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भारत सोने की चिड़िया था…
अंग्रेज़ सब कुछ लूट कर ले गए…
यही सबसे बड़ा झूठ था….!!
अपनी सात पीढ़ी पहले के पूर्वजों की स्थिति पूछ लो…
पता चल जाएगा कितनी सोने की चिड़िया थे हम…
सरकार की लाठी- बंदूके किसान की राह नही रोक सकती:बाबा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत
लठ के दम पर जिसने बार बार दिल्ली -लखनऊ को झुकाया, किसानों के लिए अपना खून पसीना बहाया ,
किसानों के रहनुमा परम आदरणीय चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत जी की जयंती पर शत् शत् नमन 🙏
#जाट_समाज
आम तौर पर लोग चीज़ें जैसी हैं उसके आदि हो जाते हैं और बदलाव के विचार से ही काँपने लगते हैं।
हमें इसी निष्क्रियता की भावना को क्रांतिकारी भावना से बदलने की ज़रूरत है।
~ भगत सिंह
“दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त, मेरी मिट्टी से भी खुश्बू-ए-वफ़ा आएगी”
महान क्रांतिकारी, शहीद-ए-आज़म भगत सिंह जी की जयंती पर उन्हें शत शत नमन।।
#BhagatSingh#भगत_सिंह
इतनी महंगाई के लिए भी एक दिया जलाइए… 🪔
आज एक तरफ़ साहब का जन्मदिन मनाया जा रहा है, दीये जलाए जा रहे हैं, जश्न की तस्वीरें दिखाई जा रही हैं…
और दूसरी तरफ़ जिस घर में रसोई का तेल खरीदना मुश्किल हो गया है, वहाँ चूल्हा कैसे जलेगा?
जिस परिवार की कमाई का बड़ा हिस्सा राशन, दवा, बच्चों की फीस, गैस और रोज़मर्रा की जरूरतों में चला जाता है, उसकी परेशानी कौन दिखाएगा?
और बिहार को देखिए…
एक तरफ़ पानी में डूबे घर, बर्बाद फसलें और राहत का इंतज़ार करते 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हैं।
दूसरी तरफ़ उसी बिहार में जन्मदिन के अवसर पर ‘आशीर्वाद का दीया’ जलाने के कार्यक्रम हो रहे हैं।
सवाल जन्मदिन मनाने का नहीं है।
सवाल प्राथमिकताओं का है।
जब जनता महंगाई से परेशान हो,
जब बाढ़ में घर डूब रहे हों,
जब परिवार राशन और दवाइयों के लिए संघर्ष कर रहे हों-
तब मीडिया का कैमरा सिर्फ़ जश्न पर क्यों रहे?
एक दिया साहब के जन्मदिन के लिए सही…
लेकिन उस परिवार के चूल्हे के लिए ? जिसमें आज खाना बनाने के लिए तेल तक नहीं है।
जश्न मनाइए, शुभकामनाएँ दीजिए-
लेकिन जनता की तकलीफ़ को जश्न की रोशनी में छिपाइए मत।
तुकाराम मुंढे बोले-अस्पताल में ₹11 के प्रोडक्ट की कीमत ₹325: ₹6.75 की सिरिंज पर MRP ₹57.20; मार्जिन पर सवाल उठाए
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#Maharashtra#FDA#TukaramMundhe#HindiNews
बाड़ेबंदी की मस्तियां
प्रत्याशी महोदय को शानदार होटल में रुकवाया गया है। एक फुट मोटे गद्दे पर बैठे-बैठे शायद धिराणी को फोन पर अपडेट्स दे रहे हैं।
सुनिए, आपका दिन बन जाएगा
हम ओर हमारी धर्म करने की परम्परायें कैसे प्रकृति को असंतुलित करती है।
चींटियों को आटा ओर शक्कर डालना,कबूतरों को चुग्गा डालना,कुत्ते को रोटी देना ओर बंदरों को केला खिलाना
हम कभी नहीं सुधरेंगे क्योंकि हमारे मस्तिष्क में यहीं सब भरा गया है
“गऊ हमारी माता है” नारे के परिणाम असली तबाही मचायेंगे
ग़ज़ब की धमकी दी है इस छात्र ने!
कहा है कि जिस हिसाब से सिलेबल और स्कूल की फ़ीस बढ़ाते हैं उस हिसाब से (स्वतंत्रता दिवस पर) लड्डू क्यों नहीं बढ़ाते? दो लड्डू का पुराना सिस्टम नहीं सुधारा तो इस बार जंतर मंतर पर प्रदर्शन पढ़ाई के लिए नहीं मिठाई के लिए होगी!
जाट समाज पतन की राह पर...?
‘जाट महान’ का प्रमाणपत्र आखिर किसने दिया?
जाट महान, जाट स्वाभिमानी, जाट सबसे बहादुर! आखिर इस आत्ममुग्धता का प्रमाणपत्र किसने जारी किया है? किसी भी समुदाय के कुछ अच्छे लोगों की उपलब्धियों को पूरी जाति के सिर पर स्थायी महानता का ताज पहना देना इतिहास नहीं, आत्मप्रवंचना है।
जिस तरह “विश्वगुरु” जैसे खोखले नारों से किसी देश की वास्तविक समस्याएं छिपाई नहीं जा सकतीं, उसी तरह “जाट महान” का राग अलापने से किसी समुदाय की कमियां समाप्त नहीं हो जातीं। किसी जाति में साहसी भी होंगे, ईमानदार भी, अवसरवादी भी, स्वार्थी भी और चापलूस भी होंगे, क्योंकि जाति 'चरित्र' का प्रमाणपत्र नहीं होती।
इसलिए हर उपलब्धि को जाति की महानता और हर कमी को अपवाद बताने का खेल बंद होना चाहिए। समुदाय पर गर्व करने से पहले यह पूछना ज्यादा जरूरी है कि हम अपने व्यक्तिगत आचरण में उस गर्व के योग्य हैं भी या नहीं।
सबसे दिलचस्प विडंबना यह है कि जो लोग दिन-रात स्वाभिमान और महानता का ढोल पीटते हैं, मैने देखा है कि वही सत्ता के सामने अपने सिद्धांतों की कीमत लगाने में सबसे आगे दिखाई देते हैं तो फिर यह महानता किस काम की? जिस स्वाभिमान को सत्ता की एक थपकी, पद के एक टुकड़े और फेंके गये सिक्कों की खनक की आवाज़ पर गिरवी रखा जा सके, मेरी नज़र में वह स्वाभिमान नहीं, सुविधा है।
दरअसल जातीय गौरव का सबसे बड़ा मजाक तब बनता है जब व्यक्ति अपने समुदाय के नाम पर गर्व करता है, लेकिन अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेने से बचता है। इसलिए “जाट महान” का झूठा प्रमाणपत्र छापने के बजाय अपने गिरेबान में झांकिए क्योंकि महानता किसी गोत्र, जाति या उपनाम की जागीर नहीं होती। महान वही है जिसका चरित्र उसके दावे से बड़ा हो; बाकी सब सिर्फ जातीय आत्ममुग्धता की चमकदार पैकेजिंग है।
और अंत में एक बात और कि किसी समुदाय की वास्तविक ताकत उसके नारों, सोशल मीडिया की डींगों या इतिहास की चुनिंदा घटनाओं में नहीं, बल्कि उसके वर्तमान आचरण में दिखाई देती है। यदि हम सचमुच अपने समुदाय को मजबूत और सम्मानित देखना चाहते हैं तो हमें अपने बच्चों को केवल जातीय गौरव की कहानियां सुनाने के बजाय ईमानदारी, शिक्षा, संवेदनशीलता, वैज्ञानिक सोच, कानून के सम्मान और अन्य समुदायों के प्रति सम्मान की सीख देनी होगी।
भाइयों, अपने समुदाय की गलतियों पर पर्दा डालना प्रेम नहीं, बल्कि उसके भविष्य के साथ धोखा है। जिस दिन हम यह कहने का साहस पैदा कर लेंगे कि “हमारी जाति में भी गलत लोग हैं और गलतियां भी होती हैं”, उसी दिन हमारा आत्मसम्मान वास्तविक होगा; क्योंकि अंधा गौरव व्यक्ति को महान नहीं बनाता बल्कि आत्मालोचना बनाती है।
- के. पी. मलिक (पत्रकार एवं आलोचक)
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जानिए हमारे देश के मुद्दे—
👥 जनता के मुद्दे :-
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2. स्वास्थ्य
3. रोजगार
4. महंगाई
5. गरीबी
6. पेपर लीक और भर्ती में भ्रष्टाचार
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9. साफ पानी और हवा
10. सड़क, बिजली और बुनियादी सुविधाएँ
🏛️ सरकार के मुद्दे :-
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2. पाकिस्तान
3. हिंदू राष्ट्र
4. नेहरू को कम दिखाना
5. विपक्ष ने 70 साल में क्या किया?
6. राष्ट्रवादी कौन, देशद्रोही कौन ?
7. सवाल पूछने वाला कहीं “दिमागी नक्सल” तो नहीं
🗳️ विपक्ष के मुद्दे :-
1. EVM
2. वोट चोरी
3. जातिगत जनगणना
4. संविधान खतरे में है
5. सरकार गिराओ-बचाओ
6. कौन किस पार्टी में चला गया
7. संसद में किसने क्या बोल दिया
📺 मीडिया के मुद्दे :-
1. सीमा हैदर का छठा बच्चा
2. मोदी जी के reel का रिकॉर्ड बना
3. हिंदू-मुस्लिम डिबेट
4. पाकिस्तान में क्या चल रहा है
5. नेता की रैली में कितनी भीड़ आई
6. सोशल मीडिया पर कौन-सा बयान , बन्दा वायरल है उसको जल्दी बुलाओ ।
राजनीति के मुद्दे बहुत हैं साहब…
बस जनता के मुद्दे ही राजनीति के मुद्दे नहीं बन पा रहे।