गांव बसाने में कुछ दिन नहीं बरस लागतें हैं।इन वर्षों में बांबुओं पर पतरे लगाकर कुछ मामूली बर्तनों व बिस्तर के साथ पत्थरों के चूल्हों पर खाना बनाकर जीवन गुजार रहे लोगों की हर मुश्किल में साथ किसने दिया..
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26 जनवरी 2001 को सारा भारत जब 52 वां गणतंत्र दिवस मना रहा था तब सुबह 8 बजकर 46 मिनट पर गुजरात के कच्छ जिले में एक प्रलयकारी भूकंप आया था। रिएक्टर स्केल पर 7.7 तीव्रता वाला 13805 लोगों को लील गया
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केरल के छोटे से गांव अन्डोरकोनम में एक बुजुर्ग व्यक्ति कोरोना से जिंदगी की जंग हार गये।विडंबना देखिए कि शमशान घाट में उनके शव के अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं मिली।तब परिजन ने इसके लिए सेवा भारती केरल से मदद मांगी।
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हमारे पास ओढ़ने के लिए बस अनंत आकाश बचा था और बिछाने के लिए केवल धरती। विधाता को पता नहीं क्या मंजूर था, चंद मिनटों में ही सब कुछ जमींदोज हो गया। हमने जो भी चालीस बरसों में संजोया था अब मलबे के ढेर में बदल चुका था।
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टूटे हुए घर , बस्तियों, को तो एक बार फिर बसते आपने देखा होगा, पर क्या एक पूरा गांव बसते सुना है। यदि नहीं सुना तो पढ़िए चपरेड़ी के अटल नगर बनने की कहानी सेवागाथा पर ।
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पैसे की कमी प्रतिभावान विद्यार्थी की बेड़ियां ना बनें इसके लिए मेधावी निर्धन बच्चों व मन में सेवाभाव रखने वाले समृद्ध परिवारों के बीच सेतु का कार्य किया संघ के स्वयंसेवक कर्वे जी व उनकी टीम ने। पूरी कहानी👉
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कोरोना विकट हो गई थी।मौत का आंकड़ा इतना अधिक था कि शवों को 3 दिनों तक अपने घर में रखने के लिए विवश होना पड़ रहा था।तब केरल सेवा भारती ने सेवा इंटरनेशनल की मदद से चिताग्नि प्रोजेक्ट ऐसे ही परिवारों की मदद के लिए 2019 में शुरू किया।
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