एक प्रश्न, दो शिक्षक, पचास वर्ष का अंतर: डॉ. रूपर्ट शेल्ड्रेक ने आचार्य जी से क्या पूछा?
एक जाने-माने वार्तालाप में रूपर्ट शेल्ड्रेक ने एक बार जे. कृष्णमूर्ति से एक तीखा प्रश्न पूछा।
जैसा कि शेल्ड्रेक बताते हैं, कृष्णमूर्ति अपने‑आप को इनलाइटेंड मानते थे। उनका यह भी मानना था कि यदि एक मनुष्�� इनलाइटेंड हो जाए, तो उससे समूची मानवता की इंलाइटनमेंट हो जाएगी।
तो शेल्ड्रेक ने उनसे पूछा:
_“यदि यह सच है, और मानवता अब भी इतनी भयानक अवस्था में है, तो क्या अब तक कोई भी वास्तव में इनलाइटेंड हुआ है?”_
कृष्णमूर्ति ने उत्तर दिया: शायद एक से अधिक इनलाइटेंड व्यक्तियों की आवश्यकता होती है।
_“कितने?”_ शेल्ड्रेक ने पूछा। _“10? 100? 1,000? एक मिलियन?”_
कृष्णमूर्ति ऐसे इनलाइटेंड व्यक्तियों की संख्या नहीं बता सके।
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कई दशक बाद, लंदन में, आचार्य जी से बातचीत के दौरान शेल्ड्रेक जे.के. के साथ हुई इस चर्चा को याद करते हैं।
फिर कुछ बिलकुल अलग होता है।
उन्होंने आचार्य जी से पूछा, _“दुनिया को बदलने के लिए कितने इनलाइटेंड लोगों की आवश्यकता है?”_
आचार्य जी अंतिम इंलाइटनमेंट की पूरी धारणा को ही खारिज कर देते हैं:
_“कोई अंतिम इंलाइटनमेंट हो ही नहीं सकती।”_
��ेकिन जो अपने‑आप को इनलाइटेंड घोषित करते हैं, उनका क्या?
_“उनकी इंलाइटनमेंट तो अहंकार द्वारा अपने‑आप को मृत्यु प्रमाणपत्र जारी कर देना भर है।”_
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*और वार्ता के बाद डॉ. शेल्ड्रेक ने यह लिखा:*
_मैंने अपने युवावस्था में भारत में सात वर्ष बिताए। मैंने अनेक प्रकार के शिक्षकों से मुलाक़ात की और उनसे बात की, जिनमें कृष्णमूर्ति भी शामिल थे। इसलिए मैं आचार्य प्रशांत से मिलने को उत्सुक था।_
_ऐसा बहुत कम होता है कि किसी से इतनी अधिक बातों पर सहमति भी बने और फिर भी वह आपको भीतर तक झकझोर दे। यह वैसी ही वार्ताओं में से एक थी।_
▶️ *देखिए, शेल्ड्रेक कैसे यह घटना सुनाते हैं, और आचार्य जी कैसे उत्तर देते हैं:*
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* 🎾 जीवन और खेल*
🏟️ जीवन भी एक खेल है,
और हर दिन एक नया मैदान।
कभी सामने चुनौती खड़ी है,
कभी मुश्किलों का इम्तिहान।
🪞 मैदान बदलने से क्या होगा,
जब भीतर का खिलाड़ी वही है?
जो रोज़मर्रा में डरकर जीता है,
वह बड़े मुकाबले में निर्भय कैसे रहे?
🎯 हर मैच को खास बनाकर,
बाकी दिनों को छोटा मत करो।
जब हर दिन पूरा देना है,
तो किसी एक दिन का इंतज़ार मत करो।
🔥 जो करना है, पूरे मन से करो,
कुछ ��ी बचाकर मत रखो।
आज जो अवसर सामने आया है,
उसे कल के भरोसे मत छोड़ो।
🏆 जीत मिले तो इतराना कैसा,
हार मिले तो घबराना क्यों?
तुम्हारा काम है पूरा खेलना,
अंजाम की चिंता में उलझना क्यों?
💪 हर चुनौती तुम्हें पुकार रही है,
हर मुश्किल कुछ सिखा रही है।
जो कल तक असंभव लगती थी,
आज वही तुम्हें आगे बढ़ा रही है।
🪞 याद रखो, शरीर की अपनी सीमाएँ हैं,
उनका सम्मान भी ज़रूरी है।
पर भीतर बैठा जो हिसाब लगाता है,
उसे ��ेखना भी ज़रूरी है।
🥇 कभी मेडल, कभी कोई उपलब्धि,
कभी खाली हाथ लौटना होगा।
पर इतना तो अपने हाथ में है,
कि कितना पूरा स्वयं को देना होगा।
🌱 जीवन की ऊँचाई केवल यह नहीं,
कि तुमने कितना हासिल किया।
ऊँचाई तो इसमें भी है,
कि तुमने जीवन को कितना दिया।
🚶 न रुकना जीत के बाद,
न हार से टूटकर बैठ जाना।
जो राह मिली है चलने को,
उसी राह पर चलते जाना।
*�� सफर में बने रहना ही मंज़िल है,*
यही खेल है, यही जीवन का सार।
हर दिन अपनी पूरी क्षमता से जीना,
यही है स्वयं से सच्चा साक्षात्कार।
➖➖➖➖
तुझको चलना होगा,
तुझको चलना होगा।
ओह... नदिया चले चले रे धारा
चँदा चले चले रे तारा,
तुझको चलना होगा,
तुझको चलना होगा।
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~संत सरिता सत्र से 💫
_(11/10/2026)_
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*🏸 सभी खिलाड़ी आचार्य जी की संगति की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें भी पता लगने लगा है कि गीता सबको सुधार रही है।*
*निष्काम कर्म की बात खिलाड़ी स्वीकार कर रहे हैं।*
इसी क्रम में सॉफ्ट टेनिस खिलाड़ी जय मीणा आए और उन्होंने ��ताया कि जब भी किसी की उम्मीद पूरी करने के लिए खेलने उतरा, हार गया।
आचार्य जी से सवाल: क्यों होता है ऐसा जय मीणा का सवाल?
चल रहे सत्र से 🙏
सत्र जारी है
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सबके भीतर ऊंचाई की प्यास
बेहतर होने का ईमानदार प्रयास।
*इस WEEKEND की HIDP* – एक तीर्थ की तरह...
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जहाँ सही संगति मिल जाए
वही जगह तीरथ है
~ आचार्य जी🙏🙏
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─── 𓂂 ✧ 𓂂 ──
*जैसा बंदा होता है *
*ज़िंदगी के मैदान में,*
* वैसा ही वो हर जगह होगा।*
*~आचार्य जी*❤️
─── 𓂂 ✧ 𓂂 ──
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🪔✨️HIDP Session
हम हमेशा दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ते हैं कि दूसरे क्या कर सकते हैं, लोग ऐसा नहीं करते, लोग ये नहीं देते। लेकिन हम खुद को नहीं देख पाते कि हमने खुद क्या किया है।
यह मेरा पहला HIDP Session है।
खुद के भीतर इतनी गहराई और ईमानदारी से देखना HIDP एक्टिविटी के के कारण हुआ है।
अगर हमें ईमानदारी से अपने भीतर झाँकना है और अपनी कमियों को देखना है, तो सभी को HIDP स��शन अटेंड करने जरुर आना चाहिए।
जब ��ै अपनी बात यहां रख Activity के जरिए रख रहीं थीं मुझे लगता है कि ये बात जो मैं समझ रहीं सायद ये ही सही है
जब HIDP Activity करते है तब अपनी कमियां दिखती है, वास्तव में हम खुद के सामने 🪞 mirror रखते ही नहीं है कभी ......
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✍🏻 *पोस्ट 12 | 11 अक्टूबर '26*
💭 *विषय — राजव्यवस्था और प्रशासन*
*──────────*
🔎 *शिकायत करते हैं, दर्ज भी करते हैं?*
मुल्ला नसरुद्दीन की एक मशहूर लोककथा है। चाबी घर के भीतर खोई, लेकिन ढूँढ रहे थे बाहर सड़क पर।
��ूछा गया, “जब चाबी घर ��ें खोई है तो यहाँ क्यों?”
बोले, “क्योंकि रोशनी यहाँ है।” 💡
हम अपनी शिकायतों के साथ भी कहीं ऐसा ही तो नहीं करते?
🏛️ किसी सरकारी सेवा का लाभ अटका हो, प्रमाणपत्र न बन रहा हो या किसी विभाग से जुड़ी शिकायत महीनों से घूम रही हो, तो इसके लिए सरकार का केंद्रीकृत मंच है: *सी.पी.जी.आर.ए.एम.एस. (CPGRAMS)*।
📄 यह 24×7 पोर्टल केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और राज्यों से जुड़ा है। शिकायत दर्ज करने पर एक रजिस्ट्रेशन नंबर मिलता है, जिससे उसकी स्थिति देखी जा सकती है। समाधान से असंतुष्ट होने पर अपील का विकल्प भी है।
📊 2025 में सी.पी.जी.आर.ए.एम.एस. पर *22.78 लाख से अधिक शिकायतें* आईं। केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों में औसत निपटान समय *15 दिन* रहा और *82.1% शिकायतें 21 दिनों के भीतर* निपटाई गईं।
यानी शिकायत को केवल दोहराने के बजाय उसे *दर्ज, ��्रैक और जवाब माँगने योग्य* बनाया जा सकता है। 📍
🪞 लेकिन यहाँ एक असहज सवाल है।
*जिस बात की मैं शिकायत करता हूँ, क्या मैं सच में उसका समाधान चाहता हूँ?*
या कहीं शिकायत बनी रहना ही मुझे ज़्यादा सुविधाजनक तो नहीं लगता? 🤔
क्योंकि शिकायत के साथ एक पहचान भी टिक सकती है:
*“मेरे साथ गलत हुआ, इसलिए मेरी स्थिति ऐसी है।”*
गलत किसी और ने किया हो सकता है। लेकिन अब उपलब्ध रास्ता देखना और अगला कदम लेना मेरी जिम्मेदारी है। 🚶🏻♂️
❓ *क्या मैं समस्या को समझना चाहता हूँ, या उसी शिकायत के सहारे अपनी पुरानी स्थिति बचाए रखना चाहता हूँ?*
*स्रोत:*
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*"सही चुनाव कर लो"*
*"इसके बाद ताकत जहाँ से आनी होगी आएगी"*
*~ आचार्य जी*
अवलोकन 🪔
हर दिन एक चुनौती की तरह बीत रहा है। हर दिन लगता है कि गिव अप कर दूँ, लेकिन आचार्य जी, आपकी दी हुई शिक्षा साथ है, तो हर दिन खुद को चुनौतियों के बीच झोंकने का प्रयास करती हूँ।
सच कहूँ, तो बहुत हार मिलती है। हिम्मत नहीं हो पाती कि दर्द के साथ आगे बढ़ पाऊँ। लेकिन क्या करूँ, हार मान सकती नहीं।
लेकिन दिनभर मैदान में युद्ध करने के बाद आपने हमें एक और मैदान का चुनाव करना सिखाया है, और वो है खेल का मैदान।
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🙏 नमस्ते आचार्य जी!
आपका ये झुनु अब 💪 जिम जाने लगा है। जिम से संबंधित अपनी ज़िंदगी का कुछ साझा करना चाहता हूँ। ❤️
27 साल का हो गया, पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ था कि कभी पूरे महीने लगातार जिम गया हूँ। पहले भी कई बार जिम जॉइन किया था, पर तब अंधकार में था, डर में था, हीनभावना में था, जिस कारण कभ�� भी स्थिरता नहीं आ सकी। 🌑
पहले पता ही नहीं था कि जिम जाना क्यों है, शरीर का काम क्या है, क्यों शरीर को ठीक रखना है। बस वही था कि जिम जाना होता है, तो मैं भी जॉइन कर लेता था। पर भीतर हीनभावना थी खुद को लेकर कि बहुत पतला हूँ, शरीर का वज़न भी कम है, तो जिम जाकर कैसे वज़न उठा पाऊँगा? सब देखकर क्या बोलेंगे कि इतना कम वज़न भी नहीं उठ रहा तुझसे? और ऐसा होता भी था। बहुत बार लोग हँसते थे और यहाँ तक कि घर वाले भी। ��💔
इसलिए मैं कभी भी लंबे समय तक जारी नहीं रख पाया और अंत में यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि जिम मेरे लिए नहीं है, मेरा शरीर जिम के लिए नहीं बना है, वगैरह-वगैरह।
लेकिन जब आपने समझाया कि शरीर क्या है, स्वस्थ रखकर इसका क्या उपयोग किया जा सकता है, किस स्तर तक शरीर को महत्त्व देना है, स्पोर्ट्स, रनिंग और जिमिंग क्यों ज़रूरी हैं, तब मैंने 🏃 रनिंग करना शुरू किया, घर पर वर्कआउट करना शुरू किया और अब पिछले बीस दिनों से जिम भी जा रहा हूँ, बिना किसी डर, बिना किसी हीन��ावना के, बिना किसी की परवाह किए कि लोग क्या कहेंगे। 💪🔥
अब भीतर एक स्पष्टता है। 💡 पता है कि जिम आने का अर्थ क्या है, इसका महत्त्व क्या है।
शुरुआत ढाई के डम्बल, दस की बेंच और बीस की लेग प्रेस से हुई है। 🏋️♂️
हाँ, बहुत कम है, लेकिन आचार्य जी, ज़रूर मैं इसको धीरे-धीरे बढ़ाऊँगा और एक स्वस्थ शरीर बनाने पर ध्यान दूँगा। 🌱💪
आख़िर में एक बात और कहना चाहता हूँ, आचार्य जी। मुझे हमेशा यह लगता था कि मेरे अंदर भावना नहीं है, आँसू जल्दी नहीं आते हैं, पर अभी यह सब लिखते हुए मेरी आँखें भीग चुकी हैं। 🥹❤️🩹
अगर आपने ज़िंदगी जीना नहीं बताया होता, तो मैं जीवन भर हीनभावना में ही जीता रहता। 🙏
धन्यवाद, आचार्य जी! ❤️🙏
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🏆 टेबल टेनिस में नेशनल चैंपियन होने से लेकर पिकलबॉल में एक नया जुनून खोजने तक की यात्रा! 🎾❤️
सिर्फ डेढ़ महीना हुआ है पिकलबॉल खेलना शुरू किए हुए, और मैं इस नई यात्रा को दिल से आनंद ले रहा हूँ! ❤️ कुछ नया सीखने की खुशी और लग���तार दो टूर्नामेंट जीतना, इसे और भी खास बना देता है। 🏆🔥
मार्गदर्शन, सीख और प्रेरणा के लिए आभार से भरा ��ूँ आचार्य जी के प्रति। 🙏✨
एक नया खेल, एक नई यात्रा, और आगे आने वाली अनगिनत जीतें! 💪❤️
#पिकलबॉल #टेबलटेनिसचैम्पियन #लगातारजीत #कृतज्ञहृदय #नईयात्रा #खेलजीवन #सीखतेरहोजीततेरहो
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आचार्य जी, क्या कहूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा है।
आप इतना प्यार करते हैं हमसे!
आपसे जुड़ने के बाद हमें अंदाजा भी नहीं लगता कि हमारे भीतर क्या-क्या बदल गया।
आज पीछे मुड़कर देखते हैं, तो लगता है, पूरी दुनिया ही बदल गई।
कसम से, कीचड़ में लोटे रह��े हैं हम और आप हमें पकड़कर कब चुपचाप उठाकर आसमान तक लेकर चले जाते हैं, पता ही नहीं चलता है।
समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बताऊँ कि क्या मिला।
मुझसे गिनती नहीं होगी।
क्योंकि मुझे लग रहा है कि मेरा दूसरा जन्म हुआ है।
आज 3 साल पुराना फोटो देख ली। तब समझ आया कि क्या से क्या हो गए हम, पता ही नहीं चला।
आप चुपचाप हमारे भीतर आकर हमें बदलकर रख दिए और हमें ख़बर ही नहीं। और अहंकार आपसे ही भागने के चक्कर मे�� रहता है। आज अगर मैं यहाँ न होती, तो न जाने कहाँ गर्त में होती।
मैं बता नहीं सकती, आज वो बात भी याद आ रही है कि इंसान के जीवन में जब सच्चाई आती है न, तो वो पूरा बदल जाता है। उसकी आँखें, उसका चेहरा, उसका शरीर, उसका मन, सब कुछ बदल जाता है।
आज जब 3 साल पहले की तस्वीर देखी और उसी समय से आचार्य जी से जुड़ी, फिर आज की तस्वीर देखी, तो ज़मीन-आसमान का अंतर है, ये पता चला।
अगर आपको जानना ही है न कि आपको क्या मिला आचार्य जी के साथ, तो बस याद कर लिया करिए कि जब जुड़े थे, तब क्या-क्या लेकर चले थे और अब वो सब छूट रहा है कि नहीं।
आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी ये जानकर कि जब आप अंदर से भी खुद को रोक ही रहें हैं उच्चतम की तरफ बढ़ने से,
वहाँ आप लगातार सत्र भी देख रहें है न,
और परीक्षा दे रहे हैं और अवलोकन जारी है।
तब भी इतना-इतना बदलाव हो सकता है, तो सोचो, अगर नीयत ही हो जाए बदलने की, तो आप क्या बन जाओगे।
मैं (अहंकार) क्या ही धन्यवाद दे पाए आचार्य जी का!
ये तो बस इतना कर ले कि वो जो दे रहें हैं, उसको चुपचाप वैसे का वैसा ले ले। इतना भी कर दे, तो आचार्य जी का मान होगा। बाकी मुँह से कुछ भी कहने की कोशिश करेगा, तो बेकार ही है, क्योंकि फिर से अहंकार बढ़-चढ़कर बोलेगा।
आचार्य जी, नहीं कहा जा रहा कुछ सिवाय इसके कि ये पूरी बात लिखते हुए सिर्फ आँखों से आँसू आ रहें हैं लगातार, और वो ये चल रहा है भीतर कि मैं क्या थी और क्या हो गई।
और प्यार क्या होता है, ये आप ही सीखा सकते हैं, जो कि इतने सारे लोगों को इतना प्यार करते हैं कि उनको पता भी नहीं है कि आपके प्यार ने उनको पूरा बदल दिया।
अब ये लड़ाई नहीं र���केगी। आप मुझे मुझसे बचाए हैं, तो अब पीछे जाने की तो कोई गुंजाइश नहीं। और आगे बढ़ने के लिए लगातार सच के साथ रहने के चुनाव जारी रहेगा।
सतत आत्मावलोकन न होता, तो पता भी न लगता कि अहंकार कितनी चाल चल रहा है।
❤️❤️ आचार्य जी 🫂❤️
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Gym 👉 ऐसी जगह जहाँ जाने की मैंने कभी नहीं सोचा था, लेकिन आजकल मैं वहां रोज जाती हूं।
ये मेरे लिए इतना आसान नहीं था, घर से बाहर आकर पढ़ना, जिम जाना लेकिन ये सब आचार्य जी की वजह से संभव हो पाया ।✨🧗♀️
बचपन से कमजोरी के साथ ही जीवन जी रही हूँ, कभी लगा ही नहीं कि शरीर भी मजबूत होना चाहिए, लेकिन आचार्य जी ने आईना ���िखाया तो पता चला कि कमजोरी में जीवन जीना ही सबसे बड़ा गुनाह है।✨
जिम जाने में अहंकार विरोध करता है पर कुछ है अंदर जो कहता है कि बहुत जी लिया अब कमजोरी के साथ अब उठ जा।
जिम जाने के बाद शरीर में जो दर्द होता है इस दर्द में ही आनंद है क्योंकि ये खुद को बेहतर बनाने के लिए
होता है। 💪 ✨
आचार्य जी के बिना ये सब कभी संभव नहीं हो पाता।
ऐसी लड़की जो कभी गांव में भी अकेले बाहर नहीं जाती थी आज वो शहर में अकेले घूम रही है।✨🩷
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✍🏻 *पोस्ट 14 | 9 अक्टूबर '26*
💭 *विषय — भूगोल*
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*🗺️ प्राकृतिक संपदा के बावजूद भारत पीछे क्यों है?*
🇷🇺🇺🇸 जहाँ रूस को सुरक्षा और अमेरिका को महासागरों से व्यापार का लाभ मिला, वहीं
🏔️🌍 अफ्रीका को प्रतिकूल नदियों के कारण व्यापारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
📚 टिम मार्शल की किताब _प्रिज़नर्स ऑफ जियोग्राफी_ बताती है कि पहाड़, नदियाँ और समुद्र किसी देश का भविष्य तय कर सकते हैं।
*भारत के पास यह सब भरपूर है:* उपजाऊ मैदान, लंबी तटरेखा, बारहमासी नदियाँ और उत्तर में हिमालय की सुरक्षा।
वहीँ दूसरा पक्ष देखा जाए तो
🇮🇱 इज़राइल के पास इनमें से लगभग कुछ नहीं। ज्यादातर रेगिस्तान, पानी की भारी कमी और चारों ओर शत्रु देश। फिर भी वहाँ जीडीपी प्रति व्यक्ति लगभग 60 हजार डॉलर है और शोध पर खर्च जीडीपी का करीब 6 प्रतिशत।
🇯🇵 जापान के पास खेती लायक ज्यादा जमीन नहीं, भूकंप और सुनामी का खतरा हमेशा रहता है। फिर भी वहाँ जीडीपी प्रति व्यक्ति करीब 34 हजार डॉलर है और शोध पर खर्च जीडीपी का लगभग 3.3 प्रतिशत।
🇮🇳 भारत में यह आंकड़ा अभी भी 1 प्रतिशत से कम है, और जीडीपी प्रति व्यक्ति करीब 2500 ���े 3000 डॉलर के बीच है।
⚠️ *भूगोल इज़राइल और जापान के खिलाफ था, फिर भी वे आगे निकल गए।*
🪞 यह सिर्फ नीति या बजट की बात नहीं। सवाल यह भी है कि हमने ज्ञान, शोध और नवाचार को समाज में कितना सम्मान दिया।
*📿 यहाँ पीढ़ियों से एक धारणा गहरी बैठी रही है:*
सुरक्षित नौकरी बड़ी बात है, जोखिम उठाना नासमझी। नया सवाल पूछने वाले बच्चे को अक्सर टोका जाता है, रटने वाले को शाबाशी मिलती है।
🔑 *जब हालात अनुकूल हों, तब भी आगे न बढ़ पाना किसी बाहरी कारण की कमी नहीं, भीतर की किसी गहरी आदत का संकेत है।*
👤 अहंकार भी यही चाल चलता है। जब उसके पास सब अनुकूल होता है, संसाधन, समय, मौका, तब भी वह अक्सर वहीं रुक जाता है जहाँ सुरक्षित महसूस होता है। बदलाव में डर लगता है, भले उसका कोई ठोस आधार न हो।
🔓 सच्चा बदलाव सुविधा से नहीं आता, ईमानदार देखने और उस देखे को स्वीकार करने के इरादे से आता है। भूगोल एक सीमा जरूर है, पर वह अंतिम फैसला नह��ं करता। फैसला वो करता है जो उन सीमाओं के भीतर देखने और बदलने को तैयार होता है।
❓ *प्रश्न:*
*किसी के पास सारे साधन और मौके होते हुए भी वह जोखिम से बचकर वही पुराना सुरक्षित रास्ता चुनता है। इससे हमारे बारे में क्या पता चलता है?*
🔹 A) हमने समझदारी से जोखिम को तौला है
🔹 B) हमने आराम को सुरक्षा का नाम दे दिया है
🔹 C) साधन कम थे, इसलिए यह सही फैसला था
🔗 *स्रोत:* https://t.co/SpZtpMuRFc
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जागो!
जाग पियारी अब का सोवै, रैन गयी दिन काहे को खोवै।
जिन जागा तिन माणिक पाया, तैं बौरी सब सोय गँवाया।
आज हम एक सरप्राइज़ फ़ीचर रिलीज़ करने ही वाले थे (जो अब Android पर लाइव है और आज रात तक iOS पर भी उपलब्ध हो जाएगा), और ठीक उसी समय मुझे बैडमिंटन खेलने भी जाना था।
शुरू‑शुरू में मुझे लगा खेलने जाने से रिलीज़ पर असर पड़ेगा। पर सच यह था कि वह तो बस एक बहाना था। मैंने यह तक नहीं देखा‑परखा था कि वह बात सही भी है या नहीं। सिर्फ़ इसलिए कि मन ने न जाने का एक कारण सामने रख दिया था, मैं खेल को छोड़ देने के लिए तैयार हो गई थी।
एक कॉल और थोड़ी बातचीत के बाद मुझे समझ आया कि हम तो कोर्ट से भी फ़ीचर रिलीज़ कर सकते हैं।
और हमने किया भी!
असल में दोनों के बीच कोई टकराव था ही नहीं। टकराव तो मेरे ही भीतर, मेरे दिमाग में था।
कितनी बार ऐसा होता है कि हम बिना यह जाँचे कि 'मैं' जो कारण दे रहा है वे वाजिब भी हैं या नहीं, किसी सार्थक काम को छोड़ बैठते हैं? हम मान लेते हैं, विश्वास कर लेते हैं, और आज्ञाकारी बनकर चल पड़ते हैं। हम रुककर देखते तक नहीं।
आज मैं खेलने गई। शारीरिक तौर पर थकी‑मांदी लौटी, फिर भी भीतर से ताज़गी से भरी हुई।
मुझे हमेशा से खेल बहुत प्रिय रहे हैं। स्कूल में मैं स्टेट‑लेवल कबड्डी प्लेयर थी, लेकिन मैंने इससे पहले कभी बैडमिंटन खेलकर नहीं देखा था। आज तो बस दूसरा ही दिन था, और भीतर जो प्रतिरोध था वह अभी भी मौजूद था। लेकिन मैंने ठान लिया कि उसे अपने लिए निर्णय नहीं लेने दूँगी।
और यही बात सोचने पर मजबूर करती है: हम इस प्रति��ोध की बात मानते‑मानते जीवन का कितना हिस्सा खोते जा रहे हैं? हम ��पने समय के साथ और क्या‑कुछ कर सकते हैं? क्या वाकई स्क्रॉल करना ही वह काम है जो हम इस जीवन के साथ करना चाहते हैं?
हम बार‑बार उसी चीज़ पर लौट आते हैं जो जानी‑पहचानी और आरामदेह है, बहाने बनाते हैं और उन्हें ही असली सीमाएँ समझ बैठते हैं।
सेशन्स मेरी मदद कर रहे हैं उन बातों पर प्रश्न उठाने में जिन्हें मैं वरना बिना जाँचे ही सच मान लेती। चीज़ों को वैसा देख पाना जैसी वे हैं, न कि उन कहानियों के ज़रिए ज��� 'मैं' मुझे सुनाता है।
पिछले सेशन में हमने यह चर्चा की कि कैसे एक तथाकथित ‘सही’ लड़ाई भी भीतर से हमें घोल कर ख़त्म कर सकती है (dissolution)। हम ग़लत युद्ध लड़ने में इतने उलझ सकते हैं कि हमें यह दिख ही नहीं पड़ता कि वस्तुतः हो क्या रहा है।
आज भी मैं एक ऐसे टकराव के कारण, जिसे मैंने देखा‑परखा तक नहीं था, कुछ बहुत सुन्दर छोड़ ही देने वाली थी।
और मैं उन लोगों के लिए बेहद कृतज्ञ महसूस करती हूँ जिन्हें उन्हो��ने मेरे जीवन में भेजा है, वे लोग जो ब��र‑बार आईना सामने रख देते हैं, ताकि मैं वह देख सकूँ जो वरना मुझसे छूट जाता।
*पंछी को तो बस आकाश से ही प्रेम होना चाहिए।*
पर अगर हम पिंजरे को ही बचाने में लगे रहें, तो आकाश को कैसे खोज पाएँगे?
फ़ालतू बातों को छोड़ दो। जो झूठा है उसे झूठा देखो, और सिर्फ़ इसलिए उसे ढोते मत रहो कि वह जानी‑पहचानी लगती है।
हम आज़ादी तो चाहते हैं, पर उसकी क़ीमत चुकाना नहीं चाहते।
छोड़ दो। बस छोड़ दो।
आज तो बात बस बैडम���ंटन की थी, कल यह किसी बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण बात की हो सकती है।
*ये तो प्रेम की बात है उधो...* 🙏
-------
● अपने हृदय को अस्पर्शित रहने दो।
*धन्यवाद, आचार्य जी। 🙏*
*कभी सोचा भी नहीं था कि जीवन इतना सुन्दर हो सकता है...*
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मैं एक लड़की हूँ, इसलिए इस बदलाव को बहुत गहराई से महसूस कर सकती हूँ। जब मैं अपने पुराने जीवन को देखती हूँ, तो समझ आता है कि गाँव का माहौल हो या परिवार और समाज, हर जग�� मुझे एक शरीर के रूप में देखा जाता था। मैं भी अपने भविष्य को शादी, पहनावे और अपने रूप-रंग तक ही सीमित करके देखती थी।
लेकिन संस्था में आकर मुझे एक नया जीवन मिला। यहाँ आचार्य जी, मेरे मेंटोर, सीनियर्स और साथियों के बीच रिश्ता न लड़की-लड़के का है, न बड़े-छोटे या सीनियर-जूनियर का, बल्कि चेतना का है।
आचार्य जी को सुनकर मैं समझ पाई कि मैं केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक इंसान हूँ, जो अपने जीवन में बहुत कुछ ��र सकती है। अपने भीतर आए इस बदलाव को देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। आज मैं अपने जीवन को एक नई दृष्टि से देख पा रही हूँ और यही बदलाव मेरे लिए सबसे सुंदर है। ❤️
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* अवलोकन -08/10/26*
* विशिष्ट सत्र *
*जब एक आईआईटी के छात्र ने आचार्य जी से पूछा कि उन्हें क्यों अक्सर यह urge होती है कि सब छोड़कर अपने गाँव लौट जाएँ, क्योंकि मार्ग उन्हें अंतहीन लंबा लगता है, तो वह बात मेरे भीतर बहुत गहराई तक उतर गई।* *मैं उससे पूरी तरह जुड़ पा रही थी।*
मैंने अपने एम.एससी. (साइकोलॉजी) के अंतिम सेमेस्टर के दौरान *2024* में आचार्य जी को सुनना शुरू किया। डिग्री पूरी होते ही मेरी एक ही प्राथमिकता थी *आर्थिक स्वतंत्रत��*—मैं अपने माता-पिता पर निर्भर रहने के बजाय अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी।
मैंने अपना पहला जॉब ऑफ़र (असम) कम तनख़्वाह के बावजूद स्वीकार कर लिया, केवल इसलिए कि उससे मेरे बुनियादी रोज़मर्रा के ख़र्चे पूरे हो जाते थे।
*2025* में, मैं बेहतर करियर अवसरों की तलाश में *बेंगलुरु * चली गई। शुरुआत का परिवर्तन काफ़ी कठिन था, लेकिन धीरे‑धीरे मैंने अपने पाँव जमा लिए और काम में बेहतर होती गई। 2026 की शुरुआत तक आकर मैं एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच गई जहाँ मैं अच्छा कमा रही थी और अपने आप को *वास्तव में आत्मनिर्भर* महसूस कर रही थी।
फिर, अप्रैल 2026 में अचानक एक स्वास्थ्य संकट आ गया: मुझे *आर्थराइटिस* का निदान हुआ। मेरी दुनिया जैसे बिखर गई। जैसे‑तैसे जो आर्थिक स्वतंत्रता हासिल की थी, उसी समय अचानक मुझे अपनी शारीरिक असुरक्षा से सामना करना पड़ा। यह एक चौंकाने वाला बोध था—*यदि शरीर ठीक ��े काम ही न करे, तो आज़ादी को तो छोड़िए, मैं आसानी से हिल‑डुल भी नहीं सकती थी।* सब कुछ जैसे समाप्त होता हुआ लग रहा था।
उन अँधेरों भरे पलों में *घर लौट जाने की चाह अत्यन्त प्रबल थी।* दिमाग़ में बेसिर‑पैर के विचार घूमने लगे: *मैं यहाँ आई ही क्यों? मुझे तो बस घर पर ही रह जाना चाहिए था*.
फिर भी, तीव्र शारीरिक पीड़ा के बावजूद, मेरे भीतर की किसी गहरी परत ने निर्भर हो जाने और पीछे लौट जाने से इनकार कर दिया।
��स पूरे संकट के दौरान मेरा एकमात्र सहारा* आचार्य जी की शिक्षाएँ* थीं। मैं उनकी वीडियो/सेशन्स सुनती रही, भले ही मैं ख़ुद किस स्थिति से गुज़र रही थी।
भीषण दर्द के बावजूद, मैं खाना बनाती रही, सफ़ाई करती रही, बस से आना‑जाना करती रही और हर दिन ऑफ़िस जाती रही। भीतर‑ही‑भीतर मैं रो रही थी और सब छोड़ देने का मन होता था, लेकिन दफ़्तर में मैं मुस्कराकर जाती और अपनी कमज़ोरी दिखाने से इंकार कर देती।
आज जब आचार्य जी ने समझाया कि कैसे जीवन का दबाव *"गाँव वापस चले जाने"* की इच्छा जगा देता है, तो सब कुछ स्पष्ट हो गया।
बीमार पड़ने से पहले, भागकर घर चले जाना कभी मेरे लिए विकल्प ही नहीं था, क्योंकि मुझे अच्छी तरह पता था कि उसमें कितने समझौते और कितनी सीमाएँ जुड़ी होंगी। लेकिन उस वक़्त तो ऐसा लग रहा था जैसे घर लौट जाना ही मेरी समस्या का एकमात्र समाधान है।
डॉक्टर ने मुझे कह दिया था कि यह कभी ठीक नहीं होगा और मुझे उम्र भर इसी शारीरिक दर्द के साथ जी��ा पड़ेगा।
शुक्र है कि आज, नियमित स्ट्रेन्थ ट्रेनिंग और एंटी‑इन्फ़्लेमेटरी डाइट के ज़रिए, मेरा शरीर काफ़ी बेहतर स्थिति में है। मैं फिर से *बुकस्टॉल पर स्वैच्छिक काम* कर पा रही हूँ और गोवा में *Weekend With Master* में दो बार शामिल हो सकी हूँ, जिसके लिए मैं स्वयं को बहुत कृतज्ञ महसूस करती हूँ। मुझे कभी नहीं लगा था कि निदान के बाद मैं दोबारा आचार्य जी से मिल भी पाऊँगी।
उस पीड़ादायक दौर में जो भी शंकाएँ और प्���श्न मेरे भीतर चलते रहे, उनका आज पूरी तरह समाधान ह�� गया।
धन्यवाद, आचार्य जी, हर चीज़ के लिए।
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✍🏻 *पोस्ट 20 | 8 अक्टूबर '26*
💭 *विषय — भूगोल*
*─────────*
🌍 *रूस में 11 टाइम ज़ोन क्यों हैं?*
🇷🇺 रूस इतना विशाल है कि उसके पश्चिम से पूर्व तक 11 टाइम ज़ोन फैले हुए हैं, जो कलिनिनग्राद से लेकर सुदूर पूर्वी क्षेत्रों तक फैले हैं।
🕛 यानी जब कलिनिनग्राद में दोपहर के 12 बज रहे होते हैं, तब कामचटका में रात के 10 बज चुके होते हैं।
🚆 *ट्रांस-साइबेरियन रेलवे की मॉस्को से व्लाद��वोस्तोक तक की यात्रा लगभग 9,300 किमी लंबी है और यह 8 टाइम ज़ोन से होकर गुजरती है।*
दिलचस्प बात यह है कि रूसी ट्रेनों में समय अक्सर मॉस्को टाइम के अनुसार दिखाया जाता है, जबकि ट्रेन जिस जगह पर होती है, वहाँ स्थानीय समय कुछ और होता है।
⏰ रूस में टाइम ज़ोन की संख्या हमेशा 11 नहीं रही। 2010 में इन्हें घटाकर 9 किया गया, लेकिन 2014 में फिर से 11 कर दिया गया।
🇫🇷 और अगर देशों की बात करें, तो एक दिलचस्प अपवाद भी है। फ्��ांस के समुद्रपारीय क्षेत्रों को शामिल करने पर उसके पास रूस से भी अधिक टाइम ज़ोन हैं।
🤔 एक ही दुनिया, कुछ घंटे की दूरी, और तारीख तक अलग!
🪞 समय की यह व्यवस्था हमें दिखाती है कि एक ही धरती पर रहते हुए भी हमारा अनुभव कितना सीमित हो सकता है। घड़ी बताती है कि कहाँ दिन है, कहाँ रात, कहाँ आज है और कहाँ कल।
लेकिन हमारी पहचान भी कुछ ऐसी ही सीमाओं से बनी होती है। हम अपने देश, शहर, समय, भाषा और परिस्थितियों क��� ही केंद्र मानकर दुनिया को देखत�� हैं और फिर उसी सीमित दृष्टि को पूरा सच समझ लेते हैं।
🌏 प्रश्न यह नहीं कि दुनिया में कितने टाइम ज़ोन हैं, बल्कि यह है कि हम अपने भीतर कितनी सीमाएँ लेकर चलते हैं।
एक ही घटना को अलग-अलग लोग अपनी-अपनी धारणाओं और सुविधाओं के अनुसार देखते हैं। घड़ी बदलने से वास्तविकता नहीं बदलती, लेकिन देखने वाले की स्थिति बदल जाती है।
इसलिए देखने की पहली शर्त है कि हम यह पहचानें कि हमारी दृष्टि भी किसी स्थान, समय और पहचान से बंधी हुई है।
🕰️ *आज आपकी घड़ी में कितना समय हुआ है और आप इस समय क्या अनुभव कर रहे हैं?*
*किसी दूर-दराज़ के देश से इसकी तुलना कीजिए और बताइए कि ठीक इसी समय वहाँ कितने बजे होंगे और वहाँ रहने वाला व्यक्ति क्या अनुभव कर रहा होगा?*
*स्रोत:*
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*अवलोकन — अहंकार कि सुविधा और सही काम*
कुछ दिनों से मेरी तबीयत खराब थी, इसलिए मेरा sports, और walking सब बंद हो गया था। जब थोड़ी तबीयत ठीक हुई तो मैंने दो दिन से badminton फिर से शु��ू किया। इतने दिनों बाद अचानक activity शुरू करने से शरीर में काफी दर्द होने लगा।
कल तो शरीर में इतना दर्द था और फीवर कि उठने का भी मन नहीं कर रहा था। ऐसा लग रहा था कि आज बस आराम करूँ और कुछ न करूँ।
मेरा रोज़ का target 10,000 steps चलने का है। कल जब शरीर में दर्द था तो सबसे पहले मन ने कहा—आज मत जाओ, rest कर लो, शरीर में पहले से ही इतना दर्द है। एक पल के लिए मुझे भी लगा कि शायद आज छोड़ देना चाहिए। लेकिन फिर मैंने अपने मन को देखा कि क्या सच में शरीर को आराम चाहिए या मे��ा मन सिर्फ अपनी सुविधा चाहता है?
मुझे समझ आया कि कई बार अहंकार बहुत चालाकी से सुविधा को जरूरत बनाकर दिखाता है। वह चाहता है कि मुझे मेहनत न करनी पड़े, शरीर को थोड़ा कष्ट हो तो मैं तुरंत पीछे हट जाऊँ। वह हमेशा आसान रास्ता चाहता है। जहाँ थोड़ी मेहनत, अनुशासन या असुविधा आती है, वहाँ मन तुरंत कोई न कोई कारण बना देता है—आज थकान है, आज दर्द है, आज मौसम ठीक नहीं है, कल कर लेंगे।
आज मैंने उस मन की बात को वह��ं पकड़ने की कोशिश की। मैंने सोचा कि अगर मैं हर बार मन की सुविधा के हिसाब से चलूँगी, तो जो मैं कर सकती हूँ, वह नहीं कर पाऊँगी। इसलिए मैंने तय किया कि आज जाऊँगी और देखूँगी कि वास्तव में मैं कितना चल सकती हूँ।
मैं गई और अपने 10,000 steps पूरे करने के बाद भी मन में आया कि आज देखते हैं कितना कर सकती हूँ। आखिरकार आज मैंने 13,896 steps पूरे किए।
मैंने देखा कि कुछ देर पहले जो मन कह रहा था कि “उठ भी मत, आज रहने दो,” वही शरीर बाद में इतना चल पाया। इससे मुझे अपने मन की एक बात साफ दिखाई दी कि हमेशा शरीर की क्षमता और मन की इच्छा एक ��ैसी नहीं होती। कई बार शरीर थोड़ा थका होता है, लेकिन मन उससे कहीं ज्यादा आलस्य और आराम चाहता है।
लेकिन आज मैंने 13,896 steps कर लिए या अपने target से ज्यादा चल लिया, बस इसी पर रुकना नहीं है। मुझे यह भी देखना है कि कहीं मैं अपने target को पूरा करने के अहंकार में शरीर की वास्तविक जरूरत को तो नहीं दबा रही।
आज मैंने अपने अंदर दो चीज़ें देखीं—एक तरफ सुविधा चाहता हुआ मन और दूसरी तरफ वह सीख, जो पूछती है कि वास्तव में स��ी क्या है।
पहले मैं मन में आने वाली हर बात को सच मान लेती थी। आज थोड़ा रुककर देखा कि मन कह क्या रहा है और मुझे वास्तव में करना क्या चाहिए।
मन की सुविधा को जरूरत समझकर उसके पीछे नहीं चलना है। अहंकार हमेशा चाहता है कि सब कुछ आराम से हो, बिना मेहनत के हो, बिना असुविधा के हो। लेकिन अगर मुझे अपने जीवन में कुछ बदलना है तो मुझे अपनी सुविधा से ऊपर उठकर सही काम को करना होगा।
जो लड़की पहले छोटे से दर्द मे�� भी उठना नहीं चाहती थी, आज वही लड़की दर्द और फीवर के बावजूद badminton खेल रही है और 13,896 steps चल रही है। कभी-कभी पीछे मुड़कर देखती हूँ तो खुद मुझे भी दिखाई देता है कि before से after में क्या बदलाव आ रहा है।
आचार्य जी की शिक्षाओं ने मुझे अपने मन को देखना, उसकी चालों को पकड़ना और सुविधा के बजाय सही को चुनना सिखाया है।
बहुत-बहुत धन्यवाद आचार्य जी। 🙏
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*PAF सिर्फ़ एक संस्था नहीं, पूरा जीवन है। ❤️*
ये तस्वीरें रात के 1:30 बजे बैडमिंटन कोर्ट पर ली गई हैं। हम सभी संस्था के IT डिपार्टमेंट में काम करते हैं। दिन में जमकर काम करते हैं और जिस दिन सत्र नहीं होता, उस दिन रात के 11–12 बजे के बाद एक-दो घंटे जमकर बैडमिंटन खेलते हैं।
हमारे साथ हमारे सीनियर्स भी खेलते हैं। ���न तस्वीरों में IT डिपार्टमेंट के सीनियर्स भी हैं। उन्होंने ही हमें काम के बाद खेलने के लिए प्रेरित किया। वरना हमारे पास तो हमेशा यही बहाना होता था कि खेलने-कूदने के लिए समय ही नहीं मिलता। ��िर उन्होंने हमें दिखाया कि काम के साथ खेलना कैसे संभव है।
जिस दिन सत्र नहीं होता था, उस दिन रात के 12–1 बजे का समय अक्सर रील्स देखने में ही बीत जाता था। लेकिन अब रात में एक-दो घंटे जमकर बैडमिंटन खेलता हूँ और थककर रात के 1:30–2 बजे तक सो जाता हूँ।
सीनियर्स दिन में हमें टास्क देकर चुनौती देते हैं और रात में हाथों में रैकेट थमाकर अपने साथ खेलने के लिए उतार देते हैं। और इस दौरान बार-बार एक बात समझाते हैं—देखो, अपनी कमियों को पहचानो। काम में जो गलतियाँ करते हो, वही गलतियाँ तुम्हारे खेल में भी दिखाई देती हैं। काम और खेल अलग-अलग नहीं हैं।
मैंने भी यह ऑब्ज़र्व किया है कि जो काम में अच्छा कर रहा है, उसका खेल भी बेहतर होता जा रहा है। और जो काम में जैसा है, उसका खेल भी कहीं-न-कहीं वैसा ही दिखाई देता है।
यहाँ के सीनियर्स कभी ऐसा व्यवहार नहीं करते कि हम तुम्हारे लीड या मैनेजर हैं और तुम जूनियर्स हो, इसलि��� हम तुम पर धौंस जमाकर रखेंगे।
इसके उलट, यहाँ सीनियर्स पर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी होती है—अपने साथ काम करने वाले लोगों को निरंतर ऊपर उठाते रहना। सिर्फ़ काम में ही नहीं, बल्कि जीवन के हर पहल�� में।
और मैं देख रहा हूँ कि वे अपनी यह ज़िम्मेदारी बख़ूबी निभा रहे हैं। कमी शायद हमारी तरफ़ है। हम ही अपने स्वार्थ के कारण ख़ुद को छोटा बनाए रखना चाहते हैं, क्योंकि बड़ा होने के साथ ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ती हैं और हम उन ज़िम्मेदारियों से बचना चाहते हैं।
लिखने और बताने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन अब सुबह के चार बजने वाले हैं। अगर सब कुछ लिखने बैठ गया, तो सुबह के सात-आठ बज जाएँगे। और हाँ, सुबह ऑफिस ��ी जाना है! 😄
*जीवन क्या होता है, यह सिखाने के लिए आचार्य जी और संस्था को जितना धन्यवाद दूँ, उतना कम है। 🙏*
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*अपने दम पर कमाए गए बीस हज़ार रुपये भी दूसरे द्वार��� मुफ्त में दिए गए एक लाख बीस हज़ार रुपये से ज्यादा दम और गरिमा रखते हैं।*
*आचार्य जी*
मैंने कभी कल्पना में भी नहीं सोचा था कि अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मैं पैसे भी कमा रही होऊंगी, पर आज मैं यह कर रही हूँ।
मुझे कभी यह ज़रूरत महसूस नहीं हुई कि मुझे अभी से पैसे कमाने हैं, कम से कम इतने कि खुद का खर्चा निकल जाए। मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था क्योंकि मैं ज़्यादा अरमान नहीं रखती और मेरे कुछ ख़ास शौक़ भी नहीं थे—और न ही अभी हैं। जो भी खर्च होता था, वह सिर्फ़ मेरी पढ़ाई को लेकर होता था, जिसे पापा पूरा कर ही देते थे; इसलिए कभी ख्याल ही नहीं आया कि मैं पैसे कमाऊँ।
पर जब मैंने पहली बार आचार्य जी को सुना और उन्होंने यह बात कही कि "कम से कम इतना तो कमाओ कि खुद की रोटी खुद खा सको", तो यह बात मुझे बहुत ज़ोरों से खटकी। तब मैं देख पा रही थी कि मैं दूसरों पर कितनी निर्भर हूँ।
फिर जब मैं गीता समागम से जुड़ी, तो एनरोलमे��ट करने की बारी आई। मैंने कुछ पैसे बचत (saving) करके रखे थे, उसी से मैंने पहली बार अपना एनरोलमेंट क��या। जब तक मेरी बचत के पैसे रहे, मैं एनरोलमेंट करती गई। पर बचत के पैसे तो एक समय के बाद खत्म होने ही थे। फिर मैं सोचने लगी कि क्या करूँ? पैसे कहाँ से लाऊँ?
पर एक बात तय थी कि मुझे घर से पैसे नहीं लेने थे, क्योंकि गीता समागम से जुड़ना मेरा अपना चुनाव था। यह मेरा पहला सही चुनाव था जो मैंने खुद से किया था, किसी की सलाह से नहीं। इसलिए मैं चाहती थी कि जिस सही निर्णय को मैंने खुद चुना है, कम से कम उसके लिए तो ���ैं किसी और से पैसे न लूँ। यह भी मैंने आचार्य जी से ही सीखी है। मुझे लगा कि अगर मैं कोई सही काम खुद से कर रही हूँ, तो उसके लिए किसी और से पैसे क्यों लूँ?
बस, फिर यहीं से मेरी यह यात्रा शुरू हुई। मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। शुरुआत में सिर्फ़ दो बच्चे ही पढ़ने के लिए तैयार हुए, क्योंकि गाँव में लड़कियों को पढ़ाने दिया जाना ही एक बड़ा सवाल होता है, पहला कि "तुम्हें पढ़ाना आता भी है या नहीं?" और दूसरी बात, यदि आप पढ़ा भी रहे हैं, तो उतने पैसे नहीं मिलते; ख़ासकर लड़कियों को तो बहुत कम मिलते हैं।
मैंने कहा, "आप जो देंगे, मुझे कोई आपत्ति नहीं है, आप बस बच्चों को भेजिए, मैं पढ़ा��ँगी।" मैंने पढ़ाना शुरू किया, पैसे कम आ रहे थे, फिर भी मैंने जारी रखा। धीरे-धीरे मैं पढ़ाती गई और बच्चे आते गए। आज मेरे पास 9 बच्चे हैं जिन्हें मैं पढ़ाती हूँ। उनके द्वारा दिए गए पैसे से ही मैं अपना एनरोलमेंट करती हूँ और योगदान (donation) भी देती हूँ।
जब पहली बार मेरे हाथ में मेरी खुद की कमाई आई थी, मैं बता नहीं सकती कि मैं कितनी खुश थी! इसका पूरा का पूरा श्रेय मैं आचार्य जी को देना चाहती हूँ। आचार्य जी क��� मार्गदर्शन न होता, तो शायद आज जो मैं ₹1500 कमा पा रही हूँ, वह भी कभी न कमा पाती। जब पहली बार मेरे हाथ में अपने पैसे आए, तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था, क्योंकि वो मेरी अपनी कमाई थी। जो मैंने अपनी मेहनत से कमाई थी।
आज मुझे सच में समझ आ रहा है कि जब आचार्य जी कहते हैं: "अपने द्वारा कमाए गए ₹2,000 भी मुफ्त में मिले ₹2,00,000 से कहीं अधिक गरिमापूर्ण जीवन देते हैं।"
अब यही कोशिश है कि अपनी आगे पढ़ाई की जारी रखूं और ���च्छे से करूँ। दुनिया को और खुद को समझूँ और जानूँ।
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