मुझे ज्योतिष सिखाना टेढ़ी खीर थी । मेरे गुरु न होते तो किसी बाबा जी की कोई बात तो मैं मानने के लिए तैयार ही नहीं था ।
मैंने पूछा गुरु शनि मंगल को स्पेशल दृष्टि क्यों ? तो ये फोटो दिखाई गुरु की । कहा ये दो चंद्रमा देख रहे हो गुरु के । कोनिक दृष्टि । पांचवी और नवीं ।
फिर शनि के चंद्रमा दिखाए ।
फिर समझ आया कि बुध शुक्र को स्पेशल दृष्टि क्यों नहीं
क्योंकि उनके चंद्रमा नहीं ।
फिर मैंने कहा कि गुरु के तो बहुत चंद्रमा हैं तो सारी दृष्टि क्यों नही ? बोले किसने कहा नहीं है । चार आना, बारह आना दृष्टियां हैं । हर हाउस को किसी दृष्टि से देखता है । पर हम पाराशरी लोग बस पूरण दष्टियां लेकर चलते हैं ।
"ચિત્ત મિલે તો સબ મિલે, નહીં તો ફોગટ સંગ ;
પાણી પથ્થર એક જ ઠોર, કોર ન ભીંજે અંગ!
- સંત તુકારામ
(કોઈપણ સંબંધમાં મન થી મનનું મિલન જરૂરી છે તો જ સંબંધ ગાઢ બને છે, જેમ પાણી પથ્થરને માત્ર બહારથી સ્પર્શે છે, પણ તે અંદરથી ભીંજાતો નથી.)