#किसको_मिले_कबीरभगवान
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संत रविदास जी और कबीर जी समकालीन थे। कबीर परमात्मा की समर्थता से परिचित होकर उन्होंने कबीर जी को अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में स्वीकार किया था। पुस्तक रैदास बानी के पेज 290 पर लिखा है:
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कबीर परमात्मा, हजरत अली को मिले, उन्हें कलमा प्रदान किया था। इस बारे में सूक्ष्मवेद में कहा गया है:
गरीब, अली अलह का शेर है, सीना स्वाफ शरीर।
कृष्ण अली एकै कली, न्यारी कला कबीर।।
गरीब, अली अलीलौं हो गये, मुहम्मद पदम पचास।
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मंसूर अली और उनकी बहन शिमली से भी कबीर परमात्मा ने शम्स तबरेज़ के रूप में भेंट की थी, जिसका वर्णन 'कबीर मंशूर' नामक पुस्तक में मिलता है। संत गरीबदास जी ने कहा है:
गरीब, बहुर शमशतबरेज रूप में, समझाये मनसूर।
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यहूदी धर्म के प्रवर्तक माने जाने वाले हज़रत मूसा जी को उनके अल्लाह ने, उनसे अधिक ज्ञानी 'अल-खिज़्र' के पास जाकर इल्म (ज्ञान) प्राप्त करने का निर्देश दिया था। इसका उल्लेख पवित्र कुरआन शरीफ़ के सूरा काफ 18 आयत 60 से 82 में है और वह
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धर्मदास जी को कबीर परमात्मा पहली बार मथुरा में 'जिंदा महात्मा' के रूप में मिले थे। इसके बाद वे अनेक बार विभिन्न रूपों में मिले, उन्हें सतलोक का साक्षात्कार कराया और पुनः संसार में भेजा। इस पर धर्मदास जी ने कहा है:
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त्रेता युग में कबीर परमेश्वर मुनींद्र नाम से प्रकट हुए तथा नल व नील को शरण में लिया।
उनकी कृपा से ही समुद्र पर पत्थर तैरे। धर्मदास जी की वाणी में इसका प्रमाण है:-
रहे नल नील जतन कर हार, तब सतगुरु से करी पुकार।
जा
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सामान्यतः स्वामी रामानंद जी को कबीर जी का गुरु माना जाता है, परंतु मर्यादा बनाए रखने के लिए कबीर जी ने गुरु-शिष्य की लीला की थी। आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार, स्वामी रामानंद जी ने स्वयं कबीर साहेब की समर्थता को स्वीकार किया था।
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कबीर परमात्मा, संत दादू दयाल जी से सन् 1551 में आमेर (राजस्थान) में मिले थे। इस पर दादू जी ने कहा है:
जिन मोकुं निज नाम दिया, सोइ सतगुरु हमार।
दादू दूसरा कोई नहीं, कबीर सृजन हार।। - कबीरपंथी शब्दावली, पृष्ठ 233
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कबीर परमेश्वर हजरत मुहम्मद जी को मिले थे।
कबीर साहेब हजरत मुहम्मद जी को सतलोक लेकर गए, सर्व लोकों की स्थिति से परिचय करवाया। किन्तु हज़रत मुहम्मद जी ने मान-बड़ाई के कारण कबीर साहेब का ज्ञान स्वीकार नहीं किया था।
कबीर साहेब ने कहा है-
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त्रेता युग में हनुमान जी को मिले कबीर परमात्मा
श्री रामचंद्र द्वारा रावण वध के बाद माता सीता की अयोध्या वापसी पर जब एक घटनाक्रम के दौरान माता सीता जी ने हनुमान जी का अपमान किया तो हनुमान जी वापिस जंगल में चले गए।
#शराब_पीना_महापाप
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सौ नारी जारी करै, सुरापान सौ बार।
एक चिलम हुक्का भरै, डूबै काली धार।।
एक चिलम भरकर हुक्का पीने वाले को देने से भरने वाले को जो पाप लगता है, वह सुनो। एक बार परस्त्राी गमन करने वाला, एक बार शराब पीने वाला,
एक बार माँस खाने वाला पाप के कारण उपरोक्त कष्ट भोगता है। सौ स्त्रिायों से भोग करे और सौ बार शराब पीऐ, उसे जो पाप लगता है, वह पाप एक चिलम भरकर हुक्का पीने वाले को देने वाले को लगता है। विचार करो तम्बाकू सेवन (हुक्के में, बीड़ी-सिगरेट में पीने वाले, खाने वाले)