हे मन कब तक पराया बनेगा
अब तो सुन ले मेरा हो जा
जो सपने तू दिखाता, रेत के घर थे ,ढह गए
जो मेरा नहीं था, तू क्यों भ्रम में रखता
यादों की कैद को मजबूत ना कर
तोड़ दे यह बेड़ियां मुझे आजाद होने दे
जो रहा पीछे गई उस और अब ना देख
कदम बढ़ा क्या पता आगे समय इतना बेरहम ना हो✍️