कुछ बातें कहने से डर लगने लगा है।
सच बोलो तो “बहुत सीधा” बोल दिया।
चुप रहो तो “कमज़ोर” कह देते हैं।
राय दो तो “ज़्यादा हो रही है।”
मैंने तय कर लिया है—
वही बोलूँगी जो सही लगेगा।
कल थिएटर में रामायण आई है।
आज लोगों के पास दो रास्ते हैं —
या तो आस्था का ठेका लेकर चुप रहो,
या फिर पूछो कि ये महाकाव्य है या तीन घंटे की reels।
अंजली अरोड़ा सीता बनीं है।
कच्चा बादाम वाली। लॉक-अप वाली।
अब वही चेहरा अयोध्या के दरबार में “गरिमा और त्याग” बेच रहा है।
सवाल कास्टिंग का नहीं है कि लड़की नाचे या न नाचे।
सवाल ये है —
जब किरदार माता सीता हो,
तो निर्माता पहले भक्ति देखते हैं या वायरल फॉलोअर्स?
VFX ऐसा कि आदिपुरुष वाले अब मंदिर में दीया जला रहे होंगे ....“कम से कम हम अकेले नहीं थे।”
पोस्टर में वानर के चेहरे पर चश्मा।
त्रेता युग में स्पेक्टेकल नहीं, स्पेक्टेकल्स आ गए।
एक तरफ मुख्यमंत्री पोस्टर अनावरण कर रहे हैं।
दूसरी तरफ टिकट पर लिखा है — आस्था, वनवास, मर्यादा।
बीच में वही पुराना फॉर्मूला:
भगवान का नाम चिपकाओ, बहस दब जाएगी, बॉक्स ऑफिस भगवान भरोसे।
कभी-कभी इस देश में बकवास चीजें भी नोट छाप लेतीं हैं । लोग सिर्फ ये देखने जाते हैं कि इतनी खराब कैसे बन गई।
उत्सुकता भी टिकट कटवा देती है।
लेकिन अभी तक वैसा चमत्कार नहीं हुआ।
पहले दिन की कमाई 8 से 15 लाख के बीच बताई जा रही है।
ये फिल्म देखने गए थे या ये देखने कि इस बार सीता किस इंफ्लुएंसर के चेहरे पर चढ़ाई गई है?
रामायण हजारों साल से चल रही है। इसे हर साल नई फेस, सस्ता VFX और प्रेस रिलीज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती।
जरूरत पड़ती है इज्ज़त की।
और इज्ज़त रील्स से नहीं आती, जिम्मेदारी से आती है।
अब बताओ —
ये कथा है,
कथा के नाम पर कंटेंट है, या फिर लोगों की जिज्ञासा पर दांव?
@Mr_Abhimanyu@CJP_for_India सॉल्यूशन बहुत simple है—सिर्फ़ विरोध प्रदर्शनों से भीड़ जुटाने के बजाय इंस्टीट्यूशंस को मजबूत करने पर काम करो। जब तक बिना विज़न के आंदोलन होंगे, तब तक सिर्फ़ नाम बदलेंगे, काम नहीं
महिला सुरक्षा पर भाषण बहुत हैं।
बस सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा थोड़ी कम है।
कामाख्या रेलवे स्टेशन का ये वीडियो देखिए।
अगर किसी महिला को ऐसी जगह पर भी असहज और असुरक्षित महसूस करना पड़े, तो सवाल सिर्फ उन लोगों से नहीं है जो ऐसा कर रहे हैं।
सवाल उस व्यवस्था से भी है
जो घटना होने के बाद जागती है।
वीडियो वायरल होना कार्रवाई का रास्ता बने,
महिला के लिए डर का सबूत नहीं।
सार्वजनिक जगहें सबकी हैं।
महिलाओं को जगह कम नहीं,
सुरक्षा ज्यादा चाहिए।
वीडियो का लिंक👇🏻
https://t.co/oPXvzI14Gw
@sauravyadav1133 बस में बैठे पुलिस वालों को ज्ञान देने से अगर चुनाव आयोग सुधर जाता, तो फिर प्रोटेस्ट करने की नहीं, सिर्फ एक बस किराए पर लेने की ज़रूरत थी।
@micchamasala कैमरे में शक्ल तो आ ही गई है, अब बस पुलिस इसको ढूँढकर स्टेशन से सीधा जेल पहुँचाए। ऐसे लोगों की अकड़ सिर्फ तब तक रहती है जब तक कोई रिकॉर्डिंग न चालू कर दे। @GuwahatiPol@assampolice
CEC का इस्तीफा चाहिए।
ठीक है।
लेकिन एक सवाल और है—
कुर्सी खाली होने के बाद उस पर बैठेगा कौन?
क्योंकि हमारे यहाँ कुर्सी बदलने की लड़ाई बहुत होती है,
कुर्सी का सिस्टम बदलने की कम।
आज एक को हटाने के लिए सड़क पर उतरेंगे,
कल दूसरे के खिलाफ फिर वही पोस्टर छापेंगे।
जनता हर बार भीड़ बनेगी,
नारा लगाएगी, पसीना बहाएगी।
और अंत में?
कुर्सी पर कोई नया आदमी बैठेगा
और जनता फिर बोलेगी—
“अरे, ये तो वही कहानी है।” 😂
आंदोलन जरूरी हो सकता है।
लेकिन आंदोलन भी अगर सिर्फ चेहरा बदलने तक रह गया,
तो कल जनता आपको भी उसी पैंतरे की तरह देखेगी।
Gen-Z है भाई…
एक ही ट्रेंड को कितने दिन देखेगी? 😏
आज शुक्रवार की रात है।
बाहर नई फिल्म लगी है — द वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट।
अंदर वही पुरानी कहानी।
शहर का नास्तिक बेटा गाँव लौटता है।
जंगल में देवी मिलती हैं।
विकास बनाम आस्था का भाषण।
फिर अंधेरे में रोशनी गिरती है और नायक बोलता है—
“अब विश्वास हो गया।”
इसे फिल्म कहते हैं या टीवी सीरियल का त्योहारी एपिसोड, टिकट बस महँगा है? 😂
एक तरफ क्रिटिक कह रहे हैं—यातना।
दूसरी तरफ पोस्टर पर आस्था, छठ, वनदेवी और मिथक।
बीच में सिद्धार्थ मल्होत्रा ऐसे खड़े हैं जैसे सवाल हो—
“हीरो हो या पुरोहित?”
और उन्होंने कहा हो—दोनों कर लेते हैं।
असल सवाल ये है—
हम फिल्म देखने गए थे या इस बार आस्था किस स्टार के चेहरे पर चिपकाई गई है, ये देखने?
@ravish_journo जब सीधे-सीधे जवाब देने की हिम्मत न हो, तब 'सूत्र' ही सबसे बड़ा सहारा बनते हैं। आयोग में एकता दिखाने से बेहतर होता कि देश को एक सीधा और साफ जवाब दे दिया जाता
Hangzhou 2023 में 28 गोल्ड ,
Aichi-Nagoya, Japan में अभी मात्र 2।
मेडल टेबल में लगभग बारहवाँ स्थान।
चीन नब्बे पार कर चुका है।
अब दोनों तरफ से वही पुराना शोर है।
एक तरफ कहा जा रहा है—
पूरी गलती सरकार की है। स्टेडियम, स्कीम, बजट, चयन… सब कागज़ पर चमकता है, मैदान पर नहीं।
दूसरी तरफ कहा जा रहा है—
एथलीट कमज़ोर हैं। दबाव में घुटने टेक देते हैं।
डिफेंडिंग चैंपियन पहले राउंड में बाहर। जो गोल्ड चाहिए था, वो रजत-कांस्य बन गया।
दोनों बातें बोलने में आसान हैं।
मुश्किल सवाल बीच में है—
अगर सिस्टम इतना मज़बूत होता, तो बार-बार वही “अभी और मेहनत करो” वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों होती?
और अगर एथलीट इतने तैयार होते, तो हर बार हार के बाद सिर्फ सिस्टम का रोना क्यों रहता?
चीन medals बनाता है।
हम motivational रील बनाते हैं।
वहाँ दस साल का प्लान होता है।
यहाँ दस दिन का हैशटैग होता है।
खेल बायो में लिखा है, बजट भाषण में लिखा है, पोस्टर पर लिखा है।
टैली पर वही पुरानी हिचकिचाहट लिखी है।
अब असली सवाल यही है—
गोल्ड के लिए फैक्ट्री चाहिए…
या फिर वही पुराना नुस्खा काफी है?
थाली बजानी है या दिये जलाने है, डिसाइड कर के बताओ
क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना, चयन साफ रखना, कोचिंग ठीक करना और खिलाड़ी को जवाबदेह बनाना—सब मुश्किल काम है।
थाली-दिये में तुरंत सुकून मिलता है।
और इस देश को पदक से ज़्यादा तुरंत सुकून पसंद है।
कबड्डी का फाइनल बाकी है। शूटिंग से एक स्वर्ण आ भी गया।
लेकिन जब तक हर हार के बाद सिर्फ दो रास्ते दिखें—
मंत्री को गाली या खिलाड़ी को “मेंटल टफनेस” का लेक्चर—
तब तक टैली ऐसी ही रहेगी।
वोटर लिस्ट की तरह खेल भी सिर्फ नामों की सूची नहीं है।
उसमें नतीजा है, तभी दावा पूरा होता है।
@RTIExpress बेटी को खोना बहुत बड़ा सदमा है सर, और आपके प्रति हमारे मन में सहानुभूति भी है लेकिन हादसों को अपने किए भले से जोड़कर देखना बंद कीजिए। कर्म कोई बार्टर सिस्टम नहीं है कि आप किसी को छोड़ेंगे तो भगवान आपका कोई दुख कैंसिल कर देगा।
चुनाव आयोग के अंदर मतभेद की खबरें सामने आईं…
और अब CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करते हुए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। नहीं माने तो देशभर में प्रदर्शन और “Jantar Mantar 2.0” का ऐलान।
कहानी सिर्फ इस्तीफे की नहीं है।
Indian Express के मुताबिक, दो चुनाव आयुक्तों ने SIR और वोटर लिस्ट से जुड़े फैसलों पर कई बार लिखित आपत्ति दर्ज की थी।
अब सवाल सीधा है—
जिस संस्था के हाथ में आपका वोट है,
उसके अंदर अगर सवाल उठ रहे हैं,
तो जवाब भी खुलकर आने चाहिए या नहीं?
क्योंकि वोटर लिस्ट कोई एक्सेल शीट नहीं…
उसमें नाम है, तभी लोकतंत्र में आपका काम है।