“यह मुद्दा समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या भाजपा का नहीं है। यह देश के युवाओं, छात्रों और नौजवानों के भविष्य का सवाल है।
क्या अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही बेटियों के कपड़े फाड़े जाएंगे? क्या युवाओं और छात्रों के हक़ में सदन में आवाज़ उठाना भी गुनाह है?
CJP आंदोलन के दौरान यदि कोई नेता बिना लाठी-डंडों और गोली की परवाह किए प्रदर्शनकारियों के बीच डटकर खड़ा दिखाई दिया, तो वह थीं डिंपल जी।
कठिन परिस्थितियों में संघर्ष के समय साथ खड़े रहने का संदेश ही किसी जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है।
जब सत्ता ने युवाओं और बेटियों की आवाज़ सुनने से इनकार किया, तब डिंपल यादव जी ने उनके आँसू, उनकी पीड़ा और उनके संघर्ष को महसूस किया।
आज उन्होंने सिर्फ़ साथ नहीं दिया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि संवेदना ही सच्ची राजनीति की सबसे बड़ी पहचान है।
झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा है कि झारखंड के उन 50 विधायकों के नेता हेमंत सोरेन और राहुल गांधी हैं, जिन्होंने राज्यसभा चुनाव में गठबंधन के प्रत्याशियों को वोट दिया।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं बंद करने का आदेश आखिर कहाँ से आया ? क्या यह आदेश PMO या MHA से आया ?
लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ को सुविधाएं छीनकर दबाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। देश जानना चाहता है कि इस फैसले की जिम्मेदारी किसकी है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा ने गठबंधन सहयोगियों से आपसी टीका-टिप्पणी से बचने और पुरानी बातों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की अपील की है।
पार्टी ने कहा कि गठबंधन पूरी तरह मजबूत है और भविष्य में भी एकजुट रहेगा।
बंगाल के इतिहास में उनका नाम हमेशा दर्ज रहेगा, जबकि अवसरवादी नेताओं को इतिहास मुश्किल से याद रखता है।
बंगाल ने मीर जाफर और जगत सेठ जैसे विश्वासघात भी देखे हैं। इतिहास गवाह है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा क्षणिक होती है, लेकिन जननेताओं की विरासत स्थायी होती है।@AITCofficial
शयोनी घोष और यूसुफ पठान चाहे अपने-अपने क्षेत्र में बड़े नाम रहे हों, लेकिन राजनीति में उनकी पहचान ममता बनर्जी के भरोसे और संघर्ष की देन है।
कुछ लोगों के जाने से न तो ममता दीदी का संघर्ष कम होगा और न ही उनकी राजनीतिक विरासत मिटेगी। @SayoniGhoshAITC@iamyusufpathan
राज्यसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी तक नहीं उतार पाई, लेकिन हंगामा करने में सबसे आगे है।
जब चुनाव लड़ने का साहस नहीं था, तो विरोध का यह दिखावा किस लिए? @JmmJharkhand
सत्य की जीत हुई, लोकतंत्र की जीत हुई है और कांग्रेस के षड्यंत्र, अहंकार एवं राजनीतिक प्रपंच की करारी हार हुई है और अंततः भाजपा समर्थित प्रत्याशी का नामांकन वैद्य माना गया। 🚩
आदिवासी हितों की बात करने वाली भाजपा की सच्चाई यह है कि झारखंड से उसका न एक भी आदिवासी लोकसभा सांसद है, न राज्यसभा सांसद।
राज्यसभा चुनाव में भी आदिवासी प्रत्याशी देने की बात तो दूर, अपना प्रत्याशी देने का साहस नहीं जुटा पाई। १/२
वर्तमान में झारखंड से बीजेपी का एक भी आदिवासी सांसद नहीं है। न तो लोकसभा और न राज्यसभा । दुसरी तरफ INDI गठबंधन में JMM के तीन और Congress कोटे से दो कुल मिलाकर पाँच सांसदों में पांचों आदिवासी है| (5/5)
राज्य सभा चुनाव में बीजेपी के पास यह मौका था कि वे झारखंड के किसी भी आदिवासी नेता को आगे कर संसद तक पहूँचा सकते थे। ऐसा नहीं है कि झारखंड में बीजेपी के पास आदिवासी नेता या कार्यकर्ता नहीं | एक से बढ़कर एक दिग्गज नेता, कार्यकर्ता, प्रवक्ता भरे पड़े हैं l पूर्व में बतौर विधायक मंत्री मुख्यमंत्री सेवा दे चुके अनुभवी लोगों की फौज भरी पडी हैl इसके अलावा भी झारखंड की धरती ने कई प्रतिभावान आदिवासी ट्राइबल एक्टिविस्ट, अन्तर्राष्ट्रिय स्तर के खिलाड़ियों, शिक्षाविदों, रिसर्चर्स (शोधकर्ताओं), पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को जन्म दिया है, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपने आदिवासी समुदाय के अधिकारों, पर्यावरण संरक्षण और जल-जंगल-ज़मीन की आवाज़ को मजबूती से उठाया है।
इसे दुर्भाग्य कहें या बदमाशी राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने आदिवासी मूलनिवासी को नकारते हुए जिन दो नाम पर समर्थन दिया है उनमें से एक गौरव वल्लभ राजस्थान (Rajasthan) के मूल निवासी हैं, दुसरे परिमल नाथवानी गुजरात (Gujarat) के उद्योगपति | दोनों ही गैर झारखंडी .... दिकू (बाहरी) |
झारखंड बीजेपी की आदिवासी विरोधी मानसिकता पहली बार सामने नहीं आई है| अपनी हरकतों और गलत फैसलों के कारण ही भाजपा झारखंड के आदिवासियों मूल निवासियों से दुर होती जा रहे हैं। मैने कई बार लिखा है कि झारखंड में बीजेपी को वोट तो आदिवासियों मूल निवासियों का चाहिए पर नेतृत्व और प्रतिनिधित्व नहीं नहीं चाहिए l जिला और मंडल स्तर के चुनाव तक में आदिवासी कार्यकर्ता को जगह नहीं मिलती | दरअसल झारखंड बीजेपी के दिकू नेताओं में घमंड भरा हूआ है| इन्हें लगता है आदिवासी काबिल नहीं है कि वे नेतृत्व कर सकें l जबकि ये भूल रहे हैं कि उनका मुकाबला एक अकेले आदिवासी नेता हेमंत सोरेन से है| झारखंड की राजनीति में 'वन मैन आर्मी' जिसने झारखंड के गरीब आदिवासियों को साथ में लेकर विश्व की सबसे बडी राजनीतिक दल (बीजेपी) को लगातार दो बार बुरी तरह पटका है| हेमंत सोरेन की ताकत और हिम्मत के पिछे झारखंड के आदिवासी है| आदिवासी समुदाय अपने निस्वार्थ, साहसी और एकजुट स्वभाव के लिए जाना जाता है। वे जल, जंगल, जमीन और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए बिना किसी स्वार्थ के हमेशा अपने नेता के साथ चट्टान की तरह खड़े रहते हैं।
व्यक्तिगत तौर पर अपनी बात कहूं तो भले ही सीएम हेमंत सोरेन लाख वैचारिक व राजनीतिक मतभेद हों पर वे हम झारखंड के आदिवासियों के लिए "यूथ आइकॉन" हैंl अगर सीएम कहते हैं कि "बीजेपी बाहरी लोगों (दिकूओं) और व्यापारियों की पार्टी है, इनको झारखंड के आदिवासी मूलनिवासी से कोई मतलब नहीं है" इसमें कुछ गलत नहीं है| हेमंत सोरेन अक्षरशः सही है।
राज्य सभा चुनाव में बीजेपी ने गौरव वल्लभ (राजस्थान) और परिमल नाथवानी (गुजरात) जैसे बाहरी नेताओं
को आगे बढ़ाकर एक बार फिर साबित कर दिया वे सिर्फ आदिवासियों मूलनिवासी विरोधी नहीं झारखंड विरोधी भी है|
कंचन ✍️
#मंतव्य #JharkhandPolitics
@HemantSorenJMM@narendramodi@NitinNabin@AmitShah@yourBabulal@AdityaPdSahu@ChampaiSoren@bjpkarmveer
शर्मनाक!
मुरादाबाद की यह तस्वीर स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर बदहाली और प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलती,जब एक मरीज जिंदगी और मौत से जूझ रहा हो, तब ऑक्सीजन सिलेंडर चलाने के लिए हथौड़े का सहारा लेना पड़े, यह केवल बदइंतजामी नहीं बल्कि व्यवस्था की असफलता का प्रमाण है।@myogiadityanath
मुरादाबाद की यह तस्वीर सिर्फ बदइंतजामी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई दिखाती है।
जब मरीज की सांसें गिनती में हों, तब ऑक्सीजन सिलेंडर खोलने के लिए हथौड़ा चलाना पड़े , इससे बड़ा सिस्टम फेलियर क्या होगा?
भाजपा अपनी कमजोरी के कारण झारखंड से उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी।
भाजपा का राज्यसभा चुनाव से पीछे हटना उसकी राजनीतिक विफलता को दर्शाता है। जनता मुद्दों पर जवाब चाहती है, बयानबाज़ी पर नहीं।.@JmmJharkhand@HemantSorenJMM
झामुमो की दोगली राजनीति खत्म होने वाली नहीं है।
दरअसल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष माननीय श्री नितिन नवीन जी के झारखंड दौरे, संगठन की मजबूती और कार्यकर्ताओं के उत्साह ने झामुमो की नींद उड़ा दी है।
झामुमो दूसरों को ज्ञान देने से पहले यह बताए कि-
☑️ राज्यसभा सीट को लेकर कांग्रेस और झामुमो में इतनी खींचतान क्यों हुई?
☑️ कांग्रेस के पर्यवेक्षकों को बार-बार रांची आकर हेमंत सोरेन जी से मान-मनौव्वल क्यों करना पड़ा?
☑️ कभी दोनों सीटों पर झामुमो के लड़ने की बात, कभी कांग्रेस का अलग दावा और फिर पर्दे के पीछे सौदेबाजी का खेल क्यों चला?
☑️ बिहार में झामुमो को किनारे लगाया गया, असम में कोई पूछने वाला नहीं था और अब झारखंड में राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस के सामने इतनी गिड़गिड़ाहट की नौबत क्यों आ गई?
भाजपा में संगठन सर्वोपरि है, इसलिए विधायक, कार्यकर्ता और नेतृत्व एक साथ खड़े दिखते हैं। लेकिन झामुमो-कांग्रेस गठबंधन में तस्वीर उलटी है- बाहर एकता का दिखावा, अंदर सीटों की सौदेबाजी।
झामुमो पहले अपने गठबंधन की कानाफूसी, खींचतान और बंदरबांट पर ध्यान दे, फिर दूसरों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाए।
आज रांची में राज्यसभा चुनाव को लेकर झामुमो नेता आदरणीय श्री बैद्यनाथ राम जी और कांग्रेस नेता श्री प्रणव झा जी के नामांकन पत्र दाखिल कार्यक्रम में शामिल हुआ तथा सत्तादल के सभी नेताओं के साथ बैठक में शामिल हुआ।
आज झारखंड विधानसभा कार्यालय में राज्यसभा चुनाव के नामांकन से पूर्व महागठबंधन के राज्यसभा प्रत्याशी श्री बैद्यनाथ राम जी एवं श्री प्रणव झा जी से आत्मीय मुलाकात हुई।
दोनों प्रत्याशियों को आगामी चुनाव हेतु हार्दिक शुभकामनाएं दीं। विश्वास है कि दोनों प्रत्याशी उच्च सदन में झारखंड की जनता की आकांक्षाओं, जनहित के मुद्दों एवं राज्य के विकास की आवाज़ को मजबूती प्रदान करेंगे।
झारखंड की जनता और भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता यह जानना चाहते हैं कि जब पार्टी राज्य में मजबूत विपक्ष होने का दावा करती है, तब राज्यसभा चुनाव में अपना झंडा उठाने वाला उम्मीदवार क्यों नहीं दिया गया।
यह स्थिति भाजपा की रणनीतिक कमजोरी और राजनीतिक असमंजस को दर्शाती है। #Jharkhand