Activist Sonam Wangchuk along with Members and supporters of Cockroach Janata Party, protesting at the Jantar Mantar in New Delhi on June 06, 2026.
📸: Shashi Shekhar Kashyap
Rupee: ₹95 → ₹100
Stocks: Crashing
Economy: Collapsed
Jobs: Gone
Income: Falling
Savings: Wiped out
Cylinders: Unavailable
Why?
PM = Compromised
He is desperate to protect himself and his financial structure. But 140 crore Indians know - PM Modi has surrendered India’s future.
"हम 2014 में 47% LPG आयात करते थे, आज 62% आयात करते हैं। तेल 82% आयात करते थे वो बढ़कर हो गया 88%... 12 साल से आप क्या कर रहे थे?
कितनी आबादी होगी, क्या जरूरत होगी, आपको कुछ भी पता नहीं? तेल और गैस का प्रोडक्शन लगातार क्यों घट रहा है?"
रेडीमेड पुल चढ़ कर नदी जल्दी पार करने वाले तैर कर देर से पहुँचने वालों से क़ाबिल नहीं कहलाते।
आज की भाषा में कहें तो लिफ्ट से ऊपर पहुँचने वाले, सीढ़ियाँ चढ़ने वालों से ज़्यादा मजबूत नहीं होते।
अगर कोई जाति जन्म से ही हर क्षेत्र में श्रेष्ठ होती, तो यह तय करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती कि किसे शिक्षा, ग्रंथ, ज़मीन और संस्थानों तक पहुँच मिले और किसे नहीं।
दौड़ में अगर कुछ लोगों के पैर बाँध दिए जाएँ और कोई आगे निकल जाए, तो वह प्रतिभा नहीं, शुरुआती बढ़त होती है।
प्रतिभा जाति से नहीं आती, अवसर से आती है। वरना आज भारत का प्रधानमंत्री ब्राह्मण न होने पर भी देश चला रहा है, अधिकांश मुख्यमंत्री ब्राह्मण नहीं हैं, देश के शीर्ष उद्योगपति अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं, ‘मिसाइल मैन’ ब्राह्मण नहीं थे, संविधान के शिल्पकार भी नहीं थे, तो क्या अब ‘बौद्धिक श्रेष्ठता’ की परिभाषा बदलेगी?
इतिहास भी वही बनता है जिसे लिखने और छपने दिया जाता है। सदियों तक महिलाओं को शिक्षा और संपत्ति से दूर रखा गया, इसलिए कई प्रतिभाशाली लेखिकाओं को जॉर्ज एलियट, करर बेल, जॉर्ज सैंड जैसे पुरुष नामों से लिखना पड़ा। यह क्षमता की कमी नहीं, अवसर की कमी थी।
ठीक यही बात हाशिए पर रहे जाति समुदायों पर भी लागू होती है, जब लिखने, पढ़ने, संस्थानों में जगह पाने की अनुमति ही न हो, तो उनकी बुद्धि इतिहास की किताबों में नहीं, लोककथाओं में रह जाती है।
असल बात सीधी है, उत्कृष्टता मेहनत और मौके से पैदा होती है, उपनाम से नहीं।
इसलिए किसी जाति का झंडा लहराकर बुद्धि का दावा करना वैसा ही है जैसे विरासत की संपत्ति पर खड़े होकर खुद को self-made कहना।
जश्न ब्राह्मण किसी जाति के वर्चस्व का नहीं, बल्कि बराबरी के मौके का होना चाहिए, जहाँ योग्यता का परचम लहराये, किसी की विरासत का नहीं।
🎤 Mohammed Qahtani, a Saudi engineer, delivered one of the most impactful speeches ever, winning the Toastmasters World Championship. He showcased the strength found in words...
भारत की तेल ख़रीद पर अब अमेरिकी निगरानी क्यों होगी?
भारत किससे तेल खरीदेगा, किससे नहीं - यह हमारी ज़रूरतें तय करेंगी या अमेरिका की मर्ज़ी?
भारत को मुनाफे का व्यापार करने पर रोक लगाने की हिम्मत अमेरिका को किसने दी?
प्रधानमंत्री जी, भारत का हित और स्वाभिमान बेचते वक़्त ज़रा भी शर्म नहीं आई?
भारत की जनता ये 3 बहुत ज़रूरी और सीधे सवाल पूछ रही है:
1.CJI को EC चयन पैनल से क्यों हटाया?
2.2024 चुनाव से पहले EC को लगभग पूरी कानूनी इम्युनिटी क्यों दी?
3.CCTV फुटेज 45 दिन में नष्ट करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों?
जवाब एक ही है - BJP चुनाव आयोग को वोट चोरी करने का औज़ार बना रही है।
देश में लगातार BLO आत्महत्या कर रहे हैं, उनकी मौत हो रही है।
न्यूज चैनलों से ये खबर गायब है। हो सकता है- चैनलों के पास BLO के नामों की लिस्ट न हो, उनकी मदद के लिए ये रही पूरी लिस्ट 👇
📍 उत्तर प्रदेश
⦁ BLO विजय कुमार वर्मा की मौत
⦁ BLO विपिन यादव ने की आत्महत्या
⦁ BLO सर्वेश कुमार गंगवार की मौत
⦁ SIR सुपरवाइजर सुधीर कोरी ने आत्महत्या की
⦁ BLO सर्वेश सिंह ने आत्महत्या की
⦁ BLO आशीष कुमार की मौत
⦁ BLO शोभा रानी की मौत
⦁ BLO रंजू दुबे की मौत
📍 केरल
⦁ अनीश जॉर्ज ने आत्महत्या की
📍 तमिलनाडु
⦁ BLO जहिता ने की आत्महत्या
⦁ आंगनबाड़ी सेविका ने की आत्महत्या की कोशिश
📍 पश्चिम बंगाल
⦁ BLO नमिता की मौत
⦁ BLO शांति ने आत्महत्या की
⦁ BLO जाकिर हुसैन हक की मौत
⦁ BLO रिंकू तरफदार ने आत्महत्या की
📍 राजस्थान
⦁ BLO हरिओम बैरवा की मौत
⦁ BLO मुकेश जांगिड ने की आत्महत्या
⦁ SIR सुपरवाइजर संतराम की मौत
⦁ BLO अनुज गर्ग की मौत
📍 मध्य प्रदेश
⦁ BLO उदयभान सिंह सिहारे ने आत्महत्या की
⦁ BLO मनीराम नापित की मौत
⦁ BLO सुजान सिंह रघुवंशी की मौत
⦁ BLO भुवन की मौत
⦁ BLO रमाकांत पांडे की मौत
⦁ BLO सीताराम गोंड की मौत
⦁ BLO अनिता नागेश्वर की मौत
⦁ नायब तहसीलदार कविता कड़ेला ने की आत्महत्या
📍 गुजरात
⦁ BLO अरविंद वढेर ने की आत्महत्या
⦁ BLO रमेशभाई परमार की मौत
⦁ BLO डिंकल सिंगोड़ावाला की मौत
⦁ BLO सहायक उषाबेन की मौत
⦁ BLO सहायक कल्पना पटेल की मौत
⦁ BLO दिनेश कुमार रावल की मौत
आधार के बारे में अब स्पष्टता हो गई ।
अगर आपके पास आधार है तो देश की हर सुविधा ले सकते हैं जो सिर्फ देश के नागरिकों को मिलता है । हर कागज बना सकते हैं। सिर्फ आधार के आधार पर पासपोर्ट से लेकर हर लेनदेन कर सकते हैं। बाकी किसी डॉक्यूमेंट की जरूरत नहीं। और हाँ अगर आधार नहीं है तो यह मिलेगा भी नहीं। कई जगह तो आधार अनिवार्य है।
लेकिन आधार है इसका मतलब यह नहीं है कि आप देश के नागरिक/वोटर हैं । वहाँ आधार का कोई आधार नहीं ।
बिहार चुनाव, चुनाव आयोग ने करवाया नहीं है बल्कि पैसे से ख़रीदवाया है। जिन राज्यों को लगता है कि वे फिर भी चुनाव लड़ेंगे तो लड़ें… माननीय सुप्रीम कोर्ट ने तो चुनाव ख़रीद लेने की हरी झंडी दिखा ही दी है, लड़िये।
@indSupremeCourt
हरियाणा के IPS अधिकारी वाई पूरन कुमार जी की आत्महत्या उस गहराते सामाजिक ज़हर का प्रतीक है, जो जाति के नाम पर इंसानियत को कुचल रहा है।
जब एक IPS अधिकारी को उसकी जाति के कारण अपमान और अत्याचार सहने पड़ें - तो सोचिए, आम दलित नागरिक किन हालात में जी रहा होगा।
रायबरेली में हरिओम वाल्मीकि की हत्या, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का अपमान और अब पूरन जी की मृत्यु - ये घटनाएँ बताती हैं कि वंचित वर्ग के ख़िलाफ़ अन्याय अपनी चरम सीमा पर है।
BJP-RSS की नफ़रत और मनुवादी सोच ने समाज को विष से भर दिया है।
दलित, आदिवासी, पिछड़े और मुस्लिम आज न्याय की उम्मीद खोते जा रहे हैं।
ये संघर्ष केवल पूरन जी का नहीं - हर उस भारतीय का है जो संविधान, समानता और न्याय में विश्वास रखता है।
सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस बी आर गवई की ओर जूता फेंकने का प्रयास निंदनीय है लेकिन सरकार को इसकी गंभीरता समझ आने में इतना वक्त क्यों लगा? वरिष्ठ वकील पिल सिब्बल @KapilSibal पौने छह बजे सवाल कर चुके थे कि इस घटना पर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और कानून मंत्री क्यों चुप हैं? क़ानून मंत्री को सूचना मिलते ही निंदा करनी चाहिए थी। दोपहर तक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी से लेकर केरला और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने इसकी कड़ी निंदा कर दी थी। क्या सरकार को इस घटना की गंभीरता समझने में इतना वक्त लग गया? इतनी देर तक क्या गुणा भाग हो रहा था? कई दिनों से चीफ जस्टिस बी आर गवई के ख़िलाफ़ गोदी ऐंकरों के कार्यक्रम से लेकर सोशल मीडिया में अनाप शनाप बातें की जा रही थीं। उन सबको नज़रअंदाज़ किया गया। यह बेहद अफसोसनाक है कि ऐसी घटना हुई है। क्या किसी और के साथ ऐसी उदारता दिखाई जाती? क्या इसलिए सरकार ने इतना वक्त लिया क्योंकि जूता उछालने वाला सनातन का नारा लगा रहा था? बार संघ ने अच्छा किया समय रहते एक्शन लिया लेकिन जजों से लेकर सभी को इस पर बोलना चाहिए। यह रैंडम घटना नहीं है। जूता निकालने वाले का अधिकार बोध कहां से आया है? जूता निकालने की घटना का संबंध जातिगत और सामंती पृष्ठभूमि से है। आज डॉ अंबेडकर होते तो राष्ट्रीय उपवास पर चले गए होते। गांधी होते तो सबके बदले ख़ुद प्रायश्चित कर रहे होते। यह घटना संस्थाओं के ख़त्म होने के बाद इन्हें कुछ नहीं समझने के दुस्साहस का प्रदर्शन करती है।
The attack on the Chief Justice of India is an assault on the dignity of our judiciary and the spirit of our Constitution.
Such hatred has no place in our nation and must be condemned.