@priyanka2bharti@SudhanshuTrived सुधांशु त्रिवेदी और वो भी तुमसे डरेंगे ???
तुम उनकी धुल के बराबर भी नहीं हो,
वो क्यों नहीं बैठ तो उसका Reason नीचे है 👇👇
चप्पल के अलावा भी बहुत तरीके हैं कॉक्रोच मारने के 👇👇
कॉकरोच को खत्म करने के लिए बोरिक एसिड और चीनी का मिश्रण (बराबर मात्रा में) कोनों और सिंक के नीचे डालें। तत्काल समाधान के लिए कॉकरोच स्प्रे जैसे लाल हिट का इस्तेमाल करें। इसके अलावा, जेल बेइट्स (Gel Baits) और ग्लू ट्रैप्स भी बहुत प्रभावी होते हैं
@KpPatha19731260@yadavakhilesh ये कौन सा सीन है जब
एक निहत्थे अभिमन्यु को घेर कर
7 महारथी शकुनि, दुस्शासन, दुर्योधन इत्यादि मार रहे थे
वैसे अखिलेश क्या बने है इसमें ?
दुःशाशन या दुर्योधन या शकुनि ?....
@KpPatha19731260 यहाँ आपकी बात से सहमत हूँ
मतभेद हो लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए
व्यक्ति विशेष के सन्दर्भ में बात करो,
आरोप प्रत्यारोप हों लेकिन इन सबमें
परिवार की बहु बेटियों को नहीं घसीटना चाहिए
चचा नेहरू ने जो ये 7 काम किए, उसके बाद भी आप उनकी महानता के गुण गाएंगे?:
1. कश्मीर मुद्दा (Kashmir Issue) संयुक्त राष्ट्र में जाना: साल 1947-48 में जब कबीलाई लड़ाकों के भेष में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला किया, तब भारतीय सेना उन्हें पीछे धकेल रही थी। आलोचकों का मानना है कि सेना को पूरा मौका देने के बजाय नेहरू मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) ले गए, जिससे यह आंतरिक मुद्दा एक अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया। सीजफायर की घोषणा: युद्ध के बीच में ही अचानक युद्धविराम (Ceasefire) की घोषणा कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के पास रह गया, जिसे आज पीओके (PoK - पाक अधिकृत कश्मीर) कहा जाता है।
धारा 370 और शेख अब्दुल्ला: नेहरू की शेख अब्दुल्ला से करीबी दोस्ती थी। उन्होंने महाराजा हरि सिंह की पूरी शर्तों के बिना विलय की बात को दरकिनार कर शेख अब्दुल्ला की सहमति को तवज्जो दी, जिससे बाद में कश्मीर को विशेष दर्जा (धारा 370) मिला, जो लंबे समय तक विवाद का कारण रहा।
2. 1962 का भारत-चीन युद्ध और 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' (Sino-Indian War)पंचशील समझौता: नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए और "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा दिया। आलोचकों का कहना है कि वे चीन की साम्राज्यवादी नीति और इरादों को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे।
तिब्बत पर रुख: नेहरू सरकार ने तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को आसानी से स्वीकार कर लिया, जिसे एक रणनीतिक भूल माना जाता है क्योंकि इसने चीन को सीधे भारत की सीमा पर ला खड़ा किया। सैन्य तैयारी में कमी: कूटनीतिक विफलता और भारतीय सेना को आधुनिक हथियारों व संसाधनों से वंचित रखने के कारण 1962 के युद्ध में भारत को चीन के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा और अक्साई चिन का एक बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में चला गया।
3. यूएन सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता का मुद्दासदन में दावे: कई ऐतिहासिक दावों और चर्चाओं के अनुसार, 1950 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) द्वारा भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता (Permanent Seat) की पेशकश की गई थी।
चीन का समर्थन: नेहरू ने अपनी वैश्विक आदर्शवादी नीति के तहत कथित तौर पर इस प्रस्ताव को प्राथमिकता नहीं दी और भारत के बजाय चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने का समर्थन किया, जो आज भारत के लिए ही एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।
4. आर्थिक नीतियां और लाइसेंस राज (Economic Policies)सोशलिस्ट मॉडल: नेहरू सोवियत संघ के आर्थिक ढांचे (Socialism) से काफी प्रभावित थे। उन्होंने भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया, लेकिन इसमें सरकारी नियंत्रण बहुत अधिक था।
लाइसेंस राज की शुरुआत: निजी उद्योगों और व्यवसायों पर कड़े सरकारी प्रतिबंध व नियम लागू किए गए, जिसे 'लाइसेंस राज' कहा गया। इसके आलोचकों का तर्क है कि इस नीति ने भारत के औद्योगिक विकास की रफ्तार को धीमा कर दिया और देश को आर्थिक रूप से पीछे धकेल दिया।
5. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठनदबाव में फैसला: शुरुआत में नेहरू राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के पक्ष में नहीं थे।आंदोलन और परिणाम: स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामुलु के आमरण अनशन और मृत्यु के बाद पैदा हुए भारी राजनीतिक दबाव के चलते नेहरू को भाषाई आधार पर राज्यों के गठन (जैसे आंध्र प्रदेश) की मंजूरी देनी पड़ी। आलोचक मानते हैं कि इस फैसले से देश में क्षेत्रीय और भाषाई विवादों की जड़ें गहरी हो गईं।
6. हिंदू कोड बिल और 'चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता' (Secularism)समान नागरिक संहिता का अभाव: नेहरू सरकार ने हिंदू कोड बिल पारित करके हिंदू विवाह और उत्तराधिकार कानूनों में सुधार किया, लेकिन मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉ में कोई बदलाव नहीं किया।
आलोचना: आलोचकों और दक्षिणपंथी विचारकों द्वारा इसे 'चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता' (Selective Secularism) कहा गया। उनका तर्क था कि यदि नेहरू वास्तव में धर्मनिरपेक्ष थे, तो उन्हें पूरे देश के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करनी चाहिए थी। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी इस मुद्दे पर मतभेदों के चलते केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था।
7. व्यक्तिगत और अन्य राजनीतिक विवादपरिवारवाद (Dynasty Politics): नेहरू के कार्यकाल के दौरान ही उनकी बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष (1959) बनाया गया, जिसे भारतीय राजनीति में परिवारवाद की शुरुआत के तौर पर देखा जाता है।
एडविना माउंटबेटन से संबंध: भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन के साथ नेहरू की गहरी दोस्ती और व्यक्तिगत पत्रों को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक गलियारों में विवाद और बहस होती रही है।
इन 7 मुद्दों के बारे में जान लो की कितना महान किया आपके चचा नेहरू ने:
1. कश्मीर मुद्दा (Kashmir Issue) संयुक्त राष्ट्र में जाना:
साल 1947-48 में जब कबीलाई लड़ाकों के भेष में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला किया, तब भारतीय सेना उन्हें पीछे धकेल रही थी। आलोचकों का मानना है कि सेना को पूरा मौका देने के बजाय नेहरू मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) ले गए, जिससे यह आंतरिक मुद्दा एक अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया।
सीजफायर की घोषणा: युद्ध के बीच में ही अचानक युद्धविराम (Ceasefire) की घोषणा कर दी गई, जिसके परिणामस्वरूप कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के पास रह गया, जिसे आज पीओके (PoK - पाक अधिकृत कश्मीर) कहा जाता है।
धारा 370 और शेख अब्दुल्ला: नेहरू की शेख अब्दुल्ला से करीबी दोस्ती थी। उन्होंने महाराजा हरि सिंह की पूरी शर्तों के बिना विलय की बात को दरकिनार कर शेख अब्दुल्ला की सहमति को तवज्जो दी, जिससे बाद में कश्मीर को विशेष दर्जा (धारा 370) मिला, जो लंबे समय तक विवाद का कारण रहा।
2. 1962 का भारत-चीन युद्ध और 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' (Sino-Indian War)पंचशील समझौता: नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए और "हिंदी-चीनी भाई-भाई" का नारा दिया। आलोचकों का कहना है कि वे चीन की साम्राज्यवादी नीति और इरादों को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे।
तिब्बत पर रुख: नेहरू सरकार ने तिब्बत पर चीनी संप्रभुता को आसानी से स्वीकार कर लिया, जिसे एक रणनीतिक भूल माना जाता है क्योंकि इसने चीन को सीधे भारत की सीमा पर ला खड़ा किया।
सैन्य तैयारी में कमी: कूटनीतिक विफलता और भारतीय सेना को आधुनिक हथियारों व संसाधनों से वंचित रखने के कारण 1962 के युद्ध में भारत को चीन के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा और अक्साई चिन का एक बड़ा हिस्सा चीन के कब्जे में चला गया।
3. यूएन सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता का मुद्दासदन में दावे: कई ऐतिहासिक दावों और चर्चाओं के अनुसार, 1950 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) द्वारा भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता (Permanent Seat) की पेशकश की गई थी।
चीन का समर्थन: नेहरू ने अपनी वैश्विक आदर्शवादी नीति के तहत कथित तौर पर इस प्रस्ताव को प्राथमिकता नहीं दी और भारत के बजाय चीन को सुरक्षा परिषद में शामिल करने का समर्थन किया, जो आज भारत के लिए ही एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।
4. आर्थिक नीतियां और लाइसेंस राज (Economic Policies)सोशलिस्ट मॉडल: नेहरू सोवियत संघ के आर्थिक ढांचे (Socialism) से काफी प्रभावित थे। उन्होंने भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया, लेकिन इसमें सरकारी नियंत्रण बहुत अधिक था।
लाइसेंस राज की शुरुआत: निजी उद्योगों और व्यवसायों पर कड़े सरकारी प्रतिबंध व नियम लागू किए गए, जिसे 'लाइसेंस राज' कहा गया। इसके आलोचकों का तर्क है कि इस नीति ने भारत के औद्योगिक विकास की रफ्तार को धीमा कर दिया और देश को आर्थिक रूप से पीछे धकेल दिया।
5. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठनदबाव में फैसला: शुरुआत में नेहरू राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के पक्ष में नहीं थे।आंदोलन और परिणाम: स्वतंत्रता सेनानी पोट्टी श्रीरामुलु के आमरण अनशन और मृत्यु के बाद पैदा हुए भारी राजनीतिक दबाव के चलते नेहरू को भाषाई आधार पर राज्यों के गठन (जैसे आंध्र प्रदेश) की मंजूरी देनी पड़ी। आलोचक मानते हैं कि इस फैसले से देश में क्षेत्रीय और भाषाई विवादों की जड़ें गहरी हो गईं।
6. हिंदू कोड बिल और 'चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता' (Secularism)समान नागरिक संहिता का अभाव: नेहरू सरकार ने हिंदू कोड बिल पारित करके हिंदू विवाह और उत्तराधिकार कानूनों में सुधार किया, लेकिन मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के पर्सनल लॉ में कोई बदलाव नहीं किया।
आलोचना: आलोचकों और दक्षिणपंथी विचारकों द्वारा इसे 'चुनिंदा धर्मनिरपेक्षता' (Selective Secularism) कहा गया। उनका तर्क था कि यदि नेहरू वास्तव में धर्मनिरपेक्ष थे, तो उन्हें पूरे देश के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करनी चाहिए थी। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी इस मुद्दे पर मतभेदों के चलते केंद्रीय कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था।
7. व्यक्तिगत और अन्य राजनीतिक विवादपरिवारवाद (Dynasty Politics): नेहरू के कार्यकाल के दौरान ही उनकी बेटी इंदिरा गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष (1959) बनाया गया, जिसे भारतीय राजनीति में परिवारवाद की शुरुआत के तौर पर देखा जाता है।
एडविना माउंटबेटन से संबंध: भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन की पत्नी एडविना माउंटबेटन के साथ नेहरू की गहरी दोस्ती और व्यक्तिगत पत्रों को लेकर भी समय-समय पर राजनीतिक गलियारों में विवाद और बहस होती रही है।