‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’ का हर्ष दुबे के इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ���ोई समर्थन नहीं है। चूँकि हम इस आंदोलन से वैचारिक रूप से जुड़े थे, इसलिए कल मेरी उपस्थिति वहाँ थी। हमने ना तो यह आंदोलन बुलाया था, ना प्रेस कॉन्फ्रेंस।
जो लोग हर्ष या अन्य लोगों के बुलाने पर जंतर मंतर आए थे, उनसे विनम्र निवेदन है कि वो अपने घरों को प्रस्थान करें। कोई तो कारण रहा होगा कि मैंने ऐसे किसी आंदोलन के लिए लोगों को इतनी शीघ्रता से बुलाने से मना किया था।
कोई भी पार्टी इसे यह ना समझे कि आंदोलन समाप्त हो चुका है। हम चर्चा करेंगे, लोगों को बताएँगे और हम शीघ्र ही वापस आएँगे और इस संख्या से बहुत बड़ी संख्या में आएँगे।
साथ ही, हर्ष दुबे के पिताजी को विधायक टिकट हेतु शुभकामनाएँ। आपके माध्यम से एक सवर्ण विधा���सभा में पहुँचेगा। आशा है आप वहाँ आरक्षण की वर्तमान नीतियों का विरोध करेंगे।
@neha_laldas @talk2anuradha
कुछ FAQs के उत्तर:
१. ठीक है भाजपा को हरा कर कॉन्ग्रेस ले आओ, तब देखना…
उत्तर: मुझे यह नहीं पता था कि नई पार्टी बनाने पर प्रतिबंध है और जनता की हथेली पर भाजपा के नाम ��ा ब्लड पैक्ट हो रखा है!
२. अजीत भारती अपनी राजनीति चमका रहा है…
उत्तर: तो क्या यह अधिकार केवल नरेन्द्र मोदी, राहुल गाँधी, केजरीवाल को ही है?
३. अजीत भारती सपा अजेंट है, सोरोस अजेंट है, कॉन्ग्रेस का प्लांटेड है, वामपंथी है…
उत्तर: साबित करो, केवल बकलोली मत करो! और यदि तुम सपा-कॉन्ग्रेस का कुछ नहीं कर पा रहे, तो अजेंट से क्या समस्या है?
४. एक पंचायत का चुनाव नहीं जीत सकते…
उत्तर: फिर तुम्हारी और तुम्हारे अनेक बापों की क्यों फटी हुई है इस आंदोलन को देख कर?
These soldiers, drenched in rain, are not part of any PR exercise.
They need neither cameras nor applause to prove their patriotism.
The bitter words of some so-called “Gen Z” voices in Ladakh cannot diminish the dignity of our soldiers. The nation knows the conditions in which they stand guard.
People may return home when the weather turns harsh. Our soldiers do not let the weather change their duty.
The nation stood with them yesterday, stands with them today, and always will.
*मैं दलित हूँ*
*कल मेरी बहन के यहाँ हवन था*
*हवन में हमने ब्राह्मणो को बुलाया था*
*सभी ब्राह्मण आए*
*मेरी बहन ने अपने हाथो से भोजन बनाया*
*मैंने उनहे भोजन परोसा*
*��िसी ब्राह्मण ने*
*एक बार भी नही पूछा*
*तुम्हारी जाति क्या है*
सवर्ण युवाओ जागो — अब सवाल पूछने का समय है! 🔥
अगर हम अपने अधिकार, अपने भविष्य और व्यवस्था में सुधार की बात भी नहीं करेंगे, तो बदलाव कौन लाएगा?
21 अगस्त सिर्फ एक तारीख नहीं है — यह अपनी आवाज़ लोकतांत्रिक तरीके से उ��ाने का मौका है।
जंतर-मंतर पर युवाओं की मौजूदगी यह दिखाएगी कि अब सवालों को दबाया नहीं जा सकता।
हमें किसी के खिलाफ नफरत नहीं चाहिए, हमें व्यवस्था में जरूरी सुधार, समान अवसर और न्यायपूर्ण व्यवस्था पर खुली बहस चाहिए।
🔥 युवा चुप मत बैठो।
🔥 सवाल करो। आवाज़ उठाओ। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखो।
🔥 21 अगस्त — जंतर-मंतर पर मिलते हैं।
जो आज चुप रहेगा, कल अपने सवालों का जवाब मांगने का अधिकार भी कमजोर कर देगा।
📍 21 अगस्त | जंतर-मंतर
✊ आवाज़ आपकी — भविष्य आपका!
#21August #JantarMantar #ReservationReform
आरक्षण पर चर्चा किसी भी पार्टी को असहज करेगी, और अब वही करना पड़ेगा। पटरी उखाड़ कर आरक्षित हो जाना, सामाजिक ���्याय नहीं, राजनैतिक गिरोहबाज़ी है। अब जबकि प्रताड़ित वर्ग इस पर लामबंद हो रहा है, तो सत्ता के चाटुकारों को समस्या होने लगी है कि ये 'मूर्खता' है।
UGC, NEET, CBSE पर बोलना भी सबको मूर्खता और षड्यंत्र ही लग रहा था, फिर एक भीड़ आई, आप पर थूका और आपको चाटना पड़ा। अंततः, हुआ वही जो हम आपको बता रहे थे।
अब आरक्षण पर ��ी एक संगठित, सघन और गंभीर चर्चा होगी। इसके चक्कर में चुनावों पर असर पड़ना चाहिए कि कौन इन विषयों पर चर्चा से भाग रहे हैं, कौन इसे नकार रहे हैं, और कौन एक ही श्वास में 'विकसित भारत' और निजी क्षेत्र में आरक्षण ढूँढ रहे हैं।
अब मुझे यह मैटर नहीं करता कि कौन सत्ता में है और किसको होना चाहिए, मैंने पिछले 7 महीनों में जो देखा और फिर गत शनिवार को जो हुआ, उस से में आश्वस्त हूँ कि बिखरा हुआ, बिका हुआ नैरेटिव ��ाम नहीं आता। सत्ता में रहने या निकाले जाने की चिंता राजनैतिक दलों को होनी चाहिए, आम नागरिक को नहीं।
आरक्षण की पूर्ण समाप्ति लक्ष्य है, जो की संविधान का भी लक्ष्य है, तो हम तो वही कर रहे हैं जो संविधान निर्माताओं ने सोचा था। ठीक है, समय सीमा नहीं थी, पर OBC आरक्षण भी तो नहीं था? उस समय के वंचित-पीड़ित-शोषित यदि आज भी वंचित-पीड़ित-शोषित ही हैं, तो इस पर सर्वेक्षण होना चाहिए कि तथाकथित सामाजिक न्याय तक पहुँचने के लिए कोई और मार्ग है क्या?
मेरा उद्देश्य प्रथम चरण में चर्चा का है, सरकार से इस पर संसद में आँकड़े रखवाने का है कि किस जाति समूह कि किन जातियों में कितनों को आरक्षण मिला, उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है, उन्हीं जाति समूहों में कौन ऐसे लोग हैं जो अभी तक घिसट कर जीने को विवश हैं?
सामान्य वर्ग के लोगों में कितने लोग आर्थिक रूप से विपन्न हैं, उनके लिए सरकार की क्या नीतियाँ हैं, उन्हें फॉर्म भरने से ले कर हॉस्टल और कोर्स की फीस में छूट क्यों नहीं है? यदि आरक्षण EWS से दिया है तो यह इतना घटिया रूप में क्यों है कि निर्धन सामान्य वर्ग का विद्यार्थी लोन चुकाने में ही जवानी खपा देता है?
इसके बाद, हर राजनैतिक व्यक्ति को, दल को हम चुनावों के समय पूछेंगे कि उन्हें सामान्य वर्ग वोट क्यों दे? उनका मेरिट को ले कर क्या स्टैंड है, विकसित भारत में मेरिट की कितनी जगह है और शिक्षा व्यवस्था में आरक्षण के कारण राष्ट्र को कब तक नकारात्मक दिशा में ले जाया जाता रहेगा?
यही आरम्भ है, और यदि आवश्यकता पड़ी तो हम और भी विकल्प देखेंगे। हमें इस से अब मतलब नहीं है कि कौन आ जाएगा तो क्या हो जाएगा, उसका लोड वो लें जिनकी विधायकी और सांसदी जाएगी। हमें अपने बच्चों और इस समाज की चिंता हैं। हम बस अपने हिस्से की चिंता कर रहे हैं।