कुछ बातें
कुछ किस्से
कुछ यादें
कुछ लफ्ज़
कुछ अश्क़
कुछ तन्हाई
कुछ सिलसिले
कुछ फाँसले
कुछ दीवानगी
कुछ दिल्लगी
कुछ रंजिशें
कुछ बंदिशें
कुछ ख़्वाब
कुछ आरजू
कुछ दर्द
कुछ आघात
कुछ जज़्बात
कुछ तपिश
कुछ ख़लिश
मैं अब भी हूँ
अब भी है यह रोया हुआ अन्धकार
चारों ओर
लेकिन कहाँ है तुम्हारी आवाज
जो मेरा नाम भरकर
इसे अविकल स्वरों में बजा दे !
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सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं
- दुष्यंत कुमार
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तू किसी रेल सी गुज़रती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ एतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
- दुष्यंत कुमार
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