।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूय-स्तत्त्वस्य तावेन समेत्य योगम् ।
एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा
कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ।।३।।
(षष्ठोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का षष्ठ अध्याय ईश्वर, जगत्, जीव तथा मोक्ष के परस्पर सम्बन्ध का अत्यन्त गूढ़ और समन्वित निरूपण प्रस्तुत करता है। प्रथम दो मन्त्रों में उपनिषद् ने यह प्रतिपादित किया कि परमेश्वर ही समस्त जगत् के सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, कालाधिष्ठाता तथा कर्म-व्यवस्था के नियन्ता हैं। तृतीय मन्त्र उसी तत्त्व को और अधिक सूक्ष्मता से उद्घाटित करते हुए सृष्टि, प्रलय तथा पुनः सृष्टि के चक्र का रहस्य प्रकट करता है। भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या में यह सिद्ध करते हैं कि सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था परमेश्वर की मायाशक्ति के अधीन है; वे ही सृष्टि का प्रवर्तन करते हैं, वे ही उचित समय पर उसका उपसंहार करते हैं, और पुनः जीवों के संचित कर्मानुसार उसी जगत् का पुनः प्रादुर्भाव करते हैं।
“तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयः” -
अर्थात् परमेश्वर सृष्टि-रूप कार्य का सम्पादन कर, समय आने पर उसे पुनः अपने कारणरूप अव्यक्त में समेट लेते हैं। शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यहाँ ‘कर्म’ से अभिप्राय ईश्वर की सृष्टि-लीला है। यह कर्म किसी अभाव की पूर्ति या व्यक्तिगत प्रयोजन के लिए नहीं, बल्कि जीवों के अनादि कर्मों के फल-भोग की व्यवस्था के लिए है। ईश्वर स्वयं निष्काम, पूर्ण और आप्तकाम हैं; अतः उनका सृष्टि-प्रवर्तन केवल लोकव्यवहार और कर्मफल-वितरण की दिव्य व्यवस्था है।
“विनिवर्त्य” शब्द प्रलय का सूचक है। सृष्टि अनन्तकाल तक स्थिर नहीं रहती। नियत समय पर सम्पूर्ण नाम-रूप, पंचमहाभूत, देह, लोक तथा समस्त दृश्य जगत् अपनी कारणावस्था में लीन हो जाते हैं। यह विनाश नहीं, अपितु कारण में कार्य का लय है। जैसे तरंग पुनः समुद्र में लीन हो जाती है, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् प्रलय में अव्यक्त माया में स्थित हो जाता है।
“तत्त्वस्य तावेन समेत्य योगम्” -
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ परमेश्वर पुनः अपनी मायाशक्ति के साथ सम्बन्ध स्थापित करते हैं और जीवों के पूर्वसंचित कर्मों के अनुसार नई सृष्टि का आरम्भ करते हैं। यह ‘योग’ किसी परिवर्तन का सूचक नहीं, क्योंकि परमात्मा नित्य निर्विकार हैं; यह केवल मायोपाधि के माध्यम से सृष्टि-व्यवस्था के पुनः प्रकट होने का द्योतक है।
“एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन” -
अत्यन्त गूढ़ है। भगवत्पाद संकेत करते हैं कि यहाँ सृष्टि-प्रक्रिया के विविध कालक्रम, अवस्थाओं अथवा तत्त्व-विकास की क्रमिक प्रक्रिया का उल्लेख है। उपनिषद् का उद्देश्य गणना प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि यह प्रतिपादित करना है कि सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था निश्चित दैवी विधान और कालानुशासन के अधीन है। सृष्टि का प्रत्येक चरण ईश्वर की सर्वज्ञ व्यवस्था के अनुसार ही सम्पन्न होता है।
“आत्मगुणैश्च सूक्ष्मैः” - शाङ्करभाष्य में विशेष महत्त्व रखता है। यहाँ ‘सूक्ष्म आत्मगुण’ से अभिप्राय उन सूक्ष्म उपाधियों - बुद्धि, मन, अहंकार, तन्मात्राओं तथा अव्यक्त कारण-शक्तियों - से है, जिनके माध्यम से जीव पुनः देह धारण करता है। जीव के संचित कर्म और सूक्ष्म संस्कार प्रलय में भी कारणरूप से विद्यमान रहते हैं। जब ईश्वर पुनः सृष्टि का प्रवर्तन करते हैं, तब उन्हीं सूक्ष्म कारणों के आधार पर प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मानुसार शरीर, परिस्थिति और अनुभव प्राप्त करता है। इस प्रकार सृष्टि न तो आकस्मिक है और न ही अन्यायपूर्ण; वह पूर्णतः कर्म-सिद्धान्त और ईश्वर की सर्वज्ञ व्यवस्था पर आधारित है।
अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से यह सम्पूर्ण प्रक्रिया केवल व्यवहारिक सत्य (व्यावहारिक सत्ता) के स्तर पर है। परमार्थतः न सृष्टि का वास्तविक उद्भव है, न प्रलय का कोई परम परिवर्तन। ब्रह्म नित्य, एकरस, निर्विकार और अद्वितीय है। सृष्टि, स्थिति और लय - ये सभी मायोपाधि से अनुभूत होने वाले व्यवहार हैं। जैसे स्वप्न का सम्पूर्ण जगत् जागरण में मिथ्या सिद्ध होता है, वैसे ही आत्मज्ञान होने पर समस्त विश्व-प्रपञ्च ब्रह्मस्वरूप में अधिष्ठित प्रतीत होता है।
व्यावहारिक जीवन के लिए यह मन्त्र अत्यन्त प्रेरणादायक है। यह सिखाता है कि संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह अराजकता या संयोग का परिणाम नहीं है। प्रत्येक जन्म, प्रत्येक अवसर, प्रत्येक अनुभव और प्रत्येक परिवर्तन एक व्यापक दैवी व्यवस्था तथा कर्म-सिद्धान्त का अंग है। अतः साधक को अपने जीवन को धर्म, विवेक, निष्काम कर्म और आत्मचिन्तन से परिपूर्ण बनाना चाहिए, क्योंकि यही भविष्य के संस्कारों और आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।
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।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद् यः।
तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथिव्यप्तेजोनिलखानि चिन्त्यम् ।।२।।
(षष्ठोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का षष्ठ अध्याय उपनिषद्-वाङ्मय में ईश्वरतत्त्व के परम दार्शनिक प्रतिपादन का अद्वितीय अध्याय है। प्रथम मन्त्र में उपनिषद् ने यह प्रतिपादित किया कि न स्वभाव और न ही काल जगत् के स्वतन्त्र कारण हैं; अपितु समस्त विश्वचक्र परमेश्वर की महिमा से संचालित है। द्वितीय मन्त्र उसी सत्य को और अधिक स्पष्ट करते हुए परमेश्वर के स्वरूप, उनकी सर्वज्ञता, सर्वव्यापकता, कालाधिपत्य तथा कर्म-व्यवस्था के नियन्तृत्व का सूक्ष्म निरूपण करता है।
भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि यहाँ वर्णित परमात्मा कोई सीमित देवता नहीं, अपितु वही परब्रह्म है, जो मायोपहित ईश्वररूप से सम्पूर्ण विश्व का कारण, नियन्ता और अन्तर्यामी है। उपनिषद् क्रमशः उसके उन दिव्य गुणों का उल्लेख करती है, जिनके बिना विश्व की सुव्यवस्थित व्यवस्था की कल्पना भी सम्भव नहीं।
“येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वम्” -
अर्थात्, जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् सदा व्याप्त एवं आवृत है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार यह आवरण किसी भौतिक वस्तु का आवरण नहीं, अपितु चैतन्य की सर्वव्यापक सत्ता का द्योतक है। जिस प्रकार आकाश सभी वस्तुओं में रहते हुए भी उनसे स्पर्शरहित रहता है, उसी प्रकार परमात्मा सम्पूर्ण विश्व में अन्तर्यामी रूप से स्थित होकर भी उससे असंग रहता है। समस्त नाम-रूप उसी में अधिष्ठित हैं, उसी से प्रकाशित हैं और अन्ततः उसी में लीन हो जाते हैं।
इसके पश्चात् उपनिषद् परमात्मा को “ज्ञः” कहती है। भगवत्पादाचार्य के अनुसार यह केवल सामान्य ज्ञान नहीं, बल्कि सर्वज्ञता का सूचक है। परमात्मा समस्त जीवों के अन्तःकरण, उनके संस्कार, उनके कर्म, उनके अतीत, वर्तमान और भविष्य का प्रत्यक्ष साक्षी है। उसका ज्ञान इन्द्रियों या मन पर आश्रित नहीं, बल्कि स्वाभाविक, स्वतःसिद्ध और नित्य है।
“कालकारः” यह शब्द अत्यन्त गूढ़ है। भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार परमात्मा केवल काल के भीतर कार्य करने वाला नहीं, बल्कि स्वयं काल का भी कारण है। काल जिसके अधीन है, वही वास्तविक ईश्वर है। समय का प्रवाह, युगों का परिवर्तन, सृष्टि और प्रलय का क्रम - यह सब उसी की व्यवस्था के अन्तर्गत घटित होता है। अतः काल ईश्वर को नियंत्रित नहीं करता; ईश्वर ही काल को नियन्त्रित करता है।
“गुणी” यहाँ गुणी का तात्पर्य त्रिगुणात्मक माया के अधिष्ठाता से है। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा स्वयं सत्त्व, रजस् और तमस् से रहित, निर्विकार और निर्गुण ब्रह्म है; किन्तु ईश्वररूप में वही माया का अधिष्ठान बनकर सम्पूर्ण सृष्टि का संचालन करता है। अतः गुणों का सम्बन्ध परमात्मा के स्वरूप से नहीं, अपितु उसकी मायाशक्ति से है।
“सर्वविद् यः” परमात्मा सब कुछ जानने वाला है। उसकी सर्वज्ञता केवल पदार्थों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव की सूक्ष्मतम भावना, प्रत्येक कर्म का कारण, प्रत्येक फल का विधान और समस्त सृष्टि का उद्देश्य उसके प्रत्यक्ष ज्ञान में स्थित है। भगवत्पाद के अनुसार यही सर्वज्ञता ईश्वर को कर्मफलदाता बनाती है।
“तेनेशितं कर्म विवर्तते ह” अर्थात्, उसी ईश्वर की आज्ञा एवं अधिष्ठान से कर्म-व्यवस्था प्रवर्तित होती है। यहाँ भगवान आदि शंकराचार्य का भाष्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वे स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर किसी को कर्म करने के लिए बाध्य नहीं करता। जीव अपने अविद्या-जनित कर्तृत्वाभिमान के कारण कर्म करता है; किन्तु उन कर्मों के फल का अचूक विधान ईश्वर की व्यवस्था से ही सम्भव होता है। यदि कोई सर्वज्ञ नियन्ता न हो, तो कर्मफल का न्यायपूर्ण वितरण कभी सम्भव नहीं हो सकता। अतः ईश्वर कर्म का कर्ता नहीं, बल्कि कर्मफल-व्यवस्था का सर्वज्ञ नियामक है।
“पृथिव्यप्तेजोनिलखानि चिन्त्यम्”
समस्त पंचमहाभूतों की ओर संकेत करते हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार ये सम्पूर्ण भौतिक जगत् के आधारभूत तत्त्व हैं। इनकी उत्पत्ति, स्थिति, परिवर्तन तथा परस्पर समन्वय भी उसी परमात्मा की मायाशक्ति द्वारा संचालित हैं। सम्पूर्ण दृश्य जगत् उन्हीं पंचमहाभूतों का विस्तार है और वे स्वयं परमेश्वर के अधीन हैं। अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से यह मन्त्र अत्यन्त सूक्ष्म सत्य उद्घाटित करता है। परमात्मा ही समस्त जगत् का आधार है; वही सर्वज्ञ है, वही काल का कारण है, वही माया का अधिष्ठाता है !
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आज का दिवस भारतीय आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना की यात्रा में अत्यंत ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अद्वैत-दर्शन को भव्य एवं साकार अभिव्यक्ति प्रदान करने वाले “शंकरावतरणम्” स्टैच्यू ऑफ वननेस’ के अनावरण की तृतीय वर्षगाँठ पर समस्त देशवासियों, अध्यात्मप्रेमियों तथा विश्वभर में भारतीय ज्ञान-परम्परा के साधकों को हार्दिक शुभकामनाएँ।
नर्मदा की पुण्यसलिला से अभिसिंचित ओंकारेश्वर की भूमि भारतीय अध्यात्म के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखती है। यही वह तपोभूमि है जहाँ से भगवद्पादाचार्य ने सम्पूर्ण भारत को एकात्मता के सूत्र में बाँधने के लिए प्रस्थान किया। इसी दिव्य भूमि पर स्थापित ‘स्टैच्यू ऑफ वननेस’ केवल एक भव्य प्रतिमा नहीं, अपितु भारत की सनातन ज्ञान-परम्परा, गुरु-शिष्य सम्बन्ध की पवित्रता तथा अद्वैत-वेदान्त की सार्वभौमिक दृष्टि का जीवंत प्रतीक है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य का अवतरण उस कालखण्ड में हुआ, जब भारत वैचारिक मतभेदों, सामाजिक विभाजनों और सांस्कृतिक चुनौतियों से घिरा था। अल्पायु में ही उन्होंने कालड़ी से कश्मीर और हिमालय की यात्रा की। शास्त्रार्थ द्वारा उन्होंने केवल दार्शनिक सिद्धान्तों की स्थापना ही नहीं की, बल्कि भारत की आत्मा में निहित मौलिक एकता को पुनर्जाग्रत किया। देश की चारों दिशाओं में मठों की स्थापना कर उन्होंने भौगोलिक विविधता को आध्यात्मिक एकात्मता से जोड़ा। उनका जीवन बताता है कि भारत की वास्तविक शक्ति बाहरी समानता में नहीं, बल्कि विविधताओं को जोड़ने वाले उस अंतःसूत्र में है, जो सबको एक ही परम चेतना की अभिव्यक्ति मानता है।
अद्वैत-वेदान्त का महान उद्घोष “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः” मनुष्य को उसकी वास्तविक सत्ता का बोध कराता है। जाति, भाषा, सम्प्रदाय, क्षेत्र और संस्कृति के भेद अन्तिम सत्य नहीं हैं। समस्त अस्तित्व के मूल में एक ही अखण्ड, अनन्त और सर्वव्यापक चेतना विद्यमान है, जो प्रत्येक प्राणी तथा प्रकृति के कण-कण में अभिव्यक्त हो रही है। इस सत्य का अनुभव होने पर द्वेष, हिंसा और विभाजन क्षीण होते हैं तथा करुणा, सेवा, समरसता और सह-अस्तित्व की भावना विकसित होती है।
इस दृष्टि से ‘स्टैच्यू ऑफ वननेस’ अस्तित्व के साथ मानवता के दिव्य साक्षात्कार का साकार स्वरूप है। यह हमें बाह्य विभेदों से ऊपर उठकर उस एकत्व का दर्शन कराता है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि एक विराट परिवार दिखाई देती है। अद्वैत केवल गूढ़ दार्शनिक सिद्धान्त नहीं, जीवन जीने की समग्र दृष्टि है। यदि प्रत्येक जीव उसी अखण्ड सत्ता की अभिव्यक्ति है, तो उसकी पीड़ा हमारी पीड़ा और उसका कल्याण हमारा कल्याण बन जाता है।
आज विश्व विज्ञान, तकनीक और भौतिक समृद्धि में अभूतपूर्व प्रगति के उपरान्त भी युद्ध, आतंक, पर्यावरणीय संकट, आर्थिक विषमता, मानसिक तनाव और सामाजिक विखण्डन से जूझ रहा है। मनुष्य ने भौगोलिक दूरियाँ समाप्त कर दीं, किन्तु हृदयों की दूरी बढ़ती गई। उसने संसार को साधनों से सम्पन्न बनाया, परन्तु स्वयं शान्ति और आत्मीयता से दूर होता गया। ऐसे समय में भगवत्पाद आदि शंकराचार्य का अद्वैत-दर्शन विश्वमानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
अद्वैत हमें स्मरण कराता है कि स्थायी शान्ति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि मानव-चेतना के रूपान्तरण से सम्भव है। लोकमंगलकारी विश्व-व्यवस्था तभी निर्मित होगी, जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति, समाज और समस्त प्राणियों से पृथक् नहीं, उनका अभिन्न अंग अनुभव करेगा। अद्वैत से अनुप्राणित दृष्टि अधिकारों के साथ कर्तव्य, उपभोग के साथ संयम, प्रगति के साथ पर्यावरण-संरक्षण तथा व्यक्तिगत उत्कर्ष के साथ सामूहिक कल्याण को महत्त्व देती है। यही दृष्टि विश्व को संघर्ष से सहयोग और विभाजन से समन्वय की ओर ले जा सकती है।
‘स्टैच्यू ऑफ वननेस’ भारत की चिरंतन भावना “वसुधैव कुटुम्बकम्” का दिव्य उद्घोष है। यह स्मारक भावी पीढ़ियों को भारतीय ज्ञान-परम्परा से परिचित कराने के साथ आत्मबोध, साधना, सेवा और विश्वकल्याण के लिए प्रेरित करता रहेगा। यह स्मरण कराता है कि वास्तविक महानता दूसरों पर नहीं, बल्कि अपने अज्ञान, अहंकार और भेद-दृष्टि पर विजय प्राप्त करने में है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य की ज्ञान-ज्योति हमारे अन्तःकरण को आलोकित करे और ‘स्टैच्यू ऑफ वननेस’ का एकात्मता-सन्देश सम्पूर्ण विश्व को शान्ति, समरसता, सह-अस्तित्व एवं लोकमंगल के पथ पर अग्रसर करता रहे ; इसी मंगलकामना के साथ सभी को इस ऐतिहासिक अवसर की अनन्त शुभकामनाएँ।
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@DrMohanYadav51@narendramodi@AmitShah@ChouhanShivraj@MPTourism@PMOIndia
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः।
देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ।।१।।
(षष्ठोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह षष्ठम् अध्याय समग्र तत्त्वचिन्तन का चरम उत्कर्ष है। पूर्व अध्यायों में जिस परमब्रह्म की सत्ता, सर्वव्यापकता, मायाशक्ति, ईश्वरत्व तथा जीव-ब्रह्म-अभेद के रहस्य का क्रमशः निरूपण किया गया, इस अध्याय में उसी परम तत्त्व को समस्त विश्वव्यवस्था के एकमात्र नियन्ता एवं अधिष्ठाता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। प्रस्तुत मन्त्र मानव-बुद्धि के उस प्राचीन दार्शनिक प्रश्न का समाधान करता है कि इस विश्व की गति का वास्तविक कारण क्या है? क्या यह केवल स्वभाव से संचालित है? क्या काल ही इसका नियन्ता है? अथवा इसके पीछे कोई चेतन, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् परम कारण विद्यमान है?
भगवत्पाद इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि संसार में विभिन्न दार्शनिक मत अपने-अपने तर्कों के आधार पर जगत् की उत्पत्ति और संचालन के विविध कारण प्रस्तुत करते रहे हैं। कोई कहता है कि जगत् का कारण स्वभाव है- अर्थात् पदार्थों की अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति ही समस्त परिवर्तन का कारण है। कोई अन्य काल को ही सर्वश्रेष्ठ कारण मानता है और समझता है कि समय की गति से ही सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय का क्रम चलता है। परन्तु उपनिषद् इन दोनों मतों को “परिमुह्यमानाः” कहकर इंगित करती है- अर्थात् जो वास्तविक तत्त्व को न जानकर बाह्य कारणों में ही उलझे हुए हैं।
भगवान् आदि शंकराचार्य के अनुसार “स्वभाव” और “काल” दोनों स्वतन्त्र सत्ता नहीं हैं। वे स्वयं भी किसी उच्चतर चेतन सत्ता के अधीन हैं। जड़ तत्त्व कभी स्वयं अपने को व्यवस्थित नहीं कर सकता। स्वभाव यदि जड़ है तो उसमें संकल्प, ज्ञान, उद्देश्य और व्यवस्था की शक्ति कहाँ से आएगी? इसी प्रकार काल केवल परिवर्तन का मापक है; वह स्वयं किसी घटना का स्वतन्त्र कर्ता नहीं हो सकता। जिस प्रकार घड़ी समय का संकेत देती है, समय का निर्माण नहीं करती, उसी प्रकार काल घटनाओं का अनुक्रम प्रकट करता है, उनका स्वतन्त्र सर्जक नहीं होता।
इसी कारण उपनिषद् निर्णायक स्वर में कहती है -
“देवस्यैष महिमा तु लोके” अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत् जिस अद्भुत व्यवस्था से संचालित हो रहा है, वह उस परम देव की ही महिमा है। यहाँ “देव” शब्द किसी सीमित देवता का वाचक नहीं, अपितु उस परमात्मा का द्योतक है जो स्वयंप्रकाश, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् तथा समस्त सृष्टि का अन्तर्यामी अधिष्ठाता है।
भगवत्पादाचार्य इस वाक्य का अत्यन्त गम्भीर अर्थ उद्घाटित करते हैं। उनके अनुसार विश्व की यह अद्भुत व्यवस्था - ग्रहों की गति, ऋतुओं का परिवर्तन, जन्म और मृत्यु का क्रम, कर्मफल की व्यवस्था, चेतना का प्रवाह तथा समस्त प्राकृतिक नियम - यह सब किसी अन्धी शक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि ईश्वर की मायाशक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त उनकी अनन्त व्यवस्था का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
मन्त्र का अन्तिम चरण -
“येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम्” अत्यन्त रहस्यमय है। यहाँ “ब्रह्मचक्रम्” सम्पूर्ण संसारचक्र का द्योतक है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार यह जन्म, मृत्यु, कर्म, भोग, पुनर्जन्म तथा अनन्त नाम-रूपों से युक्त संसार का अखण्ड प्रवाह है। यह चक्र स्वतन्त्र रूप से नहीं घूमता; इसे गति प्रदान करने वाला वही परमेश्वर है।
किन्तु यहाँ एक अत्यन्त सूक्ष्म अद्वैत रहस्य भी निहित है। ईश्वर संसारचक्र का नियन्ता अवश्य है, किन्तु स्वयं संसारधर्मों से सर्वथा असंग है। जैसे- चुम्बक लोहे को गति देता है, किन्तु स्वयं परिवर्तित नहीं होता; जैसे- सूर्य सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है किन्तु प्रकाश से स्पर्शित होकर भी अप्रभावित रहता है, ठीक उसी प्रकार परमब्रह्म अपनी मायाशक्ति द्वारा सम्पूर्ण विश्व की गति का आधार है, परन्तु स्वयं नित्य, निर्विकार एवं असंग रहता है।
यही भगवान आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त की विशिष्टता है। वे न तो जगत् को पूर्णतः असत् कहते हैं और न ईश्वर से पृथक् स्वतन्त्र सत्ता मानते हैं। यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म की मायोपाधि से प्रकाशित एक व्यवहारिक सत्य है, जिसका संचालन ईश्वर करता है; परमार्थतः केवल एक अद्वितीय ब्रह्म ही सत्य है।
यह मन्त्र आधुनिक विज्ञान के लिए भी अत्यन्त प्रासंगिक है। विज्ञान प्रकृति के नियमों का अन्वेषण करता है, किन्तु उन नियमों की अन्तिम सत्ता और उनके अस्तित्व का कारण नहीं बता सकता। गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्, क्वाण्टम क्षेत्र, समय तथा ऊर्जा - ये सभी कार्य-प्रणालियाँ हैं, किन्तु इनके पीछे विद्यमान सार्वभौम चेतना का निर्णय विज्ञान के क्षेत्र से परे है। उपनिषद् उसी चेतन अधिष्ठान की ओर संकेत करती है, जो नियमों का भी नियन्ता है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद्
।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् ।
कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ।।१४।।
(पञ्चमोऽध्याय:)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का पञ्चम अध्याय साधक को जीव, जगत् और परमात्मा के पारस्परिक सम्बन्ध का क्रमशः गहन बोध कराते हुए अन्ततः आत्मसाक्षात्कार की चरम अनुभूति तक ले जाता है। पूर्ववर्ती मन्त्रों में उपनिषद् ने परमात्मा को अनादि, अनन्त, विश्वस्रष्टा, सर्वव्यापक तथा समस्त बन्धनों से मुक्त करने वाले परम देव के रूप में निरूपित किया। प्रस्तुत मन्त्र उसी दिव्य तत्त्व का और भी सूक्ष्म स्वरूप उद्घाटित करता है। यहाँ परमात्मा को भाव से ग्राह्य, अनीडाख्य, भाव और अभाव का कारण, शिवस्वरूप तथा समस्त कलाओं एवं सृष्टि का उद्गम कहा गया है। जो साधक इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव कर लेता है, वह देहाभिमान का परित्याग कर अमृतस्वरूप ब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जाता है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस मन्त्र का भाष्य करते हुए स्पष्ट करते हैं कि उपनिषद् यहाँ किसी सीमित देवता का नहीं, बल्कि उसी परम ब्रह्म का निरूपण कर रही है, जो समस्त नाम-रूपों का अधिष्ठान, आत्मस्वरूप और अद्वितीय चैतन्य है।
मन्त्र का प्रथम पद है- “भावग्राह्यम्।”
भगवत्पाद के अनुसार परमात्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है। वह न नेत्रों से देखा जा सकता है, न वाणी से व्यक्त किया जा सकता है, न मन की कल्पनाओं में सीमित किया जा सकता है। फिर भी वह अप्राप्य नहीं है। वह शुद्ध अन्तःकरण, श्रद्धा, उपासना, आत्मचिन्तन और समाधिस्थ बुद्धि द्वारा अनुभूत होता है। यहाँ भाव का अर्थ केवल भावना नहीं, बल्कि अन्तःकरण की निर्मल, एकाग्र और ब्रह्माभिमुख वृत्ति है। जब मन विषयासक्ति से मुक्त होकर सत्य की ओर उन्मुख होता है, तभी परमात्मा का साक्षात्कार सम्भव होता है।
इसके पश्चात् उपनिषद् कहती है- “अनीडाख्यम्।”
‘नीड’ का अर्थ है- आश्रय, निवास अथवा सीमित आधार। अनीड अर्थात् जिसका कोई बाह्य आश्रय नहीं, जो स्वयं समस्त जगत् का आधार है, किन्तु स्वयं किसी आधार पर आश्रित नहीं। भगवत्पाद के अनुसार ब्रह्म स्वयंभू, स्वयंसिद्ध और निरपेक्ष सत्ता है। सम्पूर्ण विश्व उसी पर आश्रित है, किन्तु वह किसी वस्तु, स्थान, काल या कारण पर निर्भर नहीं। वही सभी का आश्रय है, किन्तु उसका कोई आश्रय नहीं।
मन्त्र का अगला विशेषण है- “भावाभावकरम्।”
यह अत्यन्त गूढ़ दार्शनिक पद है। भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार परमात्मा सम्पूर्ण व्यक्त (भाव) और अव्यक्त (अभाव) जगत् का कारण है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय सभी उसी की मायाशक्ति के अधीन घटित होते हैं। जो प्रकट है, उसका भी आधार वही है; जो अप्रकट है, उसका भी मूल वही है। परन्तु यह कारणत्व भी परमार्थतः ब्रह्म का स्वाभाविक धर्म नहीं, बल्कि माया-उपाधि से सम्बद्ध ईश्वर की व्यावहारिक सत्ता का लक्षण है।
इसके उपरान्त मन्त्र परमात्मा को “शिवम्” कहता है। यहाँ शिव किसी संप्रदाय-विशेष के देवता का नाम मात्र नहीं, बल्कि उस परम मंगलस्वरूप, कल्याणमय, शुद्ध, शान्त और अखण्ड ब्रह्म का द्योतक है। भगवत्पाद स्पष्ट करते हैं कि ब्रह्म ही परम शिव है—जो समस्त अशुभ, अज्ञान और दुःख का नाश करता है तथा आत्मस्वरूप आनन्द का प्रकाश करता है।
मन्त्र आगे कहता है- “कलासर्गकरं देवं।”
‘कला’ से अभिप्राय उन विविध शक्तियों, तत्त्वों, अवयवों और उपाधियों से है, जिनके माध्यम से सम्पूर्ण जगत् की अभिव्यक्ति होती है। पंचमहाभूत, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण, प्रकृति तथा सम्पूर्ण विश्व-विस्तार उसी परम सत्ता से प्रकाशित हैं। जैसे सूर्य के प्रकाश से असंख्य क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं, किन्तु सूर्य स्वयं उनसे लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार परमात्मा समस्त सृष्टि का कारण होते हुए भी उससे असंग रहता है।
मन्त्र का चरम निष्कर्ष है- “ये विदुस्ते जहुस्तनुम्।” यहाँ “विदुः” का अर्थ केवल शास्त्रीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आत्मानुभूति है। जब साधक श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा अपने आत्मस्वरूप में उसी परम शिव का साक्षात्कार करता है, तब उसका देहाभिमान पूर्णतः नष्ट हो जाता है।
भगवत्पादाचार्य स्पष्ट करते हैं कि “तनुं जहुः” का अर्थ शरीर का भौतिक परित्याग नहीं है। ज्ञानी जीवित रहते हुए भी देह से तादात्म्य का त्याग कर देता है। उसके लिए शरीर केवल प्रारब्ध के अनुसार चलने वाला एक उपकरण रह जाता है; वह स्वयं को कभी शरीर, मन, बुद्धि या अहंकार नहीं मानता। यही जीवन्मुक्ति की अवस्था है।
जब प्रारब्ध का अन्त होता है, तब पुनर्जन्म का कोई कारण शेष नहीं रहता, क्योंकि अविद्या और कर्म का बीज ज्ञानाग्नि में भस्म हो चुका होता है। इस प्रकार ज्ञानी जन्म-मरण के चक्र से सर्वथा परे अमृत ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
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।। श्वेताश्वतरोपनिषद् ।।
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्ठारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ।।१३।।
(पञ्चमोऽध्याय:)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का पञ्चम अध्याय जीव, जगत् और परमात्मा के पारस्परिक सम्बन्ध का क्रमबद्ध रहस्य उद्घाटित करता है। पूर्ववर्ती मन्त्रों में उपनिषद् ने जीव के कर्म, उपाधियों, पुनर्जन्म तथा ईश्वर की नियामक सत्ता का विवेचन किया। अब यह मन्त्र साधना की पराकाष्ठा और उपनिषदों के परम निष्कर्ष की घोषणा करता है- जब साधक उस अनादि, अनन्त, सर्वव्यापक एवं विश्वनियन्ता परमदेव का साक्षात्कार कर लेता है, तब वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
भगवत्पाद आदि शंकराचार्य इस मन्त्र को अद्वैत वेदान्त के परम तत्त्वज्ञान का उद्घोष मानते हैं। यहाँ वर्णित “देव” कोई सीमित देवता नहीं, अपितु वही परमेश्वर है जो समस्त विश्व का कारण, अधिष्ठान, नियन्ता और अन्ततः ब्रह्मस्वरूप है।
मन्त्र का प्रथम पद कहता है - “अनाद्यनन्तम्।” भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार परमात्मा न किसी कारण से उत्पन्न हुआ है, न उसका कोई आरम्भ है और न उसका कोई अन्त। जो स्वयं काल से परे है, वही काल का भी कारण है। जन्म और विनाश केवल नाम-रूपात्मक जगत् के धर्म हैं; ब्रह्म नित्य, अविकार और स्वयंसिद्ध सत्ता है। इसीलिए उपनिषद् उसे अनादि और अनन्त कहती है। वह न सीमित है, न विभाजित, न परिवर्तनशील।
इसके पश्चात् मन्त्र कहता है - “कलिलस्य मध्ये।” यहाँ कलिल का अर्थ है- अविद्या, माया, नाम-रूप, कर्म, राग-द्वेष और विविधता से युक्त यह संसार। यही वह जटिल क्षेत्र है जिसमें जीव मोहवश उलझा हुआ है। किन्तु परमात्मा उसी संसार के मध्य विद्यमान रहते हुए भी उससे कभी लिप्त नहीं होता। जैसे कमल जल में रहकर भी जल से अछूता रहता है, वैसे ही परमात्मा सम्पूर्ण जगत् का आधार होते हुए भी उससे असंग है।
इसके आगे उपनिषद् कहती है - “विश्वस्य स्रष्टारम् अनेकरूपम्।”
भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि परमेश्वर समस्त विश्व का निमित्त तथा उपादान कारण है। सम्पूर्ण जगत् उसी की सत्ता पर आश्रित है। “अनेकरूपम्” का अभिप्राय यह नहीं कि परमात्मा वास्तव में अनेक हो जाता है, बल्कि एक ही अद्वितीय चैतन्य माया के माध्यम से अनन्त नामों और रूपों के रूप में प्रकट होता है। विविधता उसकी वास्तविक सत्ता नहीं, उसकी उपाधि-जनित अभिव्यक्ति है।
जैसे एक ही सूर्य असंख्य जलाशयों में अनेक प्रतिबिम्बों के रूप में दिखाई देता है, अथवा एक ही स्वर्ण अनेक आभूषणों के रूप में प्रकट होता है, वैसे ही एक ब्रह्म समस्त चराचर विश्व के रूप में अनुभव किया जाता है। रूप अनेक हैं, परन्तु सत्ता एक ही है।
मन्त्र का अगला पद है - “विश्वस्यैकं परिवेष्टितारम्।” यह अत्यन्त गूढ़ अद्वैत प्रतिपादन है। परिवेष्टितारम् अर्थात् जो सम्पूर्ण विश्व को भीतर और बाहर से व्याप्त किए हुए है। वह केवल सृष्टिकर्ता ही नहीं, अपितु सृष्टि का आधार, आश्रय, अन्तःस्थित आत्मा और सर्वव्यापक चैतन्य है।
भगवत्पाद इस तथ्य को अन्य उपनिषद्-वचनों से भी पुष्ट करते हैं- “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, “ईशावास्यमिदं सर्वम्”, “येन सर्वमिदं ततम्।” परमात्मा किसी स्थानविशेष में सीमित नहीं है; सम्पूर्ण विश्व उसी में स्थित है और वही समस्त अस्तित्व का आत्मस्वरूप है।
मन्त्र का चरम निष्कर्ष है- “ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।” यही उपनिषदों का परम पुरुषार्थ है। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यहाँ “ज्ञात्वा” का अर्थ केवल बौद्धिक जानकारी प्राप्त करना नहीं है। यह प्रत्यक्ष आत्मानुभूति है, जिसमें ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद लीन हो जाता है।
यहीं “सर्वपाश” का अर्थ भी अत्यन्त व्यापक है। ये पाश हैं- अविद्या, अहंकार, राग, द्वेष, कामना, कर्म, जन्म, मृत्यु, सुख-दुःख तथा समस्त संसार-बन्धन। ये आत्मा के स्वभावगत धर्म नहीं हैं; ये केवल अज्ञान से उत्पन्न मिथ्या अध्यास हैं। जब ज्ञान का उदय होता है, तब ये पाश उसी प्रकार विलीन हो जाते हैं; जैसे - सूर्य के उदय पर अन्धकार। ज्ञान कोई नया आत्मा उत्पन्न नहीं करता; वह केवल उस सत्य को प्रकाशित करता है जो सदैव विद्यमान था।
अद्वैत वेदान्त में मुक्ति किसी स्थानविशेष की प्राप्ति नहीं, न स्वर्गगमन है, न किसी लोक में प्रवेश। मुक्ति है - अपने वास्तविक ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार। जीव तब जान लेता है कि जिसे वह बाहर खोज रहा था, वही परम देव उसके अपने आत्मस्वरूप में नित्य प्रकाशित है। व्यावहारिक दृष्टि से यह मन्त्र साधक को अत्यन्त गम्भीर दिशा प्रदान करता है। संसार की विविधता में उलझने के स्थान पर उसके आधारभूत एकत्व का दर्शन करना ही आध्यात्मिक जीवन का सार है।
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