“आवा लक्ष्मण बाबू, किताब के लिए बहुत बधाई। बहुत सुने हैं तोहरे बारे में। लड़ाई जारी रखिहा।”
मेरी किताब ‘जाति जनगणना’ उस जननेता के हाथों में, जिनके स्वप्न, संघर्ष और राजनीतिक हस्तक्षेपों ने इस देश में सामाजिक न्याय की ऐसी अनगिनत रचनात्मक संभावनाओं को जन्म दिया। कल पटना में मेरी किताब पर एक पुस्तक परिचर्चा आयोजित है; उस बिहार की राजधानी में, जिसकी मिट्टी ने सामाजिक न्याय, समाजवादी चेतना और बहुजन राजनीति के अनेक निर्णायक अध्याय लिखे हैं।
उसी आयोजन के सिलसिले में एक शाम पहले पटना पहुँचा, तो मन में सबसे पहले यही इच्छा उठी कि अगर इस किताब को आदरणीय लालू प्रसाद जी तक पहुँचा पाऊँ, तो यह सिर्फ़ एक औपचारिक भेंट नहीं होगी, बल्कि उस वैचारिक-राजनीतिक परंपरा को सलाम होगा, जिसकी लंबी लड़ाइयों ने हम जैसे लोगों के लिखने-बोलने और हस्तक्षेप करने की ज़मीन तैयार की है।
पटना पहुँचते ही संपर्क किया, संदेश भिजवाया। थोड़ी ही देर में उधर से बुलावा आ गया। समय काफ़ी हो चुका था, लेकिन यह जानकर मन और भी भीग गया कि आदरणीय लालू जी इंतज़ार कर रहे थे। सामने पहुँचा तो उन्होंने अपने परिचित अपनापे और सहज आत्मीयता के साथ कहा— “आवा लक्ष्मण बाबू, किताब के लिए बहुत बधाई। बहुत सुने हैं तोहरे बारे में। लड़ाई जारी रखिहा।” यह सिर्फ़ एक वाक्य नहीं था; यह जैसे संघर्ष की एक पूरी परंपरा का हस्तांतरण था, एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी के कंधे पर रखा हुआ भरोसेमंद हाथ।
उसके बाद जिस उत्सुकता, स्नेह और तल्लीनता से उन्होंने किताब को हाथ में लिया, उसे पलटा, देखा और अपने पास रखा वह क्षण मेरे लिए सिर्फ़ निजी खुशी का नहीं, बल्कि गहरे ऐतिहासिक अर्थ का क्षण था। लगा जैसे किताब के उन पन्नों में दर्ज शब्दों के भीतर वे अपने समय के संघर्ष, जनता की आकांक्षाएँ और सामाजिक न्याय की अब तक अधूरी परियोजना को फिर से प्राणवत्ता दे रहे हों।
हम जानते हैं कि कोई भी बौद्धिक व्यक्ति विचारों को व्यवस्थित करता है, उन्हें अपने समय के संघर्षों के अनुकूल नए रूप में ढालता है, दर्शन को स्पष्टता देता है, और कलम-किताब के माध्यम से उन्हें दस्तावेज़ी रूप में इतिहास के हवाले करता है। लेकिन एक जननेता वही विचार तब सचमुच इतिहास में बदलता है, जब वह उसे विश्वविद्यालयों, सेमिनारों और पुस्तकों की दुनिया से निकालकर आम जन के जीवन, दुख, ग़ुस्से, सपनों और राजनीतिक आकांक्षाओं से जोड़ देता है।
जब वह सड़क, संसद और सत्ता तीनों स्तरों पर लड़ते हुए राजनीति की धारा को मोड़ देता है, तब विचार सिर्फ़ विचार नहीं रह जाता, वह समाज बदलने की ठोस ताक़त बन जाता है। मेरे लिए आज का यह अनुभव ठीक वैसा ही था जैसे कलम अपने स्रोत से मिल रही हो, जैसे किताब अपने सामाजिक अर्थ की सार्थकता से और भर उठी हो।
‘जाति जनगणना’ पर लिखी गई यह किताब सिर्फ़ आँकड़ों, बहसों और नीतिगत विमर्शों का संकलन नहीं है; यह उस ऐतिहासिक सवाल का दस्तावेज़ है कि भारत जैसे समाज में जाति-आधारित गैर-बराबरी, प्रतिनिधित्व की असमानता, संसाधनों के बँटवारे में पक्षपात और सामाजिक अपमान के विरुद्ध न्याय का रास्ता कैसे निर्मित होगा।
जननायक कर्पूरी ठाकुर, बाबू जगदेव प्रसाद, बी.पी. मंडल की धरती पर लालू प्रसाद, शरद यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान का राजनीतिक दौर बहुत हद तक उसी ऐतिहासिक दिशा में आगे बढ़ा, जिसे इस किताब में दर्ज करने की कोशिश की गई है। यह दौर अपने अंतर्विरोधों, सीमाओं और उपलब्धियों के साथ सामाजिक न्याय की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है।
उस पीढ़ी के एक बड़े नायक के हाथों में इस किताब को देखना, सच कहूँ, मेरे लिए किसी जीवित इतिहास से साक्षात्कार जैसा था। लगा कि किताब केवल पढ़े जाने की वस्तु नहीं रही, बल्कि वह अपने समय, अपने स्रोत और अपने संघर्षशील वंशक्रम से फिर जुड़ गई है। यह क्षण इसलिए भी भावुक कर देने वाला था, क्योंकि इसमें निजी संतोष से कहीं अधिक सामूहिक स्मृति और राजनीतिक उत्तराधिकार की चमक थी।
सामाजिक न्याय का संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। न्याय, समता और समाजवाद की राह अभी अधूरी है। जाति जनगणना से लेकर प्रतिनिधित्व, शिक्षा, रोज़गार, भूमि, सत्ता-साझेदारी और गरिमा तक यह लड़ाई लंबी है, कठिन है, लेकिन ज़रूरी है। और जब तक यह समाज अपने सबसे वंचित, सबसे बहिष्कृत, सबसे दबे हुए लोगों के लिए बराबरी का घर नहीं बन जाता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा। हम उसी संकल्प, उसी वैचारिक प्रतिबद्धता और उसी जनपक्षधर ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने का वचन दोहराते हैं।
इन तस्वीरों को साझा करते हुए मन गहरे आभार से भरा है। आदरणीय @laluprasadrjd जी का यह स्नेह, यह आत्मीयता, यह प्रोत्साहन और यह भरोसा मेरे लिए निजी रूप से बहुत मूल्यवान है; लेकिन उससे भी अधिक, यह उस विचारधारा और संघर्षधारा का सम्मान है, जिससे हम सब अपनी ताक़त लेते हैं। उनके प्रति हृदय से आभार।
संघर्ष ज़िंदा है।
स्वप्न ज़िंदा है।
सामाजिक न्याय की लड़ाई जारी है और जारी रहेगी।
NEET छात्रा के दुष्कर्म और हत्या का उद्भेदन करने की बजाय बिहार सरकार ने केस को CBI को सौंपने का निर्णय लेकर फिर साबित कर दिया कि बिहार का प्रशासनिक ढाँचा भ्रष्ट, अयोग्य, अदक्ष और अनप्रोफेशनल है जो एक बलात्कार और हत्या के केस को भी नहीं सुलझा सकता। पुलिस से अधिक यह बड़बोली एनडीए सरकार के करप्ट और कंप्रोमाइज़्ड तंत्र की विफलता है जिनके कर्ता-धर्ता मंत्री-मुख्यमंत्री दिन रात आकाश-पाताल से अपराधियों को पकड़ने की डींगे हांकते है।
नवरुणा कांड जैसे अनेक मामलों में सीबीआई 12-13 वर्षों से आरोपियों को नहीं पकड़ पाई तथा जाँच भी बंद कर दी। यही इस मामले में होना है। कहाँ है चुनावों में जंगलराज-जंगलराज चिल्लाने वाले? बिहार की ध्वस्त और भ्रष्ट विधि व्यवस्था की जवाबदेही कौन लेगा? क्या फिर सरकार द्वारा हेडलाइन मैनेजमेंट के ज़रिए ध्यान भटकाने की कोशिशें होगी? #bihar #crime #Corruption
केंद्रीय मंत्री श्री ललन सिंह खुल्लम खुला कह रहे है कि गरीबों, दलितों और अतिपिछड़ों को मतदान के लिए घर से बाहर नहीं निकलने देना है। मतदाताओं को धमकी देते हुए केंद्रीय मंत्री चुनाव आयोग के नियमों और आचार संहिता की धज्जियां उड़ा रहे है।
प्रशासन के सहयोग से दलितों और अतिपिछड़ों को मताधिकार से वंचित करने की गहरी साजिश चल रही है। ये लोकतंत्र और संविधान को ऐसे ही ख़त्म करना चाहते हैं।
क्या शुभ लग्न देखकर चुनाव आयोग ललन सिंह पर कारवाई करेगा या अमित शाह के निर्देश का इंतजार करेगा? दो बाहरी लोग जेडीयू के साढ़े तीन व्यक्तियों के सहयोग से बिहार को कब्जाने के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार बैठे है लेकिन वो नहीं जानते कि बिहार लोकतंत्र की जननी है। #Bihar #TejashwiYadav
बिहार के मोकामा में डिप्टी CM सम्राट चौधरी और मोदी सरकार के मंत्री ललन सिंह रोड शो कर रहे थे.
इसी बीच जनता ने उनसे अस्पताल और जरूरी मुद्दों पर कड़े सवाल किए.
सवाल सुनकर मोदी-नीतीश की पार्टी के ये नेता भागते नजर आए.
20 साल के कुशासन का जनता हिसाब मांग रही है, जल्द वोट से जवाब भी देगी.
75 साल में मोहन भागवत को रिटायर होना था, 75 साल में मोदी को रिटायर होना था।
नरेंद्र मोदी ने लाल किले से आरएसएस की तारीफ़ कर दी।
फिर मोहन भागवत ने कहा कि न "मैं रिटायर होऊँगा, न होने दूँगा।"
75 साल का नियम खत्म हो गया, दोनों की अपनी-अपनी कुर्सी बच गई।
नाम: मंदीप जांगरा
काम: बॉक्सर
काबिलियत: एशियन चैंपियन और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित
उपलब्धि: आज ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
इनके सवालों का उत्तर है किसी के पास?
प्रशांत किशोर से लाख वैचारिक मतभेद हैं मगर इस 3 मिनट की वीडियो में उन्होंने जो जो कहा है उस एक एक शब्द से पूर्ण रूप से सहमत हूँ।
आपको भी यह वीडियो पूरा सुनना चाहिए।
#WATCH पटना, बिहार: बिहार के पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव ने RJD नेता रोहिणी आचार्य के बयान पर कहा, "एक महिला होने के नाते उन्होंने जो सराहनीय काम किया है शायद ही कोई बेटी या मां कर सकती है। यह हमारे और सभी महिलाओं के लिए पूजनीय है। इनकी चर्चा सदैव की जाएगी। हमारी बहनों का जो अपमान करेगा, उन पर कृष्ण का सुदर्शन चक्र चलेगा।"
@souravreporter2 बिहार में सबसे ज्यादा किसी जिला को नकारा जाता है तो वो दो जिला गोपालगंज और सिवान है इस जिला के लिए कोई योजना बनता ही नहीं है पटना सीएम ऑफिस से सारा विकास नालंद नवादा राजगीर गया पुर्णिया बेगुसराय में ही होगा।