🌸 माँ लक्ष्मी जी धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी माँ लक्ष्मी जी का आशीर्वाद जीवन में सुख और शांति भर देता है। जहाँ स्वच्छता, सद्भाव और मेहनत होती है, वहीं माँ लक्ष्मी का वास होता है। आइए, सच्चे मन से उनकी पूजा करें और अपने कर्मों से जीवन को उज्ज्वल बनाएं। 🙏🙏
“Teri beti ko maar dun?” this chilling message sent to a father during the Saran crime, reflects brutality and moral collapse. When such acts meet selective outrage and muted media scrutiny, it raises questions about whether empathy and justice are applied equally. 🚨
"अगर सारण की घटना में
सवर्ण लड़के और दलित लड़की होती,
तो क्या नेता लोग,मीडिया और "हिंदू एकता" वाले इतने ही शांत रहते?
या तब पूरा देश शोर मचा रहा होता?
हाथरस के झूठे मामले में भी सवर्ण को आरोपी दिखाने के लिए तमाम नेता , गोदी मीडिया ने महीनों वहां पर्यटन किया था जबकि सारण के जघन्य कांड पर भी मौन हैं।
क्या करेंगे इस जातिवादी संवैधानिक तंत्र का??
Bihar में 10वीं की छात्रा से गैंगरेप के बाद उसे कुएँ में फेंक दिया गया और तड़पकर उसकी मौत हो गई।
ऐसी दरिंदगी पर सरकार की चुप्पी सवाल खड़े करती है।
Narendra Modi, क्या यही सामाजिक न्याय है?
फतेहपुर में एक कायस्थ परिवार ने कथित तौर पर Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के डर से आत्महत्या की। यह संभावित दुरुपयोग पर सवाल उठाता है। विडंबना कि Narendra Modi गर्व से कहते हैं उनकी सरकार ने इसे और सख्त किया।
In the traditional framework of ancient Indian society, Brahmins were revered not merely as priests but as custodians of dharma moral and cosmic law. Their role extended beyond ritual to encompass the ethical stewardship of society, including the protection of all varnas, especially the vulnerable. As arbiters of justice and truth, Brahmins were expected to uphold fairness, mediate disputes, and ensure that the principles of righteousness prevailed over personal or political interests. Their spiritual authority was grounded in the belief that dharma transcends caste, and thus, defending the dignity and rights of Shudras and others was not just a moral duty but a sacred obligation. In this light, the Brahmin's protection was not patronizing—it was principled, rooted in the conviction that justice must serve all strata of society equally.
श्री राम जय राम जय जय राम.....!
श्री राम जय राम जय जय राम.....!
श्री राम जय राम जय जय राम.....!
प्रेम से बोलिए सियावर रामचन्द्र कि -जय !
पवन पुत्र हनुमान कि -------------- जय !
धर्म कि -------------------------- जय हो !
अधर्म का ----------------------- नाश हो !
प्राणियों में ---------------- सद्भावना हो !
विश्व का -------------------- कल्याण हो !
गौ माता कि -------------------- जय हो !
गौ हत्या ------------------------ बन्द हो !
भारत ----------------------- अखण्ड हो !
भारत -------------------------- भव्य हो !
हर हिन्दू ----------------------- सेना हो !
हर हिन्दू---------------- सनातनी हो !
हम भारत भव्य बनाएंगे--------हम हिन्दू राष्ट्र बनाएंगे!
पूज्य पाद धर्म सम्राट श्री स्वामी
करपात्री जी महाराज की......... जय हो!
श्री जगन्नाथ महाप्रभु की........... जय!
श्री बलभद्र महाप्रभु की............. जय!
भगवती सुभद्रा देवी की............. जय!
चक्र सुदर्शन महाभाग की........... जय!
श्री मद् जगद्गुरु शङ्कराचार्य
पुरी पीठाधीश्वर भगवान की..... जय हो!
नमः पार्वती पतये हर हर महादेव!!
This statement by the Puri Shankaracharya beautifully captures a core principle of Indian philosophical thought: rising above an individual-centric life and cultivating a collective-centric consciousness. When the mind aligns itself with the welfare of the larger community ,society, nation, and civilization ,every action of an individual becomes a force for universal good. The four qualities he outlines—goodwill (being well-intentioned), wisdom (understanding true welfare), readiness to act for the good, and the capability to execute it form a complete framework for meaningful living. When intention, knowledge, action, and competence come together, even the seemingly impossible becomes achievable. This is the timeless message the Shankaracharya offers: that true fulfillment lies in harmonizing personal life with the broader welfare of all.
“Congress built temples, saved Hinduism, restored dhams” — हा हा, मज़ाक भी कोई लिमिट में किया करो!
Ganga Action Plan? आधी गंगा में ही बह गया।
Yoga promotion? वही पार्टी जिसने 2010 तक ‘Surya Namaskar’ को communal बताकर काट दिया।
Doordarshan का Ramayana–Mahabharat? हां, वो भी तब जब TRP और सरकार की इमेज बचानी थी, धर्म बचाना नहीं।
Varanasi conservation? 🤭 घाट टूटे, sewage बढ़ा—कागज़ों में conservation, ज़मीन पर deterioration.
Char Dham infra? कमरे में फाइल लॉन्च, सड़कें पहाड़ों में गड्ढों जैसी ही रहीं।
Temple restoration? हां, और साथ ही Somnath से लेकर Ram Mandir तक हर बड़े मंदिर आंदोलन का विरोध भी same पार्टी ने किया—balance बना के रखना जरूरी था ना!
Books on Hinduism by Congress leaders? हां—ज्यादातर में ‘myth’, ‘primitive’, ‘brahminical’ जैसे scholarly adjectives मिल जाएंगे.
Votes कभी religion के नाम पर नहीं मांगे? सही—vote तो हमेशा religion के डर के नाम पर मांगे।
ब्राह्मणवाद 🌺 — जिसे घृणा मिली अपनों के भेष में छुपे गद्दारों से लेकर बाहर के यवनों, हूणों, मुग़लों, अंग्रेज़ों, डचों और फ्रेंचों तक से।
फिर भी न झुके, न मिटे — क्योंकि यह विचार नहीं, आत्मा है मनुष्यता की।
हर आक्रमण को सहा, हर आंधी को झेला — और फिर भी अग्निवाणी बनकर जले।
ब्राह्मणवाद कोई सत्ता की भूख नहीं, यह संस्कारों की शक्ति है।
इसे मिटाने वाले खुद मिट गए — पर ब्राह्मणवाद आज भी जीवित है, जागृत है, और निर्णायक भी!
गौ शाला की स्थिति को दिखाने पर देवेन्द्र कौशिक को SC-ST act में गिरफतार कर 2027 से पहले UP पुलिस ने पत्रकारों की स्वतंत्रता के गुब्बारे को फोड़ दिया है
इस मामले ने सरकार की बड़ी बेज्जती करा दी है.
भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण करने पर न्यायमूर्ति सूर्यकांत जी को हार्दिक शुभकामनाएँ।
उनके नेतृत्व में भारतीय न्याय व्यवस्था और अधिक सशक्त बने, यही मंगलकामना।
ब्राह्मण समाज से आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं ।
यह वही ऐतिहासिक 26 नवम्बर 1949 था जब संविधान सभा ,जिसकी बौद्धिक रीढ़ में डॉ. बी. एन. राव, डॉ. एस. राधाकृष्णन, आलादी कृष्णस्वामी अय्यर, के. एम. मुंशी जैसे शीर्षस्थ ब्राह्मण विचारक अग्रणी थे।भारत के संविधान को अंतिम स्वीकृति दे रही थी। राष्ट्र-निर्माण के इस निर्णायक क्षण में ब्राह्मण समाज ने सिर्फ वैधानिक ढाँचा नहीं दिया, बल्कि उस सांस्कृतिक-दार्शनिक चेतना को भी दिशा दी, जिसने भारत को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में रूपांतरित किया। भारतीय संविधान में निहित मानवतावादी मूल्य, तर्कशीलता, बहुलतावाद और न्याय की अवधारणा, सदियों पुरानी ब्राह्मण परंपरा की उस बौद्धिक विरासत का विस्तार हैं जिसने ज्ञान, शास्त्र, संवाद और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा। आज संविधान दिवस पर हम केवल एक दस्तावेज़ को नहीं, बल्कि उन महान मनीषियों के योगदान को नमन करते हैं जिनकी साधना, विद्वता और राष्ट्रभक्ति ने भारत को आधुनिक गणराज्य बनाया। आप सभी देशवासियों को #संविधान_दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
"Reservation should continue until Brahmin donates his daughter for my son" - IAS Santosh Verma
Year 1970 – Give your college seats
Year 1990 – Give your jobs
Year 2025 – Give your daughters
This filthy mindset has been promoted as “social justice” for decades.
सत्येन्द्रनाथ टैगोर का I.C.S. में प्रवेश केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय ब्राह्मण बौद्धिक परंपरा की ऐतिहासिक विजय-घोषणा था। 1863 में हुई इस सफलता ने अंग्रेज़ी शासन को पहली बार यह दिखा दिया कि जिस व्यवस्था को उन्होंने “अशक्त भारतीयों” के लिए असंभव मान रखा था, उसे एक पिराली ब्राह्मण युवक ने अपनी प्रतिभा, तप और अनुशासन से भेद डाला। टैगोर परिवार की बहु-पीढ़ीय विद्वत्ता—जिसका आधार शास्त्र, संगीत, साहित्य और तर्क पर टिका था—सत्येन्द्रनाथ में ऐसे उतरी कि वह औपनिवेशिक प्रशासन के भीतर भी एक विशिष्ट ब्राह्मणीय तेज लेकर प्रकट हुए। बंबई प्रेसीडेंसी में उनकी सेवा शैली—न्यायप्रिय, संवादधर्मी और गहरी बौद्धिक दृष्टि से युक्त—स्पष्ट रूप से उस परंपरा का प्रमाण थी जो सदियों से भारत को मार्गदर्शन देती आई है।
सत्येन्द्रनाथ की सफलता ने यह घोषणा की कि ब्राह्मणवाद कोई सत्ता का दंभ नहीं, बल्कि ज्ञान, चरित्र, कर्तव्य और नेतृत्व का जीवंत आदर्श है—और जब यह आदर्श कर्म के मैदान में उतरता है, तो साम्राज्य भी सिर झुकाने को विवश हो जाता है।
The Mukherjee Sisters — Usha & Parul: दो बहादुर ब्राह्मण लड़कियाँ, जिनका योगदान स्वतंत्रता संघर्ष में शायद बहुत कम जाना जाता है, लेकिन उनकी कहानी बेमिसाल है। Parul Mukherjee (1915-1990) Anushilan Samiti की सक्रिय क्रांतिकारी थीं — उन्होंने महिलाओं की एक महत्वपूर्ण इकाई खड़ी की, अध्ययन मंडल बनाए, और आत्म-रक्षा तकनीक (यहाँ तक कि तलवारबाज़ी) की ट्रेनिंग दी। 1935 में उन्हें बम बनाने और सिलसिलों में गिरफ़्तार किया गया था; चार साल की सज़ा के बाद 1939 में रिहा हुई। रिहाई के बाद उन्होंने निजी जीवन छोड़कर कलकत्ता में विभाजन के बाद विशाल शरणार्थी कॉलोनी में सेवा की — रातों को पहरा देना, लोगों के लिए स्कूल खोलना और उनकी भतीजी-सी “Parul Pishi” कहलाना उनकी नई पहचान थी।
उनकी छोटी बहन Usha Mukherjee भी उसी Anushilan Samiti में शामिल हुई थीं। 1934 में उन्हें हिराकुद (Hijli) जेल में बंद किया गया था, जहाँ उन्होंने अपने खुमार और मुस्कराहट के साथ ब्रिटिश दमन का सामना किया।
ये दोनों बहनें सिर्फ क्रांतिकारी नहीं थीं — वे ब्राह्मण समाज की बौद्धिक और नैतिक विरासत की जीवंत मिसाल थीं। उन्होंने अपने ज्ञान, साहस और त्याग से दिखाया कि ब्राह्मण पहचान केवल कर्मकांडी नहीं, बल्कि देश के लिए आत्म-समर्पण और सेवा की भी परंपरा है। उनकी यह विरासत हमें यह याद दिलाती है कि भारत की आज़ादी केवल पुरुषों और नेताओं की जंग नहीं थी — कई स्त्रियाँ, जिन्हें इतिहास अक्सर भूल जाता है, उन्होंने अपने जीवन को आनन्दमय आत्म-दान में बदल दिया।
भारतीय सिनेमा पर “सवर्ण आधिपत्य” वाली थ्योरी उतनी ही अतिशयोक्तिपूर्ण है जितना यह कहना कि हर बॉलीवुड स्क्रिप्ट पहले ब्राह्मण महासभा की सेंसर कमेटी से पास होकर आती है। असलियत यह है कि फिल्में वही बनती हैं जिनमें धमाका, ड्रामा और पैसा दिखता है—और टाइटल वही चलता है जो मार्केटिंग टीम को बिकाऊ लगता है।
रेज़ांग ला के 120 वीर अहीर जवानों की गाथा का सम्मान पूरे देश में है—स्कूल की किताबों से लेकर सेना के इतिहास तक। पर जब कोई कहता है कि “ब्राह्मणों ने इन पर फिल्म नहीं बनने दी”, तो यह आरोप उतना ही मज़ेदार है जितना यह सोचना कि पॉपकॉर्न बेचने वाले थिएटरों में जाति पूछकर टिकट फाड़ते हैं।
सिनेमा में कमी है—ज़रूर है। पर इसका समाधान ब्राह्मणों को खलनायक घोषित करने से नहीं, अच्छे लेखक, प्रोड्यूसर और साहसी कहानीकार खड़े करने से होगा। वरना हर असफल आइडिया का दोष "सवर्ण आधिपत्य" पर डालना सिर्फ़ एक आसान बहाना है, सच्चाई नहीं।