गीता का उपदेश है कि हर व्यक्ति को कर्म में विश्वास करना चाहिए क्योंकि ये जगत ही कर्मलोक है। कर्म आपके हाथ में है, परिणाम नहीं,. इसलिए कर्म पर ध्यान लगाएं। कर्म के अनुरूप परिणाम तय है।
यह जीवन एक रणभूमि है यहां निरंतर संघर्षों का सामना करना पड़ता है। इस संघर्ष रूपी महाभारत में स्वयं अपना सारथी , अपना मार्गदर्शक और योद्धा बनना होता है।
श्री कृष्ण जगत के स्वामी हैं , वह कण-कण में निवास करते हैं। छोटे से छोटे जीव के हृदय में ईश्वर का वास होता है। उस जीव को कष्ट का अनुभव होना ईश्वर को कष्ट का अनुभव कराता है। अर्थात किसी जीव को कष्ट देकर अपने ईश्वर को खुश कैसे देख सकते हैं।
कृष्ण अपने भक्तों को कर्म का मार्ग दिखाना चाहते हैं। वह कहते हैं अपने कर्म समाज के प्रति और मानव कल्याण के प्रति केंद्रित करते हुए करो। बाकी फल की चिंता मत करो , उन सभी कर्मों को मुझे समर्पित करो। इस मार्ग को अपनाकर तुम मुझे प्राप्त कर सकते हो। मेरे प्रेम का भागीदार बन सकते हो।
मैं प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान था विस्मृति होती है। मैं ही वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ। निःसन्देह मैं वेदांत का संकलनकर्ता था समस्त वेदों को जानने वाला हूँ।
श्री कृष्ण !!
मनुष्य को अपने कर्मों के संभावित परिणामों से प्राप्त होने वाली विजय या पराजय, लाभ या हानि, प्रसन्नता या दुःख इत्यादि के बारे में सोच कर चिंता से ग्रसित नहीं होना चाहिए।
आत्मा को न शस्त्र से काटा जा सकता है।ना आग उसे जला पाती है।आत्मा पानी से भी भीगती नही है।आत्मा को न हवा सुखा सकती है श्री कृष्ण ने कहा कि आत्मा अजअमर है और शाश्वत है।इंसान की आत्मा अगर माया मोह के बंधन में बंधी होती है तो उसे मोक्ष नहीं मिलता है इसलिए आत्मा का शुद्धिकरण जरूरी है।
सम्मान के साथ जियो : लोग आपके अपमान के बारे में हमेशा बात करेंगे परन्तु उनको अपने पर हावी मत होने दो. एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु से भी बदतर है।
ब्रह्म संहिता ( ३.३९)
"मैं उन श्रीभगवान गोविंद की पूजा करता हूँ जो राम, नृसिंह आदि अवतारों तथा अंशावतारों में नित्य स्तिथ रहते हुए भी कृष्ण नाम से विख्यात आदि पुरुष हैं और जो स्वयं भी अवतरित होते हैं"
प्रकृति के विपरीत कर्म करने से मनुष्य तनाव युक्त होता है। यही तनाव मनुष्य के विनाश का कारण बनता है। केवल धर्म और कर्म मार्ग पर ही तनाव से मुक्ति मिल सकती है।
मुनष्य जिस तरह की सोच रखता है, वैसे ही वह आचरण करता है। अपने अंदर के विश्वास को जगाकर मनुष्य सोच में परिवर्तन ला सकता है। जो उसके लिए काल्याणकारी होगा।
इस श्लोक का अर्थ है: विषयों (वस्तुओं) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य को उनसे आसक्ति हो जाती है। इससे उनमें कामना यानी इच्छा पैदा होती है और कामनाओं में विघ्न आने से क्रोध की उत्पत्ति होती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने विषयासक्ति के दुष्परिणाम के बारे में बताया है।)
इस श्लोक का अर्थ है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।