By saluting in official cap, we respect our Country's official ASHOKA logo.
It is always a matter of pride. There is no other thinking of rank/ relation.
It is the respect to State Emblem in which a rank denotes fingers towards it in salute and the other responds in same way.
What pride for a career police officer & a father see his daughter don the uniform as an #IPS officer!
https://t.co/RTU4Qs6zw6
@PMOIndia@HMOIndia@TelanganaCMO
ओहोहो,,,,,,
ई त सब बहूत ही ज्यादा गड़बड़ हो गया,,,,,
यानी चंदाचोरों से भी चंदा?,
क्या सच्ची में??????
तब तो पाप की कमायी से विश्व की सब से बड़ी और सब से धनी पार्टी को भी सींचा गया?????
शिक्षिका _ बाल बाबाजी @AchryConfucious अपना
होमवर्क क्यों नहीं किया ?
बाल बाबाजी क्योंकि मैं होस्टल में
रहता हूं .
शिक्षिका गुस्से से तो
नालायक होस्टल में क्या
आफत आई थी ?
बाल बाबाजी ,मैडम अब आप ही
बताओ...होस्टल में होमवर्क
कैसे करूंगा ? इसके लिए
आपको होस्टल वर्क देना
चाहिए न .
😁🫠
कांग्रेस और बीजेपी की राजनीती में क्या फर्क है
इस घटना से समझ लीजियेगा
तस्वीर में आपको दो लोग दिख रहे होंगे, एक हैँ पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी जी और दूसरा व्यक्ति वो है जिसका पुत्र आज चर्चा का विषय बना हुआ है
जी हां, ये सोनम वंग्याल हैँ सोनम वांगचुक के पिता
इन्होने 1984 में लद्दाख के आदिवासियों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल शुरू की थी
6 दिन के बाद ज़ब खबर इंदिरा जी तक गयी तो उन्होंने तुरंत सब काम छोड़कर लद्दाख गयीं.
सोनम के पिता को मिली, वहां के लोगों से बात की
जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया और हर मांग को सवेधानिक तरीके से पूरा करने की बात की.
आज उनका बेटा ज़िन्दगी और मौत के बीच खड़ा है लेकिन बीजेपी सरकार के कानो पर जूँ नहीं रेंग रही
मांगे माननी तो दूर कोई मिलने तक नहीं गए इनसे
आज गाँधी परिवार सत्ता में होता तो क्या कोई
Sonam wangchuk इस तरह भूखा रहता??
आज वाले महा घमंडी हैं जो सच मे जनता को छोड़िये, हर किसी को धूल मिट्टी समझते हैंं।
बोला भी तो था, वो चमत्कार से शरीर धारण कर इस धरा को क्रतार्थ कर रहे हैं
विश्व के कमाल के अभिनेता हैं ही।
कांग्रेस और बीजेपी की राजनीती में क्या फर्क है
इस घटना से समझ लीजियेगा
तस्वीर में आपको दो लोग दिख रहे होंगे, एक हैँ पूर्व पीएम इंदिरा गाँधी जी और दूसरा व्यक्ति वो है जिसका पुत्र आज चर्चा का विषय बना हुआ है
जी हां, ये सोनम वंग्याल हैँ सोनम वांगचुक के पिता
इन्होने 1984 में लद्दाख के आदिवासियों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल शुरू की थी
6 दिन के बाद ज़ब खबर इंदिरा जी तक गयी तो उन्होंने तुरंत सब काम छोड़कर लद्दाख गयीं.
सोनम के पिता को मिली, वहां के लोगों से बात की
जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया और हर मांग को सवेधानिक तरीके से पूरा करने की बात की.
आज उनका बेटा ज़िन्दगी और मौत के बीच खड़ा है लेकिन बीजेपी सरकार के कानो पर जूँ नहीं रेंग रही
मांगे माननी तो दूर कोई मिलने तक नहीं गए इनसे
आज गाँधी परिवार सत्ता में होता तो क्या कोई
Sonam wangchuk इस तरह भूखा रहता??
और भी बहुत कुछ है
India iz mother land
ऐन्ड,,,,
,,,,,,, इज फ़ॉदर लैंड,,,,,,
भाइयों बैनों,,,,,,,,,
मैं बताना भूल गया "सिस्टर लैंड, ब्रदर लैंड",,,,
श्याम जी भी थक जायेंगे,,,,,,,
अगले के पास अनलिमिटेड तुकबंदियों की डिक्शनरी है
थम्ब रूल केवल एक ही कि:
"जहां जहां से अकूत मोटामाल कमा सकते हो, सब का सब गडकरी और अडानी का" (चुनाव रिजर्व)
ये ध्रतराष्ट्र की कोई दुखती रग जरूर उनके हाथ मे है, जैसे ट्रम्प के हाथ उनके कुृछ राज, स्वयं ट्रम्प ही बताते हुये कहते हं कि वो जब चाहें, उजागर कर सकते हैं।
गडकरी जी, आपने देश को पैदल कर दिया. न गाड़ियाँ चलने लायक छोड़ी हैं न सड़कें. गाड़ियाँ कभी भी ख़राब हो जा रही हैं तो सड़कें कहीं भी टूट रही हैं.
@nitin_gadkari
@nehafolksinger उन्हे जो अभयदान देने वाला है,
असली का तो वही जिम्मेदार है।
उस ध्रतराष्ट्र को कहना था।
अब ये आप पर है कि कैसे ध्रतराष्ट्र तक अपनी बात पहुंचा पाती है,
क्योंकि असली ट्विस्ट वहीं पर है :
सीधा, सच यही है कि वो
"केवल वही बात सुनना चाहते हैं, जो बात वो सुनना चाहें"
(या ट्रम्प की)
दीपक जी आप के लिये तो मुम्बई जाना कठिन नही है,
इन्दौर के रास्ते मे बताते हैं कि कुछ दशक पहले एक ठेकेदार ने कोई सड़क बनाई जो 47 साल से बिल्कुल ठीक काम कर रही है।
कभी भी दुबारा डामर लगाने या रिपेयर की जरूरत तक नही पड़ी।
इसी वजह से उस कम्पनी को काम मिलना ही बन्द हो गया
बताइये?
अर्थव्यवस्था को गति चाहिए इसलिए सड़क पर गड्ढे ज़रूरी हैं!
अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए निवेश चाहिए, उद्योग चाहिए, रोज़गार चाहिए। लेकिन ये सब पुराने ज़माने की बातें हैं। आधुनिक विकास मॉडल ने एक नया सिद्धांत खोज निकाला है सड़क पर जितने ज़्यादा गड्ढे, अर्थव्यवस्था उतनी ज़्यादा मज़बूत।
आख़िर सोचिए, एक गड्ढा सिर्फ़ गड्ढा नहीं होता। वह तो चलता-फिरता आर्थिक पैकेज होता है।
सबसे पहले सड़क बनती है। फिर कुछ महीनों बाद सड़क टूटती है। फिर टेंडर निकलता है। ठेकेदार आता है, मिट्टी डालता है, रोलर चलता है, बिल बनता है, भुगतान होता है। पहली कमाई पूरी।
फिर बारिश आती है। गड्ढा वापस हो जाता है।
फिर नया टेंडर, नया ठेका, नई मरम्मत, नया भुगतान। यानी एक ही गड्ढा बार-बार रोज़गार पैदा करता है। ज़रा सोचिए गड्ढा तीन पीढ़ियों तक ठेकेदारी का सहारा बन सकता है। इसे ही शायद सतत विकास कहते होंगे।
अब ज़रा वाहन मालिकों का योगदान देखिए।
गाड़ी गड्ढे में गिरी नहीं कि सस्पेंशन ने हाथ जोड़ लिए। टायर का समय पूरा हुआ। व्हील एलाइनमेंट बिगड़ गया। शॉक एब्ज़ॉर्बर बदल गया।
मैकेनिक की दुकान पर रौनक आ गई। ऑटो पार्ट्स की बिक्री बढ़ गई। सर्विस सेंटर में भीड़ लग गई। बीमा कंपनी को नया क्लेम मिल गया। टायर निर्माता खुश, बैटरी वाला खुश, वेल्डिंग वाला खुश।
सबसे बड़ी बात गाड़ी जितनी उछलेगी, उतना ज़्यादा ईंधन जलेगा। पेट्रोल पंप की बिक्री बढ़ेगी। ईंधन की खपत बढ़ेगी। एथनॉल की मिलावट बढ़ेगी अर्थव्यवस्था का पहिया और तेज़ घूमेगा।
बारिश आई तो गड्ढा साधारण गड्ढा नहीं रहा, मिनी झील बन गया।
राहगीर अंदाज़ा लगाते रहे कि पानी दो इंच है या दो फ़ुट। हर सफ़र एक रोमांचक अभियान बन गया। बिना टिकट एडवेंचर स्पोर्ट्स का अनुभव मिलने लगा। लोगो को मुफ़्त में सविमिंग पूल जैसा आनंद.
कौन कहता है कि पर्यटन के लिए पहाड़ और समुद्र चाहिए? हर मोहल्ले में गड्ढों की झीलें हों तो स्थानीय पर्यटन अपने आप विकसित हो जाएगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र का योगदान भी कम नहीं है।
कोई फिसला, कोई गिरा, किसी की कमर में मोच आई, किसी का हाथ टूट गया। अस्पतालों में मरीज बढ़े। एक्स-रे सेंटर व्यस्त हुए। दवाइयों की बिक्री बढ़ी। फिजियोथेरेपिस्ट को नए ग्राहक मिले।
रोज़गार का ऐसा समग्र मॉडल शायद ही किसी अर्थशास्त्री ने देखा होगा।
आर्थिक विशेषज्ञों को अब GDP की नई परिभाषा लिखनी चाहिए
प्रति किलोमीटर गड्ढों की संख्या × मरम्मत की आवृत्ति × ईंधन की अतिरिक्त खपत = विकास दर।
अगर किसी शहर में गलती से सड़क पाँच-सात साल तक बिना गड्ढे के रह जाए, तो समझ लीजिए आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति है।
न नया टेंडर।
न मरम्मत।
न मैकेनिक की अतिरिक्त कमाई।
न टायर की बिक्री।
न सर्विस सेंटर पर भीड़।
न पेट्रोल की अतिरिक्त खपत।
इतने लोगों का रोजगार आखिर कैसे चलेगा?
इसलिए गड्ढों को केवल गड्ढा समझना भूल जाइए। वे विकास की नींव हैं, रोज़गार के स्रोत हैं और अर्थव्यवस्था के मौन योद्धा हैं।
हाँ, बस एक छोटी-सी समस्या रह जाती है.
आम आदमी आज भी पुरानी सोच में फँसा हुआ है। वह अब भी चाहता है कि टैक्स देने के बाद सड़क पर गड्ढों का विकास नहीं, सड़क दिखाई दे।
यही सोच शायद इस महान गड्ढा अर्थव्यवस्था मॉडल की सबसे बड़ी चुनौती है।😎
डीपीसीसी स्वयं एक छोटी बॉडी है, सीमित साधन, सीमितअधिकार।
अकेले उनसे तो कुछ नही हो पायेगा।
गिनती के कर्मचारी हैं। समय बिता रहे हैं।
बड़ी बड़ी फैक्ट्रियां जो पाल्यूटैन्ट्स नालों मे छोड़ती है, वो बिना प्रॉसेस्ड होता है क्योंकि उन पर इतने साधन नही कि खुद की ट्रीटमेन्ट यूनिट लगा सकें
जुबैर साहब 🙏🙏
हम तो यहीं रहते; रोज ये देखते हैं
अगले फालोअप वीडियो मे आप अपोलो के पास सीवेज प्लान्ट और पास ही प्रदूषण नियंत्रण विभाग के ऑफिसेज मे भी जा कर कारण के अलावा "कंक्रीट साल्यूशन" पर जरूर चर्चा कर के एक प्रोग्राम दीजिये।
(आज के कार्यक्रम मे प्रतीक सिन्हा जी नहीं है?)
CM Rekha Gupta was furious when she posters hoardings of advocates. Today, her own constituency is full of her own hoardings.
Will she lodge police FIR ?
नितिन गडकरी जी कभी झूठ नहीं बोलते। उन्होंने साफ कहा है कि भारत की सड़कें वर्ल्ड क्लास होगी। ठेकेदार कोई बदमाशी नहीं कर सकता।
इसके बाद भी लोग सिंगापुर की सड़कों के वीडियो भारत के हाईवे के बताकर साजिश कर रहे हैं। उन्हें क्या पता; हाईवे में डामर की जगह इथेनॉल का वेस्ट डाल रहे हैं।
🇮🇳अनाज सड़ता नहीं सड़ाया जा रहा है😭
ताकि सड़क के बाद शराब बनाने वालों को सस्ता मिल पाए🍺
जो चोरी किया है उसको पकड़ा न जाए !
ग्लोबल हंगर इंडेक्स भारत 123 देशों में 102 नंबर पर है
कैथल हरियाणा में बारिश आते ही गेहूं से तरपाल को हटा दिया गया🌾
एक व्यापारी अपना काम करवाने के लिए एक ऐसे मंत्री के पास गया जिसकी ईमानदारी की लोग कसमे खाया करते थे। व्यापारी ने कहा सर, हम अपने काम के मंजूरी के बदले आपको एक नई कार पेश करना चाहते हैं
मंत्री नहीं, नहीं, नहीं.
मैं इसे मुफ्त में नहीं ले सकता ।
मैं इस कार के लिए कुछ पैसे देना चाहता हूं .
😉
बहुत समझाने के बाद व्यापारी मान गया और बोला ठीक है साहब!
कृपया एक रुपया दें।
😉
मंत्री जी ने दो रुपये का सिक्का दिया।
😉
बिजनेसमैन ने कहा सॉरी सर। मेरे पास वापस करने के लिए खुल्ला एक रुपया नहीं है.
मंत्री : कोई बात नहीं।
आप मुझे मेरे मित्र के लिए एक और कार 🚗 दे दीजिए.
🤔🤭😉🤣😃😃😜 ईमानदारी आज भी जिन्दा है 😁
नोट: फ़ोटो ध्यानाकर्षण हेतु
अब इन भगवाधारियों का मानसिक संतुलन बिगड़ा हुआ ना बोले तो क्या ही बोलें.?
"जिन छात्रों ने पेपर लीक के कारण आत्महत्या की वो हस्तमैथुन करते थे"
नीचता की परिकाष्ठा है ये, इन भगवाधारी कीड़ो की।
📍जंतर मंतर
पहले 1-2% पेट्रोल पंप वाले पानी मिला लेते थे ।
अब तो रूह अफज़ा मिला रहे है ताकि रिश्तेदार के लिए दुकान पर न जाना पड़े🤔
बस गाड़ी कि टंकी खोली और दो गिलास भरकर दे दिया 🤣😂
गडकरी गन्ने का रस मिला रहे है , बाबा मुत्र बेच रहा है ।
पुजारी मंदिर लूट रहे है , चौकीदार देश लूट रहा है
राम मंदिर में लूट (छोटी मोटी चोरी नही बची ये अब लूट हो चुकी है) साधारण नही है, इसका पूरा प्लान था बहुत बड़ी टीम थी बहुत पुख्ता तैयारी की गई थी, देखिये उसका एक छोटा सा हिस्सा !