शतरंग, मेरे संपादन में समर प्रकाशन से प्रकाशित सौ कवियों के कविताओं का संग्रह है।
जैसे किसी पैंट के प्रचार में "मेरा वाला व्हाइट" ढूंढते हैं, वैसे ही शतरंग - कविताओं का वो ख़ज़ाना है, जहाँ अलग-अलग बरसते ख़्वाब, बिना आवाज दिये धप्पा मारते हैं । अमेजन पर उपलब्ध है।
चुम्बन
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चुम्बन कैसे लिया जाए?
भावों में भरकर,
या अंक में भरकर।
होंठों पर,
या माथे पर।
या फिर
बस देखते हुए
बना दिए जाएँ होंठ।
या केवल लिखकर भेज दिया जाए—
"चुम्मा..."
जो भी हो,
बस इतना कि
भीतर कहीं एक नमी उतर आए,
और भीग जाएँ दोनों।
~ मुकेश कुमार सिन्हा
दोस्ती में मैंने जाना
अकेले होने पर
खिड़की से झांकती चिड़ियां,
सांझ के अकेलेपन को
दूर करती,
दरवाजे पर सुस्ताती बिल्ली
और रात के सन्नाटे में
निगरानी करते, भौंकते कुत्ते ....
सब बड़े अपने से लगते है।
- जूली सहाय
"उम्मीद शायद सतरंगी या लाल फ्रॉक
के साथ, वैसे रंग के ही फीते से गुंथी
लड़की की मुस्कुराहटों को देखकर मर
मिटना या इंद्रधनुषी खुशियों की थी,
जो स्मृतियों में एकदम से कुलबुलाई।"
(ल प्रे क :"मॉनसून" से:
लाल फ्रॉक वाली लड़की)
~मुकेश कुमार सिन्हा
@Tweetmukesh
https://t.co/HHke7BbgVz
बहरा नही हूं
बस अपने दौर को सलीके से सुन रहा हूं
तुमने इधर-उधर की है
जिस जिंदगी को
वह उधड़े ना कही से
उसके हर धागे को
मैं अपनी कलम से बुन रहा हूं.
- गिरीश कुमार
चाहता था पकडूँ उड़ती तितलियों को...
किसी ने कहा, क्या बचकाना हरकत है
उन्हे कहाँ पता,
बेशक तितली नहीं आयी पकड़ में
हाँ, मैंने सहेज ली.. एक मुट्ठी निश्छल खुशियाँ..!!
~ मुकेश कुमार सिन्हा
@Tweetmukesh#कवि_दिवस#लेखनी ✍️
शब्दों की,
कोई क़ीमत नहीं होती।
क़ीमत तो उनमें छिपे,
एहसासात की हुआ करती है।
गुनाहों की,
सज़ा नहीं मिलती।
सज़ा तो बेकसूरों पे लगे,
इल्ज़ामात की मिला करती है।
~ गौरव सिन्हा / @garv5137
सांध्य वेला
हर सुबह से शाम तक मैं लोहा हूं
हर शाम से सुबह तक मैं मोम हूं
यह सांध्य वेला है
सूर्य ढलने ढलने को है
चांद उगने उगने को है
टिमकने लगे हैं सितारे यहां वहां
इस समय मुझे मत देखना
इस समय मैं लोहे से मोम में बदलता हूं।
- विनोद पदरज
चाँदी उगने लगी है बालों में
ये उम्र तुम पर हसीन लगती है
यूँ भी अच्छा ही लगता है लेकिन
देख कर अपनी हामला शाखें
गुलमोहर फूला फूला रहता है
अब जो थोड़ी सी भर गई हो तुम
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है
- गुलज़ार
*आंदोलन*
पहला आंदोलन
शायद बीज ने किया होगा
मिट्टी के विरुद्ध
और फूट पड़ा होगा
पौधा बनकर
या फिर शिशु ने
कोख के भीतर किया होगा
जन्म लेने के लिए
हर बार
आंदोलनकारी को प्रेम मिला है
मिट्टी से भी
और मां से भी
क्योंकि
मांएं जानती हैं
कि आंदोलन के बगैर
सृजन संभव नहीं
~अशोक कुमार