ब्राह्मण संप्रदाय में शास्त्र ही प्रमाण है जबकी बुद्ध धम्म में शास्त्र तब तक प्रमाण नहीं माना जाता जबतक की वो तर्क बुद्धि विवेक पर खरी न उतरे।
यानी कोई किताब खोल कर सबूत दिखाए तो ब्राह्मण संप्रदाय में सबूत मान लिया जाएगा लेकिन बुद्ध धम्म में तब तक उसे सबूत नहीं माना जाता जब तक कि वो मानवता की भलाई के लिए न हो।
रेफ़्रेंस संलग्न है ख़ुद पढ़ लेवे।
आप प्रतिनिधि चुनते है जो सरकार चलाए लेकिन जब धर्मनिरपेक्ष देश में एक धर्मविशेष के कर्मकांडी, काल्पनिक कथाकहानी वाचक जो की किसी भी संवैधानिक पद पर न हो फिर भी उसके सामने सदन में प्रतिनिधि झुकता नजर आए आर्शीवाद लेता आये तो क्या डेमोक्रेसी का अपमान है?
या प्रतिनिधि का ग़लत चुनाव हुआ है?
मनुस्मृति पोलखोल Part5
चैप्टर 1, श्लोक 26-32
श्लोक 26
कर्मणां च विवेकार्थं धर्माधर्मौ व्यवेचयत्।
द्वन्द्वैरयोजयच्चेमाः सुखदुःखादिभिः प्रजाः॥ २६॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने कर्मों के भेद को समझाने के लिए धर्म और अधर्म को अलग किया और प्रजा को सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से जोड़ दिया।
आलोचना:
यहीं से “धर्म-अधर्म” की सत्ता शुरू होती है। सवाल यह है कि धर्म और अधर्म तय कौन करेगा? मनुष्य की करुणा, न्याय और समानता या ब्राह्मणों का गपोड़-शास्त्र?
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श्लोक 27
अण्व्यो मात्रा विनाशिन्यो दशार्धानां तु याः स्मृताः।
ताभिः सार्धमिदं सर्वं सम्भवत्यनुपूर्वशः॥ २७॥
अर्थ:
पांच महाभूतों की नष्ट होने वाली सूक्ष्म मात्राओं—रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श—के साथ यह संसार क्रमशः उत्पन्न होता है।
आलोचना:
यहां संसार को सूक्ष्म तत्वों से बना बताया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब सारी सृष्टि समान तत्वों से बनी है, तो मनुष्य-मनुष्य में जन्म से ऊंच-नीच कहां से आ गई?
अगर जीवन का आधार समान है, तो किसी का स्पर्श “शुद्ध” और किसी का स्पर्श “अशुद्ध” कैसे?
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श्लोक 28
यं तु कर्मणि यस्मिन्स न्ययुङ्क्त प्रथमं प्रभुः।
स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमानः पुनः पुनः॥ २८॥
अर्थ:
सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने जिस जीव को जिस कर्म में नियुक्त किया, वह बार-बार जन्म लेकर वही कर्म करता रहा।
आलोचना:
यह श्लोक बेहद खतरनाक है। इसमें कहा गया कि जीव का कर्म पहले से नियुक्त है और वह जन्म-जन्मांतर तक वही करता रहता है। यही विचार आगे जाति-आधारित पेशे और सामाजिक गुलामी को धार्मिक आधार देता है।
यानी अगर किसी को सेवा-कर्म में डाल दिया गया, तो वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही करेगा। अगर किसी को ज्ञान पर अधिकार दे दिया गया, तो वह जन्म से श्रेष्ठ माना जाएगा।
यह मनुष्य की स्वतंत्रता पर हमला है।
यह प्रतिभा, शिक्षा, मेहनत और चुनाव के अधिकार को खत्म करता है।
यह कहता है—तुम्हारा भविष्य तुम्हारे जन्म से पहले तय है।
ऐसी सोच न्याय नहीं, ब्राह्मणवादी कैद है।
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श्लोक 29
हिंसाऽहिंसे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते।
यद्यस्य सोऽदधात्सर्गे तत्तस्य स्वयमाविशत्॥ २९॥
अर्थ:
सृष्टि के समय ब्रह्मा ने जिस जीव में हिंसा-अहिंसा, कोमलता-क्रूरता, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य जैसे गुण रखे, वह जीव उनमें प्रवृत्त हुआ।
आलोचना:
यह श्लोक नैतिकता को व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना से हटाकर पूर्वनिर्धारित गुणों में बदल देता है। यानी कोई हिंसक है, कोई अहिंसक है, कोई सत्यवादी है, कोई असत्यवादी है—क्योंकि सृष्टि में ऐसा डाल दिया गया।
यह सोच खतरनाक है, क्योंकि इससे अन्याय का जिम्मेदार व्यक्ति या समाज नहीं, “पूर्व-निर्धारित प्रकृति” बन जाती है।
जो अत्याचारी है, वह कह सकता है—मेरा स्वभाव ऐसा है।
जो शोषक है, वह कह सकता है—मेरा कर्म ऐसा है।
जो पीड़ित है, उसे कहा जाएगा—तुम्हारा भाग्य ऐसा है।
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श्लोक 30
यथर्तुलिङ्गान्यृतवः स्वयमेवर्तुपर्यये।
स्वानि स्वान्यभिपद्यन्ते तथा कर्माणि देहिनः॥ ३०॥
अर्थ:
जैसे ऋतुएं अपने-अपने समय पर अपने चिह्न धारण करती हैं, वैसे ही जीव अपने-अपने जन्मजात कर्म प्राप्त करते हैं।
आलोचना:
यहां मनुष्य के कर्म को ऋतुओं की तरह प्राकृतिक बताया गया है। यही सबसे चालाक तुलना है। ऋतु का आना प्राकृतिक है, लेकिन किसी मनुष्य को जन्म से सेवक, किसी को जन्म से ज्ञानी और किसी को जन्म से शासक मानना प्राकृतिक नहीं है।
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श्लोक 31
लोकानां तु विवृद्ध्यर्थं मुखबाहूरूपादतः।
ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तयत्॥ ३१॥
अर्थ:
लोकों की वृद्धि के लिए ब्रह्मा ने अपने मुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, जंघा से वैश्य और चरणों से शूद्र को उत्पन्न किया।
आलोचना:
यह श्लोक मनुस्मृति की जातिवादी रीढ़ है। यहां पहली बार समाज को शरीर के अंगों से जोड़कर ऊंच-नीच का धार्मिक ढांचा बनाया जाता है।
यह केवल प्रतीक नहीं है; इतिहास में इसी प्रतीक ने सामाजिक सत्ता बनाई। शूद्र को पैरों से पैदा बताकर उसे नीचे रखने की वैचारिक जमीन तैयार की गई।
यह श्लोक मानव-समानता के विरुद्ध धार्मिक असमानता का घोषणापत्र है।
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श्लोक 32
द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽभवत्।
अर्धेन नारी तस्यां स विराजमसृजत्प्रभुः॥ ३२॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने अपने शरीर को दो भागों में विभाजित किया। आधे भाग से पुरुष और आधे से स्त्री उत्पन्न हुई। फिर उस स्त्री से विराट की रचना की।
आलोचना:
यहां ऊपर से यह समानता जैसी लग सकती है कि आधा पुरुष और आधा स्त्री। लेकिन मनुस्मृति का आगे का चरित्र देखें तो स्त्री को स्वतंत्र व्यक्ति नहीं, पुरुष-नियंत्रित सत्ता के अधीन माना जाता है।
अगर स्त्री सृष्टि का आधा हिस्सा है, तो उसे आधा अधिकार क्यों नहीं?
समाज में स्त्री को द्वितीय दर्जे का क्यों माना गया?
रामायण टीवी सिनेमा देख के जानने वाले अक्सरहा गर्भवती सीता निष्कासन का ठीकरा धोबी पर फोड़ते है ये भी एक जातिवादी मानसिकता ही है।
वाल्मीकि रामायण में धोबी नहीं बल्की राम के सखा भद्र से राम गुप्त सूचना लेकर सीता को जंगल भे बिना बताए भेजने का फैसला लेते है।
एक धोबी ने भरी सभा में सीता की पवित्रता पर सवाल उठाये, निंदा की. इसके बाद श्रीराम ने प्रजा को ध्यान में रखते हुए अपनी पत्नी सीता को महल से बाहर निकालकर जंगल में रहने का आदेश दिया. उस समय सीता गर्भवती थीं. उन्होंने वाल्मीकि के आश्रम में लव और कुश को जन्म दिया. सीता की कोई गलती नहीं थी, लेकिन समाज ने उन्हें गलत साबित करने में उस समय कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी.
( आज अयोध्या में आकर अनायास ये क़िस्सा मन में आ गया )
इसके पहले हम जानते हैं कि लालच कैकेयी और मंथरा के मन में था. श्रीराम का कोई लेना देना नहीं था, वो तो पिता के आदेश का पालन कर रहे थे, लेकिन उन्हें बिना किसी गलती के 14 वर्ष का वनवास झेलना पड़ा. राम जी की कोई गलती नहीं थी फिर भी.
( अयोध्या में कुछ ऐसा है जो हमेशा मन को विचलित करता है )
आख़िर थे ये सभी ब्राह्मण ही बिना किसी सबूत के चाणक्य, वैदिक काल, गुप्त वंश में हिंदू ब्राह्मण स्थापित कर देश का बाँटधार कर दिए लेकिन उनसे कहीं ज़्यादा बड़े आज के गपोड़े है जिन्हे लोग इतिहासकार समझ रहे है ये तो काल्पनिक कथा कहानियों को इतिहास में घुसेड़ दे रहे है।
रोमिला थापर, डीएन झा, मृदुला मुखर्जी, आरएस शर्मा, आदित्य मुखर्जी, विपान चंद्रा, पार्थ चटर्जी आदि वामपंथियों ने साठ-पैंसठ साल तक भारत का इतिहास लिखा. टेक्स्ट बुक लेखन में एकछत्र राज था.
अब इनकी महारानी थापर जी का कहना है कि हम जनता को सही इतिहास पढ़ा नहीं पाए इसलिए बीजेपी आ गई!
दरअसल ये सब कांग्रेस का चुनावी समीकरण साधने के लिए इतिहास लिख रहे थे. कांग्रेस की चुनावी लाइन फेल हुई है तो वामपंथी इतिहासकारों को लग रहा है कि वे फेल हो गए हैं.
एक महान ओबीसी इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल थे, जो इनसे कहीं ज्यादा प्रतिभाशाली थे, पर राष्ट्रवादी कह कर उनको खारिज कर दिया गया. उनको स्कूलों और कॉलंजों में नहीं पढ़ाया जाता. उनकी धारा के सभी इतिहासकार बर्फ में लगा दिए गए.
मनुस्मृति पोलखोल Part4
चैप्टर 1, श्लोक 20-25
श्लोक 20
आधार्य गुणं त्वेषामवानोति परः परः।
यो यो यावतिथश्चैषां स स तावद् गुणः स्मृतः॥ २०॥
अर्थ:
इन पांच महाभूतों—आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—में क्रमशः गुण बढ़ते जाते हैं। आकाश में शब्द, वायु में शब्द-स्पर्श, तेज में रूप, जल में रस और पृथ्वी में गंध आदि गुण माने गए हैं।
आलोचना:
यहां पंचमहाभूतों और उनके गुणों की दार्शनिक व्याख्या आधुनिक विज्ञान नहीं, गपोड़ कल्पना है।
समस्या तब है जब ऐसेगपोड़ को समाज की जन्म-आधारित व्यवस्था के लिए आधार बनाया जाता है।
सवाल सीधा है:
अगर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश सबके लिए समान हैं, तो फिर मनुष्य को जन्म के आधार पर अलग-अलग दर्जों में क्यों बांटा गया?
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श्लोक 21
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।
वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे॥ २१॥
अर्थ:
सृष्टि के आरंभ में ईश्वर ने वेद के शब्दों के आधार पर सबके नाम, कर्म और अलग-अलग व्यवस्थाएं बना दीं।
आलोचना:
यह श्लोक बेहद खतरनाक विचार की जमीन तैयार करता है। यहां कहा जा रहा है कि नाम, कर्म और व्यवस्था पहले से वेद के अनुसार तय कर दी गई।
यहां से जन्म-आधारित पेशा और सामाजिक कैद शुरू होती है।
किसी बच्चे ने जन्म लिया और समाज ने कह दिया—तुम्हारा काम यही है।
किसी को ज्ञान का अधिकार, किसी को शस्त्र का अधिकार, किसी को धन का अधिकार और किसी को केवल सेवा का दायित्व।
यह धर्म नहीं, मानव स्वतंत्रता का अपहरण है
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श्लोक 22
कर्मात्मनां च देवानां सोऽसृजत्प्राणिनां प्रभुः।
साध्यानां च गणं सूक्ष्मं यज्ञं चैव सनातनम्॥ २२॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने देवताओं, प्राणियों, साध्यगणों और सनातन यज्ञ की रचना की।
आलोचना:
यहां ब्राह्मणों के “यज्ञ” को सनातन बताक कर्मकांड को ब्रह्मांडीय व्यवस्था का हिस्सा बना दिया गया। यही वह बिंदु है जहां कर्मकांड को सामाजिक शक्ति मिलती है।
यानी कर्मकांड को ईश्वर का आदेश बताओ और फिर उसके ठेकेदारों को समाज का श्रेष्ठ वर्ग बना दो।
सवाल:
क्या समाज की प्रगति यज्ञ से होती है या शिक्षा, श्रम, विज्ञान, नैतिकता और समानता से?
अगर यज्ञ सचमुच सार्वभौमिक व्यवस्था है, तो भूख, बीमारी, जाति-अपमान और अन्याय का समाधान यज्ञों से क्यों नहीं हुआ?
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श्लोक 23
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्।
दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥ २३॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने यज्ञ की सिद्धि के लिए अग्नि, वायु और सूर्य से ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को प्रकट किया।
आलोचना:
यहां वेदों को प्राकृतिक तत्वों से उत्पन्न बताकर उन्हें दिव्य और प्रश्नों से ऊपर स्थापित करने की कोशिश है। अग्नि, वायु और सूर्य से वेदों का प्रकट होना गपोड़ है, प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं।
उद्देश्य स्पष्ट है—
पहले वेदों को सनातन और दिव्य बताओ, फिर वेदों के नाम पर सामाजिक व्यवस्था लागू करो।
फिर जो वेद पर प्रश्न करे, उसे अधर्मी कहो।
जो वर्ण-व्यवस्था पर प्रश्न करे, उसे शास्त्र-विरोधी कहो।
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श्लोक 24
कालं कालविभक्तींश्च नक्षत्राणि ग्रहांस्तथा।
सरितः सागरांश्चैव शैलान्समविषमाणि च॥ २४॥
अर्थ:
फिर ब्रह्मा ने काल-विभाग, दिन-रात, नक्षत्र, ग्रह, नदियां, समुद्र, पर्वत, समतल और विषम भूमि की रचना की।
आलोचना:
यह श्लोक पूरी प्रकृति की उत्पत्ति गपोड़ कल्पना से करता है, न की ऐतिहासिक प्रमाण से।
समस्या यह है कि जब नदियां, समुद्र, पर्वत और ग्रह अगर सबके हैं, तो फिर धर्म और वर्ण के नाम पर मनुष्य-मनुष्य में दीवारें क्यों?
सूर्य सब पर समान चमकता है, हवा सबको समान मिलती है, जल सबकी आवश्यकता है—फिर समाज में सम्मान और अधिकार समान क्यों नहीं?
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श्लोक 25
तपो वाचं रतिं चैव कामं च क्रोधमेव च।
सृष्टिं ससर्ज चैवेमां स्रष्टुमिच्छन्निमाः प्रजाः॥ २५॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने प्रजा की रचना की इच्छा से तप, वाणी, रति, काम, क्रोध और इस सृष्टि को बनाया।
आलोचना:
यहां मनुष्य के भावों—काम, क्रोध, वाणी, रति आदि—को भी दैवी सृष्टि का हिस्सा बताया गया है। लेकिन विडंबना देखिए, आगे सामाजिक व्यवस्था में इन्हीं मनुष्यों को बराबर मनुष्य नहीं माना जाएगा।
एक तरफ मनुष्य की वाणी को सृष्टि का अंग बताया जाता है, दूसरी तरफ इतिहास में बहुजन, शूद्र, स्त्रियों और वंचित वर्गों की आवाज़ दबाई गई।
एक तरफ मन को सृष्टि का हिस्सा बताया जाता है, दूसरी तरफ ज्ञान का अधिकार कुछ जन्म-विशेष वर्गों तक सीमित किया गया।
एक तरफ प्रजा की रचना की बात है, दूसरी तरफ प्रजा को समान अधिकार देने की बात नहीं है।
यही मनुस्मृति की सबसे बड़ी समस्या है—
यह मनुष्य की रचना, सृष्टि की रचना बिना पेंदी के लोटे की तरह गपोड़ती है, लेकिन मनुष्य की समानता की बात नहीं करती।
#Manusmriti
मनुस्मृति पोलखोल part3
चैप्टर 1,
श्लोक 13
ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमिं च निर्ममे।
मध्ये व्योम दिशश्चाष्टावपां स्थानं च शाश्वतम्॥ १३॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने उस अंडे के दो टुकड़ों से आकाश और पृथ्वी बनाई। बीच में अंतरिक्ष, आठ दिशाएं और जल का स्थायी स्थान बनाया।
आलोचना:
सृष्टि का रचियता “ब्रह्मा द्वारा अंडा फोड़कर पैदा हो गया।
मनुस्मृति की चाल यही है—पहले सृष्टि उत्पत्ति को गपोड़ बनाओ, फिर उसी गपोड़ के नाम पर समाज को भी वर्णों में बांट दो। यानी पहले ब्रह्मांड पर अधिकार, फिर मनुष्य पर अधिकार।
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श्लोक 14
उद्बबर्हात्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम्।
मनसश्चाप्यहङ्कारमभिमन्तारमीश्वरम्॥ १४॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने अपने से सत-असत स्वरूप मन उत्पन्न किया और मन से अहंकार उत्पन्न किया।
आलोचना:
असल अहंकार क्या है?
किसी मनुष्य का खुद को जन्म से श्रेष्ठ मानना।
किसी जाति का खुद को ईश्वर के मुंह से पैदा हुआ बताना।
किसी वर्ग का यह दावा करना कि ज्ञान, पूजा, सत्ता और सम्मान केवल उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।
इसलिए मनुस्मृति में “अहंकार” का वर्णन भी अपने आप में विरोधाभासी है। यह ग्रंथ अहंकार की बात करता है, लेकिन सामाजिक अहंकार को धर्म बना देता है।
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श्लोक 15
महान्तमेव चात्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च।
विषयाणां ग्रहीतॄणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च॥ १५॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने महत् तत्व, तीन गुण—सत्त्व, रज, तम—और विषयों को ग्रहण करने वाली पांच इन्द्रियां उत्पन्न कीं।
आलोचना:
यहां सत्त्व, रज और तम की बात करके समाज में मनुष्यों की श्रेणीकरण मानसिकता को मजबूत किया जाता है।
खतरा यह है कि जब किसी व्यक्ति या समुदाय को “सत्त्वगुणी”, “रजोगुणी” या “तमोगुणी” जैसे खांचों में डाल दिया जाता है, तो वास्तविक सामाजिक अन्याय छिप जाता है।
गरीबी, शिक्षा से वंचना, श्रम का शोषण, जातिगत अपमान—इन सबको व्यवस्था की गलती मानने के बजाय व्यक्ति के “गुण” या “कर्म” पर डाल दिया जाता है।
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श्लोक 16
तेषां त्ववयवान्सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम्।
संनिवेश्यात्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे॥ १६॥
अर्थ:
ब्रह्मा ने इन छह तेजस्वी तत्वों के सूक्ष्म अंशों को मिलाकर सभी प्राणियों की रचना की।
आलोचना:
यहां कहा गया कि सभी प्राणियों की रचना उन्हीं सूक्ष्म तत्वों से हुई। अगर सभी प्राणी एक ही तत्वों से बने हैं, तो मनुष्य-मनुष्य में जन्म आधारित ऊंच-नीच कैसे पैदा हो गई?
यही मनुस्मृति का बड़ा विरोधाभास है। सृष्टि के स्तर पर सबको समान तत्वों से बना बताती है, लेकिन समाज के स्तर पर मनुष्य को जन्म से अलग-अलग दर्जों में बांटती है।
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श्लोक 17
यन्मूर्त्यवयवाः सूक्ष्मास्तानीमान्याश्रयन्ति षट्।
तस्माच्छरीरमित्याहुस्तस्य मूर्तिं मनीषिणः॥ १७॥
अर्थ:
इन छह सूक्ष्म अवयवों के आश्रय से शरीर बनता है, इसलिए ज्ञानी लोग उसे शरीर कहते हैं।
आलोचना:
इस श्लोक में शरीर की रचना को सूक्ष्म तत्वों से जोड़ा गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि जब शरीर सबका तत्वों से बना है, तो किसी शरीर को जन्म से पवित्र और किसी शरीर को अपवित्र क्यों माना गया?
जाति-व्यवस्था ने शरीर तक को अपमानित किया। किसी का स्पर्श अपवित्र, किसी का जन्म नीच, किसी का श्रम गंदा—यह सब उसी मानसिकता का परिणाम है, जिसे मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने वैचारिक आधार दिया।
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श्लोक 18
तदाविशन्ति भूतानि महान्ति सह कर्मभिः।
मनश्चावयवैः सूक्ष्मैः सर्वभूतकृदव्ययम्॥ १८॥
अर्थ:
आकाश आदि महाभूत अपने-अपने कर्मों सहित उस ब्रह्म में प्रवेश करते हैं, और मन भी अपने सूक्ष्म अवयवों सहित सभी प्राणियों में प्रकट होता है।
आलोचना:
यहां “कर्म” की भाषा को सामाजिक अन्याय सही ठहराने का सबसे बड़ा हथियार बनाया गया है।
गरीब को—पिछले जन्म का कर्म।
जातिगत अपमान को —कर्मफल।
शिक्षा से दूर रखा गया—कह दो उसका धर्म सेवा है।
सत्ता और ज्ञान पर कब्जा—कह दो वह जन्म से योग्य है।
मनुस्मृति का खतरनाक पक्ष यही है कि यह मनुष्य के वर्तमान दुख को बदलने के बजाय उसे दैवी-कर्म व्यवस्था में फंसा देती है।
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श्लोक 19
तेषामिदं तु सप्तानां पुरुषाणां महौजसाम्।
सूक्ष्माभ्यो मूर्तिमात्राभ्यः सम्भवत्यव्ययाद्व्ययम्॥ १९॥
अर्थ:
इन सात महातेजस्वी तत्वों के सूक्ष्म अंशों से यह नश्वर संसार अविनाशी तत्व से उत्पन्न होता है।
आलोचना:
यहां संसार को अविनाशी तत्व से उत्पन्न नश्वर रूप बता सामाजिक प्रश्नों से भागने का माध्यम बनती है।
जब जनता समानता मांगेगी, तो कहा जाएगा—यह संसार नश्वर है।
जब शोषित अधिकार मांगेगा, तो कहा जाएगा—कर्मफल है।
जब जाति पर सवाल होगा, तो कहा जाएगा—धर्मशास्त्र सनातन है।
जब तर्क मांगा जाएगा, तो कहा जाएगा—यह सूक्ष्म और अचिन्त्य है।
यानी मनुस्मृति में दर्शन का उपयोग मुक्ति के लिए नहीं, व्यवस्था को स्थायी बनाने के लिए होता दिखता है।
पश्चिम बंगाल में उन जातियों का नाम बताओ जिन्हें ओबीसी की लिस्ट से बाहर किया गया है ? @grok और ये भी बताओ पश्चिम बंगाल में कितने प्रतिशत ओबीसी है और किस जातिय जनगणना से यह पता चला?
मनुस्मृति सेकंड सेंचुरी का नहीं है।
ब्राह्मणवादी इतिहास की बजाय स्वतंत्र ऐतिहासिक नजरिया अपनाये।
भारत में फाह्यान 399 CA में आए थे तब उन्हें पूरे भारत में 84 तरह के पाषंडी मिले लेकिन मनु या मनुस्मृति रामायण या महाभारत गीता वेद मानने वाला कोई नहीं मिला।
645 CA में ह्यूएनसंग का समय हो या 690 CA में नालंदा विश्वविद्यालय के स्कॉलर इत्सिंग को भी पूरे भारत में कोई मनु या मनुस्मृति या कोई भी ब्राह्मणवादी ग्रंथ को मानने वाला नहीं मिला। ऐसे में मुस्लिम आगमन के बाद लिखी गई ब्राह्मणवादी किताबों को दूसरी सदी का समझना या प्रचारित करना भ्रमित होना है।
Its an interesting view into the 2nd Century Indian Society where Brāhmaṇa seem to be setting their own ideas about society through the words ascribed to Manu.
चुटिया और माथे पर ३ लकीर का हुलिया न तो ह्यूएनसंग को भारत में दिखा था न ही सातवी सदी में इत्सिंग को और उससे पहले फाहयान को।जबकी फाहयान गुप्त काल के दौरान ही भारत में 15 साल थे और न मैग्स्थनीज़ को जो चदगुपत के दरबारी थे।
काल्पनिक चाणक्य⛄️
भारत के सबसे बड़े भाषा वैज्ञानिक डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह का कहना है. जब सभी इतिहासकार मानते हैं कि अर्थशास्त्र की भाषा गुप्तकाल की है,
तब क्यों नही यह मान लिया जाता है की कौटिल्य, चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार का नही, बल्कि गुप्तवंश राजा चंद्रगुप्त प्रथम या द्वितीय का सलाहकार रहा होगा.
मौर्य काल में जाति वर्ण अव्यवस्था का प्रमाण दिखाने के लिए लगता है गुप्तवंश राजा चंद्रगुप्त के संस्कृत भाषा बोलने वाले सलाहकार को चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में बिठा दिया गया,
जहां मौर्य सम्राट को संस्कृत भाषा नही, प्राकृत भाषा आती है. इतिहास लिखने में इतना बड़ा भ्रष्टाचार आखिर क्यों किया गया ?
मित्रों, राजनीति और सामाजिक शास्त्र के अलावा इतिहास पर भी ध्यान दीजिए. इतिहास में भी यह लोग श्रेष्ठ बनकर अपने सर पर बैठ गए हैं ताकि इनका वर्चस्व बना रहे.
मनुस्मृति पोलखोल Part-2
चैप्टर 1, श्लोक 7-12,
श्लोक 7
योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातनः।
सर्वभूतमयोऽचिन्त्यः स एव स्वयमुद्बभौ॥ ७॥
अर्थ:
जो इन्द्रियों से परे, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सभी प्राणियों में व्याप्त और अचिन्त्य है, वही स्वयं प्रकट हुआ।
आलोचना:
जिस बात को प्रमाण से सिद्ध नहीं किया जा सकता, उसे “इन्द्रियों से परे”, “अचिन्त्य”, “अव्यक्त” कहकर सवालो से भागने की कोशिश।
जब कोई चीज़ न दिखाई दे, न जांची जा सके, न तर्क से समझी जा सके, फिर भी उसे अंतिम सत्य घोषित कर दिया जाए, तो यह ज्ञान नहीं, आस्था के नाम पर गपोड़ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यह सत्ता “सर्वभूतमय” यानी सभी प्राणियों में समान रूप से व्याप्त है, तो ब्राह्मण श्रेष्ठ और शूद्र सेवक कैसे हो गया?
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श्लोक 8
सोऽभिध्याय शरीरात्स्वात्सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ ८॥
अर्थ:
उस परमात्मा ने अनेक प्राणियों को उत्पन्न करने की इच्छा से अपने शरीर से पहले जल उत्पन्न किया और उसमें बीज डाला।
आलोचना:
यहां सृष्टि की व्याख्या वैज्ञानिक आधार पर नहीं, बल्कि कल्पनात्मक रूप में की गई है। “अपने शरीर से जल उत्पन्न किया” और “उसमें बीज डाला”—यह दर्शन नहीं विशुद्ध गपोड़ है।
यह सवाल उठता है कि जो ग्रंथ समाज के कानून, धर्म और कर्तव्य तय करने का दावा करता है, उसकी शुरुआत ही गपोड़ से क्यों होती है जिसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं?
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श्लोक 9
तदण्डमभवद्धैमं सहस्रांशुसमप्रभम्।
तस्मिञ्जज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः॥ ९॥
अर्थ:
वह बीज सूर्य के समान चमकने वाला स्वर्णिम अंडा बन गया। उसी में सब लोकों के पितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए।
आलोचना:
यहां “स्वर्णिम अंडे” से ब्रह्मा के जन्म की गपोड़ कल्पना हांकी गई है। इसे इतिहास, विज्ञान या सामाजिक न्याय का आधार नहीं बनाया जा सकता।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अगर ब्रह्मा “सर्वलोकपितामह” हैं, यानी सबके पितामह हैं, तो उनकी संतानें जन्म से असमान कैसे हो गईं?
कोई जन्म से पूज्य और कोई जन्म से नीच कैसे घोषित किया गया?
यहीं मनुस्मृति की धूर्तता दिखती है—पहले सबको एक दिव्य स्रोत से उत्पन्न बताओ, फिर आगे जाकर उसी मानव-समाज को वर्णों में बांटकर स्थायी असमानता लागू करो।
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श्लोक 10
आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
ता यदस्यायनं पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥ १०॥
अर्थ:
जल को “नारा” कहा गया है, क्योंकि जल नर से उत्पन्न हुआ है। जल पहले उसका निवास था, इसलिए वह नारायण कहलाया।
आलोचना:
यहां शब्दों की व्युत्पत्ति के आधार पर धार्मिक अर्थ गढ़े जा रहे हैं। “नर”, “नारा”, “नारायण”—इन शब्दों को जोड़कर गपोड़ा गया है लेकिन भाषा की ऐसी व्याख्या प्रमाण नहीं बन जाती।
यह तरीका बहुत खतरनाक है,
शब्दों का खेल करके ईश्वर, धर्म, वर्ण और समाज की व्यवस्था गढ़ दी जाती है, फिर कहा जाता है—यह सनातन सत्य है।
सवाल यह है कि क्या समाज का न्याय शब्द-व्युत्पत्ति से तय होगा या मानव-मर्यादा और समानता से?
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श्लोक 11
यत्तत्कारणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
तद्विसृष्टः स पुरुषो लोके ब्रह्मेति कीर्त्यते॥ ११॥
अर्थ:
जो अव्यक्त, नित्य और सत-असत स्वरूप कारण है, उससे उत्पन्न पुरुष संसार में ब्रह्मा कहलाता है।
आलोचना:
यहां फिर “अव्यक्त”, “नित्य”, “सत-असत” जैसे दार्शनिक शब्दों का गपोड़ खड़ा किया गया है ताकि सामान्य मनुष्य सवाल ही न पूछे।
लेकिन कोई भी व्यवस्था, चाहे वह कितनी भी गपोड़ क्यों न हांके, अगर मनुष्य को जन्म से छोटा-बड़ा बनाती है, तो वह नैतिक नहीं हो सकती।
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श्लोक 12
तस्मिन्नण्डे स भगवानुषित्वा परिवत्सरम्।
स्वयमेवात्मनो ध्यानात्तदण्डमकरोद् द्विधा॥ १२॥
अर्थ:
उस अंडे में भगवान ने एक वर्ष तक निवास किया और फिर अपने ध्यान से उस अंडे को दो भागों में बांट दिया।
आलोचना:
“स्वर्णिम अंडा”, “उसमें भगवान का रहना”, “ध्यान से अंडे को दो भागों में बांटना”- ऐसे धूर्तता को प्रमाणिक ज्ञान मानकर समाज की वास्तविक व्यवस्था तय करना खतरनाक है।
तीखा सवाल यह है कि अगर यह सब प्रतीक है, तो फिर इसी ग्रंथ की वर्ण-व्यवस्था को शाब्दिक सत्य क्यों माना गया?
और अगर इसे शाब्दिक सत्य माना जाए, तो फिर इसका प्रमाण क्या है?
यही दोहरा खेल है—जहां बात अवैज्ञानिक लगे, वहां कहा जाता है “यह प्रतीक है”; और जहां सत्ता चाहिए, वहां कहा जाता है “यह धर्मशास्त्र है, मानना पड़ेगा।”
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सबसे बड़ा विरोधाभास यही है:
अगर ईश्वर सबमें है, तो जाति क्यों?
अगर ब्रह्मा सबके पितामह हैं, तो जन्म से ऊंच-नीच क्यों?
अगर सृष्टि एक स्रोत से निकली है, तो मनुष्य का धर्म अलग-अलग वर्णों में क्यों बांटा गया?
अगर यह सब अचिन्त्य है, तो इसे समाज का कानून बनाने का अधिकार किसने दिया?
NCERT बुक में मनुस्मृति श्लोक डाला जा रहा है ऐसे में यह जरूरी है की ब्राह्मणवादी धूर्त मानसिकता को अच्छे से समझा जाय।
आज चैप्टर 1 से शुरुवात करते है।
मनुस्मृति की शुरुआत ही वर्ण-व्यवस्था को “धर्म” बनाकर पेश करती है
श्लोक 1
मनुमेकाग्रमासीनमभिगम्य महर्षयः।
प्रतिपूज्य यथान्यायमिदं वचनमब्रुवन्॥ १॥
अर्थ: महर्षि, एकाग्र होकर बैठे मनु के पास गए, उनका पूजन किया और उनसे प्रश्न किया।
आलोचना:
यहां शुरुआत ही “मनु” को सर्वोच्च ज्ञाता बनाकर की गई है। यानी समाज का कानून, नैतिकता और व्यवस्था किसी लोकतांत्रिक विचार-विमर्श से नहीं, बल्कि एक व्यक्ति/ऋषि-परंपरा की कथित दिव्य सत्ता से तय होनी है। यही मनुस्मृति की सबसे बड़ी समस्या है—यह मनुष्य की स्वतंत्र बुद्धि नहीं, बल्कि अंध-श्रद्धा और अधिकारवादी ज्ञान-व्यवस्था को आधार बनाती है।
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श्लोक 2
भगवन्सर्ववर्णानामन्तरप्रभवाणां च।
धर्मान्नो वक्तुमर्हसि॥ २॥
अर्थ: हे भगवन! सभी वर्णों और संकीर्ण जातियों के धर्म हमें बताइए।
आलोचना:
यहीं से मनुस्मृति का असली एजेंडा सामने आ जाता है। प्रश्न मानवता, समानता या न्याय का नहीं है; प्रश्न है—किस वर्ण और किस जाति का धर्म क्या होगा। यानी जन्म के आधार पर मनुष्य का कर्तव्य पहले से तय कर देना। यही विचार आगे चलकर जाति-व्यवस्था, ऊंच-नीच, अस्पृश्यता और सामाजिक गुलामी का वैचारिक हथियार बनता है।
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श्लोक 3
त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुवः।
अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्यतत्त्वार्थवित्प्रभो॥ ३॥
अर्थ: हे प्रभो! इस स्वयं उत्पन्न, अचिन्त्य, अप्रमेय ब्रह्म के विधान का तत्त्वार्थ आप ही जानते हैं।
आलोचना:
यहां मनु को लगभग “अंतिम प्राधिकारी” घोषित किया गया है। जब किसी व्यवस्था को “अचिन्त्य” और “अप्रमेय” बता दिया जाता है, तो उसका मतलब होता है—उस पर सवाल मत करो। यही ब्राह्मणवादी ग्रंथों की चाल है: पहले व्यवस्था को ईश्वरीय बताओ, फिर उसे प्रश्नों से ऊपर रख दो। लेकिन जो व्यवस्था मनुष्य को जन्म से ऊंचा-नीचा बनाती है, वह “धर्म” नहीं, अन्याय का शास्त्रीकरण है।
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श्लोक 4
स तैः पृष्टस्तथा सम्यगमितौजा महात्मभिः।
प्रत्युवाचार्च्य तान्सर्वान्महर्षीञ्छ्रूयतामिति॥ ४॥
अर्थ: महर्षियों द्वारा पूछे जाने पर तेजस्वी मनु ने कहा—सुनो।
आलोचना:
यहां पूरा दृश्य ऐसा रचा गया है कि मनु बोलेंगे और बाकी सब सुनेंगे। कोई बहस नहीं, कोई प्रतिप्रश्न नहीं, कोई सामाजिक अनुभव नहीं। यानी सत्ता एकतरफा है। मनुस्मृति ज्ञान नहीं, तानाशाही थोपती है।
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श्लोक 5
आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ ५॥
अर्थ: आरंभ में यह जगत अंधकारमय, अज्ञात, लक्षणहीन, तर्क से परे और सोया हुआ था।
आलोचना:
यहां सृष्टि की शुरुआत को तर्क और प्रमाण से नहीं, गपोड़ से समझाया गया है। “अप्रतर्क्यम्” यानी जिसे तर्क से न जाना जा सके। यही समस्या है—जहां तर्क खत्म होता है, वहां अंधविश्वास शुरू होता है। अगर समाज की व्यवस्था भी इसी “अप्रतर्क्य” आधार पर बनाई जाएगी, तो फिर न्याय, समानता और मानवाधिकार की कोई जगह नहीं बचेगी।
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श्लोक 6
ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्।
महाभूतादि वृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः॥ ६॥
अर्थ: फिर स्वयंभू भगवान प्रकट हुए और अंधकार को दूर किया।
आलोचना:
यहां सत्ता का स्रोत फिर “स्वयंभू भगवान” बना दिया गया। आगे चलकर इसी ईश्वरीय आधार पर वर्ण-व्यवस्था को प्राकृतिक और धार्मिक बताया जाता है। सवाल यह है—अगर सबका निर्माता एक है, तो मनुष्य जन्म से ऊंचा-नीचा कैसे हो गया? अगर ईश्वर सबका है, तो किसी को ब्राह्मण, किसी को शूद्र, किसी को सेवक और किसी को शासक बनाने का अधिकार किसने दिया?
निष्कर्ष
मनुस्मृति की शुरुआत ही साफ कर देती है कि यह ग्रंथ मानव-समानता का ग्रंथ नहीं है, बल्कि वर्ण और जाति आधारित समाज को धार्मिक वैधता देने वाला ग्रंथ है। इसमें मनुष्य को मनुष्य नहीं, बल्कि जन्म-आधारित श्रेणियों में बांटने की भूमिका तैयार की जाती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अन्याय को सीधे अन्याय नहीं कहा गया, बल्कि उसे “धर्म” कह दिया गया। यही मनुस्मृति की वैचारिक चाल है—
जन्म से बंटवारा करो, उसे ईश्वर की इच्छा बताओ, फिर सवाल करने वालों को अधर्मी घोषित करो।
एक न्यायपूर्ण समाज में धर्म वह होना चाहिए जो मनुष्य को आज़ाद करे, बराबर बनाए और सम्मान दे। लेकिन मनुस्मृति की शुरुआत ही यह संकेत देती है कि उसका लक्ष्य बराबरी नहीं, बल्कि वर्ण-व्यवस्था को स्थायी बनाना है।
सवाल सीधा है:
जो ग्रंथ मनुष्य के जन्म से उसका धर्म तय करता है, क्या वह मानवता का ग्रंथ हो सकता है?
जो व्यवस्था तर्क से ऊपर बताई जाती है, क्या वह न्यायसंगत हो सकती है?
#Manusmriti
@grok इस चढ़ावे डकैती में राम की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है क्या? @grok क्या राम मंदिर में चढ़ावा डकैती होगा और राम चुपचाप देखते रहेंगे तो फिर राम पर श्रद्धा रखने का मतलब क्या है जब वो अपने नाक के नीचे के भ्रष्टाचार तक होने दे रहे ?
@grok थाइलैंड बुद्धिस्ट देश है वहाँ हिंदू हनुमान के पद क्या कर रहे है ? जबकि वाल्मीकि रामायण के काल्पनिक हनुमान कभी श्रीलंका या इंडोनेशिया गए इसका जीकर भी नहीं है।
फुटप्रिंट का इतिहास: तथागत के फुटप्रिंट सबसे पुराने पाए जाते है जो बुद्धिस्ट देशों ने सहेजा है। भारत हो या इंडोनेशिया, आज का श्रीलंका हो या थाईलैंड ये सभी बुद्धिस्ट देश है।
@grok फैक्ट चेकिंग करके बताओ की संलग्न पोस्ट में हनुमान के फुटप्रिंट दावा फेक है ।
भारत की न्यायव्यवस्था क्या ब्राह्मणवादी व्यवस्था बन चुकी है ?
सोमनाथ महाविहार को कब हिंदू मंदिर कहके कब्जा किया गया?
क्या ये बौद्ध धरोहर वापस बौद्ध अनुवायीयों को सौपी जाएगी?
ऐसे तमाम प्रश्नों के मिलेंगे जवाब।
आज 7:00pm, 28 June 2026, Rational World Youtube Live देखना न भूले।
संलग्न पोस्ट ह्वाट्सऐप यूनिवर्सिटी से पढ़ाई का नतीजा।
फैक्ट: सनातन सभ्यता समन सभ्यता को कहा जाता है।
वेद कब कौन गा रहा था इसका एविडेंस नील बट्टे सन्नाटा जबकि इत्सिंग(690CA) ने बताया पूरा भारत और समुंद्री दीप बुद्धचरित गाते थे। साथ ही तक्षशिला और नालंदा बुद्धिस्ट महाविहार थे।