सोशल मीडिया पर ऐसे ऐसे मैसेज जात को लेकर भरे पड़े है , कोई ब्राह्मण अपने पर गर्व , कोई शूद्र अपने पर गर्व, न ज्ञान लेना , न वेदों को पढ़ना।
▫️यदि जाति जन्म से निश्चित होती, तो मनुस्मृति स्वयं यह क्यों कहती➡️
“शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।” (मनु 10.65)
आप सभी को पावन पर्व श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं
आइये हम सब भगवान श्री कृष्ण के वास्तविक चरित्र को जाने उन पर जो लांछन लगा रहे हैं उन्हे भगवान के स्वरूप से अवगत कराये
इसके लिए हम सब महर्षि व्यास कृत महाभारत का अध्ययन जरूर करें और भगवान के वास्तविक चरित्र को जाने।
आदि गुरु शंकराचार्य ने अपने छान्दोग्य उपनिषद 8/15/1 में भी मुक्ति से पुनरावृति को स्वीकारते हुऐ लिखा है कि ➡️
“जब तक ब्रह्मलोक में स्थित है,तब तक जीव वहीं रहता है,अवधि की समाप्ति के पूर्व नहीं लौटता”।
🔥मोक्ष की अवधि 31नील 10 खरब 40 अरब वर्ष होती है,इस अवधि में सृष्टि 36 हजार बार बनती व बिगड़ती है।
मोक्ष प्राप्ति के साधन ज्ञान, कर्म व उपासना के समन्वय की उच्चतम स्थिति व्यक्ति द्वारा प्राप्त करना है-अथर्ववेद यजुर्वेद 40/141
🔥जैसे पुराणो मे मोक्ष को स्थायी बताया गया है, मोक्ष प्राप्त की अधिकारी आत्मा मरने के बाद भगवान विष्णु के शरीर में हमेशा के लिए विलीन हो जाती है।
🔥वेदो में मोक्ष अस्थायी होती है, यानि अवधि विशेष तक ही।
वेदो में बताया गया है कि मोक्ष के दौरान आत्मा परमात्मा के साथ विचरण करती है।
उसी को हम देखकर कह सकते है कि निश्चितरुप से ये उत्तम दिव्य गुण संपन्न आत्माऐं मोक्षधाम से पृथ्वीलोक पर लौटी हुई आत्माऐं है।
🔥मोक्ष से वापिस लौटने वाला व्यक्ति दिव्य गुण संपन्न जीवन वाला होता है-अथर्ववेद 13/2/25
मोक्ष➡️
मोक्षधाम से लौटी ये उत्तम दिव्य गुण सम्पन्न आत्माएं पृथ्वी लोक पर उच्चतम स्थिति वाली मनुष्य योनि में जन्म लेकर मानव जाति का मार्गदर्शन करती हुई भगवान के रुप में पूजने लगती है।
🔥जैसे भगवान राम और भगवान कृष्ण आदि जिनका मानव जाति के उद्धार में जो योगदान रहा है…
और प्रतिदिन करने का संकल्प लें। जिस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने विषम परिस्थितियों में भी संध्या में यज्ञ का परित्याग नहीं किया, हम भी संध्या एवं यज्ञ को अपने जीवन का अंग बनाएं।और योगेश्वर के इस जन्मदिवस पर उनके उत्तम चरित्र का यश गान करें।
योगेश्वर के चरित्र को हम स्वयं महाभारत के माध्यम से जाने और उनके चरित्र के शुद्ध स्वरूप को घर-घर पहुंचाएं और अपने उस महान पूर्वज को हम कलंकित न करे,ना होने दे।
आओ हम सभी मिलकर योगेश्वर श्री कृष्ण के जन्मोत्सव को आज शुद्ध रूप से मनाये।संध्या एवं यज्ञ करें।
का काव्यात्मक चोले में विकृत चित्रण मात्र है।
🔥यह देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि कृष्ण का वह विकृत रूप तो घर-घर में प्रचलित है और जो महाभारत वर्णित शुद्ध स्वरूप है जो राष्ट्र के लिए अक्षय प्रेरणा का स्रोत बन सकता है उसकी चर्चा दुर्लभ है।
और राष्ट्रीय अस्मिता तथा राष्ट्र धर्म के मूर्तिमन्त प्रतीक हैं।
🔥पुराणों ने "चोर-जार शिखमणि" के रूप में जिस कृष्ण का चित्रण किया है उसका अनुमोदन महाभारत में कहीं नहीं है वह केवल पुराणों की लीला है। और इसके पीछे व्यक्तिगत वासनाओं की पूर्ति के लिए अवचेतन मन में छिपी मनोग्रंथियों
एवं पराक्रमी पुरुष आज तक संसार में नहीं हुआ। सत्य निष्ठा के समान ही वे कुटिल राजनीति के भी उपदेष्टा थे।
🔥ग्रहस्थ जीवन के प्रेमी होने के साथ-साथ अत्यंत संयमी और योग विद्या पारंगत योगेश्वर भी थे। संक्षेप में यह निशंकोच कहा जा सकता है कि श्री कृष्णा भारत की संस्कृति
श्री कृष्णा अपने समय के एक अद्वितीय विद्वान थे। वे वेद वेदंगों के ज्ञाता, दान, दया, बुद्धि, शूरता, शालीनता, चतुराई, नम्रता, तेजस्विता, धैर्य, संतोष, आदि सभी गुणों में अनुपम थे।
वास्तव में श्री कृष्ण के समान प्रगलभ, बुद्धिशाली, कर्तृत्ववान, प्रज्ञावान, व्यवहार कुशल, ज्ञानी
सन्ध्या और यज्ञ के प्रति श्री कृष्ण की निष्ठा➡️
श्री कृष्णा ईश्वर के बहुत बड़े उपासक थे। किसी भी परिस्थिति में उन्होंने संध्या एवं यज्ञ का परित्याग नहीं किया। युद्ध काल में भी वह निरंतर संध्या यज्ञ करते थे। दूत कर्म पर जाते हुए रास्ते में सांझ हो गई तो वे संध्या के लिए रुक गए।
🔥जिसमें कोई अधर्म का आचरण श्री कृष्ण ने जन्म से मरण पर्यंत बुरा काम कुछ भी किया हो ऐसा कही नहीं लिखा
और इस भागवत वाले ने अनुचित मनमाने दोष लगाए हैं, जिनको पढ़-पढ़ा,सुन-सुन के अन्य मत वाले श्री कृष्ण जी की बहुत सी निंदा करते हैं।
🔥आओ जाने योगेश्वर के महान चरित्र के विषय में➡️
🔥महर्षि दयानंद ने सदाचार निर्माणार्थ जिस सत्पुरुष की गणना सर्वप्रथम की है, वह योगेश्वर श्री कृष्ण ही हैं। उन्होंने लिखा है श्री कृष्ण का जीवन आप्त पुरुषों के सदृश है- देखो श्री कृष्ण जी का इतिहास महाभारत मे अति उत्तम है उनके गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश हैं।
आर्यावर्त में श्री राम और श्री कृष्णा ऐसे दो महापुरुष हुए हैं जिन्हे राष्ट्र पुरुष और इतिहास पुरुष की दृष्टि से अद्वितीय कहा जा सकता है।
श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और श्री कृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं। पुरुषोत्तम दोनों हैं। पुरुषोत्तम अर्थात उत्तम पुरुष अर्थात आर्य।