"लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन है।"
जब जनता को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, तो उसे बदलने का अधिकार भी होना चाहिए।
सत्ता किसी की स्थायी नहीं, जनता की होती है। लोकतंत्र तभी मजबूत रहेगा, जब सरकारें जनता से डरें, जनता सरकार से नहीं।
#protest#paperleak
भारत की जनता यह बात कभी न भूले–चाहे केंद्र की सरकार हो या राज्य की, लोकतंत्र में समय-समय पर सत्ता परिवर्तन आवश्यक है। लंबे समय तक एक ही सरकार सत्ता में रहे, तो जवाबदेही घटती है और दमनकारी प्रवृत्तियों का खतरा बढ़ता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का वोट है।
#संसद_मार्च
संसार में दुःख बहुत है। दुःख के नाना प्रकार और नाना रूप हैं। जीवों के दुःखों का कोई पार नहीं, कोई निव��त्ति नहीं। यदि जीवों में नर्वस सिस्टम न होता, तो कितना अच्छा होता। कोई कराहता नहीं, कोई रोता नहीं। इस संसार में असंख्य जीव हर क्षण किसी न किसी प्रकार के दुःख का अनुभव कर रहे हैं।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
“कठोपनिषद्”
उपनिषदों का यह अमर संदेश सम्पूर्ण मानवता के लिए जागरण का दिव्य आह्���ान है। यह केवल निद्रा से जागने का नहीं, अपितु अविद्या से ज्ञान, सीमित अहंकार से अनन्त आत्मस्वरूप और बन्धन से ब्रह्मानुभूति की ओर अग्रसर होने का आह्वान है। यही मानव जीवन का परम उद्देश्य है।
मानव जीवन परमात्मा की अनुपम कृपा का अमूल्य प्रसा�� है। यह केवल जन्म और मृत्यु के मध्य की यात्रा नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार की महान साधना है। प्रत्येक साधक को इस मार्ग पर संघर्ष, बाधाओं और परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है। किन्तु अद्वैत वेदान्त की दृष्टि में कठिनाइयाँ शत्रु नहीं, अपितु आत्मबल और आत्मज्ञान को जागृत करने वाले दिव्य अवसर हैं।
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य भाष्य के माध्यम से कहते है कि आत्मा नित्य, शुद्ध, ��ुद्ध, मुक्त और निर्भय है। दुःख, भय और निराशा आत्मा के धर्म नहीं, अपितु अविद्या से उत्पन्न देहाभिमान के परिणाम हैं। जब मनुष्य स्वयं को शरीर और मन तक सीमित मानता है, तभी वह दुर्बलता का अनुभव करता है; परन्तु आत्मस्वरूप का स्मरण होते ही उसके भीतर अदम्य साहस और शान्ति का उदय होता है।
जीवन की प्रतिकूलताएँ वास्तव में मनुष्य की सीमाओं को नहीं, उसके सामर्थ्य को उद्घाटित करती हैं। स्वर्ण अग्नि में तप���र अधिक उज्ज्वल होता है, चन्दन घिसकर अधिक सुगन्धित होता है और हीरा घर्षण से अधिक चमकता है। उसी प्रकार संघर्षों की अग्नि में तपकर ही चरित्र, विवेक और आत्मबल का विकास होता है।
जीवन-संघर्ष में चार आधार अत्यन्त आवश्यक हैं- प्रार्थना, श्रद्धा, पुरुषार्थ और दृढ़ संकल्प। प्रार्थना अन्तःकरण को पवित्र करती है, श्रद्धा उसे स्थिरता प्रदान करती है, पुरुषार्थ जीवन को गतिशील बनाता है और दृढ़ संकल्प साधक को लक्ष्य से विचलित नहीं होने देता। इन सबका परम आधार आत्मस्मृति है—यह स्मरण कि हमारे भीतर वही एक अखण्ड ब्रह्मचैतन्य विद्यमान है।
भारतीय अध्यात्म सिखाता है ��ि विपत्ति अभिशाप नहीं, वरदान है। दुःख वैराग्य देता है, वैराग्य विवेक को जन्म देता है, विवेक आत्मचिन्तन की प्रेरणा देता है और आत्मचिन्तन अन्ततः आत्मसाक्षात्कार तक पहुँचाता है। अतः प्रतिकूल परिस्थितियों से भयभीत होने के स्थान पर उन्हें आध्यात्मिक परिष्कार का साधन समझना चाहिए।
अतः निर्भीक होकर जीवन-पथ पर आगे बढ़िए। अपने भीतर स्थित परमात्मस्वरूप का निरन्तर स्मरण कीजिए। प्रार्थना को अपना आधार, श्रद्धा को अपनी शक्ति, पुरुषार्थ को अपना धर्म और आत्मज्ञान को अपना परम लक्ष्य बनाइए। तब कोई भी बाधा आपको विचलित नहीं कर सकेगी; क्योंकि जो अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है, उसके लिए समस्त जगत् ब्रह्ममय हो जाता है।
स्मरण रहे कि विपत्तियाँ मनुष्य को पराजित करने नहीं आतीं, वे उसके भीतर सुप्त ब्रह्मतेज को जागृत करने आती हैं। प्रार्थना दिशा देती है, श्रद्धा शक्ति देती है, पुरुषार्थ गति देता है और आत्मज्ञान जीवन को पूर्णता प्रदान करता है। यही अद्वैत वेदान्त का अमर संदेश है कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानो; वही निर्भयता है, वही शक्ति है और वही परम आनन्द है।
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#Protectionishumanity
Mothers are worried their whole life for their children's safety
Wishing a very happy mother's day to all the mothers #happyMothersDay
ऐसी कैद से अच्छा है, इनको इनके हाल पर आजाद कर देना।
कैसा विकास, कैसी उपज, कैसी अर्थव्यव��्था,
जहा�� जानवरों की ऐसी दुर्दशा?
किसी देश की महानता और उसकी नैतिक उन्नति का अंदाजा हम वहां जानवरों के साथ होने वाले व्यवहार से लगा सकते हैं– महात्मा गांधी
एक्सप्रेसवे से कृषि को नई गति कैसे मिलेगी ?
हम पहले ही तेल और गैस के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं—
क्या अब अन्न के लिए भी उसी राह पर बढ़ रहे हैं?
जब उपजाऊ खेत सड़कों में बदल जाएंगे,
तो आने वाली पीढ़ियों का पेट कौन भरेगा?
#कृषि#विकास
एक समय था जब हमारी माँ एक बूंद दूध गिर जाने पर भी डांट देती थीं—कहती थीं, “यह गौरस है, इसका आदर करो।” हम उस गिरे हुए दूध को भी श्रद्धा से स्पर्श कर माथे से लगा लेते थे। दूध केवल आहार नहीं, संवेदना और संस्कार का प्रतीक था।
फिर आई दुग्ध क्रांति—दूध बढ़ा, पशुपालन बढ़ा, आमदनी बढ़ी।
पशुओं की पीड़ा को समझते हुए, दूध, दही, घी जैसे उत्पादों से बने प्रसाद को त्याग कर, शुद्ध और अहिंसक विकल्पों को अपनाएँ—जैसे भुने अनाज, नारियल, गुड़, फल और मेवे से बने प्रसाद।
भक्ति का अर्थ केवल अर्पण नहीं, बल्कि करुणा और संवेदना भी है। आइए, अपनी आस्था को दया और
यह दृष्टि हमें धैर्य, विश्वास और आंतरिक शांति प्रदान करती है।
समय-समय पर, परिस्थिति के ���नुसार, मैं इन दोनों दृष्टिकोणों का संतुलित उपयोग करती हूं—
कभी सक्रिय होकर अन्याय के विरुद्ध खड़ी होती हूँ, और कभी ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर भरोसा रखकर शांत रहती हूं।
जो इस बात का संकेत हैं कि हर जीव—चाहे वह पशु हो या पक्षी—हमारी करुणा और संरक्षण का अधिकारी है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण में हम यह विश्वास रखते हैं कि ईश्वर सब देख रहा है, और जो भी अन्याय या हिंसा करता है, उसे उसके कर्मों का फल अवश्य मिलेग���।