।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः।
देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ।।१।।
(षष्ठोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह षष्ठम् अध्याय समग्र तत्त्वचिन्तन का चरम उत्कर्ष है। पूर्व अध्यायों में जिस परमब्रह्म की सत्ता, सर्वव्यापकता, मायाशक्ति, ईश्वरत्व तथा जीव-ब्रह्म-अभेद के रहस्य का क्रमशः निरूपण किया गया, इस अध्याय में उसी परम तत्त्व को समस्त विश्वव्यवस्था के एकमात्र नियन्ता एवं अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। प्रस्तुत मन्त्र मानव-बुद्धि के उस प्राचीन दार्शनिक प्रश्न का समाधान करता है कि इस विश्व की गति का वास्तविक कारण क्या है? क्या यह केवल स्वभाव से संचालित है? क्या काल ही इसका नियन्ता है? अथवा इसके पीछे कोई चेतन, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् परम कारण विद्यमान है?
भगवत्पाद इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि संसार में विभिन्न दार्शनिक मत अपने-अपने तर्कों के आधार पर जगत् की उत्पत्ति और संचालन के विविध कारण प्रस्तुत करते रहे हैं। कोई कहता है कि जगत् का कारण स्वभाव है- अर्थात् पदार्थों की अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति ही समस्त परिवर्तन का कारण है। कोई अन्य काल को ही सर्वश्रेष्ठ कारण मानता है और समझता है कि समय की गति से ही सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय का क्रम चलता है। परन्तु उपनिषद् इन दोनों मतों को “परिमुह्यमानाः” कहकर इंगित करती है- अर्थात् जो वास्तविक तत्त्व को न जानकर बाह्य कारणों में ही उलझे हुए हैं।
भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार “स्वभाव” और “काल” दोनों स्वतन्त्र सत्ता नहीं हैं। वे स्वयं भी किसी उच्चतर चेतन सत्ता के अधीन हैं। जड़ तत्त्व कभी स्वयं अपने को व्यवस्थित नहीं कर सकता। स्वभाव यदि जड़ है तो उसमें संकल्प, ज्ञान, उद्देश्य और व्यवस्था की शक्ति कहाँ से आएगी? इसी प्रकार काल केवल परिवर्तन का मापक है; वह स्वयं किसी घटना का स्वतन्त्र कर्ता नहीं हो सकता। जिस प्रकार घड़ी समय का संकेत देती है, समय का निर्माण नहीं करती, उसी प्रकार काल घटनाओं का अनुक्रम प्रकट करता है, उनका स्वतन्त्र सर्जक नहीं होता।
इसी कारण उपनिषद् निर्णायक स्वर में कहती है -
“देवस्यैष महिमा तु लोके” अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् जिस अद्भुत व्यवस्था से संचालित हो रहा है, वह उस परम देव की ही महिमा है। यहाँ “देव” शब्द किसी सीमित देवता का वाचक नहीं, अपितु उस परमात्मा का द्योतक है जो स्वयंप्रकाश, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् तथा समस्त सृष्टि का अन्तर्यामी अधिष्ठाता है।
भगवत्पादाचार्य इस वाक्य का अत्यन्त गम्भीर अर्थ उद्घाटित करते हैं। उनके अनुसार विश्व की यह अद्भुत व्यवस्था - ग्रहों की गति, ऋतुओं का परिवर्तन, जन्म और मृत्यु का क्रम, कर्मफल की व्यवस्था, चेतना का प्रवाह तथा समस्त प्राकृतिक नियम - यह सब किसी अन्धी शक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि ईश्वर की मायाशक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त उनकी अनन्त व्यवस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मन्त्र का अन्तिम चरण -
“येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम्” अत्यन्त रहस्यमय है। यहाँ “ब्रह्मचक्रम्” सम्पूर्ण संसारचक्र का द्योतक है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार यह जन्म, मृत्यु, कर्म, भोग, पुनर्जन्म तथा अनन्त नाम-रूपों से युक्त संसार का अखण्ड प्रवाह है। यह चक्र स्वतन्त्र रूप से नहीं घूमता; इसे गति प्रदान करने वाला वही परमेश्वर है।
किन्तु यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म अद्वैत रहस्य भी निहित है। ईश्वर संसारचक्र का नियन्ता अवश्य है, किन्तु स्वयं संसारधर्मों से सर्वथा असंग है। जैसे- चुम्बक लोहे को गति देता है, किन्तु स्वयं परिवर्तित नहीं होता; जैसे- सूर्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है किन्तु प्रकाश से स्पर्शित होकर भी अप्रभावित रहता है, ठीक उसी प्रकार परमब्रह्म अपनी मायाशक्ति द्वारा सम्पूर्ण विश्व की गति का आधार है, परन्तु स्वयं नित्य, निर्विकार एवं असंग रहता है।
यही भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त की विशिष्टता है। वे न तो जगत् को पूर्णतः असत् कहते हैं और न ईश्वर से पृथक् स्वतन्त्र सत्ता मानते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म की मायोपाधि से प्रकाशित एक व्यवहारिक सत्य है, जिसका संचालन ईश्वर करता है; परमार्थतः केवल एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है।
यह मन्त्र आधुनिक विज्ञान के लिए भी अत्यन्त प्रासंगिक है। विज्ञान प्रकृति के नियमों का अन्वेषण करता है, किन्तु उन नियमों की अन्तिम सत्ता और उनके अस्तित्व का कारण नहीं बता सकता। गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्, क्वाण्टम क्षेत्र, समय तथा ऊर्जा - ये सभी कार्य-प्रणालियाँ हैं, किन्तु इनके पीछे विद्यमान सार्वभौम चेतना का निर्णय विज्ञान के क्षेत्र से परे है। उपनिषद् उसी चेतन अधिष्ठान की ओर संकेत करती है, जो नियमों का भी नियन्ता है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
02 सितम्बर, अटलांटा, जॉर्जिया, USA (अमेरिका)।
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद गुरुदेव श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री” के पावन सान्निध्य में ‘अवधेशानन्दजी मिशन USA’ द्वारा दो दिव्य सत्संग-संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। प्रथम सत्र प्रातःकाल तथा द्वितीय सत्र सायंकाल रमणीय ऐलाटूना नदी (Allatoona River) के तट पर सम्पन्न हुआ।
प्रातःकालीन सत्संग में आदरणीया पूज्या शैला माताजी ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय ‘भक्तियोग’ की भावपूर्ण एवं जीवनोपयोगी व्याख्या की। उन्होंने बताया कि भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण, समत्व, करुणा और अहंकाररहित जीवन ही सच्चे भक्त के लक्षण हैं-
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ।।”
अर्थात् जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा रखता है तथा सुख-दुःख में समभाव रखता है, वही भगवान् का प्रिय भक्त है।
इसके उपरान्त "पूज्य आचार्यश्री" ने भक्तियोग के सगुण-साकार एवं निर्गुण-निराकार स्वरूपों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उपासना की विधियाँ भिन्न हो सकती हैं, किन्तु उनका लक्ष्य एक ही है - अहंकार का विसर्जन, अन्तःकरण की निर्मलता और परमात्मा में अखण्ड प्रतिष्ठा। सगुण भक्ति श्रद्धा, सेवा, नाम, रूप और लीला द्वारा भक्त को भगवान् के निकट ले जाती है, जबकि निर्गुण भक्ति उसी परम तत्त्व की सर्वव्यापक एवं अद्वैत अनुभूति कराती है। परिपक्व होने पर दोनों धाराएँ परम प्रेम और ब्रह्मानुभूति में समाहित हो जाती हैं।
"पूज्य आचार्यश्री" ने नारद भक्ति-सूत्र के अमृतमय सूत्रों की सरस एवं गम्भीर व्याख्या करते हुए कहा कि “सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा। अमृतस्वरूपा च।”
भक्ति परमात्मा के प्रति परम प्रेम और अमृत का स्वरूप है; वह मनुष्य को नश्वर आकर्षणों से ऊपर उठाकर शाश्वत आनन्द प्रदान करती है। “यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवत्यमृतो भवति तृप्तो भवति।” जिसे प्राप्त कर मनुष्य सिद्ध, अमृतमय और पूर्णतः तृप्त हो जाता है।
उन्होंने कहा कि भक्ति बाह्य प्रदर्शन अथवा क्षणिक भावावेश नहीं, अपितु चित्त की वह पवित्र अवस्था है, जिसमें भक्त अपनी इच्छाओं, अपेक्षाओं और अहंकार को भगवान् के चरणों में समर्पित कर देता है। भक्ति जीवन में विनम्रता, सरलता, सेवा, करुणा और निष्कामता लाती है।
“निरोधस्तु लोकवेदव्यापारन्यासः।”
अर्थात् भक्ति में संसार और शास्त्रविहित कर्मों का निषेध नहीं, बल्कि कर्तृत्वाभिमान एवं फलासक्ति का परमात्मा में समर्पण है। भगवान् को अर्पित कर्म ही साधना, सेवा और पूजा बन जाता है।
"पूज्य आचार्यश्री" ने श्रीमद्वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरितमानस, श्रीमद्भागवत महापुराण तथा भक्तिशास्त्र के प्रेरक प्रसंगों द्वारा भक्ति के विविध आयामों की व्याख्या की। नवधा भक्ति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि
“श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ।।”
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन; नवधा भक्ति के नौ सोपान हैं। इनमें से किसी एक का भी पूर्ण निष्ठा से आश्रय लेने पर अन्तःकरण निर्मल होकर ईश्वरानुभूति के योग्य बन जाता है।
इन सत्संग-संगोष्ठियों में अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों से आए भक्तों ने आध्यात्मिक ऊर्जा, अन्तःशान्ति और दिव्य आनन्द की अनुभूति की। इस अवसर पर प्रभु प्रेमी संघ, दिल्ली के वरिष्ठ न्यासी आदरणीय श्री विनोद बुट्टन जी एवं आदरणीया श्रीमती सरोज बुट्टन जी सहित अमित बुट्टन, विभा बुट्टन, अंशु शरॉफ और आदित्य उपस्थित रहे। मेडिसन सिटी से श्री बब्बी चावला, श्रीमती नीलू चावला एवं मनीष चावला; दिल्ली से श्री सहजपाल जी, श्रीमती शशि सहजपाल एवं निखिल; वाशिंगटन से डॉ. कंचन एवं श्री विवेक बैरीवाला, श्री देवेन्द्र गुप्ता, श्रीमती पंखुड़ी गुप्ता सहित अनेक साधकों ने सत्संग का लाभ प्राप्त किया। इस अवसर पर अमेरिका में मिशन के सेवा, संस्कार, सत्संग और आध्यात्मिक जागरण से जुड़े कार्यों के विस्तार पर भी विचार-विमर्श हुआ।
इसी क्रम में कल अटलांटा स्थित प्रतिष्ठित जिमी कार्टर सेंटर में विशाल सत्संग-समारोह आयोजित होगा, जिसमें "पूज्य आचार्यश्री" अपने प्रेरक एवं तत्त्वदर्शी उद्बोधन से जनसमुदाय को सम्बोधित करेंगे। यह आयोजन भारतीय अध्यात्म, सनातन जीवन-मूल्यों और विश्वबन्धुत्व के दिव्य सन्देश को अमेरिका की धरती पर व्यापकता प्रदान करेगा।
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।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
एकैकजालं बहुधा विकुर्वन्
अस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः ।
भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः
सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ।।३।।
(पञ्चमोऽध्यायः)
वेदान्त-दर्शन का मूल प्रतिपाद्य है कि सम्पूर्ण चराचर जगत् किसी अचेतन संयोग अथवा स्वतन्त्र भौतिक कारण का परिणाम नहीं, अपितु एकमात्र परम चेतन ब्रह्म की मायाशक्ति से अभिव्यक्त नाम-रूपात्मक विश्व है। वही परमात्मा सृष्टि का कारण, धारक, संहारकर्ता तथा समस्त परिवर्तनशील जगत् का नित्य एवं अपरिवर्तनशील अधिष्ठान है। श्वेताश्वतरोपनिषद् के पञ्चम अध्याय का यह तृतीय मन्त्र इसी परम सत्य का अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक निरूपण करता है।
भगवत्पाद के अनुसार जगत् ब्रह्म का वास्तविक परिणाम नहीं, अपितु मायोपाधि के कारण प्रतीत होने वाला विवर्त है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय परम सत्ता में अधिष्ठित व्यावहारिक सत्य हैं; परमार्थतः ब्रह्म सदा नित्य, निर्विकार, अखण्ड और अद्वितीय है।
मन्त्र का आरम्भ है- “एकैकजालं बहुधा विकुर्वन्।” यहाँ “जाल” से अभिप्राय मायामय विश्व-प्रपञ्च से है। एक ही कारण में स्थित यह जगत् अनेक नामों और रूपों में अभिव्यक्त होता है। “बहुधा विकुर्वन्” का अर्थ यह नहीं कि परमब्रह्म स्वयं अनेक भागों में विभक्त हो जाता है। अनेकता केवल नाम-रूपों की है; तत्त्वतः ब्रह्म में कोई वास्तविक विभाजन नहीं होता। जैसे एक ही सूर्य अनेक जलाशयों में असंख्य प्रतिबिम्बों के रूप में दिखाई देता है, किन्तु अपने स्वरूप में एक ही रहता है, वैसे ही एक ब्रह्म अनन्त जगत् के रूप में प्रतिभासित होता है।
मन्त्र आगे कहता है- “अस्मिन् क्षेत्रे संहरत्येष देवः।” यहाँ “क्षेत्र” सम्पूर्ण देह, प्रकृति, जगत् और अनुभव के क्षेत्र का द्योतक है। परमेश्वर इस क्षेत्र का केवल स्रष्टा ही नहीं, अपितु संहारकर्ता भी है। किन्तु संहार का अर्थ सर्वथा विनाश नहीं, बल्कि नाम-रूपों का अपने कारण में लीन हो जाना है। जैसे स्वप्न जागरण में विलीन हो जाता है, वैसे ही प्रलयकाल में सम्पूर्ण जगत् मायोपाधि सहित अव्यक्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है। ब्रह्म में कोई परिवर्तन नहीं आता; केवल विश्व-प्रपञ्च अप्रकट हो जाता है।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है- “भूयः सृष्ट्वा”, अर्थात् वही परमेश्वर पुनः सृष्टि को अभिव्यक्त करता है। सृष्टि कोई प्रथम बार घटित होने वाली घटना नहीं, बल्कि अनादि काल से प्रवाहित आविर्भाव और तिरोभाव का चक्र है। जीवों के संचित कर्मों के अनुरूप ईश्वर पुनः जगत् की रचना करता है। यह सृष्टि मनमानी नहीं, अपितु कर्म-सिद्ध न्याय-व्यवस्था से संचालित है। सर्वज्ञ, निष्पक्ष और सर्वनियन्ता परमेश्वर प्रत्येक जीव को उसके कर्मानुसार उपयुक्त देह, परिस्थिति और अनुभव-क्षेत्र प्रदान करता है।
मन्त्र के अन्तिम शब्द “पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा” ईश्वर की सार्वभौम सत्ता का उद्घोष करते हैं। देवता, प्रजापति, ब्रह्मा तथा अन्य सभी अधिष्ठाता देव भी पूर्णतः स्वतन्त्र नहीं हैं। वे उसी परमेश्वर की शक्ति और व्यवस्था से अपने-अपने दायित्वों का निर्वाह करते हैं। परमेश्वर ही देवों का देव, ईश्वरों का ईश्वर और समस्त अधिपतियों का परम अधिपति है। उसकी परम सत्ता से परे कोई अन्य स्वतन्त्र नियामक नहीं है।
अद्वैत की दृष्टि से सृष्टि, स्थिति और संहार ब्रह्म के वास्तविक धर्म नहीं हैं। ये मायोपाधि से सम्बद्ध ईश्वर के व्यावहारिक कार्य हैं। परमार्थतः ब्रह्म न सृष्टि करता है, न संहार करता है और न किसी परिवर्तन को प्राप्त होता है। वह स्वप्रकाश, नित्य, शुद्ध और निर्विकार चैतन्य है। जैसे अभिनेता अनेक पात्रों का अभिनय करता हुआ भी अपने वास्तविक स्वरूप में अपरिवर्तित रहता है, वैसे ही ब्रह्म माया के माध्यम से समस्त विश्व-व्यवहार का आधार होकर भी उससे सर्वथा असंग रहता है।
इस मन्त्र का साधना-पक्ष भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जब साधक यह समझ लेता है कि सम्पूर्ण जगत् का उदय, विस्तार और लय उसी एक परम चेतना में हो रहा है, तब सांसारिक परिवर्तन उसे विचलित नहीं कर पाते। जन्म-मृत्यु, लाभ-हानि, निर्माण-विनाश तथा संयोग-वियोग ये सभी कालबद्ध घटनाएँ हैं; नित्य सत्य केवल ब्रह्म है। यही दृष्टि साधक के अन्तःकरण में वैराग्य, समत्व और आत्मनिष्ठा को जन्म देती है। तब वह परिवर्तनशील संसार में रहते हुए भी अपरिवर्तनशील सत्य में प्रतिष्ठित रहना सीखता है।
आधुनिक युग में भी यह मन्त्र पूर्णतः प्रासंगिक है। विज्ञान हमें ब्रह्माण्ड की संरचना और उसके नियमों का ज्ञान प्रदान कर सकता है, किन्तु अस्तित्व के परम अधिष्ठान का बोध नहीं करा सकता। उपनिषद् स्मरण कराते हैं कि दृश्य जगत् का अध्ययन आवश्यक है, परन्तु उससे भी अधिक आवश्यक उस चैतन्य का साक्षात्कार है, जो प्रत्येक परिवर्तन का प्रकाशक और साक्षी है।
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