वो मर्द नहीं जो डर जाए,
हालात के खूनी मंज़र से,
जिस हाल में जीना मुश्किल हो,
उस हाल में जीना मर्दी है,
हमारे जिस्म ज़ख्मों से चूर सही,
तुम अपने शिकस्ता तीर गिनो,
खुद अहले तरकश बोलेंगे,
ये बाज़ी किसने हारी है,
ये बाज़ी हक़ की बाज़ी है,
ये बाज़ी तुम ही हारोगे ✊🏻
ऐसा महसूस होता है कि अकबरुद्दीन ओवैसी साहब बोल रहे हैं। सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी साहब को तो देखा नहीं मगर उनके अल्फाजों से कौम के लिए दर्द महसूस होता है। ए मेरे रब! तेरा शुक्रगुजार हूं कि तूने मुझे मजलिस के साथ काम करने की तौफीक दी है। मेरी दुआ कबूल हुई।🤲❤️