हमारे यहाँ भी मंदिर के नाम पर ज़मीन होती है और उस ज़मीन पर सिर्फ़ मंदिर और भगवान का ही नाम चलता है, ऐसी ही ज़मीन पशुओं के और पक्षियों के संरक्षण के लिए होती है राजस्थान के हर गांव में ये कॉन्सेप्ट है और इसे ब्रेक नहीं करना चाहिए. पिछले पाँच साल में हमने भी इस मैटर में अपने गाँव में बहुत संघर्ष किया है #ओरण_हमारी_विरासत #Rajasthan
सब आगे आये, यह लड़ाई किसी एक की नही हैं , यह लड़ाई हर एक रेगिस्तानी वाशिंदे की हैं जिसे इस धरती माँ ने यहां न जाने किन किन परिस्थितियों में अपने आँचल में सम्भाले रखा।।
देश का चौकीदार ओर पहरेदार जब सो रहे थे तो जनता का सेवक आपका बेटा रात्रि में सर्द हवाओं में ओरण भूमि में मशीनों को रुकवाकर पहरेदारी मे अकेला सो रहा था
सायद इसीलिए शिव की जनता ने आजादी के बाद पहली बार अपने बेटे अपने भाई को निर्दलीय विधायक चुना
@RavindraBhati__
मारवाड़ में राठौड़ राज्य के संस्थापक राव सीहाजी से राव रणमल जी तक लगातार 13 पीढ़ियां युद्ध में काम आई। इसीलिए राठौड़ो को "रणबंका राठौड़" कहा गया।
ऐसा नहीं था कि राजा महलों में बैठे है और सेना लड़ रही है। राजा युद्ध का नेतृत्व करते थे, आगे होकर लड़ते थे, सेना का मनोबल बढ़ाते थे।
राज्य और देश के लिए पीढ़ियां होम देने के बाद भी आज पूछा जाता है कि राजपूतों ने किया ही क्या ?
चुन चुन के बुराइयों और कमजोरियों को ही प्रचारित किया जाता है, उनके त्याग,बलिदान और उपलब्धियों की चर्चा नहीं की जाती।
video credit :- @thebharatpur
जैसलमेर के ग्यारहवें शासक व दूसरे शाके के महानायक महारावल दुर्जणसाल (दूदाजी) और उनके अनुज वीरवर तिलोकसी के बलिदान दिवस पर सादर नमन। उनके साथ जैसाण की रक्षा के लिए बलिदान देने वाले वीर- वीरांगनाओं को कृतज्ञ भाव से वंदन।
14वीं शताब्दी में अपने अदम्य साहस और शौर्य से फिरोज तुगलक की शत्रु सेना का मुकाबला करते हुए मातृभूमि की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर जैसलमेर की विजय पताका को थामे रखा। ऐसे अमर बलिदानियों के रण कौशल के कारण ही जैसलमेर का मस्तक आज भी गर्व से ऊंचा है। हमारे पूर्वजों के गौरवमयी इतिहास को संजोते हुए हम उनके कृतित्व और व्यक्तित्व से प्रेरणा लें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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