अलसाई धूप गीली और जैसे बारिश सूखी है क्यूं आज मौसम की तासीर रूखी है पहाड़ पर से गिरते पड़ते पत्थरों की तरह जैसे वक्त के बिखरे मोती समेटे नहीं जा रहे और ओस की छोटी छोटी बूंदे आंखों की पुतलियों पर घाव कर रही हैं बादल गर्जना भूल गए आंधियां बेहोश फिर भी धरा का सीना जैसे फटा जा रहा है