क्या आप जानते हैं डॉ अंबेडकर ने भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के लिए श्रद्धांजलि लेख लिखा था और उसमें साफ़ ज़िक्र था गांधी द्वारा उन्हें बचाने की कोशिशों का?
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दिसम्बर 1946 में सब संविधान सभा की बैठक हुई, तो उसके 389 सदस्यों में से 93 की सीट रियासतों के प्रतिनिधित्व के लिए थीं।
लेकिन उस पहली मीटिंग में एक भी राजा या रियासत ने हिस्सा नहीं लिया।
रियासतों का देश के 40% हिस्से पर क़ब्ज़ा था, भारत की कुल आबादी का एक-चौथाई हिस्सा वहाँ बसता था।
उनकी हिस्सेदारी के बग़ैर संविधान और आज़ादी दोनों अधूरे थे।
रियासतों में एक तरफ़ ग्वालियर, कोटा, अलवर नेतृत्व कर रहे थे, दूसरी तरफ़ हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर आदि थे।
जब वे राजा भारत में शामिल होने में अनिच्छा दिखा रहे थे, तब अप्रैल 1946 में जवाहरलाल नेहरू ने उनके गढ़ ग्वालियर में जा कर ललकारा और ऐलान किया कि जो रियासतें भारत की संविधान सभा में शामिल नहीं होंगी, उन्हें भारत का दुश्मन माना जाएगा।
फिर उन्होंने सरदार पटेल को ज़िम्मेदारी सौंपी। अगले चार महीने में 565 में से 562 रियासतें लाइन पर आ गई। जो तीन उन्हें अगले एक साल के भीतर भारत में शामिल करा लिया। ये हैदराबाद, जूनागढ़, जम्मू-कश्मीर रियासतें थीं।
ख़ास बात ये है, कि हिंदू रियासतों को लोकतांत्रिक भारत में शामिल
न होने की शह सावरकर दे रहे थे। उनका सोचना था कि हिंदू राष्ट्र हिंदू राजाओं के दम पर ही बनेगा। आज उनके भक्त अखंड भारत की बात करते हैं। लेकिन तब वो एक लोकतांत्रिक भारत के स्वरूप के ही ख़िलाफ़ थे।
आज श्री रत्नप्पा कुम्हार जी जन्म जयंती पर कांग्रेस हेडक्वार्टर, 24 अकबर रोड, नई दिल्ली ऑफिस में श्रद्धांजलि समारोह में उद्बोधन के अंश।
@INCIndia
ये मंदिर से चढ़ावा चोरी करने वाले वाले, पेपर लीक करवाने वाले, छात्रों पर लाठी चलवाने वाले कौन से दिमाग़ी नक्सल थे, महाराज ?
जंतर मंतर प्रदर्शन पर भले ही आप दिखावा करते हैं कि हमने माफ़ कर दिया है लेकिन आपने माफ़ नहीं किया है, और वही कुंठा आज आपके शब्दों से निकल रही हैं।