सरकार का कहना है कि…!!!
अरावली में दुर्लभ खनिज भंडार बहुत है…इसलिए खनन ज़रूरी है….!!!
हमारा कहना है कि…
सुप्रीम कोर्ट और संसद भवन के नीचे भी कई दुर्लभ खनिज मिल जाएँगे….!!
पहले उनके नीचे खोदो…
फिर अपने अपने पार्टी कार्यालय के नीचे खोदो…
फिर मूंदडा पोर्ट के नीचे खोदो…
फिर एंटीलिया के नीचे खोदो….
फिर भी अगर कम पड़े तो आगे विचार करेंगे…!!!
#SaveAravalli #अरावली_बचाओ_अभियान
प्रिय दिल्लीवासियों,
बची रहे जो ‘अरावली’
तो दिल्ली रहे हरीभरी!
अरावली को बचाना कोई विकल्प नहीं है बल्कि ये तो संकल्प होना चाहिए। मत भूलिए कि अरावली बचेगी तो ही एनसीआर बचेगा।
अरावली को बचाना अपरिहार्य है क्योंकि यह दिल्ली और एनसीआर के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है या कहें क़ुदरती ढाल है। अरावली ही दिल्ली के ओझल हो चुके तारों को फिर से दिखा सकती है, पर्यावरण को बचा सकती है।
अरावली पर्वतमाला ही दिल्ली के वायु प्रदूषण को कम करती है और बारिश-पानी में अहम भूमिका निभाती है।
अरावली से ही एनसीआर की जैव विविधता बची हुई है। जो वेटलैंड गायब होते चले जा रहे हैं, उन्हें यही बचा सकती है। गुम हो रहे परिंदों को वापस बुला सकती है।
अरावली से ही एनसीआर का तापमान नियंत्रित होता है।
इसके अलावा अरावली से एक भावात्मक लगाव भी है जो दिल्ली की सांस्कृतिक-ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है।
अरावली को बचाना, दिल्ली के भविष्य को बचाना है, नहीं तो एक-एक साँस लेने के लिए संघर्ष कर रहे दिल्लीवासी स्मॉग जैसे जानलेवा हालात से कभी बाहर नहीं आ पाएंगे। आज एनसीआर के बुज़ुर्ग, बीमार और बच्चों पर प्रदूषण का सबसे ख़राब और ख़तरनाक असर पड़ रहा है। यहाँ के विश्व प्रसिद्ध हॉस्पिटल और मेडिकल सर्विस सेक्टर तक बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जो लोग बीमारी ठीक करने दिल्ली आते थे, वो अब और बीमार होने नहीं आ रहे हैं।
- यही हाल रहा तो उत्तर भारत के सबसे बड़े बाज़ार और आर्थिक केंद्र के रूप में भी दिल्ली अपनी अहमियत खो देगी।
- विदेशी तो छोड़िए, देश के पर्यटक भी यहाँ नहीं आएंगे।
- न ही दिल्ली में कोई बड़ा इवेंट आयोजित होगा।
- न ही कोई राजनीतिक, शैक्षिक, अकादमिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक सम्मेलन आयोजित होगा।
- न ही ओलंपिक, कॉमनवेल्थ या एशियाड जैसी कोई बड़ी खेल प्रतियोगिता आयोजित होगी।
- यहाँ का होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी-कैब, गाइड, हैंडीक्राफ़्ट बिज़नेस, हर काम-कारोबार व अन्य सभी आर्थिक-सामाजिक गतिविधियाँ ठप्प हो जाने के कगार पर पहुँच जाएंगी।
- जब प्रदूषण की वजह से हवाई जहाज़ नहीं चलेंगे, ट्रेनें घंटों लेट होंगी, सड़क परिवहन असुरक्षित हो जाएगा, तो दिल्ली कौन आएगा।
- यहाँ तक कि इसका असर ये भी पड़ेगा कि लोग अपने बेटी-बेटे की शादी तय करने से पहले दिल्ली के हवा-पानी के बारे में सोचने लगेंगे।
- इसीलिए हर नागरिक के साथ हर स्कूल-कोचिंग, हर व्यापारी, हर कारोबारी, हर दुकानदार, हर रेहड़ी-पटरीवाले, हर घर-परिवार तक को ‘अरावली बचाओ’ अभियान का हिस्सा बनना चाहिए।
- हर चैनल, हर अख़बार को ये अभियान चलाना चाहिए। जो लोग सरकार की चाटुकारिता कर रहे हैं, वो भी समझ लें कि उनका स्वयं का जीवन भी ख़तरे में है।
अरावली को बचाना मतलब ख़ुद को बचाना है।
अगर अरावली का विनाश नहीं रोका गया तो भाजपा की अवैध खनन को वैध बनाने की साज़िश और ज़मीन की बेइंतहा भूख देश की राजधानी को दुनिया की ‘प्रदूषण राजधानी’ बना देगी और लोग दिल्ली छोड़ने को बाध्य हो जाएंगे।
इसीलिए आइए हम सब मिलकर अरावली बचाएं और भाजपा की गंदी राजनीति को जनता और जनमत की ताक़त से हराएं!
आपका
अखिलेश
जो सदियों से तूफानों को रोककर हमें पनाह देता रहा, आज वो खुद अपने वजूद की भीख मांग रहा है।
अगर ये दीवार गिर गई, तो दिल्ली-NCR को रेगिस्तान बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। विकास के नाम पर हम अपने ही 'फेफड़ों' का सौदा कर रहे हैं।
अभी नहीं जागे, तो आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी। ⛰️💔
#SaveAravalli
#Save_Aravalli
तारीख की नजरों ने, वह दौर भी देखा है
लम्हे ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई
राजस्थान की जनता दलगत राजनीति से दूर रहकर अपने भविष्य, राजस्थान के भविष्य के लिए सोचे, विचार करे और अरावली को खत्म करने का फैसले का पुरजोर विरोध करे क्योंकि सरकारें सिर्फ अपना हित देखती हैं। आज आवाज नहीं उठाई तो हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कोसेंगी।
पता नहीं यह फैसला जिसने भी और जब भी लिया, कितने नोटों के बंडलों तले दबकर लिया होगा?
सरकार कोई भी हो, कोई फर्क नहीं पड़ता यदि फैसला राजस्थान की सबसे प्राचीन विरासत को मिटाने को लेकर लिया गया है तो हमारा विरोध हमेशा रहेगा।
राजस्थान की विरासतों को खत्म करने के हर फैसले के विरोध में रहेंगे, चाहे कोई भी सरकार हो।
सादर साभार
#SaveAravalli #SaveAravali
अरावली पर हमला = बच्चों के भविष्य पर हमला! अरावली कोई नक्शे की रेखा नहीं, बल्कि गुजरात–राजस्थान–हरियाणा–दिल्ली की जीवनरेखा है। 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले पहाड़ों को अरावली न मानने का नियम दरअसल जंगलों को खनन माफिया के हवाले करने की साज़िश है।
यह विकास नहीं, खुला विनाश है। अरावली हमारा प्राकृतिक सुरक्षा कवच है — इसे मिटने नहीं देंगे! #SaveAravalli
जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए आज नहीं बोलोगे तो कब बोलोग? आने वाली पीढ़ियां ज़ब पूछेगी तूम से कि क्या रहे थे ज़ब तानाशाह द्वारा हमारी प्रकृति का विनाश किया जा रहा था, आज अगर बोलेंगे तो गर्व से कह सकेंगे कि हमने गलत का विरोध किया था और डरे नहीं थे।
#अरावली_पर्वतमाला_बचाओ
राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है—
“सिर साठे रूख/रूंख रहे तो भी सस्तो जाण”।
इस कहावत का अर्थ है कि यदि सिर कटने जैसी बड़ी कुर्बानी देकर भी पेड़, प्रकृति या समाज बच जाए, तो यह सौदा भी सस्ता माना जाता है।
यह पंक्ति राजस्थान की त्याग, बलिदान और प्रकृति-प्रेम की परंपरा को दर्शाती है, जहाँ अपने अस्तित्व से पहले धरती, जंगल और आने वाली पीढ़ियों की रक्षा को सर्वोपरि माना गया है।
#SaveAravalli