उत्तरप्रदेश में गोंड समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) जाति प्रमाणपत्र जारी करने में लगातार देरी और अस्वीकृतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
भारत और चीन की आबादी लगभग बराबर है, लेकिन भारत में ट्रेनों में भीड़, धक्का-मुक्की और अव्यवस्था आम है, जबकि चीन में वही सिस्टम बेहतर तरीके से चलता है। समस्या जनसंख्या नहीं, व्यवस्था और जिम्मेदारी की है।
मोहन भागवत, जो न तो किसी संवैधानिक पद पर हैं और न ही जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि हैं, उन्हें VVIP स्तर की सुरक्षा और लंबा काफिला आखिर किस आधार पर दिया जा रहा है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन बताता है, तो फिर उसके प्रमुख पर करदाताओं का पैसा खर्च करना कितना उचित है? अगर वास्तव में कोई सुरक्षा खतरा है, तो सरकार को पारदर्शिता के साथ बताना चाहिए, खतरा किससे है और कितना गंभीर है। और अगर ऐसा कोई स्पष्ट खतरा नहीं है, तो यह विशेषाधिकार क्यों? जब देश में किसान, बेरोजगार युवा और आम नागरिक बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब एक गैर-सरकारी संगठन के प्रमुख को इतनी भारी सुरक्षा देना क्या उचित है? क्य�� इस तरह की सुविधाएं संविधान में निहित “समानता के अधिकार” और पारदर्शिता के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करतीं?
एससी-एसटी छात्रों से कहा जाता है “बजट नहीं है”, इसलिए उनकी छात्रवृत्ति रोक दी गई है। लेकिन मोहन भागवत की सुरक्षा पर करोड़ों खर्च हो रहे हैं तो सवाल उठना जरूरी है क्या देश के गरीब और वंचित छात्रों की शिक्षा सरकार की प्राथमिकता नहीं है? जब VIP सुरक्षा के लिए पैसा है, तो छात्रों की छात्रवृत्ति के लिए क्यों नहीं?
गोंडी भाषा भारत की सबसे प्राचीन आदिवासी भाषाओं ��ें से एक है, जिसे करोड़ों लोग बोलते हैं, फिर भी इसे संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला। यह सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की पहचान, संस्कृति और इतिहास की धरोहर है। गोंडी को संवैधानिक मान्यता देना समय की मांग है ताकि इसकी सुरक्षा, संवर्धन और सम्मान सुनिश्चित हो सके।
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प्���त्येक युग और प्रत्येक राष्ट्र में ऐसा सम्राट नहीं जन्म लेता। विश्व इतिहास में सम्राट असोक एक अद्वितीय व्यक्तित्व हैं। उनकी जयंती पर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन!
ज़मीन के भीतर से निकली हुई बुद्ध की जितनी प्रतिमाएँ देखी हैं, उतनी शायद ही किसी और देवी-देवता की मिली हों।
इतिहास खुद गवाही देता है कि यह विरासत कितनी व्यापक और गहरी है।
कोलंबिया की Arhuaco जनजाति ने हजारों वर्षों से सिएरा नेवादा दे सांता मार्ता पर्वतमाला के जंगलों को 80% तक सुरक्षित रखा है। उनका संदेश साफ है प्रकृति के साथ सामंजस्य ही भविष्य है। खनन और वनों की कटाई के खिलाफ उनका संघर्ष पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा है।
अमेजन में यह अलग-थलग पड़ा आदिवासी समुदाय बिना बाहरी संपर्क के जीवन जी रहा है। लेकिन लकड़हारों का अतिक्रमण उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी असंपर्कित जनजाति Mashco-Piro के और करीब ला रहा है जिससे विनाश��ारी संपर्क का खतरा बढ़ रहा है। भूमि और जीवन की रक्षा जरूरी है
"हम, इस भूमि के मूल निवासी, ही असली शासक हैं।”
अमेज़न के बंदरगाह पर हफ्तों के विरोध के बाद आदिवासी समुदाय ने ब्राज़ील सरकार को विवादित निजीकरण योजना रद्द करने पर मजबूर किया। यह संदेश भारत और पूरी दुनिया के लिए भी प्रेरणा है।
पूर्वोत्तर भारत हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारा गौरव है। दिल्ली के मालवीय नगर में अरुणाचली महिलाओं के साथ हुई नस्लीय टिप्पणी और हिंसा बेहद शर्मनाक है। “चिंकी” जैसे शब्द मज़ाक नहीं, मानसिक हिंसा हैं। हम इस भेदभाव के खिलाफ मजबूती से खड़े है।https://t.co/VbhGP5BWpy
दिल्ली के मालवीय नगर में नॉर्थ-ईस्ट की लड़कियों के साथ नस्लीय टिप्पणी और बदसलूकी की घटना शर्मनाक और निंदनीय है। किस��� को उसकी जाति, क्षेत्र या दिखावे के आधार पर अपमानित करना अस्वीकार्य है। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो। #StopRacism
राजस्थान के भील, मीणा, गरासिया आदिवासी समुदायों का डीएनए कोई “कच्चा माल” नहीं है! बिना स्पष्ट सहमति जेनेटिक डेटा विदेशी फार्मा कंपनियों तक पहुँचना निजता, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। पारदर्शी जांच, जवाबदेही और कठोर कार्रवाई जरूरी है।
एक BSF जवान देश की रक्षा कर रहा था, और उसी देश में उसके 24 वर्षीय बेटे एंजेल चकमा को उत्तराखंड में “चीनी” कहकर पीट-पीटकर मार डाला गया। FIR तक दर्ज नहीं हुई। छात्रों के दबाव में केस लिखा गया। जो देश बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा पर शोक जताता है, वहीं अपने नागरिक की नस्लीय हत्या पर मेनस्ट्रीम मीडिया और BJP चुप हैं। क्या यही राष्ट्रवाद है? शर्मनाक है ये।
उत्तराखंड में आदिवासी युवक अंजेल चकमा की नस्लभेदी गालियों के बाद निर्मम हत्या ने भारत की अंतरात्मा को झकझोर दिया है।
त्रिपुरा के BSF जवान का बेटा, MBA का छात्र, 17 दिनों तक ICU में ज़िंदगी से लड़ता रहा और आखिरकार नफ़रत की हिंसा का शिकार हो गया।
यह सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर और आदिवासी समुदाय के खिलाफ गहरी जमी नफरत का परिणाम है।
पूर्वोत्तर के आदिवासी भी इसी देश के नागरिक हैं, बल्कि इस देश के मूल निवासी हैं। हर भारतीय को देश के क���सी भी कोने में सम्मान और सुरक्षा से जीने का संवैधानिक अधिकार है।
हम मांग करते हैं कि इस मामले को Hate Crime माना जाए और प्रभावशाली आरोपियों को भी कठोरतम सज़ा मिले। नस्लभेद और आदिवासी विरोधी हिंसा भारत के लोकतंत्र पर कलंक है।
#JusticeForAnjelChakma
#StopRacism
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#AdivasiLivesMatter
#NortheastIsIndia