(गणित-वक्ता), धार्मिक/सामाजिक/राजनीतिक/गणितीय व हिन्दी कविता के पोस्ट्स।
री-पोस्ट/लाइक का अर्थ सहमति/स्वीकृति नहीं। (रा. स्व. से. संघ)
🚩💐 हर हर महादेव 💐🚩🙏
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🌸ॐ🌸 नमः पार्वती पतये हर हर महादेव.!🙏🙏
🌸🌸🌸 🚩#रुद्राष्टकम् 🚩
प्रतिदिन श्रद्धा से मन लगाकर यह कर्णप्रिय रुद्राष्टक सुनिए।
माँ पार्वती सहित भगवान शिव की कृपा प्राप्त होगी.. मन प्रफुल्लित रहेगा। 😊🙏
• स्वर: अनिल पाठक, • संगीत: सन्नी शर्मा, • संकलन: राकेश दूबे
शिव भक्त महिमा
नोपनीतसहस्त्रेभ्यो ब्रह्मचारी विशिष्यते ॥
ब्रह्मचारि सहस्त्रेभ्यो गृहस्थो हि विशिष्यते ।
गृहसंस्थ सहस्त्रेभ्यो ह्यग्निहोत्री विशिष्यते ॥
अग्निहोत्र सहस्त्रेभ्यः सत्रयाजी विशिष्यते ।
सत्रयाजिसहस्त्रेभ्यः सर्वविद्यार्थपारगः ॥
सर्वविद्यार्थवित्कोट्या शिवभक्तो विशिष्यते ।
तस्मादेवं शिवं भक्त्या पूजयेच्छान्तमानसः ॥
हजारों उपवीत वालों की अपेक्षा ब्रह्मचारी विशेष होता है और हजारों ब्रह्मचारियों की अपेक्षा गृहस्थ विशेष होता है। गृह में निवास करने वाले हजारों जनों की अपेक्षा अग्निहोत्री विशेष होता है और हजारों अग्निहोत्रियों की अपेक्षा सत्रयाजी विशेष होता है। हजारों सत्रयाजियों की अपेक्षा सर्वविद्याओं के अर्थों के जानकार विशेष होते हैं। ऐसे करोड़ों सर्वविद्यार्थविदों की अपेक्षा शिवभक्त विशेष होता है। अतएव भगवान् शिव की भक्तिपूर्वक शान्तमानस होकर पूजा करनी चाहिए।
सुप्रभात 🌼
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अंक १: तैत्तिरीय उपनिषद - परिचय
जहाँ बुद्धि थमती है, वहाँ से उपनिषदों की अनंत यात्रा शुरू होती है। कृष्ण यजुर्वेद का तैत्तिरीय उपनिषद वैदिक वांग्मय का वह सूक्ष्म शिखर है, जहाँ से ब्रह्म की खोज का मार्ग खुलता है। आइए, इस दिव्य यात्रा से जुड़ें।
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गुरु की आज्ञा पाकर भृगु ऋषि एकांत में गहरे विचार और तप में लीन हो गए। कल के अंक ३ में हम देखेंगे कि भृगु ने अपने पहले तप से किस सत्य को खोजा और 'अन्नमय कोश' का रहस्य क्या है।
इस दिव्य और व्यावहारिक ज्ञान यात्रा से निरंतर जुड़े रहें।
✍️ - मधु शर्मा
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परम सत्य को परिभाषित करने के बाद गुरु वरुण ने भृगु की जिज्ञासा शांति हेतु ब्रह्म को स्वयं अनुभव करने का आदेश दिया। गुरु का प्रथम आदेश था—'तप'। उन्होंने कहा कि बिना स्वयं के अनुभव और आंतरिक तपन के इस महाज्ञान को आत्मसात नहीं किया जा सकता।
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वरुण देव ने ब्रह्म की पहचान हेतु भृगु को एक परम सूत्र दिया:
"यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति। तद्विजज्ञासस्व। तद् ब्रह्मेति।" (३.१)
जिससे सब उत्पन्न होते हैं और जिसमें लीन होते हैं, उसे जानो।
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वरुण देव ने विनम्रता, श्रद्धा और आत्मीय तृष्णा से भरे पुत्र को देखा और सीधा उत्तर न देकर उसे संकेत दिए। उन्होंने कहा कि अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन, वाक् ये सब उस परम तत्व को जानने के द्वार या साधन मात्र हैं, स्वयं ब्रह्म नहीं हैं।
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गुरु की शरण में जाकर भृगु ने अत्यंत विनम्रता और श्रद्धा भाव से याचना की:
भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति ।
(३.१.१)
हे भगवन! मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए। यह याचना सत्य को जानने के लिए आत्मा की गहरी पुकार थी।
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अंक २: भृगु की जिज्ञासा और गुरु का आदेश
ज्ञान यात्रा एक तीव्र जिज्ञासा से प्रारंभ होती है। तैत्तिरीय उपनिषद की 'भृगुवल्ली' में परम सत्य को जानने की इच्छा लिए ऋषि भृगु अपने पिता और गुरु वरुण देव की शरण में पहुँचते हैं। आइए, इस पावन संवाद को समझें।
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अंक ३: तैत्तिरीय उपनिषद- अन्नमय कोश
गुरु वरुण से ब्रह्म का लक्षण जानकर भृगु ऋषि ने गहन तप किया। उनका ध्यान अपने अस्तित्व के सबसे बाहरी आवरण पर गया। उन्होंने जाना कि हमारा यह स्थूल शरीर ही चेतना का प्रथम सोपान है, जिसे 'अन्नमय कोश' कहा जाता है।
#VedaRicha#तैत्तिरीय_उपनिषद
राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः।
राम एव परं तत्त्वं श्रीरामो ब्रह्मतारकम् ॥
श्रीराम ही परब्रह्म, श्रीराम ही सर्वोपरि तप, श्रीराम ही परम तत्त्व एवं श्रीराम ही तारक-ब्रह्म हैं।
सुप्रभात 🌼
नमः श्रीरामभक्ताय अक्षविध्वंसनाय च ।
नमो रक्षः पुरीदाहकारिणे वज्रधारिणे ॥
नमो ब्राह्मणदेवाय वायुपुत्राय ते नमः ।
नमोऽस्तु रामभक्ताय गोब्राह्मणहिताय च ॥
नमोऽस्तु रुद्ररूपाय कृष्णवक्त्राय ते नमः।
अञ्जनीसूनवे नित्यं सर्वव्याधिहराय च ॥
नागयज्ञोपवीताय प्रबलाय नमोऽस्तु ते।
स्वयं समुद्रतीर्णाय सेतुबन्धनकारिणे ॥
आप श्रीरामके भक्त और अक्षकुमारके प्राणोंको हरनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। राक्षसराज रावणकी लंकापुरीको जलानेवाले तथा वज्रधारी आपको प्रणाम है। ब्राह्मणोंके लिये देवरूप आपको नमस्कार है। वायुनन्दनको प्रणाम है। श्रीरामजीके भक्त तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितकारी आपको नमस्कार है। आपने रुद्ररूपसे अवतार लिया है, आपका मुख कृष्णवर्णका है, आप सम्पूर्ण व्याधियोंका नित्य विनाश करते रहते हैं, अञ्जनानन्दन ! आपको अभिवादन है। जिन्होंने नागको यज्ञोपवीतके रूपमें धारण कर रखा है, जो स्वयं ही समुद्रको लाँघ जानेवाले और सेतुबन्धके कार्यके सहयोगी हैं, उन महाबली हनुमानजीको नमस्कार है।
सुप्रभात 🌼
प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खद्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥
जो सांसारिक भयको हरनेवाले और देवताओंके स्वामी हैं, जो गङ्गाजीको धारण करते हैं, जिनका वृषभ वाहन है, जो अम्बिकाके ईश हैं तथा जिनके हाथमें खङ्गाङ्ग, त्रिशूल और वरद तथा अभयमुद्रा है, उन संसार-रोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषधरूप 'ईश' (महादेवजी) का मैं प्रातः समयमें स्मरण करता हूँ।
सुप्रभात 🌼