आज भारत का पूरा education और employment system तबाह हो चुका है। डिग्री तो मिल रही है, लेकिन हाथ में हुनर नहीं है।
नई शिक्षा नीति 2020 ने 2025 तक 50% छात्रों को vocational education से जोड़ने का लक्ष्य रखा, जिसका 2% ही जमीन पर उतर सका है। सारी योजना हवा हवाई है।
दूसरी तरफ़ सरकार की आर्थिक नीतियों ने रोजगार पैदा करने वाले निवेश के बजाय कुछ चुनिंदा बड़े उद्योग समूहों को फायदा पहुँचाने का काम कर रही है।
भारत हर साल 50 लाख graduates तैयार करता है, लेकिन graduate स्तर की केवल 28 लाख नौकरियाँ पैदा होती हैं। यानी हर साल 22 लाख युवाओं के सपने शुरू होने से पहले ही टूट जाते हैं।
Uttarakhand Subordinate Service Selection Commission की भर्ती परीक्षाओं से लेकर कई अन्य भर्तियों तक, पेपर लीक उद्योग बन गया है।
नौकरियाँ बिकती हैं। भर्ती माफिया फल-फूल रहा है। नौकरी उनको मिलती है जिनके पास पैसा और BJP में connections हैं।
साथियों, हमने पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे नौजवानों का साथ दिया।
पिछले कई दिनों से संसद के भीतर भी हम उनके साथ हुई बर्बरता के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं।
अमित शाह के आदेश पर बच्चों पर pellet guns चलाए गए, water cannon चलाए गए, tear gas छोड़ी गई, बिजली का करंट छोड़कर barricades लगाए गए, कील लगी लाठियों से lathi charge किया गया और कुछ जगहों पर करंट वाली लाठियों तक का इस्तेमाल किया गया।
संसद में हम लगातार इस बारे में 15 दिन से हम लोग सवाल पूछ रहे हैं लेकिन न प्रधानमंत्री जवाब दे रहे हैं, न गृह मंत्री। सरकार संसद में जवाब देने से बच रही है। क्योंकि चोर की दाढी में तिनका है। क्या यही लोकतंत्र है? क्या जनता के सवालों का जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
📍हल्द्वानी, उत्तराखण्ड
देश के छात्रों ने system के फैलाए अंधेरे के बीच, अपने डर का सामना कर, रौशनी की मशाल जलाई है।
ये मशाल अब पूरे देश को अपने अधिकारों का रास्ता दिखा रही है।
BJP-RSS और अडानी के System को अब खतम, tata, bye-bye कहने का वक्त आ गया है।
रिजिजू जी, संसदीय कार्य मंत्री होने के नाते आपसे बेहतर यह कौन जानता होगा - महिला आरक्षण विधेयक 2023 में ही सर्वसम्मति से पारित हो चुका है, कांग्रेस के पूर्ण समर्थन के साथ।
सवाल यह है कि तीन साल बाद भी वह लागू क्यों नहीं हुआ और अब आप उसे परिसीमन से बेवजह क्यों जोड़ना चाहते हैं?
2023 का क़ानून लागू कीजिए। बिना किसी शर्त के।
प्रयागराज आ रहा हूं - देश के उस शहर में जहां सबसे ज़्यादा नौजवान तैयारी करते हैं।
एक बात साफ़ है: यहां का हर छात्र जानता है कि system बेईमान हो चुका है। आपकी मेहनत में कोई कमी नहीं - कमी उस system की नीयत में है जो आपकी मेहनत का दाम नहीं देती।
पेपर लीक, रुकी भर्तियाँ, सालों का इंतज़ार और जवाबदेही किसी की नहीं।
कोटा में छात्र बोले, देहरादून में फिर आवाज़ उठी और दिल्ली में इन्हीं बच्चों पर लाठियाँ चलीं - सिर्फ़ सवाल पूछने के लिए। आखिर में एक मंत्री को जाना पड़ा।
यह सरकार झुकती है बस आवाज़ एक साथ उठनी चाहिए।
कल प्रयागराज में यही बात करने आ रहा हूं। आप भी आइए। 8 अगस्त, शाम 5 बजे - के.पी. ग्राउंड, प्रयागराज।
#ChhatronKiGoonj
पिछले 15 दिनों से पूरा विपक्ष लगातार यह माँग कर रहा है कि छात्रों पर हुई बर्बरता को लेकर सदन में केंद्रीय गृह मंत्री बयान दें। लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री लगातार लापता हैं।
जिस तरह से विद्यार्थियों को पीटा गया, उनके ऊपर pellet gun चलाई गई, tear gas चलाई गई, यह सब किसके इशारे पर हुआ। इस पर सरकार को खुद statement देना चाहिए था। लेकिन गृह मंत्री दिल्ली में रह कर भी सदन में न आकर लोकतंत्र के मंदिर का लगातार अपमान कर रहे हैं। जवाबदेही से बच रहे हैं।
आज सभापति, राज्य सभा ने संसदीय कार्यमंत्री को निर्देश दिया है कि वो विपक्ष की भावनाओं से गृहमंत्री को अवगत कराएं। उनसे सदन में आने को कहें। हम सभापति जी को धन्यवाद देते हैं।
सरकार को यह जवाब देना होगा कि छात्रों पर pellet gun क्यों चलाई गयी, tear gas और लाठी किसके कहने से चली, Barricades पर करंट क्यों दौड़ाया गया, कीलें लगी लाठी से बच्चों पर प्रहार क्यों हुए।
देश जानना चाहता हैं कि सादे कपड़ों में छात्रों को पीटने वाले लोग कौन थे? CRPF की RAF force को लाठी चलाने का आदेश किसने दिया है।
आंदोलन वापस लेने के बाद भी बच्चों को भाजपा और संघ के लोग प्रताड़ित कर रहे हैं। बच्चों को और उनके परिवार के लोगों को धमका रहे हैं।
ये सारी बातें सदन में Home Minister ही साफ कर सकते हैं। उनको सदन में आकर जिम्मेदारी लेनी चाहिए और देश से माफी माँगनी चाहिए।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र फीस वृद्धि और सीट कटौती के खिलाफ़ अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं। लेकिन प्रशासन छात्रों को सुनने के बजाय उन पर FIR कर रहा है।
मोदी सरकार की नीति ही युवाओं की आवाज़ दबाना है। सवाल पूछो तो लाठी, विरोध करो तो मुक़दमे, और आवाज़ उठाओ तो पेलेट गन।
जब मैंने छात्रों की बात को सुनने के लिए प्रयागराज आने का फैसला किया, तब से प्रशासन मेरे कार्यक्रम को हर संभव तरीके से रोकने की कोशिश कर रहा है।
साफ़ है, उन्हें छात्रों की गूंज से भी डर लग रहा है।
मैं छात्रों के साथ हूँ। सरकार चाहे जितनी भी कोशिश कर ले, मुझे छात्रों की आवाज़ उठाने से रोक नहीं सकती।
कांग्रेस पार्टी विद्यार्थियों के साथ है। झारखंड हो, पंजाब हो, दिल्ली हो, कहीं भी हो, हम सब, राहुल गाँधी जी और पूरी कांग्रेस पार्टी हमारे विद्यार्थियों के साथ खड़े हैं।
चाहे हमारा alliance partner हो, या चाहे हमारा opposition हो, हम विद्यार्थियों व युवकों के साथ हैं। उनकी समस्या को हल करने के लिए हम लड़ते रहेंगे।
उस साल 2024 में NEET-UG पेपर लीक के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने के लिए के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया था।
इस साल 2026 में NEET-UG पेपर लीक के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा सुधार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया।
आज @MeSanjayy द्वारा @htTweets में प्रकाशित एक नए विश्लेषण से पता चलता है कि नीलेकणी समिति को दिए गए 9 संदर्भ बिंदुओं में से 7 पर राधाकृष्णन समिति पहले ही पूरी तरह काम कर चुकी थी, जबकि शेष 2 पर भी उसने आंशिक रूप से काम किया था।
जैसा कि पहले भी सामने आ चुका है, मोदी सरकार अब तक राधाकृष्णन समिति की 101 सिफारिशों में से 27 को भी लागू नहीं कर पाई है। इतना ही नहीं, 2024 और 2026 के पेपर लीक के बीच पूरे दो वर्षों तक NTA में पूर्णकालिक महानिदेशक तक नियुक्त नहीं किया गया।
राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट को लागू करने के मामले में मोदी सरकार ने न तो राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई और न ही गंभीरता। नीलेकणी टास्क फोर्स महज़ प्रधानमंत्री की छवि बचाने की एक डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज है। उनकी छवि को अब उनके अपने ही इकोसिस्टम के अंदर भी गंभीर झटका लगा है।
https://t.co/mjp95yONkP
उस साल 2024 में NEET-UG पेपर लीक के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने के लिए के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया था।
इस साल 2026 में NEET-UG पेपर लीक के बाद मोदी सरकार ने परीक्षा सुधार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक हाई पावर्ड टास्क फोर्स का गठन किया।
आज @MeSanjayy द्वारा @htTweets में प्रकाशित एक नए विश्लेषण से पता चलता है कि नीलेकणी समिति को दिए गए 9 संदर्भ बिंदुओं में से 7 पर राधाकृष्णन समिति पहले ही पूरी तरह काम कर चुकी थी, जबकि शेष 2 पर भी उसने आंशिक रूप से काम किया था।
जैसा कि पहले भी सामने आ चुका है, मोदी सरकार अब तक राधाकृष्णन समिति की 101 सिफारिशों में से 27 को भी लागू नहीं कर पाई है। इतना ही नहीं, 2024 और 2026 के पेपर लीक के बीच पूरे दो वर्षों तक NTA में पूर्णकालिक महानिदेशक तक नियुक्त नहीं किया गया।
राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट को लागू करने के मामले में मोदी सरकार ने न तो राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई और न ही गंभीरता। नीलेकणी टास्क फोर्स महज़ प्रधानमंत्री की छवि बचाने की एक डैमेज कंट्रोल एक्सरसाइज है। उनकी छवि को अब उनके अपने ही इकोसिस्टम के अंदर भी गंभीर झटका लगा है।
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मार्च 2025 से देश के सामान्य पेट्रोल पंपों पर व्यावहारिक रूप से केवल E20 पेट्रोल ही उपलब्ध कराया जा रहा है।
मोदी सरकार के परिवहन मंत्री ने दावा किया था कि एथेनॉल मिश्रण से डीजल की कीमत 50 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल का विकल्प 55 रुपये प्रति लीटर तक उपलब्ध कराया जा सकेगा। लेकिन कीमतों में ऐसी कोई कमी देखने को नहीं मिली। इसके उलट, एक स्वतंत्र विश्लेषण के अनुसार अप्रैल 2023 से मार्च 2026 के बीच उपभोक्ताओं ने एथेनॉल मिश्रित ईंधन से कम माइलेज की भरपाई करने के लिए सामूहिक रूप से लगभग 88,234 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च किए।
आज आम नागरिक असल में E20 के लिए पहले के सामान्य पेट्रोल की तुलना में अधिक कीमत चुका रहे हैं। माइलेज में आई इस कमी की भरपाई के लिए मोदी सरकार E20 की खुदरा कीमत घटा सकती थी। नीति आयोग के एथेनॉल रोडमैप में भी उपभोक्ताओं की भरपाई के लिए E10 और E20 ईंधन पर वित्तीय एवं टैक्स प्रोत्साहन देने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इसके बजाय मोदी सरकार ने एथेनॉल उत्पादकों को 4,000 करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी मंजूर कर दी, जिससे E20 कार्यक्रम का लाभ उपभोक्ताओं की बजाय उद्योगों की ओर और अधिक झुक गया।
E20 ने आम मध्यमवर्गीय भारतीयों से विकल्प छीन लिया है, उन पर बढ़ा हुआ ईंधन खर्च थोप दिया है और जिस वाहन को खरीदने के लिए उन्होंने वर्षों तक बचत की, उसी पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। E20 से यदि किसी वर्ग को सबसे अधिक लाभ हुआ है, तो वह एथेनॉल उत्पादकों का है।
Since March 2025, regular petrol pumps have effectively supplied only E20 petrol.
The Modi Government’s Transport Minister had claimed that ethanol blending would bring diesel costs down to Rs. 50 per litre and provide a petrol alternative at Rs. 55 per litre. No such reduction has materialised. Instead, an independent analysis estimates that between April 2023 and March 2026, consumers collectively spent nearly ₹88,234 crore extra just to offset the reduced mileage of ethanol-blended fuel.
Citizens are effectively now paying more for E20 than they previously paid for regular petrol. The Modi government could have reduced the retail price of E20 to offset this loss in mileage. The NITI Aayog's ethanol roadmap recommended fiscal and tax incentives on E10 and E20 fuels to compensate consumers. Instead, the Modi Government has approved more than ₹4,000 crore in subsidies for ethanol producers, further tilting the benefits of the E20 programme towards industry rather than consumers.
E20 has deprived ordinary middle class Indians of choice, saddled then with an inflated fuel bill, and damaged the vehicle that they saved for years to purchase. The only class to have benefitted from E20 is the ethanol producers.
INDIA demands answers —
1️⃣ Why is the Home Minister shying away from making a statement in the Parliament on the atrocities perpetrated against our youth?
2️⃣ Isn’t the PM responsible for चंदा-चढ़ावा चोरी in Shree Ram Mandir