बात तो सही है। सौभाग्य से दो महीने पहले हमारे बड़े भाई की गुरुदीक्षा हुई है। हमारा विचार है कि जब तक अन्तःकरण में ठाकुरजी की स्पष्ट प्रेरणा न हो, तब तक किसी व्यक्ति के चकाचौंध या भीड़-मानसिकता से प्रभावित होकर गुरु स्वीकार नहीं करेंगे, फिर चाहे जीवन भर बिना गुरु के ही रहना पड़े।