उत्तराखंडी माताओं की हकीकत बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करो फिर वही बच्चे मां बाप से दूर,इनका बोलते बोलते रोना गड़वाली में खेरी, बहुत रुला दिया इस वीडियो ने मां अपने बच्चों के लिए कितना करती है और बाद में देखने के लिए तरसना,बहुत भाउक वीडियो है,मां की ममता तुम्हें नमन सैल्यूट ।
अमृत रस
पकड़ो बूंद अंजुरी से
समझो इसकी महिमा तुम
बूंद-बूंद से घट भर जाता
अमृत रस बरसाता है।
समझो इसकी कीमत तुम
मत इसको तुम व्यर्थ करो
जीवन का प्राणदाता ये
संजीविनी बन जाता है।
पकड़ो बूंद अंजुरी से......
डॉ.निशा नंदिनी भारतीय
व्योम-सर में हो उठा विकसित
अरुण आलोक-शतदल;
चिर-दुखी धरणी विभा में
हो रही आनन्द-विह्वल !
चूमकर प्रति रोम से सिर
पर चढ़ा वरदान प्रभु का,
रश्मि-अंजलि में पिता का
स्नेह-आशीर्वाद आया !
रे प्रवासी, जाग , तेरे
देश का संवाद आया !
~ दिनकर
#सुहानी_भोर🌄
#काव्य_कृति✍️
सर्वप्रथम ऋणी हूँ मैं, उस #माँ का
सहकर जिसने असह्य दर्द और पीड़ा
लायी मुझे इस संसार में !
प्यार से पुचकारकर
जागकर बिताईं जिसने कई रातें
गीली बिस्तर में करवट बदलकर-बदलकर
ताकि ले सकूं, चैन और सुकून की नींद मैं..!!
~ शीतल साहू
#मातृ_दिवस 🤱 #लेखनी✍️
गाँव में लगातार तीन दिन के बरसात के बाद आज सुबह सूर्योदय के समय का अत्यन्त सुंदर दृश्य, जिस स्वर्ग की कल्पना मानव जाति लगातार करते आ रही है शायद यही उस कल्पना का एक छोटा सा उदाहरण है ..!
#सुप्रभात.! 🙏🙏
है बहुत अंधियार अब #सूरज निकलना चाहिए,
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए।
रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह,
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए..!!
~ गोपालदास 'नीरज'
#सूर्य 🌞 #लेखनी ✍️
#श्रमिकों की दुनिया बहुत बड़ी
सागर की लहरों से लेकर
अम्बर तक फैली !
इनका कोई अपना देश नहीं,
काला, गोरा, पीला भेष नहीं !
सारी दुनिया के श्रमिकों का जीवन,
सारी दुनिया के श्रमिकों की धड़कन
कोई अलग नहीं !
~ महेंद्र भटनागर
#श्रमिक_दिवस 🛠️ लेखनी ✍️
@pareeknc7@Lekhni_@madhuleka
सुबह-सुबह रोशनी का एक टुकड़ा
पानी की एक बूंद के भीतर जाकर
ठहर गया है
मानो मैं कोई एक चमकता हुआ हीरा देख रहा हूं...
कुछ ही देर में ओझल हो जाएगा
यह अप्रतिम दृश्य...
पानी की बूंद में ठहरी हुई चमक
आकाश में चली जाएगी
किसी तारे के भीतर रात होते ही..!!
~ राग तेलंग
#सुहानी_भोर🌄
मुख पे छलके श्रम की बूंदें
सर पे ईंटों का भारी बोझ
यह मेरे अद्वितीय भारत की
अद्भुत,जीवंत,कर्मठ खोज।
कहते हैं लोग इन्हें मजदूर
ईंट-पत्थर,गारा ये ढोते हैं
किंचित अल्प नहीं दूजों से
किसी के आगे नहीं रोते हैं।
ये निश्छल देवदूत धरा के
हम सबके जीवनदाता हैं.
डॉ.निशा नंदिनी