Civic activist Santosh Pandit has reportedly been detained by Pune Police after repeatedly highlighting dangerous potholes, open manholes and poor road conditions across the city. His demonstrations brought attention to the everyday risks faced by commuters.
The incident has sparked questions online about civic accountability. When citizens raise concerns over public safety, the response should be to fix the problem, not silence the person pointing it out. 🙏
इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करे ताकि हॉस्पिटल के उपर सख्त कार्रवाई हो सके
मां बाप से पैसे लिए इलाज किया फिर गंभीर बच्चे को अस्पताल से बाहर कर दिया माता-पिता बच्चे को लेकर बाहर बैठे है क्या यही सिस्टम है भारत देश का 😡
सभी साथी सपोर्ट करिए ये सामाजिक मुद्दा है करवाई होनी चाहिए
There was a time when a Union Minister from Bihar voluntarily resigned after a railway accident.
Today, an Education Minister isn't resigning despite multiple controversies.
Where is the accountability?
ये डेमोक्रेसी है!😳😲
पुलिस उनकी है, डंडे उनके है, सिस्टम उनका है सब-कुछ उनका है
तनख्वाह से पैसा कटता है ना, 100 रुपये कमाती 30 रुपये देती हू ना, फिर क्या होता है उसका, ये होता है आप लोग मेरे बच्चो पर डंडे मारोगे सिर्फ इसलिए कि वो अपना हक मांगना रहे।
Despite being visually impaired, this DU Law Faculty student stood at the Jantar Mantar protest, serving water bottles to others and supporting the cause. He believes he must be there because students are struggling, and some are even taking their own lives under immense pressure. ( Video from June 22)
श्रृंगार करती हुईं स्त्रियों से ज़्यादा सुंदर लगती है संघर्ष करतीं हुई स्त्रियां।✨
हाथों में डफली लिए संघर्ष करती हुई इस खूबसूरती लड़की के बोल है,
"जो सबको शिक्षा ना दे वो सरकार निकम्मी है,जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है"..🔥
जंतर मंतर पर चाहे जितना भी कोई धरना प्रदर्शन या आंदोलन कर ले,लेकिन जब तक AISA या SFI का प्रतिनिधित्व मौजूद नहीं रहता है तब तक आंदोलन सुना लगता है।
सलाम पहुंचे ऐसी संघर्षशील स्त्रियों को।❣️
केवल सोनम वांगचुक अनशन नही कर रहे हैं, JNU की स्कॉलर Neha भी अनशन कर रही है. आरक्षण, जाति जनगणना, पिछड़ा दलित और आदिवासियों के मुद्दे पर Neha एक मुखर आवाज हैं.
क्या इंजीनियरों के मुकाबले डॉक्टरों की हालत ज़्यादा खराब है?
मुझे पता नहीं था कि डॉक्टरों की हालत इतनी बुरी है। सरकारी कॉलेजों से पास होने वाले इंजीनियरों को तो ज़्यादातर प्लेसमेंट मिल ही जाती है। जहाँ तक प्राइवेट क्लिनिक खोलने वालों की बात है, तो उनमें से सिर्फ़ 10-20% ही ठीक-ठाक कमाई कर पा रहे हैं; बाकी लोग बमुश्किल गुज़ारा कर रहे हैं या बिना मरीज़ों के खाली बैठे हैं।
मैं एक ऐसे डॉक्टर को जानता हूँ जिसने AIIMS भुवनेश्वर से MBBS किया और PG एंट्रेंस एग्ज़ाम के लिए तीन बार कोशिश की, फिर भी सफल नहीं हो पाया। अब उसके माता-पिता उससे शादी के खर्च की चिंता सता रही है।
वीडियो: डॉ. धनंजय पांडा
International media is highlighting India’s hunger strike — because our children’s future is in danger.
It’s visible to American media, but invisible to Indian media.
Dharmendra Pradhan — Resign!
हमें यह समझना चाहिए कि हम किन लोगों को अपना आदर्श बना रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उन लोगों की आदतें और जीवनशैली अपना रहे हैं, जिन्होंने स्वयं अपने जीवन में गलत रास्ता चुना, अपने परिवार और अपनों का सम्मान नहीं किया। किसी भी व्यक्ति का अनुसरण करने से पहले उसके चरित्र, आचरण और मूल्यों को परखना आवश्यक है, क्योंकि अंततः हमारी आदतें ही हमारे व्यक्तित्व और भविष्य का निर्माण करती हैं।