"ईमान" सबसे बड़ी "नेमत" हैं, दुसरों की दलाली के लिए "अपनों" से गद्दारी न करें, दलाल अपने मफ़ाद (फ़ायदे) के लिए अपने ही ईमान, ज़मीर, दीन और मज़हब और रिश्तों का सौदा कर लेता हैं! #इस्लाम की सफ़ों में छुपे "गद्दारों" को "बेनकाब" करना भी "ईमान" का ऐन "तकाज़ा" हैं ।
COMPLAINT AGAINST THE HATE MONGER RAMAGIRI MAHARAJ WHO GAVE DELIBERATE & MALICIOUS STATEMENT AGAINST OUR PROPHET MUHAMMAD ﷺ BY OUTRAGING & INSULTING RELIGIOUS BELIEFS & PROMOTING ENMITY BET'N TWO DIFFERENT RELIGIONS, REQUEST FOR ACTION @Goa_Cops@spsouthgoa@DGP_Goa@spnorthgoa
COMPLAINT AGAINST THE HATE MONGER RAMAGIRI MAHARAJ WHO GAVE A DELIBERATE & MALICIOUS STATEMENT AGAINST OUR PROPHET MUHAMMAD ﷺ BY OUTRAGING & INSULTING RELIGIOUS BELIEFS & PROMOTING ENMITY BET'N TWO DIFFERENT RELIGIONS, REQUEST FOR ACTION @TelanganaCMO@TelanganaDGP@INCTelangana
राफ़्ज़ीयत चंद ख़ानकाहों, जलसों के रास्तें आसानी से हमारे अंदर दाख़िल हो रही हैं, हमारे उलमा को चाहिए के जलसों में ख़तीब, शायरों व पीरों का इन्तेख़ाब पुरी मालूमात के बाद ही करें, याद रहे अक़ाईद-ए-अहलेसुन्नत ही सब कुछ हैं, और उनकी हिफाज़त हमारे लिए हमारी जानों से बढ़कर होनी चाहिए।
सुल्तान टिपू की यौमे शहादत [४ मई] पर विशेष:
#TipuSultan#DeathAnniversary
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• प्रारंभिक जानकारी:
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🔵 नाम: सुल्तान फतेह अली खान उर्फ टिपू
🔶 पिता: हैदर अली खान
🔶 जन्म: 20 नवंबर, 1750 ई.
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अगर ये जुलूस वाले मुसलमान होते और इमारत मन्दिर की होती तो अब तक इनके और इनके रिश्तेदारों के घरों पर बुलडोज़र चल गया होता और मीडिया उन्हें गला फाड़ फाड़ कर दंगाई और आतंकवादी करार देता, लेकिन ये हिन्दू हैं इस लिए पुलिस, प्रशासन और मीडिया को ऐसे मौक़े पर मोतियाबिन्द हो जाता है I
"ईमान" जब इंसान के अंदर अपनी जड़ें मज़बूत कर लेता हैं, तो "गुनाह" मुश्किल, और "नेकियाँ" आसान हो जाती हैं ।
तो "ईमान" की राहें हमवार किजिए, और "गुनाहों" की राहों से इज्तिनाब (परहेज़) किजिए, ताकी आप पर रहम हों ।
गुमराही और बे-अदबी से पाक़ "उर्दु" का सबसे बेहतरीन तर्जमा-ए-कुरआन यानी “कंज़ुल-ईमान”, कुरआन शरीफ़ या इसका तर्जमा ख़रीदतें वक़्त हमेशा “कंज़ुल-ईमान” का 'नाम' याद रखें, और अपने शहर के बुक स्टॉल से यहीं तरजमाँ मांगे ।
शरई मसाईल में हम हमारे अक़ाबिरीन ही की जानिब रुजु करें, कोई आज़ाद ख़याल आलिम या मुफ्ती अपनी कोई नई बात या तहक़िक़ पेश करता हैं, तो वह उसपर ख़ूद अमल करें या अपने मुरीदीन को करवाए, हम अहलेसुन्नत हैं, और हमारे अक़ाबिर उलमा क़े फ़रामीन और फ़तावा हमारे लिए क़ाफ़ी व-शाफ़ी हैं ।
अजमेर के शिया-राफ़्ज़ी मुजावर:
जब दरगाह का भिकारी भीक मांगते मांगते वहाँ का खादिम बन जाता है, तो इस ग़लत-फहमीं में रहता है की अब वही दरगाह का मालिक है! लेकिन वोह यह भूल जाता हैं की वह तब भी भिकारी था और अब भी, पर अजमेर वोह जगह हैं जहाँ अच्छें-अच्छों को औकात याद दिलाई जाती हैं ।