तुमने कहा था
कि धर्म और ईश्वर में
एक धागे जितनी महीन परत है
इतनी महीन परत
कि पूर्वाग्रहों का चश्मा
चढ़ाने पर
वह अदृश्य प्रतीत
होने लगती है
पर मैंने कहा था,
कि धर्म और ईश्वर में
ज़मीन आसमान सी
दूरी है
अगर ईश्वर आसमान है
तो उसके हाथ से छूटना
यानी
औंधे मुँह ज़मीन
पर गिरना !!
उठाई जातीं हैं
उंगलियाँ
दिये जाते हैं
ताने
कहा जाता है
बद-चलन
किया जाता है
रुस्वा
क्यूँकि
कोशिश की है मैंने
तुम्हें इस ज़ालिम “शरीयत"
से बाहर जाने की
जबकि
शाम -ओ -सहर
रौंदते हैं ‘मर्द’
क़दमों तले
"शरीयत" !!
निसंदेह शील स्त्री व पुरुष दोनों के नैतिक मूल्यों का आईना है। पर यह समाज दोहरा चरित्र रखता है। जहां स्त्रियों के लिये पग-पग पर अनुशाषन व मर्यादा के बंध हैं वहीं पुरुष बेलगाम अश्व की भांति स्वछंद हैं। पहले तो उसके लिये लक्ष्मण रेखाएं बनी ही नही और लांघे भी तो क्या 'वह पुरुष है'
वहाँ एक बस्ती थी
एक घर था
उस घर में थी एक वेश्या
उसके पास था एक पुराना सिक्का
और एक पोस्टकार्ड
जिस पर स्वर्ग का पता लिखा था
लुओं के मौसम थे
उसने मुझे बुलाया
पिलाया मीठे कुएँ का जल
फिर रोई धार-धार
मेरी हथेलियों पर गिरे उसके खारे आँसू
रेगिस्तान की वह एक न भूलने
वाली बारिश थी !