देश के सनातनी न भूलें कि किस तरह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके शासन-प्रशासन ने पूजनीय शंकराचार्य जी का अपमान किया।
प्रयागराज महाकुंभ में उन्हें निर्धारित स्नान और पालकी यात्रा से रोका गया, जिसके विरोध में उन्हें धरने और अनशन पर बैठना पड़ा।
कन्नौज में गौ-प्रतिष्ठा यात्रा के दौरान रात्रि विश्राम की अनुमति तक नहीं दी गई, जिससे उन्हें सड़क किनारे शिविर लगाकर रात बितानी पड़ी।
सनातन के नाम पर राजनीति करने वालों को इसका जवाब देना चाहिए।
https://t.co/WxU22S2F6V
https://t.co/XuxVm6raqq
चौरीचौरा, गोरखपुर के अस्पताल में एक गर्भवती महिला की मृत्यु की ज़िम्मेदारी तय की जाए और उचित कार्रवाई हो।
यदि प्रदेश में कोई सार्थक और सक्रिय स्वास्थ्य मंत्री हैं तो वो पोडकॉस्ट छोड़कर अपने विभाग पर ध्यान दें।
विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस पर हम सब संकल्प लें कि सबको उत्तम अन्न मिले, कोई भूखा न रहे और अन्न का एक भी दाना व्यर्थ न हो।
आइये, हम सभी मिलकर इस पवित्र ध्येय की प्राप्ति के लिए प्रयास करें।
#wordfoodsafatyday
CM यानी करप्ट माउथ
• ANI पर गाली।
• सदन में नेता प्रतिपक्ष जैसे वयोवृद्ध को अभद्र शब्दों से संबोधित किया।
• गुरुजनों से अभद्र वाचिक व्यवहार
• मंच से गाली।
• और अब भाषण का यह निम्न स्तर।
आख़िर क्यों?
विज्ञान कहता है की किशोरावस्था में किया गया “वनस्पति” का अत्यधिक सेवन व्यक्ति के बोलने और समझने की छमता को प्रभावित करता है। वही मनोविज्ञान कहता है कि बचपन और किशोरावस्था के अनुभव व्यक्ति की भाषा, व्यवहार और व्यक्तित्व पर गहरी छाप छोड़ते हैं। वही संस्कार आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में भी झलकते हैं।
CM के “करप्ट माउथ” होने की वजह शायद यही है।
जिन्हें CM का इतिहास नहीं पता, उनके लिए यह दबाई गई जानकारी है:
• मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 1994 के आसपास अजय सिंह बिष्ट अपने पारिवारिक परिवहन व्यवसाय में सहयोग कर रहे थे।
• उस समय उनके पास तीन बसें और एक ट्रक था।
• संभवतः उन्होंने यह भाषिक अभद्रता उसी दौर में, डग्गामार वाहन चलवाते समय सीखी।
• अजय सिंह बिष्ट के पिता श्री आनंद सिंह बिष्ट और गोरखनाथ मठ के पूर्व महंत श्री अवैद्यनाथ जी यानी श्री कृपाल सिंह बिष्ट जी, रिश्ते में भाई बताए जाते हैं।
• कहा जाता है कि बाद में उनके चाचा ने ही उन्हें मठ में बुलाया।
• महंत श्री अवैद्यनाथ जी ने अपने भतीजे अजय सिंह बिष्ट को कुछ ही वर्षों में मठ का उत्तराधिकारी बना दिया।
सवाल उठता है: उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं को क्यों चुना गया? क्या यह केवल योग्यता का निर्णय था या रिश्तेदारी का भी प्रभाव था? पहले मठ की गद्दी मिली, फिर कुछ ही वर्षों में लोकसभा की सीट भी।
स्पष्ट किया जाए कि मठ में महंत चुनने के लिए क्या कोई औपचारिक चुनाव प्रक्रिया हुई थी? डग्गामार वाहन चलवाने वाला व्यक्ति क्या 4 वर्षों में ही इतना योग्य हो गया? यदि नहीं, तो क्या इसे ‘पक्षपाती परिवारवाद’ नहीं कहा जाना चाहिए?
और अंत में- पद और परिधान रिश्तों और समय की मदद से मिल सकते हैं, पर भाषा और व्यवहार नहीं।
#असफल_मुख्यमंत्री
#CM_CorruptMouth
कागज़ों में हरियाली, ज़मीन पर गायब!
महोबा में देख रेख के अभाव में 70% सूख गए पिछले वर्ष लगाए गए पौधे।
फर्रुखाबाद में पिछले वर्ष वन विभाग के द्वारा लगाए गए पौधों की हालत देखरेख के अभाव में हुई खराब।
औरैया में वन विभाग की फाइलों में हरियाली, जमीन पर नहीं बचा एक भी पौधा।
नहीं चाहिए भाजपा।
भाजपा राज में महाभ्रष्ट ‘शासन-प्रशासन’ ने जनता का विश्वास खो दिया है। हत्याओं और एनकाउंटर ने उप्र की छवि को पूरी तरह नकारात्मक बना दिया है। भाजपा ख़ुद अपराधी है।
सुना है कि मुख्यमंत्री जी के अति प्रिय अधिकारी के अनुपयुक्त प्रशासनिक व्यवहार को माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दंडित किया गया है। और भविष्य में उनको किसी दायित्व दिये जाने के लिए उनकी योग्यता पर शंका प्रकट की गयी है और उनके दुर्व्यवहार का मामला ‘कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग’ को भेज दिया गया है, साथ ही कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमेटी को भी।
दरअसल वो तो खट्टे फल हैं, दोष तो उस वृक्ष की जड़ में है जिसके साये में वो कार्यरत हैं। लोक सेवक जब अपने को लोक शासक समझने लगता है तो उसका अहंकार न्यायालय तक की अवमानना करने लगता है।
वैसे क्यों न ऐसा किया जाए कि जिस तरह टीचर्स को अपनी योग्यता पुनः साबित करने के लिए फिर से परीक्षा पास करने के लिए कहा जा रहा है, वैसा ही नियम प्रशासनिक अधिकारियों पर भी लागू हो, जिससे समय-समय पर उनकी योग्यता की जाँच हो सके।
हम शिक्षकों से पूछ रहे हैं : हमने कुछ गलत कहा क्या?