सेवा, अनुशासन और राष्ट्रीय विचारों के प्रबल संवाहक, विश्व के सबसे बड़े सामाजिक व सांस्कृतिक संगठन 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' के शताब्दी वर्ष की कोटिश: स्वयंसेवकों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देता हूँ।
व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के इस संकल्प को लेकर 100 साल तक माँ भारती की सेवा का लक्ष्य लेकर असंख्य स्वयंसेवकों ने मातृभूमि के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया है।
समाज में राष्ट्रीय विचारों का प्रसार कर समर्थ व अखण्ड भारत निर्माण के दिव्य ध्येय के साथ लोगों को जोड़ता यह संगठन असंख्य नागरिकों के लिए प्रेरणा का केंद्र है।
विगत 100 वर्षों से मातृभूमि की सेवा और स्वाभिमान के लिए युवाओं को अपने कण-कण व क्षण-क्षण के समर्पण की प्रेरणा देकर राष्ट्रनिर्माण में अद्वितीय योगदान प्रणम्य है।
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विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की शताब्दी वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ। संघ शताब्दी की इस विशाल यात्रा में माँ भारती की सेवा, सुरक्षा और संवेदना के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देने वाले @RSSorg के सभी साधकों को नमन करता हूँ।
सभी सुख-वैभव को त्यागकर एक स्वयंसेवक और प्रचारक के रूप में पूरा जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर देना आसान नहीं है। 100 वर्षों में संघ के असंख्य स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने त्याग और समर्पण से इसे सिद्ध कर दिखाया है।
परम पूज्य हेडगेवार जी के नेतृत्व में वर्ष 1925 में नागपुर में विजयादशमी के दिन कुछ लोगों के साथ शुरू हुआ संघ आज व्यक्ति से लेकर राष्ट्र के प्रति समर्पण और संगठन कौशल के दम पर दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन बन गया है। मुझे गर्व है कि मैं भी एक स्वयंसेवक हूँ।
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हर संकट में साथ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है पहचान!
2004 में सुनामी के दौरान सेवा भारती ने प्रभावित क्षेत्रों आश्रय निर्माण के साथ-साथ भोजन, कपड़े और चिकित्सा सामग्री का वितरण किया।
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हर संकट में साथ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है पहचान!
भुज भूकंप (2001) के दौरान 600 डॉक्टर समेत करीब 25,000 स्वयंसेवकों ने राहत और पुनर्वास कार्यों में भाग लिया।
गुजरात के विभिन्न जिलों में राहत शिविर स्थापित किए गए और विभिन्न हिस्सों में राहत सामग्री भेजी गई।
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हर संकट में साथ...
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संकल्प!
कोविड-19 महामारी के दौरान 118 शहरों और कस्बों में कोविड देखभाल केंद्र और 287 शहरों और कस्बों में आइसोलेशन केंद्र स्थापित किया।
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विजयादशमी केवल उत्सव नहीं, यह राष्ट्र जागरण का संकल्प है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा — अनुशासन, एकता और राष्ट्रशक्ति का प्रतीक है।
सच्ची विजय वही है, जब राष्ट्रहित सर्वोपरि हो।
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राष्ट्र साधना, जनसेवा और देशभक्ति की अनवरत यात्रा का शताब्दी पर्व..
विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन #राष्ट्रीय_स्वयंसेवक_संघ के गौरवशाली #शताब्दी_वर्ष पर सभी राष्ट्रवादी बंधुओं को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
संघ का यह शताब्दी वर्ष प्रत्येक स्वयंसेवक और भारतीय के लिए गर्व का क्षण है। #स्थापना_दिवस के इस ऐतिहासिक अवसर पर 'राष्ट्र प्रथम' की भावना से अहर्निश कार्य कर रहे संघ के उन सभी कार्यकर्ताओं का अभिनंदन करता हूं, जिन्होंने #भारत_माता की सेवा को अपना जीवन धर्म बनाते हुए त्याग, तपस्या और राष्ट्रभक्ति की अमूल्य साधना की है।
यह शताब्दी वर्ष हम सभी के लिए #भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का संकल्प है।
आइए, हम सब मिलकर इस महान संगठन की प्रेरणा से 'राष्ट्र सर्वोपरि' के संकल्प को और मजबूत करें..!
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वर्ष 1925, दिन था विजयदशमी का... जब नागपुर की धरती पर मातृभूमि और राष्ट्रवाद के लिए पहली लौ जगी। नागपुर हर दिन की तरह ही शांत था, पर एक डॉक्टर को मातृभूमि एवं देश की चिंता सताए जा रही थी। उन्होंने समझ लिया था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, भारत को आत्मा की स्वतंत्रता चाहिए। और इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक छोटी सी शाखा शुरू की।
शुरू में न कोई मंच था, न कोई शोरगुल, बस था तो देश के प्रति अपना सर्वस्व न्योछावर करने की दृढ़ इच्छा, अनुशासन और भारत देश को एक बार फिर से शक्तिशाली बनाने और एकजुट देखने का सपना। नतीजन, उस दिन की एक छोटी सी शुरुवात ने भविष्य की एक बड़ी धारा को जन्म दिया, और स्थापना हुई...राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की, एक विचारधारा की, जो धीरे-धीरे गांव दर गांव, शहर दर शहर पूरे देश में फैल गई। और सबके हृदय में अंकित हुआ एक ही ध्येय वाक्य- “हम भारत माता के पुत्र हैं, और उसकी सेवा ही हमारा धर्म है।”
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आरएसएस की पहचान अनुशासन का जीवंत विद्यालय उसकी शाखा है। खुले मैदान में खड़े साधारण से पंक्तिबद्ध स्वयंसेवक ही उसके जीवंत प्रतीक हैं। जहां न कोई ऊँच-नीच है, न जात-पाँत है, और न ही अमीरी-गरीबी। सभी एक समान पंक्ति में खड़े होकर एक समान कदमों से मां भारती की सेवा करने के लिए बढ़ते हैं।
शाखा जीवन का वह विद्यालय है, जहां समय की पाबंदी सीखी जाती है, विनम्रता का अभ्यास होता है, और खेल-खेल में साहस का संस्कार मिलता है। शाखा में सीखे गए गीत, प्रार्थनाएँ और अनुशासन जीवनभर स्वयंसेवक के साथ रहते हैं। यही अनुशासन बाद में सेवा के कार्यों में बदलता है। चाहे बाढ़ हो या भूकंप, शाखा से निकले स्वयंसेवक सबसे पहले पीड़ितों तक पहुँचते हैं। शाखा ने हमेशा यह सिखाया है कि सच्ची ताक़त शरीर में नहीं, बल्कि सेवा और एकता में छिपी है।
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यदि संघ की आत्मा को एक शब्द में समेटना हो तो वह है - सेवा, और यही सेवा ही संघ का प्राण है।
संघ की सेवा की सबसे बड़ी विशेषता है निश्छलता, जहां किसी नाम या प्रसिद्धि की चाह नहीं। स्वयंसेवक मानते हैं कि सच्ची सेवा वही है, जो बिना अपेक्षा और बिना प्रचार की जाए। इसलिए सेवा संघ के लिए कोई काम नहीं, बल्कि जीवन का धर्म है। इसके अनेकों जीवंत उदाहरण हैं—1947 के विभाजन के दौरान लाखों लोग अपने घरों से उजड़ गए। उस समय स्वयंसेवक ही थे जो राहत शिविरों में भोजन परोसते, घायल बच्चों को गोद में उठाकर अस्पताल पहुँचाते। 2001 के भुज भूकंप में, जब धरती कांप उठी और हजारों लोग मलबे तले दब गए, स्वयंसेवक बिना रुके दिन-रात राहत कार्यों में लगे रहे। 2004 की सुनामी हो या 2020 की महामारी, संघ के स्वयंसेवक चुपचाप हर जगह सेवा में जुटे नज़र आए।
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"संघे शक्ति कलौ युगे"
राष्ट्र सेवा को समर्पित, विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के 100 वर्ष पूरे होने पर समस्त स्वयंसेवकों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
हर संकट में साथ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान!
वर्ष 2013 में केदारनाथ में आई बाढ़ के दौरान सेवा भारती ने प्रभावितों के लिए भोजन, चिकित्सा सहायता और पुनर्वास की व्यवस्था की।
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हर संकट में साथ... राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है पहचान!
2004 में सुनामी के दौरान सेवा भारती ने प्रभावित क्षेत्रों में आश्रय निर्माण के साथ-साथ भोजन, कपड़े और चिकित्सा सामग्री का वितरण किया।
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