देश में लंबे अरसे तक कॉंग्रेस और फिर बीजेपी की सरकार है लेकिन सभी ने उच्च शिक्षा को आम आदमी और गरीब परिवारों के बच्चों के भविष्य का ध्यान नहीं रखा.अच्छे कॉलेज यूनिवर्सिटी में होनहार गरीब बच्चा पढ़ ही नहीं सकता.एडमिशन हो भी जायेगा तो रहने की कोई व्यवस्था सरकारों ने नहीं बनायीं.केन्द्र की 2023-24 की उच्च शिक्षण संस्थानों की रिपोर्ट के मुताबिक,56 केंद्रीय विश्वविद्यालय में करीब पौने 10 लाख सीटों पर महज 125000 हॉस्टल सीट उपलब्ध हैँ.यही हाल दिल्ली यूनिवर्सिटी का है यहाँ 251474 नियमित छात्रों में डीयू के 20 हॉस्टल में सिर्फ 6957 सीट ही उपलब्ध हैँ इसका अर्थ महज 2.77% छात्रों को ही हॉस्टल की सुविधा है बाकी के लिए नहीं.बाकी के सभी छात्र कैंपस के बाहर बहुत ही बुरी कंडीशन के मकानों और हॉस्टलों में रहने को मजबूर हैँ.यह हाल जामिया,एमयू का भी है.शिक्षा के जरिए छात्रों के भाविष्य निर्माण हेतु बेहतर शिक्षा व्यवस्था,आबादी के अनुसार स्कूल, कॉलेज, स्टेडियम, हॉस्टल बनाने के बजाय बड़े-2 उद्योगपतियों के कर्ज और टैक्स के लगभग 15 से 16 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिये गये.अभी हाल ही में किसी उद्योग पति का 22 हजार करोड़ भी माफ किये गय ऐसा सुनने को मिला.इतने पैसे में हजारों यूनिवर्सिटी हॉस्टल के साथ खुल जाती.यही नहीं तमाम राजनैतिक दलों और सरकारों ने छात्रों को जाति धर्म और मजहब आदि में बाँट कर अपने फायदे के लिए देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया.इसके उलट उत्तर प्रदेश में आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी के शासन काल में 6 विश्वविद्यालय तमाम डिग्री कॉलेज और सरकारी कोचिंग इंस्टिट्यूट उच्च हॉस्टल की सुविधा सहित खोलने का काम किया.लखनऊ के हजरतगंज में अम्बेडकर PG हॉस्टल और भागीदारी भवन इसका जीता जगता उदाहरण है.बाबा साहब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने कई देशों में रहकर उच्च शिक्षा ग्रहण की और वहाँ रहकर पश्चिमी देशों की तरक्की के बारे में गहन स्टडी भी की आखिर यह देश इतना हर मामले में आगे कैसे हैँ.बाबा साहब ने कहा की पश्चिमी देशों ने शिक्षा के दम पर साइंस और टेक्नोलॉजी में महारत पा ली है. इसी लिए बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने भारत आकर अपने अनुयाइयों को शिक्षित बनो का उपदेश दिया साथ ही मुम्बई के अन्दर भव्य सिद्धार्थ साइंस और कॉमर्स कॉलेज खोलने का काम भी किया. संविधान के अन्दर शिक्षा का कानून भी बनाया और 13 साल तक के बच्चों को फ्री शिक्षा का कानूनी अधिकार भी किया.
अशोक सिद्धार्थ का गुनाह था कि उन्होंने समर राज की एक पोस्ट को RT कर दिया। अतः राजनीति से संन्यास लो।
आकाश आनंद का गुनाह है कि उन्होंने बहन जी की एक पोस्ट को RT नहीं किया। अतः पार्टी से बाहर हो जाओ।
लेकिन बहन जी, सतीश मिश्रा पर कार्रवाई कब होगी, जो न तो आपके हर पोस्ट को रीट्वीट करते हैं और न ही पार्टी को मजबूत करने के लिए कोई काम करते हैं। ऊपर से सतीश मिश्रा ने BSP में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके अपने बेटे, बेटियों और दामाद... सबको सेटल कर दिया है।
बहन जी उन धूर्त पदाधिकारियों की बिल्कुल समीक्षा नहीं कर रही हैं, जो कई-कई राज्यों के प्रभारी बनकर डमी कैंडिडेट खड़ा करने अथवा टिकट दिलाने के नाम पर करोड़ों का धन लुटाने और पार्टी को रसातल में धकेलने के काम किए हैं।
आखिर सतीश मिश्रा से सवाल कब होगा, जो लंबे समय से पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं, कई बार पार्टी के सांसद भी रहे हैं और विगत कई वर्षों से मीडिया की जिम्मेदारी भी संभालते हैं? लेकिन पार्टी का नैरेटिव गढ़ने के नाम पर उन्होंने बहन जी को केवल गुमराह किया है कि इस बार पूरा ब्राह्मण आपके साथ खड़ा है लेकिन हकीकत इससे उलट है।सच कहूं तो उनके कहने से कोई भी ब्राह्मण बसपा से नहीं जुड़ता है। साथ ही, आए दिन पार्टी के खिलाफ फेक न्यूज और झूठा नैरेटिव चलता रहा, लेकिन न तो उन पर कोई कार्रवाई हुई और न ही मीडिया IT सेल खड़ा करने का कोई प्रयास दिखाई दिया। हाँ, लखनऊ के अपने सजातीय YouTubers पर अकूत पैसा लुटाकर अपना माहौल बनवा लेते हैं। दलित-बहुजन YouTubers को तो कोई पूछता भी नहीं।
ऊपर से आगामी यूपी विधानसभा का चुनाव सिर पर है। ऐसे में बहन जी को इन जैसे पदाधिकारियों एवं प्रभारियों से सवाल करने की बजाय सारी चिंता इस बात की है कि ट्विटर पर उन्हें आकाश आनंद ने रीट्वीट क्यों नहीं किया। ऊपर से बहन जी ने आदेश दिया कि बसपा के सभी पदाधिकारी आकाश आनंद को अनफॉलो कर दें। इतने बड़े समाज और इतने बड़े राष्ट्र की इतनी बड़ी नेता का ध्यान इस बात पर हो कि उन्हें किसी ने रीट्वीट क्यों नहीं किया... यह सोचकर भी पीड़ा हो रही है।
आपने कहा कि अगर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास ले लें, तो आकाश आनंद की वापसी का रास्ता खुल जाएगा। जबकि ऐसी मांग भी अपने आप में अनैतिक और असंवेदनशील है, फिर भी अशोक सिद्धार्थ ने समाजहित को ध्यान में रखते हुए राजनीति से संन्यास ले लिया और कहा कि बहन जी, आपके लिए तो जान भी हाजिर है।
अब अपने वादे पर कायम रहने की बजाय आप कह रही हैं कि अशोक सिद्धार्थ ने तुरंत संन्यास क्यों नहीं लिया? संन्यास लेने में कुछ घंटे की देरी क्यों हुई? हद है। भला इस बात का भी कोई तुक है? संवेदना और सदमा भी कोई चीज होती है।
माननीया बहन जी को चाहिए कि जो लोग उन्हें गुमराह कर रहे हैं और जिनकी वजह से किसी के राजनीतिक जीवन का फैसला कुछ घंटों की देरी और सोशल मीडिया पर रीट्वीट करने या न करने से तय होने लगे, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
इसलिए समय आ गया है कि सतीश मिश्रा समेत तमाम राष्ट्रीय महासचिवों, प्रभारियों और वरिष्ठ पदाधिकारियों के कामकाज की निष्पक्ष समीक्षा हो। पार्टी में जवाबदेही तय हो और यह देखा जाए कि कौन वास्तव में BSP को मजबूत करने के लिए काम कर रहा है और कौन केवल पद और प्रभाव का लाभ उठा रहा है। क्योंकि चुनाव सोशल मीडिया के रीट्वीट से नहीं, बल्कि संगठन, कार्यकर्ताओं, रणनीति और जमीन पर किए गए काम से लड़ा जाता है।
- सूरज कुमार बौद्ध
@Mayawati@AnandAkash_BSP
ये गंवार DGP कैसे बना था?
जरा सोचिए, इस ब्राह्मणवादी आदमी अपने पद पर रहते हुए कितने दलितों के साथ भेदभाव किया होगा। राज्य सरकारें बड़ी मुश्किल से 75 हजार देती हैं, वह भी कुछ विशेष मामलों में ही संभव है। हमें भी बताओ कि SC-ST Act की किस धारा या किस शासनादेश में 16 लाख मिलता है?
SC/ST एक्ट में अजीत भारती की हाई कोर्ट में ज़मानत याचिका में SC पक्ष के पीड़ित लोगों को डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी जी को अपनी साइड की केस लड़ने का प्रस्ताव देना चाहिए। वे देश के बड़े वकीलों में से हैं और मुझे लगता है कि वे केस स्वीकार कर सकते हैं। पूछकर देखिए।
Pay back to society.
के तहत मैं और मेरे कुछ साथियों ने मिलकर एक MA की छात्रा जिनका एक्जाम फीस के वजह से इस बार एग्जाम छूट जाता, क्योंकि घर में आर्थिक तंगी थी हालत खराब था तो हमने उनका 7500 फीस जमा किया।
जिससे उनका एग्जाम ना रुके और उनका भविष्य उज्जवल हो ऐसे ही छोटी-छोटी मदद हम सभी को करनी चाहिए।।
"बहन मायावती जी अपने वायदे से मुकर गईं।"
अभी कल बहन जी ने कहा था कि अगर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से संन्यास ले लेते हैं तो आकाश आनंद को BSP में पुनः पद के साथ काम करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
आज सुबह अशोक सिद्धार्थ जी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और पद तक का त्याग कर दिया, लेकिन उनके संन्यास के बाद बहन जी अपने ही कहे हुए वादे से पीछे हटती दिखाई दे रही हैं। अब उनका तर्क है कि अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद की नीयत में अभी भी खोट है।
इसके लिए आपने दो तर्क दिए हैं;
पहला, अशोक सिद्धार्थ ने कल के पोस्ट के तुरंत बाद राजनीति से संन्यास क्यों नहीं लिया? चूंकि उन्होंने आज सुबह संन्यास लिया, इसलिए कुछ घंटों की देरी को उनकी नीयत में खोट और राजनीतिक अभिलाषा बरकरार रहने का प्रमाण माना गया।
लेकिन क्या किसी व्यक्ति को अपनी जिंदगी के इतने बड़े फैसले पर कुछ घंटे सोचने और शांत होकर परिस्थितियों को समझने का भी अधिकार नहीं है? राजनीति से संन्यास लेना कोई सामान्य घोषणा नहीं है। वर्षों की राजनीतिक यात्रा को एक झटके में समाप्त करने का फैसला है। इसके बावजूद उन्होंने कुछ ही घंटों में संन्यास ले लिया और कहा कि संन्यास तो बहुत छोटी चीज है, बहन जी के लिए तो जान भी हाजिर है।
दूसरा, आकाश आनंद ने बहन जी के कल के पोस्ट को रीट्वीट नहीं किया। इसलिए यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि उन्हें पार्टी और मूवमेंट से अधिक अपने रिश्तों की चिंता है।
बहन जी, आप देश की इतनी बड़ी नेता हैं। फिर भी इतना हल्का और बचकाना तर्क? क्या किसी व्यक्ति की पार्टी के प्रति निष्ठा अब किसी पोस्ट को रीट्वीट करने से तय होगी? सिर्फ आपका पोस्ट रीट्वीट न करने के कारण आपने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया। हद होती है। कोई व्यक्ति दुख में हो सकता है, आहत हो सकता है, चुप रह सकता है। हर चुप्पी विद्रोह अथवा साजिश नहीं होती है।
बहन जी, शायद आपको अंदाजा भी नहीं है कि आप जिस तरह बार-बार आकाश आनंद को सार्वजनिक रूप से जलील कर रही हैं, वह Human Dignity के खिलाफ है। कोई भी व्यक्ति लगातार ऐसी परिस्थितियों में मानसिक रूप से टूट सकता है। आप स्वयं कल्पना कीजिए कि आकाश आनंद कितनी वेदना, पीड़ा और घुटन में जी रहे होंगे। ऐसे समय में उनसे ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सक्रिय रहने की उम्मीद करना ही अपने आप में असंवेदनशील है।
मुझे दुख इस बात का है कि करोड़ों बहुजनों की आदर्श नेता होने के बावजूद इतनी गंभीर परिस्थिति में इतनी छोटी-छोटी बातों पर आकाश आनंद को जलील कर रही हैं।
असली खेल धूर्त पदाधिकारियों का है, जो वर्षों से बहन जी को गुमराह करके पार्टी को खोखला करने में लगे हुए हैं। बहन जी को यह समझना ही होगा कि जो पदाधिकारी हर बात को अपने हिसाब से छानकर नेतृत्व तक पहुंचाते हैं, जो अपने हित के मुताबिक दूसरों को अच्छा-बुरा साबित करते हैं, दरअसल वही लोग पार्टी और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच दीवार बने हुए हैं। और संगठन को सबसे ज्यादा खतरा इन्हीं लोगों से है।
अपने आसपास के उन धूर्त पदाधिकारियों को पहचानिए, जो अपनी कुर्सी, प्रभाव और अकूत धन की लूट को बचाए रखने के लिए जानबूझकर पार्टी को पारिवारिक कलह में धकेल दिए हैं। अगर कोई व्यक्ति पार्टी में रहकर संगठन को मजबूत करने के बजाय आंतरिक कलह से अपना प्रभाव मजबूत कर रहा है, तो वह पार्टी का हितैषी नहीं हो सकता।
करोड़ों बहुजनों की पहुंच बहन जी तक डायरेक्ट होनी चाहिए, लेकिन अफसोस कि आज वह धूर्त पदाधिकारियों के चंगुल में फंस चुकी हैं। ये वही लोग हैं, जो हर उस मिशनरी की बात को तोड़-मरोड़कर बहन जी तक पहुंचाते हैं, जो पार्टी में कुछ अच्छा करने और मूवमेंट को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है। जब ये लोग भूखे गिद्धों की तरह आकाश आनंद का राजनीतिक करियर नोचने पर आमादा हैं, तो सोचिए हम जैसे सामान्य कार्यकर्ताओं की बिसात ही क्या है।
इन मक्कार पदाधिकारियों की कुर्सी बचाना आसान है, लेकिन एक पूरी पीढ़ी के राजनीतिक भविष्य को नुकसान पहुंचने के बाद उसकी भरपाई करना आसान नहीं होगा।
बहन जी, आपके आसपास के पदाधिकारी आते-जाते रहेंगे, लेकिन यह आंदोलन और करोड़ों बहुजनों की उम्मीदें स्थायी हैं। इसलिए किसी भी पदाधिकारी को आपके और बहुजन समाज के बीच दीवार मत बनने दीजिए। जिस दिन आम मिशनरी अपनी बात सीधे आप तक पहुंचा सकेगा और आप बिना किसी फिल्टर के जमीनी सच्चाई सुन पाएंगी, उसी दिन आपको पता चलेगा कि ये धूर्त एवं मक्कार पदाधिकारी आपको क्या बता रहे थे और जमीन पर वास्तव में क्या हो रहा है। इस चंगुल से बाहर निकलना अब सिर्फ आपकी मजबूरी ही नहीं, बल्कि बहुजन आंदोलन के भविष्य की जरूरत भी है। आपको इस चंगुल से बाहर निकलना ही होगा।
आपका शुभचिंतक: सूरज कुमार बौद्ध
@Mayawati@AnandAkash_BSP
बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के पाँच बच्चे थे: यशवंत, गंगाधर, रमेश, इंदु और राजरत्न। इनमें से चार बच्चों की बचपन में ही अत्यंत दुःखद परिस्थितियों में मृत्यु हो गई, जब बाबासाहेब 10×10 के कमरे में B.I.T. चॉल में रहते थे। जो बेटे, यशवंत (भैयासाहेब), ज़िंदा रहे, उनको बाबासाहेब ने जो ख़त लिखा है, क्या कभी आपने उसे पढ़ा है?
होश में रहकर ख़त को पढ़िए। अंबेडकरवादी परंपरा क्या है, उसे समझिए। बहन @Mayawati जी उस परंपरा की आज सबसे बड़ी नेता हैं। बाबासाहेब को समझे बगैर बहन जी को समझना मुश्किल है।
@Ravitiwariii_ तुम्हारे वाले बैंक से लोन लेकर खुद को दिवालिया घोषित कर लेंगे, उसके बाद पूरा पैसा डकार कर पैसा लेकर भाग जाएगा।
तुम्हारे वाले असली हरामखोर है।
आदरणीय बहन जी, आप खुद में त्याग और दया की मूर्ती हैं, जब बात समाज के हित की आई तो आपने मुख्य मंत्री की कुर्सी और राज्यसभा के सदस्य पद को भी ठोकर मार दी।
आदरणीय बहन जी, आप हमारी मार्गदर्शक ही नही हमारी आदर्श भी हैं, और अगर आज आपको लगता है कि मेरे राजनीतिक और सामाजिक जीवन में रहने से हमारे संतो , गुरुओं और महापुर्षों के बनाए हुए बहुजन मिशन को नुकसान पहुंच रहा है,
"तो मैं अभी इसी वक्त राजनैतिक और सामाजिक जीवन से सन्यास ले रहा हूं"!
आदरणीय बहन जी, मेरा ये जीवन आपका ऋणी है, ऐसे में सन्यास तो बहुत छोटी चीज है आपके लिए अगर मुझे कभी अपनी जान भी देनी पड़े तो वो भी मेरे लिए फक्र की बात होगी - अशोक सिद्धार्थ
सैमसंग जो फोल्ड फोन 60-70 हजार में दे रहा है Apple 3 लाख में देगा।
दोनों बेहद घटिया, ओवर प्राइस, ओवर हाइप और खरीदे हुए बाज़ार पर सवार हैं, ये सब दुनिया को कब पता लगेगा।
चाइना का कोई फोन 25-30k वाला ले लो, काम होगा, फीचर अनलिमिटेड। आपका कम कटेगा।
चित्रा त्रिपाठी का कहना है बहनजी पार्क स्मारक बनवाईं मगर विश्वविद्यालय नहीं बनवाईं।
चित्रा अपने पड़ोस में ही दुनिया का सबसे खूबसूरत विश्वविद्यालय GBU नहीं देखी हैं।
लखनऊ में उर्दू अरबी फारसी विश्वविद्यालय क्या ही देखी होंगी!
कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय क्या ही देखी होंगी!
दिव्यांगों के लिए शकुंतला विश्वविद्यालय क्या ही देखी होंगी!
देख तो सब सकती हैं बस चश्मा नहीं हटा पा रही हैं, जातिवाद का चश्मा।
@narendramodi के अलावा अलावा @Mayawati क्या, किसी को भी नेता मानना ही नहीं चाहती हैं, ये है अंधभक्ति का चश्मा।
JNU और जामिया बंद करो बोलने वालों को राष्ट्रवादी बताकर प्रचार करती हैं, नफ़रत का ये है नफ़रत का चश्मा।
क्या गरीबी ही सब कुछ तय करती है?
मल्लिकार्जुन खरगे जी तो गरीब नहीं हैं। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। फिर उनके साथ हुई शुद्धिकरण की घटना आर्थिक आधार पर हुई थी या जातीय आधार पर?
आज भी लोग बहन जी को उनकी जाति के आधार पर गालियां देते हैं। जाति एक कड़वी सच्चाई है। स्वीकार करो।
गौतम बुद्ध विश्विद्यालय गौतम बुद्ध नगर , श्रीमती शकुंतला मिश्र राष्ट्रीय पुनर्वास विश्विद्यालय लखनऊ,मान्यवर श्री कांशीराम जी उर्दू-फ़ारसी और अरबी विश्विद्यालय लखनऊ क्या चित्रा त्रिपाठी के पिता जी ने बनवाये?
Jonny sins और ख़ालिफ़ा की काम क्रिया देखकर यह तनातनी लौंडा दिन रात हाथ वाली क्रिया आदि हो चुका देखो कैसे सुकड़ी हड्डी हुआ पड़ा हैं
फर्जी तनातन जॉनी सींस का तगड़ा फैन है हर जगह बस वही देखना चाहता हैं
आरक्षण विरोधी तत्काल इसकी इच्छा पूरी करे नहीं तो बेचारा हाथ की क्रिया से गायब हो जाएगा।