जो दिल में छुपी है वो कहानी भी कहा कर।
धड़कन की तड़प मेरी ज़ुबानी भी कहा कर।
जो अश्क मिरी आँख से टपके हैं वफ़ा में,
तू उनको मोहब्बत की निशानी भी कहा कर।
सूखी हुई आँखों में जो ठहरा है मुसलसल,
उस दर्द को तुम अश्कों का पानी भी कहा कर।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
तुम्हारी राह में हम ज़िंदगी गुज़ारेंगे।
कभी तो आप हमें प्यार से पुकारेंगे।
सँवर रही है जो दुनिया तो ख़ैर होने दो,
हम अपने बिखरे हुए ख़्वाब ही सँवारेंगे।
किसी की जीत पे हमको कोई गिला तो नहीं,
हम अपनी हार को भी शान से गुज़ारेंगे।
~ Azhar Sabri ~
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वो जिसे ढूँढता हर ख़्वाब की ताईद में था।
एक ही शख़्स मेरी आख़िरी उम्मीद में था।
तुम तो आए ही नहीं ख़ैर कोई बात नहीं,
एक ज़माना मगर इस चाँद की उम्मीद में था।
जिसको दुनिया की हवाओं ने है बदला 'अज़हर',
वो तो कल तक मेरी हर बात की ताईद में था।
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
ग़म को चेहरे से नुमाया नहीं होने देते।
हम कभी ख़ुद को अकेला नहीं होने देते।
वक़्त कितना ही बुरा हो मगर ऐ जाने-वफ़ा,
तेरी यादों को पुराना नहीं होने देते।
ख़ुद ही जलते हैं चिराग़ों की तरह राहों में,
उनकी गलियों में अंधेरा नहीं होने देते।
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उरूज-ए-वक़्त की ज़िंदा मिसाल थे हम भी।
ज़माने भर के लिए बेमिसाल थे हम भी।
क़दम जहाँ भी पड़े, कारवाँ बनाते गए,
किसी ज़माने में अहल-ए-कमाल थे हम भी।
ये और बात कि अब ख़ामोशी मुक़द्दर है,
कभी किसी के लिए इक सवाल थे हम भी।
~ Azhar Sabri ~
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सर झुकाकर तुझे पाने तो नहीं जाएँगे।
अपनी हस्ती को मिटाने तो नहीं जाएँगे।
वो अगर छोड़ भी दें, राह बदल लेंगे हम,
हम मुक़द्दर को रुलाने तो नहीं जाएँगे।
रूठना भी तो मोहब्बत की निशानी है मगर,
उम्र भर उनको मनाने तो नहीं जाएँगे।
~ Azhar Sabri ~
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आँखों में अश्क दिल में शरारे हैं आज कल।
हम बे-सहारा हो के सहारे हैं आज कल।
गर्दिश ने इस मकाम पे लाकर खड़ा किया,
अपने ही घर में हम तो किनारे हैं आज कल।
ख़ामोशियाँ बयाँ हैं, ज़बाँ बंद है मगर,
आँखों से हो रहे जो इशारे हैं आज कल।
~ Azhar Sabri ~
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क्यों देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम।
पहचान अपनी ढूँढेंगे अपने हुनर से हम।
माना कि रास्ते में अँधेरा बहुत है पर,
सूरज नया उगाएँगे अपने ही घर से हम।
औक़ात बादलों की हवाएँ बताएँगी,
छू लेंगे आसमान को अपने हुनर से हम।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
हँस कर हर एक ज़ख़्म छुपाने की बात थी।
इक उम्र दर्द दिल में दबाने की बात थी।
झुकना पड़ा हमें ही कि रिश्ता बचा रहे,
वरना तो हाथ छोड़ के जाने की बात थी।
हम चुप रहे तो बात की इज़्ज़त बची रही,
वरना तो आईना भी दिखाने की बात थी।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
नफ़रतों को ज़रा आदाब सिखाया जाए।
आज हर शख़्स को सीने से लगाया जाए।
तीर अल्फ़ाज़ के सीने में उतर जाते हैं,
लफ़्ज़ चुनने का हुनर सबको सिखाया जाए।
घर भी शीशे का है, लोगों के दिल भी नाज़ुक,
बात ऐसी न हो, पत्थर ही उठाया जाए।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
जला जो घर तो तमाशा है हर किसी के लिए।
ये रौशनी है तो लानत है रौशनी के लिए।
वही चराग़ जो घर को जला के छोड़ गया,
सजा रखा है वही अपनी बंदगी के लिए।
बदल दिए हैं ज़माने ने ज़ाविए वरना,
हम आज भी हैं खड़े तेरी रहबरी के लिए।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
अक्स खो दूँगा तो ईजाद करूँगा तुझ को।
ख़ुद को भूलूँगा तो फिर याद करूँगा तुझ को।
ये जो ख़ामोश से लफ़्ज़ों का समंदर है मेरा,
इक न इक रोज़ मैं फ़रियाद करूँगा तुझ को।
तू मेरे शे’र की, ग़ज़लों की ज़रूरत है मियाँ,
अपनी हर नज़्म में ईजाद करूँगा तुझ को।
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
दिल में जो उतर आए वो दिलबर नहीं गिरता
सजदे में जो झुक जाए वो पैकर नहीं गिरता।
मंज़िल की तमन्ना हो अगर दिल में मुसलसल,
ठोकर से कभी राह का रहबर नहीं गिरता।
पहचान है ये ज़र्फ़ की और ऊँचे शजर की,
फल आए तो वो झुकता है, मर कर नहीं गिरता
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
एक क़तरा हूँ, समंदर में मिला दो मुझ को।
मेरी हस्ती का कोई और पता दो मुझ को।
अब तो ख़ुद से भी मुलाक़ात नहीं होती है,
मैं कहाँ खो गया हूँ, आके बता दो मुझ को।
आईना बन के रहा उम्र भर औरों के लिए,
अब किसी आँख का मंज़र ही बना दो मुझ को।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
ज़ख़्म दुनिया को दिखाने से कहाँ भूलेगा।
दिल तुझे ख़ुद से मिटाने से कहाँ भूलेगा।
ख़त जलाओ तो भला ख़ुशबू कहाँ जलती है,
वो असर फिर भी जलाने से कहाँ भूलेगा।
ज़ख़्म पर वक़्त की चादर भी अगर डालोगे,
दर्द फिर भी तो छुपाने से कहाँ भूलेगा।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
किसी ने अपनी कमी की तरफ़ नहीं देखा।
किसी ने दिल की नमी की तरफ़ नहीं देखा।
अजीब दौर है ख़ुद्दारियों की बस्ती का,
कि जिसने देखा, ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा।
हर एक शख़्स था आईना हाथ में लेकर,
किसी ने अपनी बदी की तरफ़ नहीं देखा।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
ज़ुल्मत ने हर चराग़ को बेज़ार कर दिया।
एक लौ ने पूरी रात को लाचार कर दिया।
हमको डरा सकी न कभी गर्दिश-ए-जहाँ,
हर एक चोट ने हमें ख़ुद्दार कर दिया।
तिनके थे हाथ में तो हवाएँ थीं ख़ुश बहुत,
मुट्ठी बनी तो वक़्त ने तलवार कर दिया।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
लिक्खा हुआ हूँ वक़्त के किरदार की तरह।
ठहरा हुआ हूँ रूह में दीवार की तरह।
महफ़िल में मेरे लफ़्ज़ सजाए गए बहुत,
बिकता हूँ मैं यहाँ किसी शहकार की तरह।
बीता हुआ वो दौर हमें याद है बहुत,
दिल में सजे हैं ज़ख़्म भी दस्तार की तरह।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri
बात बढ़ती तो ज़माने को बताते जाते।
ख़ामुशी ओढ़ के हम राज़ छुपाते जाते।
तुमने आवाज़ न दी, वरना हम ऐ दोस्त मेरे,
एक आवाज़ पे दुनिया को भुलाते जाते।
वक़्त ने छीन ली हँसने की अदा भी हमसे,
वरना हर मोड़ पे हम फूल खिलाते जाते।
~ Azhar Sabri ~
#Ghazal#Shayari#AzharSabri