Daughter of a BJP politician, Yashaswinee Raje Singh, tells why she supports India's student-led protests and how the Cockroach Janta Party galvanised Gen Z.
Thank you to everyone who has given so far. We have raised ₹7.5 lakh, and are still ₹2.5 lakh short this month. Another 500 readers at ₹500 each closes it. We take no ads, grants or government money, so this depends entirely on you.
https://t.co/s5tbkxPnn4
*शिकायत नहीं, काम करने वाले पैदा कीजिए : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
काम न होने का रोना तो हर कोई रो लेता है लेकिन काम करने वाले लोग तैयार करने की फ़िक्र बहुत कम लोग करते हैं। आज हमें अपने आप से एक ईमानदार सवाल पूछना चाहिए कि क्या हम ऐसी नस्ल तैयार कर रहे हैं जो सिर्फ़ रस्मी कार्यक्रमों, सीमित दायरों और पारंपरिक भूमिकाओं तक ही महदूद रहे या फिर ऐसी क़ियादत पैदा कर रहे हैं जो क़लम, मीडिया, शिक्षा, तकनीक, समाजसेवा, न्याय, प्रशासन और राष्ट्रीय जीवन के हर मैदान में दीन और मिल्लत की प्रभावशाली नुमाइंदगी कर सके?
दुनिया बदल चुकी है। आज जंग तलवारों से नहीं, बल्कि शिक्षा, विचार, मीडिया, विज्ञान, तकनीक और नेतृत्व से लड़ी जा रही है। जो क़ौमें अपने युवाओं को समय की ज़रूरतों के मुताबिक़ तैयार करती हैं, वही इतिहास बनाती हैं और जो सिर्फ़ अतीत की यादों में जीती हैं, वे इतिहास के हाशिए पर धकेल दी जाती हैं।
हमें ऐसे नौजवान चाहिए जो मस्जिद से भी जुड़े हों और आधुनिक ज्ञान से भी लैस हों। जो दीन की गहराई भी रखते हों और दुनिया की समझ भी। जो मिहराब व मिम्बर से भी बोल सकें और मीडिया के मंच पर भी। जो किताब भी लिख सकें, संस्थाएं भी चला सकें और समाज की समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत कर सकें। लेकिन कड़वा सच यह है कि... जिस क़ौम के पास करोड़ों की आबादी हो लेकिन गिनती के लोग ही उसके दर्द को आवाज़ देने वाले हों, उसे अपने दुश्मनों से पहले अपनी सोच पर रोना चाहिए।
हम हर साल शिकायत करते हैं कि हमारी बातें कोई नहीं सुनता, हमारे मसले कोई नहीं उठाता, हमारे अधिकारों की रक्षा कोई नहीं करता। मगर कभी यह भी सोचा कि इसके लिए हमने तैयार कितने लोग किए हैं?
अगर पूरी मिल्लत में हाफ़िज़/ आलिम/ मुफ्ती कम हों, डॉक्टर कम हों, वकील कम हों, पत्रकार कम हों, शिक्षक कम हों, वैज्ञानिक कम हों, लेखक कम हों और दूरदर्शी नेतृत्व न हो, तो फिर शिकायत किससे है?
याद रखिए! जो क़ौम अपने बच्चों को सिर्फ़ भीड़ का हिस्सा बनाती है, वह ख़ुद भीड़ बनकर रह जाती है और जो क़ौम अपने बच्चों को नेतृत्व, ज्ञान, चरित्र और संघर्ष का हुनर सिखाती है, वही इतिहास की दिशा बदल देती है।
आज हमारी सबसे बड़ी गरीबी धन की नहीं, बल्कि योग्य, निडर, ईमानदार और मिशनरी लोगों की गरीबी है। सिर्फ़ यह कहना कि “काम नहीं हो रहा” कोई उपलब्धि नहीं है। असली सवाल यह है कि काम करने वाले लोग कहां से आएंगे? यदि हम उन्हें तैयार नहीं करेंगे, उनकी प्रतिभा को निखारेंगे नहीं, उन्हें अवसर नहीं देंगे, तो फिर बदलाव की उम्मीद किससे करेंगे?
आज ज़रूरत शिकायतों की नहीं, निर्माण की है। आलोचना की नहीं, प्रशिक्षण की है। खोखले नारों की नहीं, योग्य और दूरदर्शी क़यादत/ नेतृत्व तैयार करने की है और अगर आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली नस्लें हमसे यह सवाल पूछेंगी "जब वक़्त तुम्हें जगाने आया था, तब तुम क्या कर रहे थे?"
सिर्फ़ ताली बजाने वाले नहीं... सिर्फ़ नारे लगाने वाले नहीं... सिर्फ़ शिकायत करने वाले नहीं... क़ौम को ऐसे लोग चाहिए जो सोचें, लिखें, बोलें, नेतृत्व करें, संस्थाएं बनाएं और हालात बदल दें क्योंकि इतिहास दर्शकों ने नहीं, मैदान में उतरने वालों ने लिखा है और याद रखिए! अगर हम आने वाली नस्लों को सिर्फ़ श्रोता बनाएंगे, तो वे ताली बजाएंगी लेकिन यदि उन्हें क़ायद/ रहबर बनाएंगे, तो वे इतिहास बदल देंगी। क़ौमों का भविष्य उनके खोखले नारों और भाषणों से नहीं, बल्कि उनकी तैयार की हुई नई पीढ़ी से तय होता है।
✍️ सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन
*हुसैन के नाम पर आंसू बहुत हैं, हुसैन के रास्ते पर चलने वाले कम हैं : सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी*
मुहर्रम का महीना आते ही "या हुसैन" की सदाएं बुलंद होने लगती हैं। जगह-जगह मजलिसें होती हैं, सबीलें लगती हैं, नज़र-नियाज़ का एहतिमाम होता है और अहले बैत की मुहब्बत का इज़हार किया जाता है। यह सब अपनी जगह क़ाबिले-एहतराम है लेकिन एक सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है। क्या इमाम हुसैन सिर्फ़ अकीदत का नाम हैं या अमल का भी? क्या कर्बला सिर्फ़ एक तारीखी वाक़िआ है या हर दौर के इंसान के लिए एक ज़िंदा पैग़ाम भी?
*हुसैन से मुहब्बत है तो किरदार भी पैदा कर!*
*फ़क़त नारा-ए-हुसैन से तक़दीरें नहीं बदलतीं!!*
इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु अन्हु नबी-ए-करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नवासे, जिगर गोशा-ए-बतूल और जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं। उनकी मुहब्बत हर सुन्नी मुसलमान के ईमान का हिस्सा है। लेकिन मुहब्बत का तक़ाज़ा सिर्फ़ आंसू बहाना नहीं बल्कि उनके पैग़ाम को अपनी ज़िंदगी में उतारना भी है। आज का सबसे बड़ा सवाल। अगर हम अपने समाज पर नज़र डालें तो हर तरफ़ अन्याय, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, झूठ और अवसरवादिता का बोलबाला दिखाई देता है। ताक़तवर कमज़ोर को दबा रहा है, सच को समझौतों की भेंट चढ़ाया जा रहा है और इंसाफ़ को निजी हितों के तराज़ू में तोला जा रहा है। ऐसे माहौल में हमें अपने आप से पूछना चाहिए। क्या हम सचमुच इमाम हुसैन के चाहने वाले हैं? क्योंकि इमाम हुसैन का नाम लेना आसान है लेकिन उनके रास्ते पर चलना आसान नहीं।
*जो ज़ुल्म देखकर ख़ामोश रह गया यारो!*
*वह अपने दौर का मुजरिम भी है, गवाह भी है!!*
सिर्फ़ मोहब्बत नहीं, उसूल भी चाहिए। आज हर व्यक्ति अपने आपको आशिक़े हुसैन कहता है लेकिन जब सच बोलने की कीमत चुकानी पड़े, जब अन्याय के खिलाफ़ खड़े होने का समय आए, जब अपने लाभ और सिद्धांत में से किसी एक को चुनना पड़े, तब बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं। हमने इमाम हुसैन को एक भावनात्मक शीर्षक तो बना लिया लेकिन उनके मिशन को भुला दिया। हम उनकी कुर्बानी पर आंसू तो बहाते हैं, मगर उनके संदेश को अपने चरित्र का हिस्सा नहीं बनाते।
*सर दे दिया मगर कभी बातिल से न झुके!*
*दुनिया को यह सबक़ शहे कर्ब व बला ने दिया!!*
अगर कर्बला में भी समझौता हो जाता... ज़रा सोचिए! अगर मैदाने कर्बला में इमाम हुसैन भी समझौते का रास्ता चुन लेते... अगर वह भी खामोशी को तरजीह देते... अगर वह भी अपनी जान और अपने परिवार की सुरक्षा को हक़ से ऊपर रख देते... तो क्या आज हक़ और बातिल के बीच की रेखा इतनी स्पष्ट होती? हरगिज़ नहीं। कर्बला हमें सिखाती है कि हक़ के लिए डटे रहना ही असली कामयाबी है, चाहे दुनिया उसे हार ही क्यों न समझे।
*हुसैन ने जो दिया था सबक़-ए-वफ़ा हमें!*
*अब इम्तिहान यह है कि उस पर अमल भी हो!!*
समाज को सिर्फ़ मातम नहीं, किरदार चाहिए। आज हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत यह नहीं कि हम सिर्फ़ कर्बला को याद करें बल्कि यह है कि हम कर्बला के पैग़ाम को ज़िंदा करें। अपने भीतर सच पैदा करें। इंसाफ़ को मज़बूत करें। मज़लूम का साथ दें। ज़ालिम का विरोध करें और हर हाल में हक़ का दामन थामे रखें। याद रखिए। हुसैनी होना सिर्फ़ मुहब्बत का दावा नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, साहस और कुर्बानी का नाम है।
*मातम से नहीं बदलेगी तक़दीर-ए-ज़माना!*
*किरदार में पैदा करो अंदाज़-ए-हुसैन!!*
अपने दिल में झांकिए। अगर हमारे अंदर सच के लिए बेचैनी नहीं... अगर मज़लूम के लिए दर्द नहीं... अगर अन्याय के खिलाफ़ ग़ुस्सा नहीं... अगर समाज और राष्ट्र के लिए कुर्बानी का जज़्बा नहीं... तो हमें अपने दावों पर दोबारा विचार करना चाहिए।
*दिलों में अगर चराग़-ए-हुसैन रौशन हो जाए!*
*अंधेरों का हर एक लश्कर फ़ना हो जाए!!*
सिर्फ़ नारे नहीं, अमल चाहिए। आइए! हम केवल नारों तक सीमित न रहें। हम केवल भावनाओं तक सीमित न रहें। हम केवल रस्मों तक सीमित न रहें बल्कि इमाम हुसैन के पैग़ाम को अपने घरों, संस्थाओं, राजनीति, समाज और व्यक्तिगत जीवन में उतारें क्योंकि इतिहास गवाह है, इमाम हुसैन को मानने वाले बहुत थे, लेकिन इमाम हुसैन के साथ खड़े होने वाले बहुत कम थे।
*उठो कि वक़्त पुकारे, हुसैनी बन जाओ!*
*सितम के सामने दीवार-ए-आहनी बन जाओ!!*
अंत में सिर्फ़ एक सवाल। क्या इमाम हुसैन सिर्फ़ हमारी ज़ुबान पर हैं या हमारे चरित्र में भी? क्योंकि इमाम हुसैन से मुहब्बत का असली सबूत आंसू नहीं, बल्कि चरित्र है। नारा नहीं, बल्कि कर्म है। दावा नहीं, बल्कि त्याग है।
*कल हश्र में पूछा जाएगा इतना ही फ़क़त!*
*हुसैन का नाम लिया था या रास्ता भी चुना था?!!*
✍️ सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी
चेयरमैन: ग़ौसे आज़म फ़ाउंडेशन
A case of cow slaughter in Bijnor turned out to be a planned conspiracy by Jagpal to frame his political rival Hasan. On instructions of Village head Jagpal, They hired Faizan, Zubair & Salman to perform the cow slaughter. Bhrampal brought a calf which was slaughtered in Ramavtar's farmland. Soon after, Jagpal had already gathered several local Hindu organizations to protest against the cow slaughter.
After investigation, Police arrested village head Jagpal, his brother Kiranpal Lala, Ramavatar, Brahmpal and Faizan.
As Priyank Kharge demands transparency from the RSS, the organisation points to decades-old IT rulings.
The actual history reveals an organisational design explicitly tweaked to stay anonymous.
@anisha_w unpacks it.
https://t.co/3MK0ilhocx
Are those arrested in Delhi in ISI-linked espionage case all Muslims? No. The names Danish, Khalid or Junaid were invented by Right-wing social media users to give the alleged crime a communal colour. #FactCheck by @OishaniB_
https://t.co/HjpoYsVnd7
देखिए कैसे आपके प्राइम टाइम से लेकर खबरों के पोस्ट्स और स्टूडियोज़ में 'जिहाद' शब्द का इस्तेमाल बढ़ा है. और अब धीरे-धीरे आम बनता जा रहा है जो कि न सिर्फ सांप्रदायिक है बल्कि देश के सोहार्द और एकता की भावना पर वार है. #AltNewsVideoReport https://t.co/6nu79O1aEk