शिक्षक के बिना शिक्षा देने वाला यूपी विश्व का पहला राज्य बना हुआ है. पिछले 8 साल से शिक्षक भर्ती न देकर भी शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त किए हुए है. कम खर्च में अधिकतम आउटपुट देने में यूपी का जवाब नहीं.
@itspravin99 Lt grade ke liye har subject me 15 guna abhyarthi up me mil pana asambhav hai, lekin Europe, amerika, Afrika ke abhyarthi liye jayenge to ye 15 guna ka aankda pura ho sakta hai.
प्रबंधक शिखा अग्निहोत्री और उसका पति विनीत अग्निहोत्री शिक्षकों से हर छोटे मोटे काम के लिए एक लाख नब्बे हजार रुपए की मांग करते थे. आए दिन शिक्षकों को परेशान कर उनसे पैसे ऐंठना इनका पेशा बन गया था. आए दिन स्कूल में मारपीट की घटनाएं होती रहती थीं. एक कर्मचारी को इतना परेशान किया गया कि उसकी मृत्यु हो गई. माननीय कोर्ट ने मामूली लताड़ लगाकर छोड़ दिया जबकि दोनों पति पत्नी को फांसी की सजा होनी चाहिए थी.
प्रदेश के लाखों एडेड माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों की यही मांग है कि सरकार सभी 4512 सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों का राजकीयकरण कर अपने अधिकार में लें. प्रबन्धक और उनके रिश्तेदारों के अनाधिकृत प्रवेश के चलते लूट और शोषण का अड्डा बने इन स्कूलों को सही दिशा में ले जाना बहुत जरूरी है. @UPGovt@myogiadityanath@CMOfficeUP@gulabdeviup @ChiefSecy_UP @PrashantK_IPS90
जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती में उन युवाओं से विशेष अपील है जो युवा किसी अन्य जगह चयनित हो चुके हैं हैं वे युवा जूनियर एडेड शिक्षक भर्ती में फ़ॉर्म न भरें. किसी अन्य युवा को मौका मिलने दें. आपका यह फ़ैसला किसी के जीवन में खुशियां ला सकता है.
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जज साहब मुझे कुछ कहना है.
तुम्हें जो भी कहना हो विटनेस बॉक्स में आकर कहिए.
ऑनलाइन, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया का लब्बोलुआब भरने वालों के सर्वर एकदम पिलपिले होते हैं जरा सा लोड पड़ते ही चिरक देते हैं. मानव संपदा पोर्टल भी आए दिन मरियल रोना रोता रहता है. अरे यार कुछ नहीं कर सकते हो तो कम से कम सर्वर ही ठीक से लगा दो. पैसे वैसे की समस्या आ रही हो तो बताइये युवाओं से चंदा इकट्टा करवा दें---ऑर्डर ऑर्डर ऑर्डर
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(इसके बाद जज साहब ज़ोर जोर से हथौड़ा पटकते है)
थके हुए शिक्षक का क्लासरूम में स्वागत करना चाहती है सरकार?
◾शिक्षक समाज का दर्पण होता है। वही भविष्य की पीढ़ी का निर्माता है, लेकिन आज उसी शिक्षक का मनोबल लगातार टूट रहा है। विद्यालयों में शिक्षकों पर बढ़ते प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कार्यभार ने उन्हें मानसिक थकान और तनाव के भंवर में धकेल दिया है। परिणामस्वरूप, शिक्षा की गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ने लगा है।
◾विद्यालयों में शिक्षकों की ड्यूटी प्रातः 9 बजे से अपराह्न 3 बजे तक निर्धारित है। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह केवल “विद्यालयी समय” है, जबकि शिक्षक का कार्य इससे कहीं अधिक विस्तृत है। सुबह जल्दी उठकर विद्यालय की तैयारी, अध्यापन सामग्री तैयार करना, रिकॉर्ड अपडेट करना, विद्यालय तक आना-जाना और घर लौटकर कॉपी जांचना—इन सबके बीच उसका दिन व्यावहारिक रूप से आठ से दस घंटे का हो जाता है।
◾ऐसे में जब सरकारें शिक्षकों को बीएलओ (Booth Level Officer) की जिम्मेदारी सौंप देती हैं, तो यह उनके लिए एक नई परेशानी बन जाती है। बीएलओ का कार्य केवल कागज़ी औपचारिकता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय भ्रमण, मतदाता सूची सत्यापन, फॉर्म भरवाना और रिपोर्टिंग जैसे श्रमसाध्य कार्यों से जुड़ा होता है। अधिकारी कहते हैं कि यह कार्य “विद्यालय समय के बाद” किया जाए, लेकिन शिक्षक के पास विद्यालय के बाद भी परिवार, घर और व्यक्तिगत जीवन की जिम्मेदारियाँ होती हैं। ऐसे में बीएलओ की ड्यूटी न केवल थकावट बढ़ाती है, बल्कि शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालती है।
◾उधर लगभग हर रविवार किसी न किसी प्रतियोगी परीक्षा — पीसीएस, पीईटी, टीईटी, सीटीईटी, आरओ/एआरओ, डीएलएड या अन्य भर्ती परीक्षाओं — में शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जा रही है। रविवार जो विश्राम और पारिवारिक समय का दिन होना चाहिए था, अब वह भी परीक्षा ड्यूटी का दिन बन गया है। परिणाम यह है कि शिक्षक लगातार काम करते रहते हैं, उन्हें आराम का अवसर नहीं मिलता, और यह निरंतर तनाव अब उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर असर डाल रहा है।
◾अनेक शिक्षक आज अनिद्रा, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। यह केवल व्यक्तिगत संकट नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। एक थका हुआ शिक्षक न तो नई शिक्षण तकनीकों पर ध्यान दे सकता है, न ही विद्यार्थियों की व्यक्तिगत प्रगति पर। यह स्थिति अंततः छात्रों की सीखने की प्रक्रिया और विद्यालयी वातावरण दोनों को प्रभावित कर रही है।
◾सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि शिक्षक केवल एक कर्मचारी नहीं, बल्कि एक विचारक और मार्गदर्शक है। जब वही थका और हताश होगा, तो समाज का बौद्धिक विकास रुक जाएगा।
समाधान के लिए कुछ कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए —
👉शिक्षकों को बीएलओ और अन्य गैर-शैक्षणिक कार्यों से यथासंभव मुक्त किया जाए।
👉रविवार को अनिवार्य विश्राम दिवस के रूप में मान्यता दी जाए।
👉शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य हेतु परामर्श, योग और ध्यान शिविरों का आयोजन किया जाए।
👉प्रशासनिक कार्यों को डिजिटल और सरल बनाया जाए ताकि शिक्षक अपने वास्तविक कार्य — अध्यापन — पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
◾आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षकों को कर्तव्यनिष्ठ कर्मी नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता के रूप में देखा जाए। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे ज्ञानवान और संवेदनशील बनें, तो हमें अपने शिक्षकों को भी विश्राम, सम्मान और संतुलित कार्यभार देना होगा।
क्योंकि सच यही है —
“थका हुआ शिक्षक कभी प्रेरणा नहीं दे सकता।”
लेखक : नवीन पाण्डेय
पुलिस की भर्ती को छोड़कर एक भी भर्ती अपने सही समय पर नहीं हुई है. शिक्षक भर्ती तो 6,7 सालों से नदारत है. ऐसे में युवा सिस्टम को कोसेगा नहीं तो क्या आरती करेगा---
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@itspravin99 अगर अभी दो साल तक ये भर्ती न होती तो ये बचे–कुचे पद भी खत्म हो जाते।
आश्चर्य की बात है, चार साल में बहुत से शिक्षक रिटायर्ड भी तो हुए होंगे, तो इस हिसाब से पद बढ़ने चाहिए थे लेकिन यहां तो पद ही घटा दिए।
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यार जुगाड़ वालों के 10, 12 पद बहुत थे. यहाँ तो पूरे 300 पद ही रोक लिए गए. रामराज चल रहा है न, त्रेतायुग में ऐसा होता होगा शायद. पद की संख्या घट या बढ़ सकती है तो लिखा हुआ था पर इतने पद घट जाएंगे ये उम्मीद नहीं थी---😳
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