मैं जीवन को भ्रम नहीं, वास्तविकता की दृष्टि से देखता हूँ। इसलिए मैंने यह अपेक्षा रखना छोड़ दिया है कि कठिन समय में कोई साथ निभाएगा। क्योंकि अनुभव ने सिखाया है कि संसार अक्सर शब्दों से नहीं, परिस्थितियों के अनुसार संबंध निभाता है। इसीलिए अब मैंने स्वयं का सहारा बनना सीख लिया है।
मदद उतनी ही करो, जितना सामने वाला उसका मूल्य समझ सके। क्योंकि आवश्यकता से अधिक किया गया उपकार धीरे-धीरे लोगों की आदत बन जाता है, फिर कृतज्ञता समाप्त हो जाती है और अधिकार का भाव जन्म ले लेता है। जब वही सहायता किसी दिन नहीं मिलती, तो लोग सम्मान नहीं, शिकायत और दूरी देने लगते हैं।
जीवन की सबसे विषम अनुभूति शायद वही होती है, जब अथक प्रयासों, अनगिनत त्यागों और निरंतर संघर्ष के बाद भी व्यक्ति स्वयं को हर दिशा में पराजित और ठगा हुआ महसूस करे। तब पीड़ा असफलता की नहीं, बल्कि टूटते विश्वास की होती है,जो भीतर के साहस को भी मौन कर देती है।!
संसार में सबसे अधिक सम्मान का पात्र वह व्यक्ति है, जो बार-बार टूटने, ठुकराए जाने, छले जाने और बिखरने के बाद भी अपने भीतर की कोमलता को जीवित रखता है। जिसने पीड़ा को विष नहीं बनने दिया और हर घाव के बाद भी लोगों से मुस्कुराकर मिलना नहीं छोड़ा वही वास्तविक रूप से दृढ़ है।!!
अनुभवों की पाठशाला में युवा होकर,
हम पिता का दर्द समझे हैं पिता होकर।!!
भगवान हर पिता को इतनी उम्र दे कि वो उन खुशियो को देख सके जो उन्होंने अपनी औलाद के लिए मांगी हो.!!
#HappyFathersDay
हर कठिन मोड़ पर सहारा मिलना आवश्यक नहीं होता, क्योंकि दुनिया का साथ अक्सर परिस्थितियों तक सीमित रहता है। पर मनुष्य में इतना आत्मबल अवश्य होना चाहिए कि वह अपने टूटते धैर्य, बिखरती उम्मीदों और भीतर के संघर्षों को स्वयं संभाल सके यही वास्तविक शक्ति और परिपक्वता है।