हर साल शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित होनी चाहिए. हर साल कम से कम 15,000 से 20,000 शिक्षकों की भर्ती होनी चाहिए. डिग्री डिप्लोमा लिए बैठे युवा धीरे धीरे अपनी Efficiency खोते चले जा रहे हैं. शिक्षण प्रशिक्षण में लगाया गया जनता का पैसा बर्बाद हो रहा है. इस ओर ध्यान देने की जरूरत है-
“इथेनॉल की जितनी फैक्ट्रियां हिंदुस्तान में लगी हैं, वहां की 10-15 किमी की आबादी पूरी बर्बाद है”
ये मेरा नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश के बस्ती के लोगों का कहना है।
बस्ती में कई गाँवों से मैदा फैक्ट्री और फूड प्रोसेसिंग यूनिट खोलने के नाम पर धोखे से जमीन ले ली गई।
आखिर में पता चला कि वहां कैमिकल-युक्त एथेनॉल फैक्ट्री खुलेगी! 😱
इसकी खबर लगते ही गांव वालों ने विरोध शुरू कर दिया है।
गडकरी जी वाहन धारक आम जनता को कोई मलाई नहीं मिल रही। उसे तो पेट्रोल में आपका मिलाया इथेनॉल मिल रहा है।
You will regret this statement Mr @nitin_gadkari 🙏
यह तो हद दर्जे का दोगलापन है 😭
2023 में नितिन गडकरी — "Ethanol के इस्तेमाल से आपको ₹15/लीटर पेट्रोल मिलेगा और आपकी कार का माइलेज भी वही रहेगा।"
2026 में नितिन गडकरी — ₹105/लीटर पेट्रोल बेच रहे हैं, जबकि लोग इथेनॉल मिलाने की वजह से गाड़ियों के इंजन में जंग लगने और माइलेज कम होने पर नाराज़गी जता रहे हैं। 🤢
और 'गोदी मीडिया' में इस बारे में कोई कवरेज भी नहीं है।
“इथेनॉल का माइलेज 30 फ़ीसदी कम होता है”
तेल कंपनी BPCL के बड़े अधिकारी अनुराग सरावगी का ये बयान ANI हैंडल से डिलीट करा दिया गया है!
किस लॉबी ने डिलीट कराया @nitin_gadkari जी?
(Video posted by @AjitSinghRathi)
इथेनॉल की खरीद लागत (OMCs के लिए) — ₹71.32 प्रति लीटर
पेट्रोल की बेस/रिफाइनिंग लागत — ₹52–55 प्रति लीटर
यानी जिस इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाया जा रहा है, उसकी खरीद लागत ही पेट्रोल की बेस लागत से अधिक है।
ऊपर से—
▪️ इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कम, इसलिए माइलेज पर असर पड़ सकता है।
▪️ इथेनॉल उत्पादन के लिए भारी मात्रा में गन्ना और पानी की आवश्यकता होती है, जिससे जल संसाधनों और कृषि भूमि पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
▪️ खाद्य फसलों, पानी और कृषि संसाधनों के उपयोग को लेकर भी गंभीर पर्यावरणीय और नीतिगत प्रश्न उठते रहे हैं।
तो सवाल सीधा है—
जब लागत ज़्यादा, ऊर्जा कम और पर्यावरणीय कीमत भी अलग से चुकानी पड़ रही है, तो E20 ईंधन से सबसे बड़ा फायदा आखिर किसे हो रहा है?
देश को ये धन्नासेठ की पार्टी भाजपा से मुक्ति चाहिए।
“Ethanol से माइलेज 30% कम मिलता है, लेकिन हमें इसे सकारात्मक नज़रिए से देखना चाहिए।”
— एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, भारत पेट्रोलियम
जब आप हमें ईंधन के नाम पर मिलावटी चीज़ दे रहे हैं, जिससे न सिर्फ़ माइलेज कम मिलता है बल्कि हमारी गाड़ियाँ भी खराब होती हैं, तो हम इसे सकारात्मक नज़रिए से कैसे देख सकते हैं?
इसे सिर्फ़ गडकरी एंड सन्स ही सकारात्मक नज़रिए से देख सकते हैं, क्योंकि वे इससे पीढ़ियों के लिए दौलत बना रहे हैं।
ये नितिन गडकरी का बहुत ही आपत्तिजनक बयान है!
इथेनॉल मिले पेट्रोल से तमाम समस्याएं हो रहीं हैं लेकिन नितिन गडकरी को ये “लॉबिज़” का काम लग रहा है! देश की जनता की तरफ़ से व्यक्त हर तकलीफ़ को ‘पैसा के बूते चलाया जा रहा कैंपेन’ बताना गडकरी का ओवर कॉन्फ़िडेंस दिखाता है। उल्टा विपक्षी पार्टियों का आरोप तो ये है कि अपने बेटे के बिज़नेस में फ़ायदा पहुँचने के लिए नितिन गडकरी ने इथेनॉल नीति बनायी है।
ख़ैर, जनता जब अपने कार-बाइक का कबाड़ इनके दरवाज़े पर रखना शुरू कर देगी तब शायद इनको एहसास होगा कि मंत्री पद के अहंकार में ये कितना आगे निकल चुके हैं!
“…इथेनॉल का माइलेज 30 फ़ीसदी कम होता है…”
अनुराग सरावगी, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के बायोफ्यूल्स के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर
Video Credit : ANI https://t.co/WWxnk5ZztN
सुप्रीम कोर्ट के बहस में सरकार के तरफ से कहा गया है कि Ethanol Blending बस एक एक्सपेरिमेंट है उससे गाड़ी खराब होती है कि नहीं वो सरकार नहीं मालूम और न जिम्मेदारी है।
जैसे जबरदस्ती Covid 19 वैक्सीन लगवाकर सरकार ने बोल दिया कि सारे नागरिकों ने अपने मर्जी से लगवाया,
जैसे PM Cares Fund के लिए पहले लोगों से चंदा इकट्ठा करवा कर बोल दिया गया कि ये एक प्राइवेट चंदा है इसके RTI का कोई काम नहीं।
गजब का मजाक चल रहा है इस देश में, किसी दिन आपके शरीर पर भी सरकार एक्सपेरिमेंट करवा देगी और बाद में बोल देगी कोर्ट में की आपने अपनी मर्जी से करवाया है।
मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट को बता रही है कि इथेनॉल मिले पेट्रोल को लेकर अभी प्रयोग के स्तर पर ही है और नतीजा अगले साल पता चलेगा। लेकिन इस बीच मध्य वर्ग की मेहनत की कमाई से ली गई गाड़ियों की बैंड बज रही है।
अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्री नितिन गड़करी के इथेनॉल प्रेम पर जल्द अंकुश नहीं लगाया तो वाहन धारक मध्यमवर्ग का एकाध फ़ीसदी वोट खिसक सकता है।
एक तो वाहन की EMI का भार, उसे चुका लिया हो तो भी माइलेज की मार, समस्या होने पर वर्कशॉप का खर्चा… क्या क्या झेले मध्यम वर्ग!