Their entire narrative is built on lies.
@shubhankrmishra Bhai, I know you���ll get hate from many ignorant people for this video.
But we have to rise above the hate, speak the truth, and keep exposing the reality to the world.
आरक्षण से बने डॉक्टर शारदा ने, पूरे घर का इकलौता बेटा का हाथ टुकड़ो में काट दिया😭😥
पेट की बीमारी में हाथ का क्या कनेक्शन🙄
गया था बेचारा लोहिया हॉस्पिटल लखनऊ में पेट का ईलाज कराने, और अनपढ़ डॉक्टर शारदा ने काट दिया हाथ,वो भी कई बार मे😡😡
और कम्प्लेन करने पर भगा रहे हैं 😡
इस अनपढ़ डॉक्टर, और हॉस्पिटल पर कार्यवाही होनी ही चाहिए और उसको हर्जाना भी मिलना चाहिए😡😡
🚨 अब आरक्षण का मुद्दा स्कूलों तक पहुँच गया है।
एक क्लास टीचर ने छात्रों की दो कतारें बनाईं – एक जनरल की और एक SC/ST की। दोनों को आरक्षण पर बोलना था।
SC लड़की ने कहा कि जनरल को EWS का फायदा मिलता है।
तुरंत जनरल लड़की ने जवाब दिया – फिर हर SC/ST को आरक्षण क्यों मिलता है? उनमें अमीर-गरीब का कोई फर्क नहीं माना जाता, जो गलत है। सिर्फ गरीबों को ही आरक्षण मिलना चाहिए।
SC/ST वाली कतार से किसी के पास जवाब नहीं था। लड़की ने अकेले ही पूरी डिबेट खत्म कर दी 🙏
थोड़ा समय निकाल कर इस युवा को सुनिए.
जिनको लोकतंत्र में यकीन है वे जरूर सुनें.
जिनको यकीन नहीं है वे थोड़ी देर के लिए अपनी विचारधारा को ताक पर रख कर सुनें.
आपको इस युवक की आवाज़ में भारत के लोकतंत्र की आत्मा की आवाज़ और करोड़ों करोड़ों ऐसे लोग जो आज भी तंगहाली का जीवन जी रहे हैं और अपने परिवार के 2 जून की रोटी के लिए सुबह से शाम तक खटते रहते हैं उनकी कराहती आवाज सुनाई पड़ेगी.
बैकग्राउंड में म्यूजिक है. इसका अपना इफ़ेक्ट है. उसे आप इग्नोर भी कर सकते हैं पर हर शब्द में आपको ऐसे भारत की आवाज सुनाई पड़ेगी जो अच्छी शिक्षा चाहता है, रोजगार चाहता है, सामंतशाही, भ्रष्टाचार और दमन से मुक्ति चाहता है और एक अच्छे जीवन की तलाश में दिन रात लगा रहता है जो मृगमरीचिका की तरह कभी यथार्थ में तब्दील नहीं होती.
हाल ही में रिलीज़ हुई फ़िल्म 'कर्तव्य' में पत्रकार सौरभ द्विवेदी की एक्टिंग बेहद खराब थी, कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है। असल में, फ़िल्म में उन्होंने जो कुछ भी करने की कोशिश की—जिसमें उन्हें मुख्य विलेन के तौर पर कास्ट किया गया था—उसमें एक्टिंग का नामोनिशान तक नहीं था।
मुझे हैरानी हुई कि डायरेक्टर या प्रोड्यूसर की ऐसी क्या मजबूरी थी कि उन्होंने सौरभ को कास्ट किया। क्या सौरभ या उनके किसी शुभचिंतक ने फ़िल्म में ���ैसा लगाया था? या फिर ऊपर से कोई ऐसा निर्देश आया था कि उन्हें एक्टिंग करने का अपना शौक पूरा करने का मौका दिया जाए?
ज़्यादा से ज़्यादा, अगर उन्हें फ़िल्म में लेना ही था—और अगर उन्हें खुश करने की कोई मजबूरी थी—तो उन्हें किसी पत्रकार का रोल दिया जा सकता था, जिसमें वे फ़िल्म के किसी सीन में किसी किरदार का इंटरव्यू लेते नज़र आते।
लेकिन मुझे फ़िल्म के प्रोड्यूसर और डायरेक्टर की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने सौरभ की "एक्टिंग स्किल्स" पर भरोसा किया—जो कि उन सभी सीन्स में पूरी तरह से नदारद थीं जिनमें सौरभ नज़र आए—और उन्हें मुख्य विलेन के तौर पर कास्ट कर लिया, भले ही इससे फ़िल्म के फ्लॉप होने का खतरा था।
असल में, @saurabhtop के चेहरे पर किसी भी तरह के हाव-भाव का न होना, और उतनी ही दर्दनाक तरीके से सपाट डायलॉग बोलना—बिना किसी वॉइस मॉड्यूलेशन (आवाज़ में उतार-चढ़ाव) के—यह इशारा करता था कि शायद बॉलीवुड और टॉलीवुड के सभी विलेन हड़ताल पर चले गए थे, और उस खास रोल के लिए कोई एक्टर उपलब्ध ही नहीं था।
यह कहने की ज़रूरत ��हीं है कि किसी भी ��़िल्म में मुख्य विलेन उतना ही ज़रूरी होता है जितना कि हीरो। ज़रा कल्पना कीजिए 'शोले' फ़िल्म की, जिसमें अमजद खान न हों, बल्कि सुधीर कुमार गब्बर सिंह का रोल कर रहे हों।
सौरभ द्विवेदी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी एक खास जगह बनाई है—इसलिए नहीं कि उन्होंने कोई बड़ा घोटाला उजागर किया है—बल्कि इसलिए कि उन्होंने 'गोदी मीडिया' के इस दौर में राजनेताओं से कड़े सवाल पूछे हैं।
हालांकि, उनकी साख को ए��� तस्वीर से धक्का लगा, जो बिहार विधानसभा चुनावों से पहले सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी। इस तस्वीर में वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सामने आधे-खड़े (झुके हुए) पोज़ में नज़र आ रहे थे।
मैं सौरभ द्विवेदी को पत्रकारिता के क्षेत्र में अपार सफलता की शुभकामनाएं देता हूँ, लेकिन उनसे गुज़ारिश करता हूँ कि वे फ़िल्मों में एक्टिंग करके दर्शकों को और ज़्यादा 'टॉर्चर' न करें। या फिर, वे किसी अच्छे एक्टिंग स्कूल से एक्टिंग सीख सकते हैं।
#ActingNahiAsaan #Lallantop #Bollywood #Tollywood
चीन का सबसे बड़ा एग्जाम Gaokao, जो कभी लीक नहीं होता:👇
- इस एग्जाम में हर साल 1.3 करोड़ से ज़्यादा छात्र शामिल होते हैं.
- पेपर बनाने वाले टीचर्स को 3 महीने पहले ही सेलेक्ट कर लिया जाता है.
- टीचर्स को हाई सिक्योरिटी मिलिट्री कैं��� में रखा जाता है जहाँ वे किसी से बात नहीं कर सकते, इंटरनेट के इस्तेमाल पर भी पाबंदी.
- क्वेश्चन पेपर राज्य की जेल में बने प्रिंटिंग प्रेस में प्रिंट होते हैं.
- क्वेश्चन पेपर को किसी मुख्यमंत्री के काफिले की तरह हथियारों से लेस गार्ड अलग-अलग शहरों में ले जाते हैं. गाड़ी के ड्राइवर पुलिस/मिलिट्री के लोग होते हैं.
- एग्जाम सेंटर पर ये पेपर स्टील के बेहद मजबूत कमरे में रखे जाते हैं जहाँ अलार्म और मोशन सेंसर लगे होते हैं.
- एग्जाम वाले दिन छात्र ट्रेनों में लदकर नहीं जाते बल्कि सरकार फ्री बस की व्यवस्था करती है जिसके पीछे Good Luck लिखा होता है.
- रोड पर अलग से ग्रीन कॉरिडोर बनाया जाता है ताकि छात्र समय से पहुँच सके.
- चीटिंग रोकने के लिए रेडियो फ्रीक्वेंसी डिटेक्टर का इस्तेमाल किया जाता है, छात्रों के कपड़े नहीं टटोले जाते.
- AI एप्स को भी कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाता है.
- पेपर लीक की कोशिश ������ने वाले व्यक्ति पर देशद्रोह का केस लगता है.
भक्ति रस में डूबी ये हैं @ArtSivasri
इनसे कभी मिली तो नहीं लेकिन सोशल मीडिया पर इनके कुछ वीडियो क्लिप्स देख कर प्रभावित हूं. अद्भुत गाती हैं. जितनी मीठी आवाज ��ै, उतनी ही मीठी मुस्कान भी !
जाति तभी खत्म होगी जब जाति प्रमाण पत्र बनना बंद होंगे...अब इसकी जरूरत नहीं है, जातिगत आरक्षण भी समाप्त होना चाहिए, केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर दिया जाना चाहिए।
Dharm Decode With @rahulreports #17: वेद में स्वर्ग और नर्क का असली मतलब! | Veda Explained
राहुल सिंह बताते हैं कि:
वेदों में जोर कर्म और उसके परिणाम पर है, न कि डराने वाले स्वर्ग-नर्क की कहानियों पर।
कर्म = आपके द्वारा किए गए कार्य
परिणाम = आपके कर्मों का असर
Simple Explanation:
मन शांत और जीवन संतुलित → वही स्वर्ग
मन अशांत, क्रोध और लोभ में → वही नर्क
वेद डराते नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और जीवन के सही मार्ग की शिक्षा दे���े हैं।
अगले एपिसोड Dharm Decode #18 में जानेंगे कि वेद और पुराण में असली अंतर क्या है और आखिर पुराण क्यों लिखे गए।
follow करें और जानें धर्म के रहस्य आसान भाषा में।
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