A True INDIAN,
सबकी बात सुनाता हूं।
सबसे संवाद
सबका'विकाश'
Military Consultant for Jr. CRICKET, FILMs,Music,THEATRE, SPORTS,Travel,Talk Show, FITNESS,MASS Comn
@AnilAgarwal_Ved Good afternoon sir
I m ex indian Airforce Sgt
Working along with young children of defence forces.
Need your support and sponsorship
Kindly think,support and support us.
@RailYatri@RPF_INDIA@RailMinIndia
Travelling in 12295 on 03/04/26 from smvt to Danapur
Bathroom blocked
Unauthorised passengers on board to S-3 creating nonsense to passengers
KINDLY DO THE NEEDFUL
जो चार दिन में ही सबके गैस खत्म हो गए हैं । ये लंबी लंबी लाइने लग गई है ये सब हमारे उसी चरित्र के प्रबल होने के संकेत हैं। तुलसी बाबा कह गए हैं की, “धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।।”
आपद काल है धीरज धरिए।
तंदूरी चिकनv/sतंदूरी पनीर के भूखे
ये सोच के भी डर लगता है
कभी-कभी आदमी एक ऐसे मोड़ पर खड़ा हो जाता है जहाँ उसे लगता है कि सड़ांध सिर्फ किसी एक जगह नहीं है, बल्कि हवा में घुल चुकी है। समाज की हालत भी कुछ वैसी ही हो चुकी है। ऊपर से देखने पर सब कुछ व्यवस्थित दिखाई देता है। सभ्यता, संस्कार, रिश्ते, व्यवस्था, नियम, लेकिन ज़रा भीतर झाँक कर देखिए तो लगता है जैसे किसी पुराने बंद कमरे में सालों से खिड़की नहीं खुली हो। वहाँ हवा नहीं चलती, सिर्फ सड़ांध ठहरी रहती है।
सच कहूँ तो इस समाज में सबसे बड़ी समस्या ये है कि यहाँ हर आदमी खुद को ईमानदार मानता है और दूसरे को बेईमान। हर कोई दूसरों की गलतियों का हिसाब रखने में लगा है, लेकिन अपनी कमियों को देखकर जैसे आँखें बंद कर लेता है। यही वजह है कि ऊपर से नीचे तक एक अजीब सा पाखंड फैला हुआ है। जो मंचों पर खड़े होकर नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, वही अपने निजी जीवन में सबसे पहले उस नैतिकता को कुचलते दिखाई देते हैं।
व्यवस्था की हालत भी इससे अलग नहीं है। जिस सिस्टम से उम्मीद की जाती है कि वह न्याय देगा, वही अक्सर ताकतवर के सामने झुक जाता है। नियम किताबों में रहते हैं और फैसले ताकत और पहचान देखकर होते हैं। जो ईमानदार है वह धीरे-धीरे किनारे कर दिया जाता है, और जो चालाक है वह आगे बढ़ता जाता है। कई बार लगता है कि यह व्यवस्था सड़ी हुई इसलिए नहीं है कि इसमें कुछ लोग खराब हैं, बल्कि इसलिए कि यहाँ खराब होना ही सफल होने की पहली शर्त बन गया है।
लेकिन सबसे कड़वा सच तब सामने आता है जब आदमी अपने ही लोगों की तरफ देखता है। जिनसे उम्मीद होती है कि वे साथ देंगे, वही कई बार सबसे पहले पीठ में छुरा घोंपते दिखाई देते हैं। परिवार, रिश्तेदार, दोस्त ये सब शब्द सुनने में बहुत मधुर लगते हैं, लेकिन व्यवहार में अक्सर इनका अर्थ बदल जाता है। बहुत से रिश्ते सिर्फ तब तक मजबूत रहते हैं जब तक उनसे कोई फायदा जुड़ा रहता है। जैसे ही परिस्थिति बदलती है, वही लोग धीरे-धीरे दूर खिसकने लगते हैं।
यह भी एक सच्चाई है कि इस समाज में लोग किसी की मदद करने से ज्यादा उसकी असफलता का इंतजार करते हैं। सामने मुस्कुराते हैं, पीठ पीछे आलोचना करते हैं। कोई थोड़ा आगे बढ़ जाए तो उसे गिराने के तरीके खोजे जाते हैं, और अगर कोई संघर्ष कर रहा हो, तो उसके दुख को समझने के बजाय उसे उसकी ही कमजोरी का प्रमाण बना दिया जाता है।
पड़ोसी, परिचित, जान-पहचान के लोग इन सबके साथ भी अक्सर एक अजीब सा दिखावा चलता है। बातचीत में मिठास होती है, लेकिन मन में दूरी। लोग एक-दूसरे के जीवन में झाँकने के लिए उत्सुक रहते हैं, लेकिन किसी के दर्द को सच में समझने की कोशिश बहुत कम करते हैं। किसी की परेशानी भी कई बार चर्चा का विषय बन जाती है, समाधान का नहीं।
धीरे-धीरे आदमी ये समझने लगता है कि इस पूरे ढाँचे में सड़ांध सिर्फ संस्थाओं में नहीं है, बल्कि मानसिकता में है। जब सोच ही स्वार्थ से भरी हो, तो रिश्ते भी स्वार्थी हो जाते हैं और व्यवस्था भी। लोग सच से ज्यादा सुविधा को चुनते हैं। सही होने से ज्यादा सुरक्षित रहना उन्हें जरूरी लगता है।
और शायद यही वजह है कि कई बार आदमी को लगता है कि भरोसा नाम की चीज़ बहुत दुर्लभ हो गई है। हर कोई किसी न किसी भूमिका में अभिनय कर रहा है। कोई आदर्श का, कोई दोस्ती का, कोई रिश्तेदारी का। लेकिन जैसे ही परिस्थितियाँ कठिन होती हैं, उन भूमिकाओं के पीछे का असली चेहरा सामने आने लगता है।
फिर भी एक बात समझनी पड़ती है कि इस सड़े हुए माहौल में भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो पूरी तरह सड़े नहीं होते। वे कम होते हैं, बहुत कम। अक्सर भीड़ में दबे हुए, चुपचाप अपना काम करते हुए। उन्हीं की वजह से शायद ये दुनिया पूरी तरह अंधेरी नहीं हो पाती।
लेकिन जो आदमी ये सब देख चुका होता है, वह भोला नहीं रह पाता। उसके भीतर एक दूरी पैदा हो जाती है। वह लोगों से मिलता है, बात करता है, रिश्ते निभाता है, लेकिन भीतर कहीं एक कोना ऐसा रह जाता है जहाँ वह जानता है कि भरोसा बहुत सोच-समझकर ही करना चाहिए।
क्योंकि इस समाज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि यहाँ अच्छाई की बातें बहुत होती हैं, लेकिन अच्छाई को जीने वाले लोग बहुत कम मिलते हैं। और जब ये बात समझ में आती है, तब आदमी को पहली बार एहसास होता है कि सड़ांध सिर्फ बाहर नहीं है, बल्कि उस पूरे माहौल में फैली हुई है जिसमें हम सब साँस ले रहे हैं। 💔
राघवेन्द्र चतुर्वेदी ✍️
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एक दिन
सुबह सुबह
दरवाजे की घंटी बजी । दरवाजा खोला
तो देखा एक आकर्षक कद- काठी का व्यक्ति चेहरे पे प्यारी सी मुस्कान लिए खड़ा है ।
मैंने कहा, "जी कहिए.."
तो उसने कहा,
अच्छा जी, आप तो रोज़ हमारी ही गुहार लगाते थे, और सामने आया हूं तो कहते हो जी कहिए!
मैंने कहा
"माफ कीजिये, भाई साहब ! मैंने पहचाना नहीं, आपको..."
तो वह कहने लगे,
"भाई साहब, मैं वह हूँ, जिसने तुम्हें साहेब बनाया है... अरे ईश्वर हूँ.., ईश्वर.. तुम हमेशा कहते थे न कि ..... नज़र मे बसे हो पर नज़र नही आते..... लो आ गया..! अब आज पूरे दिन तुम्हारे साथ ही रहूँगा।"
मैंने चिढ़ते हुए कहा,
"ये क्या मज़ाक है?"
"अरे मज़ाक नहीं है, सच है। सिर्फ़ तुम्हे ही नज़र आऊंगा। तुम्हारे सिवा कोई देख- सुन नही पायेगा, मुझे।"
कुछ कहता इसके पहले पीछे से माँ आ गयी.. "अकेला ख़ड़ा- खड़ा क्या कर रहा है यहाँ, चाय तैयार है , चल आजा अंदर.."
अब उनकी बातों पे थोड़ा बहुत यकीन होने लगा था, और मन में थोड़ा सा डर भी था.. मैं जाकर सोफे पर बैठा ही था, तो बगल में वह आकर बैठ गए। चाय आते ही जैसे ही पहला घूँट पिया मैं गुस्से से चिल्लाया,
"अरे मां..ये हर रोज इतनी चीनी ?"
इतना कहते ही ध्यान आया कि अगर ये सचमुच में ईश्वर है तो इन्हें कतई पसंद नही आयेगा कि कोई अपनी माँ पर गुस्सा करे। अपने मन को शांत किया और समझा भी दिया कि 'भई, ... तुम किसी की नज़र में हो आज... ज़रा ध्यान से।'
बस फिर मैं जहाँ- जहाँ... वह मेरे पीछे-पीछे पूरे घर में... थोड़ी देर बाद नहाने के लिये जैसे ही मैं बाथरूम की तरफ चला, तो उन्होंने भी कदम बढ़ा दिए..
मैंने कहा,
"प्रभु, यहाँ तो बख्श दो..."
खैर, नहा कर, तैयार होकर मैं पूजा घर में गया, यकीनन पहली बार तन्मयता से प्रभु वंदन किया, क्योंकि आज अपनी ईमानदारी जो साबित करनी थी.. फिर आफिस के लिए निकला, अपनी कार में बैठा, तो देखा बगल में महाशय पहले से ही बैठे हुए हैं। सफ़र शुरू हुआ तभी एक फ़ोन आया, और फ़ोन उठाने ही वाला था कि ध्यान आया, ... 'तुम किसी की नज़र मे हो।'
कार को साइड मे रोका, फ़ोन पर बात की और बात करते-करते कहने ही वाला था कि ... 'इस काम के ऊपर के पैसे लगेंगे' ...पर ये तो गलत था, : पाप था तो प्रभु के सामने कैसे कहता तो एकाएक ही मुँह से निकल गया,"आप आ जाइये । आपका काम हो जाएगा, आज।"
फिर उस दिन आफिस में न स्टाफ पर गुस्सा किया, न किसी कर्मचारी से बहस की 25-50 गालियाँ तो रोज़ अनावश्यक निकल ही जाती थी मुँह से, ... पर आज सारी गालियाँ, 'कोई बात नही, इट्स ओके...'मे तब्दील हो गयीं।
वह पहला दिन था जब क्रोध, घमंड, किसी की बुराई, लालच, अपशब्द , बेईमानी, झूठ ये सब मेरी दिनचर्या का हिस्सा नही बनें।
शाम को आफिस से निकला, कार में बैठा, तो बगल में बैठे ईश्वर को बोल ही दिया...
"प्रभु सीट बेल्ट लगा लें, कुछ नियम तो आप भी निभायें... उनके चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी..."
घर पर रात्रि भोजन जब परोसा गया तब शायद पहली बार मेरे मुख से निकला,
"प्रभु, पहले आप लीजिये ।"
और उन्होंने भी मुस्कुराते हुए निवाला मुँह मे रखा। ..... भोजन के बाद माँ बोली,
"पहली बार खाने में कोई कमी नही निकाली आज तूने। क्या बात है ? सूरज पश्चिम से निकला है क्या, आज?"
मैंने कहाँ,
"माँ आज सूर्योदय मन में हुआ है... रोज़ मैं महज खाना खाता था, आज प्रसाद ग्रहण किया है माँ, और प्रसाद मे कोई कमी नही होती।"
थोड़ी देर टहलने के बाद अपने कमरे मे गया, शांत मन और शांत दिमाग के साथ तकिये पर अपना सिर रखा तो ईश्वर ने प्यार से सिर पर हाथ फिराया और कहा,
"आज तुम्हे नींद के लिए किसी संगीत, किसी दवा और किसी किताब के सहारे की ज़रुरत नहीं है।"
गालों की थपकी ने गहरी नींद को हिला दिया...
"कब तक सोयेगा .., जाग जा अब। ... मां की आवाज थी"
सपना था शायद... हाँ, सपना ही था, ... पर आज का यह सपना मुझे जीवन की गहरी नीँद से जगा गया... अब समझ में आ गया उसका इशारा...
"तुम मेरी नज़र में हो...।"
जिस दिन हम ये समझ गए कि ... "वो" देख रहा है, ... उस दिन से हमारी जीवन यात्रा सरल व सुखद हो जायेगी। .....बोलिए...जय् सीताराम!
🙏🙏💐💐
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#औ_का
देश में आज भी करोड़ों लोग keypad फोन इस्तेमाल करते हैं, जिनके पास smartphone ही नहीं है। ऐसे में telecom कंपनियों से कुछ बुनियादी सवाल पूछना जरूरी है।
1. क्या कंपनियाँ धीरे-धीरे voice-only recharge खत्म करके लोगों को मजबूरन data pack लेने के लिए मजबूर कर रही हैं?
2. जब बहुत से ग्राहकों के पास internet चलाने वाला फोन ही नहीं है, तो उनसे data के पैसे क्यों लिए जा रहे हैं?
3. क्या telecom कंपनियाँ ग्रामीण और गरीब ग्राहकों की जरूरतों को समझकर सस्ते voice-only plans उपलब्ध कराएंगी, या फिर सिर्फ मुनाफे के हिसाब से ही प्लान बनाए जाते रहेंगे?
4. क्यों कंपनियाँ स्पष्ट रूप से यह नहीं बतातीं कि keypad फोन यूज़र्स के लिए कितने सस्ते voice-only विकल्प वास्तव में मौजूद हैं?
5. क्या telecom कंपनियाँ यह भरोसा देंगी कि भविष्य में keypad फोन यूज़र्स को उनकी जरूरत के हिसाब से सस्ते recharge मिलते रहेंगे, या उन्हें जबरदस्ती data पैक लेने के लिए मजबूर किया जाएगा?
@TRAI@reliancejio@airtelindia@BSNLCorporate
पुलिस ने शांत किया।
सोशल मीडिया पर सिविक सेंस पर भूचाल।
ट्रेन-मेट्रो में रील कल्चर से सबकी शांति हराम।
पैसे हैं, मगर अनुशासन कहाँ? ये बढ़ती घटनाएँ शर्मनाक हैं।
कंटेंट बनाना ठीक, लेकिन दूसरों का सुकून क्यों तोड़े।
कड़े फाइन लगें या सिर्फ शर्मिंदगी काफी है।
आपकी राय क्या है।