।। श्वेताश्वतर उपनिषद् ।।
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यन-
श्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।६।।
(चतुर्थोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का यह मन्त्र उपनिषद्-साहित्य के सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं गहन प्रतीकों में से एक है। यही मन्त्र ऋग्वेद तथा मुण्डकोपनिषद् में भी प्राप्त होता है। भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य ने अपने शांकरभाष्य में इसे जीव, ईश्वर तथा आत्मसाक्षात्कार के रहस्य को उद्घाटित करने वाला अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मन्त्र माना है। अद्वैत वेदान्त की सम्पूर्ण साधना का सार इस एक प्रतीक में समाहित है।
उपनिषद् कहता है कि एक ही वृक्ष पर दो सुन्दर पक्षी अभिन्न मित्रों की भाँति निवास करते हैं। उनमें से एक वृक्ष के मधुर फलों का आस्वादन करता है, जबकि दूसरा कुछ भी भोगे बिना केवल साक्षीभाव से सब कुछ देखता रहता है। यह केवल प्राकृतिक दृश्य नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव जीवन का आध्यात्मिक रूपक है।
भगवत्पादाचार्य के अनुसार यह वृक्ष संसार है। व्यापक अर्थ में यह शरीर, मन, बुद्धि तथा कर्मों से निर्मित संसार-वृक्ष है, जिसकी जड़ अविद्या है, शाखाएँ कर्म हैं और फल सुख-दुःख, हर्ष-विषाद तथा जन्म-मरण के विविध अनुभव हैं। यही अश्वत्थ-वृक्ष भगवद्गीता में भी वर्णित है।
इस वृक्ष पर स्थित पहला पक्षी जीव है। वह वास्तव में शुद्ध, नित्य और अविनाशी आत्मा ही है, किन्तु अविद्या के कारण स्वयं को शरीर और मन के साथ अभिन्न मान बैठता है। यही तादात्म्य उसे कर्मों का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता बना देता है। वह कभी सुख से प्रसन्न होता है, कभी दुःख से व्यथित; कभी सफलता में गर्व करता है तो कभी असफलता में निराश हो जाता है। उसके समस्त अनुभव कर्मफल के विविध स्वाद मात्र हैं।
उपनिषद् ने इन्हीं अनुभवों को पिप्पल-फल कहा है। यह फल कभी मधुर प्रतीत होता है तो कभी कटु, किन्तु दोनों ही अनित्य हैं। भगवान आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि संसार के समस्त भोग आत्मा को तृप्त नहीं कर सकते, क्योंकि सीमित वस्तुएँ असीम चेतना की प्यास को कभी नहीं बुझा सकतीं।
दूसरा पक्षी ईश्वर है- परमात्मा, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी और नित्यमुक्त। वह उसी वृक्ष पर स्थित होकर भी किसी कर्मफल का भोक्ता नहीं है। वह केवल साक्षी है। न वह कर्म से स्पर्शित होता है, न सुख-दुःख से विचलित। वह सूर्य के समान सबको प्रकाशित करता है, किन्तु किसी से लिप्त नहीं होता।
शांकरभाष्य का अत्यन्त सूक्ष्म निष्कर्ष यह है कि जीव और ईश्वर वस्तुतः दो स्वतंत्र परम सत्ताएँ नहीं हैं। यह द्वैत केवल उपाधियों के कारण प्रतीत होता है। जीव अज्ञानोपाधि से सीमित प्रतीत होता है और ईश्वर मायोपाधि से जगत् का अधिष्ठाता। उपाधियों का अतिक्रमण होने पर दोनों में कोई भेद शेष नहीं रहता। वही एक अखण्ड ब्रह्म दोनों का वास्तविक स्वरूप है।
यही अद्वैत वेदान्त का परम सिद्धान्त है। जब तक अज्ञान है, तब तक जीव स्वयं को भोक्ता मानता है; ज्ञान के उदय पर वह जान लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप सदा से शुद्ध साक्षी आत्मा ही था।
इस मन्त्र का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर मानो दो स्तर विद्यमान हैं। एक मन इच्छाओं, स्मृतियों, अपेक्षाओं और अनुभवों में उलझा रहता है; दूसरा भीतर का मौन साक्षी है, जो बिना किसी विकार के सबका अवलोकन करता है। ध्यान, आत्मचिन्तन और विवेक का उद्देश्य इसी साक्षी का बोध कराना है।
जब साधक बार-बार स्वयं को साक्षी के रूप में स्थापित करता है, तब कर्मफल का आकर्षण क्षीण होने लगता है। वह अनुभव करता है कि सुख-दुःख मन की अवस्थाएँ हैं; आत्मा इन सबसे परे है। तब संसार बन्धन न रहकर आत्मबोध का साधन बन जाता है।
भगवत्पादाचार्य के अनुसार मोक्ष कोई नई उपलब्धि नहीं, अपितु अपने वास्तविक स्वरूप का स्मरण है। जैसे बादलों के हटते ही सूर्य स्वयं प्रकट हो जाता है, वैसे ही अविद्या के निवृत्त होते ही आत्मा का स्वप्रकाश स्वरूप प्रकाशित हो उठता है। तब भोक्ता और साक्षी का भेद समाप्त हो जाता है, क्योंकि ज्ञात होता है कि दोनों का आधार वही एक अद्वितीय ब्रह्म है।
अतः यह मन्त्र केवल दो पक्षियों की कथा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का अमर प्रतीक है। एक पक्षी अज्ञानग्रस्त जीव है, दूसरा सर्वज्ञ साक्षी परमात्मा; और आत्मज्ञान का परम क्षण वह है, जब साधक अनुभव करता है कि दोनों कभी वास्तव में पृथक् थे ही नहीं। वही एक शुद्ध, नित्य, मुक्त, सच्चिदानन्द ब्रह्म सबके भीतर समान रूप से विराजमान है। यही अद्वैत सत्य मानव जीवन का परम पुरुषार्थ, समस्त वेदान्त का चरम निष्कर्ष तथा भगवत्पादाचार्य श्री आदि शंकराचार्य के शांकरभाष्य का दिव्य सन्देश है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
#भगवत्पादाचार्य
#AvdheshanandG_Quotes
भारत के गौरव का एक और स्वर्णिम क्षण !
स्लोवाकिया के राष्ट्रपति महामहिम पीटर पेलेग्रिनी द्वारा भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को “द ऑर्डर ऑफ द व्हाइट डबल क्रॉस” प्रथम श्रेणी से सम्मानित किया जाना सम्पूर्ण भारतवर्ष के लिए अत्यंत गौरव, आनंद और अभिमान का विषय है।
यशस्वी प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी ने इस सम्मान को अपने लिए व्यक्तिगत उपलब्धि न मानकर भारत के 140 करोड़ देशवासियों को समर्पित किया है। यह उनकी विनम्रता, राष्ट्रनिष्ठा और जनसेवा के प्रति अटूट समर्पण का अद्भुत उदाहरण है।
यह सम्मान केवल मात्र एक अलंकरण ही नहीं अपितु भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा, सशक्त कूटनीति, सांस्कृतिक गरिमा और विश्वबंधुत्व की भावना का प्रतीक है। प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत ने विश्व पटल पर मैत्री, विश्वास, सहयोग और शांति के नए सेतु निर्मित किए हैं।
स्लोवाकिया का यह सर्वोच्च सम्मान सम्माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को प्राप्त 33वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है, जो उनके दूरदर्शी नेतृत्व, वैश्विक स्वीकार्यता और भारत के प्रति विश्व समुदाय के बढ़ते सम्मान का प्रमाण है।
यह वास्तव में भारत के लिए एक और गौरवपूर्ण क्षण है।आदरणीय प्रधानमंत्री श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक बधाई एवं अनंत
शुभकामनाएँ।
Heartiest congratulations to Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi Ji on being conferred with Slovakia’s highest honour, “The Order of the White Double Cross” First Class by H.E. President Peter Pellegrini.
By dedicating this honour to the 140 crore people of India, PM Modi Ji has once again reflected his humility, statesmanship and unwavering devotion to the nation. This honour is a shining testimony to India’s rising global stature and the world’s growing respect for India’s leadership.
@narendramodi@PMOIndia@PellegriniP_ #वंदेमातरम्
।। “श्वेताश्वतर” उपनिषद् ।।
तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःस्वरणीषु चाग्निः।
एवमात्माऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसायोऽनुपश्यति ।।१५।।
(श्वेताश्वतर उपनिषद् - प्रथमोध्याय)
श्वेताश्वतर उपनिषद् का यह मंत्र वेदान्त के उस परम रहस्य का उद्घाटन करता है, जिसके अनुसार आत्मा कोई बाह्य पदार्थ, नवीन उपलब्धि अथवा भविष्य में प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है, अपितु वह मनुष्य के स्वयं के अस्तित्व का नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप है। उपनिषद् यहाँ आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया को अत्यन्त सरल किन्तु अत्यन्त गहन दृष्टान्तों के माध्यम से स्पष्ट करता है। यह मंत्र बताता है कि आत्मज्ञान किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि उस सत्य का अनावरण है जो सदैव विद्यमान होते हुए भी अज्ञान के कारण अप्रकट बना रहता है।
उपनिषद् कहता है कि जैसे तिलों के भीतर तैल स्वभावतः विद्यमान रहता है, किन्तु वह प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देता। उचित विधि से मर्दन और निष्पेषण करने पर वही तैल प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार दधि के भीतर सर्पि अर्थात् घृत निहित रहता है, परन्तु मन्थन के बिना वह दृष्टिगोचर नहीं होता। जैसे पर्वतीय स्रोतों और भूमिगत धाराओं में जल विद्यमान रहता है, परन्तु उसे खोजने और उचित मार्ग देने पर ही वह प्रवाहित होता है; और जैसे अरणिकाष्ठ में अग्नि निहित रहती है, किन्तु मन्थन के बिना उसकी ज्वाला प्रकट नहीं होती- वैसे ही आत्मा भी प्रत्येक जीव के अन्तःकरण में नित्य विद्यमान है, परन्तु अज्ञान, अविवेक और वासनाओं के आवरण के कारण उसका स्वरूप प्रत्यक्ष नहीं हो पाता।
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य इस मंत्र के भाष्य में स्पष्ट संकेत करते हैं कि आत्मा कभी उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि जो वस्तु उत्पन्न होती है वह विनाशशील भी होती है। आत्मा नित्य है, स्वयंसिद्ध है और स्वप्रकाश है। अज्ञान आत्मा का नाश नहीं करता, क्योंकि सत्य का कभी नाश नहीं हो सकता; अज्ञान केवल उसके प्रकाश को ढँक देता है। जिस प्रकार बादल सूर्य को नहीं मिटाते, केवल दृष्टि को आच्छादित कर देते हैं, उसी प्रकार अविद्या आत्मा को नहीं मिटाती, केवल उसके अनुभव में बाधक बनती है।
मंत्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण वाक्य है- “एवमात्माऽत्मनि गृह्यते”। यहाँ उपनिषद् यह घोषित करता है कि आत्मा का साक्षात्कार कहीं बाहर नहीं, स्वयं आत्मा में ही होता है। परमात्मा को किसी विशेष स्थान, दिशा अथवा बाह्य वस्तु में खोजने की आवश्यकता नहीं है। वह स्वयं साधक के हृदय में, उसके चैतन्य में, उसके अस्तित्व के मूल में सदा विद्यमान है। आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है; उसे नेत्र देख नहीं सकते, वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, मन पूर्णतः ग्रहण नहीं कर सकता। वह तो स्वयं उन सबका आधारभूत साक्षी है। इसलिए आत्मसाक्षात्कार का अर्थ है- दृश्य जगत्, देह, मन, बुद्धि और अहंकार से अपनी भिन्नता का विवेकपूर्वक अनुभव करना तथा उस शुद्ध साक्षी-चैतन्य में स्थित होना।
उपनिषद् आगे आत्मप्राप्ति का साधन भी बताता है- “सत्येन” और “तपसा”।
यहाँ ‘सत्य’ का अर्थ केवल वाणी की सत्यता नहीं है। शाङ्कर-वेदान्त के अनुसार सत्य वह है जो त्रिकालाबाधित हो- जो भूत, वर्तमान और भविष्य में कभी परिवर्तित न हो। ब्रह्म ही सत्य है, आत्मा ही सत्य है। अतः ‘सत्येन’ का तात्पर्य है- अपने जीवन को परम सत्य की दिशा में उन्मुख करना, अनित्य में आसक्ति का त्याग करना तथा नित्य आत्मतत्त्व में श्रद्धा और निष्ठा स्थापित करना। जब साधक संसार के क्षणभंगुर आकर्षणों से ऊपर उठकर सत्यस्वरूप आत्मा को अपने जीवन का केन्द्र बना लेता है, तभी उसके भी आत्मज्ञान की भूमि तैयार होती है।
‘तपस्’ का अर्थ भी केवल शारीरिक कष्ट या उपवास नहीं है। उपनिषद् के परिप्रेक्ष्य में तपस् का वास्तविक स्वरूप है- अन्तःकरण की शुद्धि, इन्द्रियों का संयम, मन की एकाग्रता, वासनाओं का क्षय, आत्मचिन्तन, ध्यान तथा निरन्तर साधना। तपस् वह आन्तरिक अग्नि है जिसमें अहंकार, राग, द्वेष, मोह और अज्ञान क्रमशः भस्म होते जाते हैं। जब चित्त शुद्ध और निर्मल हो जाता है, तब उसमें आत्मज्ञान का प्रकाश उसी प्रकार प्रतिबिम्बित होता है जैसे स्वच्छ दर्पण में सूर्य का प्रकाश।
मंत्र का अन्तिम पद- “अनुपश्यति” अत्यन्त सूक्ष्म अर्थ रखता है। उपनिषद् केवल ‘पश्यति’ नहीं कहता, बल्कि ‘अनुपश्यति’ कहता है, अर्थात् साधक उस सत्य का बारम्बार, निरन्तर और स्थिर भाव से दर्शन करता है। यह कोई क्षणिक अनुभव नहीं, बल्कि ऐसी आत्मनिष्ठा है, जिसमें ज्ञानी पुरुष निरन्तर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित रहता है। उसके लिए आत्मा कोई विचार नहीं रहती, बल्कि जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाती है।
#श्वेताश्वतर_उपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#भगवत्पादाचार्य
#AvdheshanandG_Quotes
Follow the path of Sanatan Dharma. Sanatan Dharma means righteousness, noble values, truth, compassion, discipline and responsibility. It gives direction to life and brings inner balance, orderliness and peace.
A life rooted in Dharma becomes meaningful and dignified. It teaches us to act with honesty, humility, patience and self-control. Dharma protects us from confusion, selfishness and negativity, and inspires us to live for the welfare of all. When thoughts, words and actions are guided by Dharma, life becomes harmonious, purposeful and spiritually uplifting.
#AvdheshanandG_Quotes
#motivation
कुशला ब्रह्मनामकरणे वृत्तिहीनाः।
तेऽप्यज्ञानितमा नूनं पुनरायान्ति यान्ति च ।।१३३।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के प्रखर भाष्यकार भगवत्पाद भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त सूक्ष्म, किन्तु गम्भीर भ्रान्ति का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे उन लोगों की ओर संकेत करते हैं, जो ब्रह्मतत्त्व के विषय में वाचाल, तर्ककुशल और नाम-रूप के स्तर पर प्रवीण तो होते हैं, किन्तु जिनमें ब्रह्म-वृत्ति का वास्तविक उदय नहीं हुआ है। इस प्रकार वे ज्ञान और ज्ञानाभास के मध्य के भेद को अत्यन्त स्पष्ट कर देते हैं।
“कुशला ब्रह्मनामकरणे” अर्थात् जो लोग ब्रह्म के नामों, परिभाषाओं, तत्त्वचर्चाओं और शास्त्रीय पदावली में अत्यन्त दक्ष हैं। वे वेदान्त के गूढ़ सिद्धान्तों का सुन्दर निरूपण कर सकते हैं, भाषण दे सकते हैं, शास्त्रों का उद्धरण कर सकते हैं; किन्तु यह कुशलता केवल वाणी और बुद्धि तक सीमित है। यह शब्दज्ञान है, न कि स्वानुभव।
“वृत्तिहीनाः” ऐसे साधक ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं। अर्थात् उनके अन्तःकरण में वह अखण्डाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं हुई है, जो “अहं ब्रह्मास्मि” इस सत्य को जीवित अनुभव के रूप में प्रकट करती है। उन्होंने ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर पर ग्रहण किया है, उसे आत्मनिष्ठ अनुभूति में रूपान्तरित नहीं किया। इसीलिए उनका ज्ञान परिवर्तनकारी नहीं बन पाता; वह उनके जीवन, व्यवहार और अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करता।
दार्शनिक दृष्टि से यह स्थिति श्रवण और मनन के स्तर पर ही रुक जाने का द्योतक है। जब तक निदिध्यासन द्वारा उस ज्ञान को अन्तःकरण में दृढ़ नहीं किया जाता, तब तक वह अविद्या-नाशक नहीं बनता। जैसे केवल औषधि का नाम जान लेने से रोग दूर नहीं होता, वैसे ही केवल ब्रह्म का नाम और स्वरूप जान लेने से मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।
“तेऽपि अज्ञानितमाः नूनम्” - भगवद्पादाचार्य यहाँ अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से विद्वान् प्रतीत होते हैं, वस्तुतः अज्ञानियों में भी अत्यन्त अज्ञानी हैं। यह कथन कठोर प्रतीत हो सकता है, किन्तु इसका उद्देश्य साधक को जागरूक करना है; क्योंकि यहाँ अज्ञान केवल जानकारी का अभाव नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप के प्रति अपरिचय है।
“पुनरायान्ति यान्ति च” अर्थात् ऐसे साधक पुनः-पुनः जन्म-मरण के चक्र में आते-जाते रहते हैं। कारण यह है कि उनके भीतर देहाभिमान, कर्तृत्व-भोक्तृत्व और वासनाएँ अभी भी विद्यमान हैं। जब तक ये संस्कार नष्ट नहीं होते, तब तक संसरचक्र से मुक्ति सम्भव नहीं है। शास्त्रज्ञान, यदि वह अनुभूति में परिणत न हो, तो इस बन्धन को नहीं काट सकता।
उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं “नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन” यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से, न अधिक श्रवण से प्राप्त होती है। वह उसी को प्राप्त होती है, जो उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से अपनाता है। अतः केवल वाणी की कुशलता या तर्क की तीक्ष्णता आत्मज्ञान का प्रमाण नहीं है।
इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि अद्वैत वेदान्त केवल बौद्धिक दर्शन नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अनुभूति है। जब तक ब्रह्म-वृत्ति का उदय होकर वह साधक के अन्तःकरण को रूपान्तरित नहीं करती, तब तक ज्ञान अधूरा है। और जब यह वृत्ति उदित होकर स्थिर हो जाती है, तब साधक स्वतः ही ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है।
अतः भगवद्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य यहाँ साधक को सावधान करते हैं कि वह केवल शब्दों में न उलझे, केवल तर्क और चर्चा में संतुष्ट न हो, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारे- उसे जीए, उसे अनुभव करे, और उसी में स्थित हो जाए। यही वेदान्त का वास्तविक उद्देश्य है।
निष्कर्षतः, जो केवल ब्रह्म के नामों और तत्त्वों का उच्चारण करते हैं, किन्तु ब्रह्म-वृत्ति से हीन हैं, वे अभी भी अज्ञान के अधीन हैं और संसार-चक्र में बँधे रहते हैं। केवल वही साधक मुक्त होता है, जो ज्ञान को अनुभव में रूपान्तरित कर, ब्रह्मस्वरूप में अचल स्थित हो जाता है। यही इस श्लोक का सार और अद्वैत वेदान्त का परम उपदेश है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#AvdheshanandG_Quotes
माननीय उच्च न्यायालय द्वारा धार की ऐतिहासिक भोजशाला को संरक्षित स्मारक, माँ वाग्देवी की आराधना-स्थली तथा भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्राचीन केंद्र के रूप में मान्यता देना हमारी सांस्कृतिक विरासत, आस्था और इतिहास के सम्मान का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों, पुरातात्विक साक्ष्यों और सतत उपासना-परंपरा के आधार पर यह स्वीकार किया है कि भोजशाला प्राचीन काल से माँ वाग्देवी सरस्वती का मंदिर एवं संस्कृत अध्ययन का गौरवशाली केंद्र रही है। न्यायालय द्वारा हिन्दू पक्ष को वहाँ निरंतर पूजा-अर्चना का अधिकार प्रदान किया जाना सांस्कृतिक न्याय और ऐतिहासिक सत्य की प्रतिष्ठा है।
इस निर्णय का सभी पक्षों द्वारा शांति, सौहार्द और संवैधानिक मर्यादा के साथ सम्मान किया जाना चाहिए।
#Bhojshala #भोजशाला #भोजशाला_में_वाग्देवी
वैदिक सनातन संस्कृति, भारतीय अध्यात्म और मानवीय मूल्यों के वैश्विक प्रचार-प्रसार में निरंतर समर्पित, करुणा, सेवा और साधना के दिव्य संवाहक आदरणीय श्री श्री रविशंकर जी के आविर्भाव दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अभिनन्दन।
जन्मदिवसस्य हार्दिकाः शुभाशयाः।।
“पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतम्।
श्रुणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतम्॥
अदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥”
आदरणीय श्री श्री रविशंकर जी ने “Art of Living” के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व में सनातन संस्कृति, योग, ध्यान, प्राणायाम और मानवीय चेतना के उत्थान का अद्वितीय कार्य किया है। उन्होंने “जीवन जीने की कला” को केवल उपदेश नहीं, बल्कि एक वैश्विक जनआन्दोलन का स्वरूप प्रदान किया।
उनके मार्गदर्शन में सेवा, साधना और सत्संग के माध्यम से करोड़ों लोगों के जीवन में शांति, संतुलन और आध्यात्मिक जागरण का संचार हुआ है। मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना, विश्वशांति, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामोदय, युवा जागरण तथा आपदा राहत जैसे विविध क्षेत्रों में उनके प्रेरणादायी कार्य अत्यंत प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि आदरणीय श्री श्री रविशंकर जी स्वस्थ एवं दीर्घायु के साथ सदैव लोकमंगल के पथ पर मानवता का मार्गदर्शन करते रहें।
Warm greetings and heartfelt salutations to revered Sri Sri Ravi Shankar Ji on his sacred birthday.
Through Art of Living, he has inspired millions across the world with Sanatana values, yoga, meditation, service, peace and human upliftment. May he be blessed with good health, long life and continued strength to guide humanity on the path of harmony and universal welfare.
@Gurudev@ArtofLiving
#श्रीश्रीरविशंकरजी
#srisriravishankarji
#Art_of_Living
#AvdheshanandG_Quotes
ये हि वृत्तिं जहत्येनां ब्रह्माख्यां पावनीं पराम्।
वृथैव ते तु जीवन्ति पशुभिश्च समा नराः ।।१३०।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना के एक अत्यन्त निर्णायक और गम्भीर पक्ष का उद्घाटन करते हैं। यहाँ वे “ब्रह्मवृत्ति” उस परम पावन, आत्मप्रकाशक और मुक्तिदायिनी वृत्ति के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि जो मनुष्य इस दिव्य वृत्ति का परित्याग करता है, उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।
“ये हि वृत्तिं जहति” - जो साधक इस वृत्ति को त्याग देते हैं, अर्थात् जो “अहं ब्रह्मास्मि”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इस अखण्ड बोध से विमुख होकर पुनः संसार-वृत्तियों, विषयासक्ति और देहाभिमान में प्रवृत्त हो जाते हैं - वे वास्तव में अपने जीवन के परम उद्देश्य से च्युत हो जाते हैं। यहाँ त्याग का अर्थ केवल बाह्य उपेक्षा नहीं, बल्कि उस आन्तरिक उपेक्षा से है, जिसमें साधक आत्मज्ञान की दिशा में प्राप्त हुई प्रगति को स्थिर नहीं रखता।
“ब्रह्माख्यां पावनीं पराम्” - यह वृत्ति “ब्रह्माख्या” है, क्योंकि यह ब्रह्मस्वरूप का ही बोध कराती है; “पावनी” है, क्योंकि यह समस्त अविद्या, वासनाओं और संस्कारों का परिमार्जन करती है; और “परा” है, क्योंकि यह साधना की पराकाष्ठा है। यही वह वृत्ति है, जो जीव को बन्धन से मुक्त कर, उसे अपने नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित करती है।
इस ब्रह्मवृत्ति का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि यही “अखण्डाकार-वृत्ति” अज्ञान का निवारण करती है। जब यह वृत्ति स्थिर होती है, तब समस्त द्वैतबोध का लय हो जाता है, और केवल ब्रह्मस्वरूप सत्य ही शेष रहता है। अतः इसका त्याग करना, वस्तुतः आत्मस्वरूप से विमुख होना है।
“वृथैव ते तु जीवन्ति” - ऐसे लोग, यद्यपि बाह्य रूप से जीवित प्रतीत होते हैं, किन्तु उनका जीवन आध्यात्मिक दृष्टि से निरर्थक हो जाता है। वे जीवन के परम प्रयोजन आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त किए बिना ही कालक्षेप करते हैं। उनका जीवन केवल इन्द्रिय-तृप्ति, विषय-भोग और क्षणिक सुखों की खोज में व्यतीत होता है।
“पशुभिश्च समा नराः” - भगवद्पादाचार्य यहाँ एक अत्यन्त कठोर, किन्तु सत्य कथन करते हैं कि ऐसे मनुष्य पशुओं के समान हैं। यह उपमा निन्दा के लिए नहीं, बल्कि जागरण के लिए है। पशु भी केवल आहार, निद्रा, भय और मैथुन में ही संलग्न रहते हैं; यदि मनुष्य भी केवल इन्हीं प्रवृत्तियों में लीन रहकर अपने विवेक, आत्मचिन्तन और ब्रह्मबोध की क्षमता का उपयोग नहीं करता, तो वह अपने मानवीय गौरव को खो देता है।
उपनिषद् भी इसी सत्य को प्रतिपादित करती हैं - “इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः” यदि इस जीवन में आत्मा का ज्ञान हो जाए, तो जीवन सफल है; अन्यथा महान् हानि है। भगवद्गीता में भी कहा गया है - “आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्” ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य और पशु दोनों में समान हैं; किन्तु मनुष्य का विशिष्टत्व विवेक और आत्मबोध में है।
अतः, इस श्लोक का गूढ़ सन्देश यह है कि मानव जीवन अत्यन्त दुर्लभ और मूल्यवान है, और इसका परम प्रयोजन आत्मज्ञान की प्राप्ति है। ब्रह्मवृत्ति जो इस ज्ञान का साधन है का परित्याग करना, इस दुर्लभ अवसर को व्यर्थ गंवाना है।
निष्कर्षतः भगवद्पादाचार्य साधक को यह प्रेरणा देते हैं कि वह ब्रह्मवृत्ति को दृढ़तापूर्वक धारण करे, उसका निरन्तर अभ्यास करे, और उसे अपने जीवन का केन्द्र बनाए। यही वृत्ति जीवन को पवित्र, सार्थक और मुक्तिदायी बनाती है। इसके बिना जीवन केवल बाह्य गतिविधियों का प्रवाह है, जिसमें न सत्य का बोध है, न परम आनन्द की अनुभूति।
अतः, साधक को चाहिए कि वह सजग, सतर्क और दृढ़ संकल्प के साथ इस ब्रह्मवृत्ति का पालन करे; क्योंकि यही मानव जीवन की सच्ची सार्थकता और परम सिद्धि का मार्ग है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#AvdheshanandG_Quotes
लयस्तमश्च विक्षेपो रसस्वदाश्च शून्यता।
एवं यद्विघ्नबाहुल्यं त्याज्यं ब्रह्मविद्या शनैः।।१२८।।
("अपरोक्षानुभूति")
अद्वैत-वेदान्त के परमाचार्य भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् श्रीआदि शंकराचार्य इस श्लोक में साधना-पथ के अत्यन्त सूक्ष्म और गूढ़ विघ्नों का निरूपण करते हैं। जहाँ पूर्व श्लोक में उन्होंने अनुशासनहीनता, आलस्य और भोगलालसा जैसे सामान्य अवरोधों की ओर संकेत किया था, वहीं यहाँ वे उन आन्तरिक, सूक्ष्मतम बाधाओं का उद्घाटन करते हैं, जो विशेषतः उन्नत साधकों के लिए भी अत्यन्त चुनौतीपूर्ण सिद्ध होती हैं। ये विघ्न इतने सूक्ष्म होते हैं कि साधक प्रायः इन्हें साधना की उपलब्धि समझ बैठता है। अतः आचार्य सावधान करते हैं कि इनका त्याग क्रमशः, विवेकपूर्वक किया जाए।
(१) “लयः” -
लय का अर्थ है - मन का अविवेचित शान्त हो जाना-एक प्रकार की निद्रा या जड़ता, जिसमें विचार तो शान्त हो जाते हैं, किन्तु जागरूकता का अभाव होता है। यह वास्तविक समाधि नहीं, बल्कि अज्ञान का सूक्ष्म आवरण है। साधक इसे शान्ति समझकर भ्रमित हो सकता है, किन्तु यह केवल चेतना का अस्थायी लोप है। अद्वैत की दृष्टि में समाधि जागरूकता की पराकाष्ठा है, न कि चेतना का लय।
(२) “तमः” -
तमसिक जड़ता, अज्ञान और अविवेक का प्रतीक है। यह मन को भारी, मन्द और निष्क्रिय बना देता है। उपनिषद् कहती हैं - “अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः” अज्ञान में स्थित व्यक्ति स्वयं को ज्ञानी समझता है। तामसिक वृत्ति साधक को प्रमाद, मोह और भ्रम में रखती है, जिससे वह सत्य की ओर अग्रसर नहीं हो पाता।
(३) “विक्षेपः” -
विक्षेप मन की चंचलता है - वह प्रवृत्ति जो साधक को बार-बार विषयों की ओर ले जाती है। यह रजोगुण का परिणाम है। भगवद्गीता में अर्जुन के द्वारा व्यक्त “चञ्चलं हि मनः” इसी विक्षेप का द्योतक है। यह विघ्न साधक को एकाग्रता से दूर कर, बाह्य जगत् में उलझा देता है।
(४) “रसस्वादः” -
यह अत्यन्त सूक्ष्म विघ्न है। साधक जब ध्यान या समाधि में कुछ आनन्द का अनुभव करता है, तो वह उसी में आसक्त हो जाता है। यह आनन्द यद्यपि शुद्ध प्रतीत होता है, किन्तु यह अभी भी वृत्ति-जन्य है अर्थात् यह आत्मानन्द नहीं, बल्कि मानसिक अवस्था का सुख है। इस “रस” का आस्वादन साधक को आगे बढ़ने से रोक देता है, क्योंकि वह इसे ही अन्तिम लक्ष्य समझ बैठता है।
(५) “शून्यता” -
शून्यता का अनुभव भी एक विघ्न है, जब साधक सब कुछ नकारकर एक प्रकार की रिक्तता में ठहर जाता है। यह नास्तित्व या शून्यभाव अद्वैत का लक्ष्य नहीं है। अद्वैत में सत्य शून्य नहीं, बल्कि पूर्ण, स्वयंप्रकाश चैतन्य है। यदि साधक शून्यता को ही अन्तिम सत्य मान लेता है, तो वह ब्रह्मस्वरूप की सकारात्मक अनुभूति से वंचित रह जाता है।
भगवद्पादाचार्य कहते हैं - “एवं यद्विघ्नबाहुल्यं” इस प्रकार ये विविध विघ्न साधना में प्रचुरता से उपस्थित होते हैं। यह साधना-पथ की स्वाभाविक अवस्था है। अतः साधक को निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि सजग रहकर इनका विवेकपूर्वक निराकरण करना चाहिए।
“त्याज्यं ब्रह्मविद्या शनैः” - इन सभी विघ्नों का परित्याग “शनैः” धीरे-धीरे, क्रमशः करना चाहिए। यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण निर्देश है। साधना में अधीरता या बलपूर्वक दमन नहीं, बल्कि धैर्य, विवेक और निरन्तर अभ्यास आवश्यक है। ब्रह्मविद्या का मार्ग सूक्ष्म है; यहाँ प्रत्येक बाधा को पहचानकर, समझकर और अतिक्रमित करना होता है।
दार्शनिक दृष्टि से ये सभी विघ्न अविद्या के ही विभिन्न रूप हैं। कभी जड़ता के रूप में, कभी चंचलता के रूप में, कभी सुखासक्ति के रूप में, और कभी शून्यवाद के रूप में। अद्वैत का लक्ष्य इन सबके अतिक्रमण द्वारा उस चैतन्यस्वरूप में स्थित होना है, जो न लय है, न तमस, न विक्षेप, न रस, न शून्यता अपितु इन सबका साक्षी, स्वयंप्रकाश, नित्य ब्रह्म है।
अतः, आचार्य शंकर का यह उपदेश साधक को सूक्ष्म विवेक, धैर्य और निरन्तर साधना की ओर प्रेरित करता है। यह श्लोक चेतावनी भी है और मार्गदर्शन भी कि साधना के पथ पर आने वाले इन सूक्ष्म विघ्नों को पहचानकर, उनसे ऊपर उठकर ही साधक आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता को प्राप्त कर सकता है।
निष्कर्षतः, लय, तमस, विक्षेप, रसास्वाद और शून्यता ये सभी साधना के मार्ग में आने वाले सूक्ष्म आवरण हैं। इन्हें क्रमशः त्यागकर ही साधक उस परम ब्रह्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होता है, जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त है। यही अद्वैत वेदान्त की चरम सिद्धि है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#AvdheshanandG_Quotes
“भगवद्पाद भाष्यकार भगवान् आदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी के प्रकटोत्सव” पर “पूज्य आचार्यश्री जी” का दो दिवसीय नर्मदा तट ओंकारेश्वर प्रवास: “अद्वैत से एकात्मता का अलौकिक शंखनाद “ !
कल्याणी मोक्षदा पुण्य सलिला माँ नर्मदा की कल-कल बहती पावन धारा, मांधाता पर्वत की धवल दिव्यता और अद्वैत की अजस्र गूंज-ओंकारेश्वर की तपोभूमि पर “आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास” द्वारा भारतीय चेतना के पुनर्जागरण का अनुष्ठान “भगवद्पाद भाष्यकार भगवान् आद्य श्रीशंकराचार्य जी का प्रकटोत्सव” “एकात्म पर्व’ का महामहोत्सव आयोजन हुआ। इस दिव्य महोत्सव को श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ, जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज (“पूज्य आचार्यश्री जी”) के पावन सान्निध्य ने आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की।
महोत्सव की पूर्व संध्या में सायंकालीन सत्र का आकाश ‘शंकर संगीत दीक्षांत समारोह’ की दिव्य स्वरों से आप्लावित रहा। भगवान भाष्यकार आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य जी की दीक्षा भूमि पर जब ‘शंकरदूतों’ के कण्ठ से उनके रचित स्तोत्र प्रस्फुटित हुए, तो संपूर्ण वातावरण एकात्मभाव में विलीन हो गया। १० दिवसीय ‘अद्वैत जागरण शिविर’ के कठिन व्रत अनुशीलन, उपनिषदों के मर्म और ब्रह्मविद्या के स्वाध्याय से तपकर निकले ये साधक अब समाज में सनातन ज्ञान के संवाहक बनकर उभर रहे हैं। इस अवसर पर चिन्मय मिशन के पूज्य स्वामी प्रबोधानन्द सरस्वती जी, पूज्य स्वामी सदविद्यानन्द सरस्वती जी, पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी नर्मदानन्द जी, न्यास के सीईओ डॉ. मनीष पांडेय जी की उपस्थिति रही।
तदनंतर श्री शंकर भगवत्पाद के आविर्भाव का मांगलिक अनुष्ठान "शंकरावतरणम्" का उदय नवीन संकल्पों के साथ हुआ। प्रातःकाल नर्मदा तट पर शिविरार्थियों ने विधिवत ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षा ग्रहण कर स्वयं को एकात्मता, लोक-सेवा और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पित किया। यह क्षण व्यक्तिगत अस्तित्व के समष्टि में विलय का जीवंत प्रमाण बना।
पूज्य आचार्यश्री जी की दिव्य सन्निधि में आयोजित इस आध्यात्मिक अनुष्ठान की पूर्णता चिन्मय मिशन के प्रमुख परम पूज्य स्वामी तेजोमयानन्द जी सरस्वती, दक्षिणामूर्ति पीठाधीश्वर परम पूज्य अनंतश्री विभूषित स्वामी पुण्यानन्द गिरि जी महाराज एवं मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक एवं धर्मस्व न्यास मंत्री श्री धर्मेन्द्र सिंह लोधी जी की गरिमामयी उपस्थिति में हुई।
पूज्य आचार्यश्री जी ने सारस्वत प्रबोधन प्रदान करते हुए अद्वैत वेदांत की वर्तमान प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भगवान् आद्य शंकराचार्य जी का प्रादुर्भाव केवल एक सत्पुरुष का आविर्भाव ही नहीं, बल्कि भारतीय मनीषा और सनातन धर्म संस्कृति के पुनरुद्धार का अवतरण सिद्ध हुआ पूज्य आचार्यश्री ने कहा कि
"अद्वैत केवल बौद्धिक विमर्श नहीं, जीवन का सत्य है" आचार्यश्री ने रेखांकित किया कि भगवान भाष्यकार का उद्घोष "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मैव नापरः" समष्टि की एकात्मता का महामंत्र है। जब साधक अपने भीतर उसी ब्रह्म का साक्षात्कार करता है, तब वह समस्त प्राणिमात्र के मध्य विद्यमान भेदभाव का अतिक्रमण कर लेता है। अद्वैत केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग तो है हो साथ ही सामाजिक समरसता और मानवीय एकता का आधार भी है। ज्ञान, भक्ति और कर्म की त्रिवेणी ही सनातन धर्म के युगानुकूल उत्थान का मूलमंत्र है।
“आचार्यश्रीजी “ ने शंकर दूतों का आह्वान किया कि भगवद्पाद द्वारा स्थापित चार पीठ भारत की सांस्कृतिक अखंडता के जीवंत प्रतीक हैं। आज की सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके दिव्य विचारों को आचरण में ढालें और भारत को पुनः ज्ञान, करुणा और अध्यात्म का 'आलोकस्तम्भ' बनाने का संकल्प लें।
इस विशिष्ट अवसर पर मंचस्थ विभूतियों में श्री श्री माँ पूर्ण प्रज्ञा जी, विद्वत शिरोमणि गौतम भाई पटेल, महंत मंगलदास त्यागी जी, ब्रह्मर्षि कुप्प शिव सुब्रमण्यम अवधानी जी एवं पूज्य स्वामी स्वयंप्रकाशानन्द जी महाराज रहे।
साथ ही आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के सीईओ श्री मनीष पांडेय जी, विधायक खंडवा श्रीमती कंचन तनवे जी, मांधाता विधायक श्री नारायण पटेल जी, जिलाधीश श्री ऋषव गुप्ता जी, एसएसपी श्री मनोज कुमार राय जी, एडिशनल एसपी श्री राजेश रघुवंशी जी, श्री दादाजी धूनीवाले ट्रस्ट के न्यासी धर्मेन्द्र बजाज जी सहित संतमण्डली, मूर्धन्य विद्वानों एवं गणमान्य नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति रही।जिन्होंने 'एकात्म पर्व' के इस वैचारिक अनुष्ठान में सहभागिता की।
#शंकराचार्य_जयन्ती #भगवद्पादाचार्य #सनातन_संस्कृति
#आचार्यशंकरसांस्कृतिकएकतान्यास #oneness #ekatmadham #ओंकारेश्वर #नर्मदा
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।
यन्मौनं योगिभिर्गम्यं तद्भजेत्सर्वदा बुधः ।।१०७।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति)
यह श्लोक भगवत्पादाचार्य की अद्वैतदृष्टि का अत्यन्त गूढ़ और परमार्थमय प्रतिपादन है। यहाँ उस सत्य का निरूपण है, जो मन और वाणी दोनों की पहुँच से परे है। आत्मतत्त्व न इन्द्रियों का विषय है, न विचार का, न ही शब्दों से बँधने योग्य; वह तो स्वयं मन, वाणी और समस्त ज्ञान-प्रक्रिया का अधिष्ठान है। इसलिए श्रुति कहती है कि जहाँ पहुँचकर वाणी और मन लौट आते हैं, वही परम सत्य है।
यहाँ “मौन” का अर्थ केवल न बोलना नहीं है। अद्वैत में मौन वह आन्तरिक स्थिति है, जहाँ मन के संकल्प-विकल्प शान्त होकर आत्मस्वरूप में विलीन होने लगते हैं। यह जड़ता या रिक्तता नहीं, बल्कि आत्मा के स्वप्रकाश चैतन्य में स्थित होने की अवस्था है। इसी मौन को योगीजन अन्तर्मुख साधना, चित्तशुद्धि और आत्मनिष्ठा के द्वारा प्राप्त करते हैं।
अतः यह श्लोक साधना के एक अत्यन्त सूक्ष्म सत्य को उद्घाटित करता है कि सत्य की अन्तिम अनुभूति शब्दों के विस्तार में नहीं, मौन की परिपक्वता में होती है। बाह्य निःशब्दता उसका प्रारम्भ हो सकती है, किन्तु वास्तविक मौन वह है जहाँ मन की द्वैतात्मक वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं और आत्मा का अखण्ड चिदानन्दरूप स्वभाव स्वयं प्रकाशमान हो उठता है। यही मौन योगियों का गम्य है, यही वेदान्त का अन्तिम विश्राम है, यही बुद्धिमानों का नित्य भजन है।
भगवत्पादाचार्य का यह वचन साधक को स्मरण कराता है कि परम सत्य वाणी के वैभव में नहीं, अन्तर्मौन की निर्मलता में प्रकट होता है। जो तत्त्व मन और वाणी से अतीत है, वही आत्मा का सत्य स्वरूप है। अतः विवेकी पुरुष को चाहिए कि वह उसी शब्दातीत, मनातीत, योगिगम्य ब्रह्ममौन का निरन्तर आश्रय ग्रहण करे। वही मौन ज्ञान की परिपक्वता है, वही आत्मनिष्ठा की चरम अवस्था है, और वही "अपरोक्षानुभूति" का दिव्य प्रकाश है।
अतः “तद्भजेत्सर्वदा बुधः” का तात्पर्य है कि विवेकी पुरुष को उसी शब्दातीत, मनातीत, योगिगम्य ब्रह्ममौन का निरन्तर आश्रय लेना चाहिए। यही मौन वेदान्त का अन्तिम विश्राम, आत्मसाक्षात्कार का द्वार और "अपरोक्षानुभूति" का मर्म है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#PrabhuShriKiLekhni
#AvdheshanandG_Quotes
#avdheshanandg_mission
#स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
"अपरोक्षानुभूति"
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे।
बहुत्वं तन्निषेधार्थं श्रुत्या गीतं च वै स्फुटम् ।।९८।।
यह श्लोक अद्वैत वेदान्त की परम निष्पत्ति का अत्यन्त उज्ज्वल उद्घोष है। यहाँ भगवान् आदि शंकराचार्य यह प्रतिपादित करते हैं कि जब साधक उस परावर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, जो कारण और कार्य, सूक्ष्म और स्थूल, पर और अपर, समस्त भेदों का अधिष्ठान है तब उसके कर्म क्षीण हो जाते हैं। साथ ही श्रुति ने बहुत्व के निषेध को भी अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है। इस प्रकार यह श्लोक दो महान् अद्वैतसिद्ध निष्कर्षों को एक सूत्र में बाँधता है - ब्रह्मदर्शन से कर्मबन्ध का उपशम और ब्रह्म में बहुत्वाभास का निरसन।
श्लोक का प्रथम चरण - “क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे” मुण्डकोपनिषद् के प्रसिद्ध वचन की स्मृति कराता है - “भिद्यते हृदयग्रन्थिः, छिद्यन्ते सर्वसंशयाः, क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे।” यहाँ “परावर” शब्द अत्यन्त अर्थगर्भित है। “पर” वह है जो सर्वथा Transcendent, निरुपाधिक, निर्विशेष, परमार्थतत्त्व है; “अवर” वह है जो उपाधियों, जगत्, नामरूप और व्यवहार में व्यक्त प्रतीत होता है। ब्रह्म ही इन दोनों का अधिष्ठान है वह परम भी है और सबमें व्याप्त भी; अतीत भी है और अन्तःस्थित भी। जब उसी ब्रह्म का साक्षात्कार होता है, तब जीव का देहाभिमान, कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान निवृत्त हो जाता है; और जहाँ कर्तृत्वाभिमान ही नहीं रहा, वहाँ कर्मबन्ध की सत्ता किस प्रकार शेष रह सकती है?
कर्म का सम्बन्ध आत्मा से नहीं, अपितु अज्ञानावच्छिन्न जीवभाव से है। आत्मा न कर्ता है, न भोक्ता; वह केवल स्वप्रकाश, असंग, अकर्ता, अभोक्ता चैतन्य है। किन्तु जब वही आत्मा देह, मन, बुद्धि और अहंकार के साथ मिथ्या तादात्म्य ग्रहण कर लेती है, तब “मैं करता हूँ”, “मैं भोगता हूँ”, “मैं सुखी हूँ”, “मैं दुःखी हूँ” ऐसी भ्रान्त धारणाएँ उत्पन्न होती हैं। इन्हीं से कर्मसंचय, पुनर्जन्म, प्रारब्ध, आगामि और संसारचक्र की समस्त कल्पना खड़ी होती है। परन्तु जब ब्रह्मदर्शन होता है, तब यह मूलभूत भ्रान्ति ही भंग हो जाती है। अध्यास के नष्ट होने पर अध्यासजन्य कर्मबन्ध भी टिक नहीं सकता। रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प से उत्पन्न भय शेष नहीं रहता; उसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार के उदय पर कर्म का बन्धन परमार्थतः निवृत्त हो जाता है।
यहाँ “क्षीयन्ते” पद का अर्थ भी सूक्ष्म रूप से समझना आवश्यक है। इसका अभिप्राय यह नहीं कि आत्मा पर वास्तव में चिपके हुए कर्म किसी भौतिक वस्तु की तरह गिर पड़ते हैं। अद्वैत वेदान्त की दृष्टि में कर्मबन्ध आत्मा का स्वाभाविक धर्म नहीं, अज्ञानजन्य अध्यास है। अतः ज्ञान के उदय पर कर्मों का क्षय वस्तुतः उनके मिथ्यात्व के प्रकाशन के रूप में है। वे उसी अर्थ में क्षीण होते हैं, जैसे स्वप्न के पुण्य-पाप जागरण पर क्षीण हो जाते हैं, या जैसे मरीचिका का जल ज्ञान होने पर नष्ट माना जाता है। आत्मा तो कभी उनसे बँधी ही नहीं थी; ज्ञान केवल इस सत्य को प्रकाशित करता है।
श्लोक का उत्तरार्ध - “बहुत्वं तन्निषेधार्थं श्रुत्या गीतं च वै स्फुटम्” अद्वैत के दार्शनिक हृदय पर प्रकाश डालता है। श्रुति ने बहुत्व के निषेध को स्पष्ट रूप से कहा है। “नेह नानास्ति किञ्चन”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, “एकमेवाद्वितीयम्” ये महावाक्य और उपनिषद्वचन यही प्रतिपादित करते हैं कि जो बहुत्व, भेद, पृथक्-पृथक् सत्ता, जीव-जगत्-ईश्वर का द्वैत या बहुविधानुभव हमें प्रतीत होता है, वह परमार्थतः सत्य नहीं; यह अज्ञानजन्य नामरूप-विस्तार है। श्रुति का प्रयोजन इसी बहुत्वबुद्धि का निरसन कर साधक को अद्वैतबोध में प्रतिष्ठित करना है।
बहुत्व का निषेध केवल दार्शनिक तर्क नहीं; यही मोक्ष का आधार है। जब तक बहुत्व सत्य प्रतीत होता है, तब तक “मैं” और “दूसरा”, “यह” और “वह”, “लाभ” और “हानि”, “प्रिय” और “अप्रिय” के समस्त विभाजन बने रहते हैं। इन्हीं से राग-द्वेष, स्पर्धा, भय, शोक, मोह और कर्मचक्र का पोषण होता है। परन्तु जब श्रुति के उपदेश, गुरु के अनुग्रह, मनन और निदिध्यासन से यह स्पष्ट हो जाता है कि बहुत्व केवल प्रतीतिमात्र है और अधिष्ठान केवल एक ब्रह्म है, तब मनुष्य भेदबुद्धि से ऊपर उठकर समत्व और आत्मनिष्ठा में स्थित होने लगता है। यही ज्ञान कर्मक्षय का कारण है; क्योंकि कर्म का आधार ही बहुत्वबुद्धि और कर्तृत्वाभिमान है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#PrabhuShriKiLekhni
#AvdheshanandG_Quotes
#avdheshanandg_mission
#स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
"अपरोक्षानुभूति"
उत्पन्नेऽप्यात्मविज्ञाने प्रारब्धं नैव मुञ्चति।
इति यच्छ्रूयते शास्त्रात्तन्निराक्रियतेऽधुना ।।९०।।
यह श्लोक अद्वैत वेदान्त के एक अत्यन्त सूक्ष्म, प्रायः चर्चित और साधकों के मन में बार-बार उठने वाले प्रश्न को अपने समक्ष रखता है। प्रश्न यह है कि यदि आत्मज्ञान हो जाने पर अविद्या का नाश हो जाता है, तो फिर ज्ञानी के लिए प्रारब्ध कर्म का अस्तित्व क्यों स्वीकार किया जाता है? शास्त्रों में यह भी कहा जाता है कि आत्मज्ञान होने पर भी प्रारब्ध देह के स्तर पर चलता रहता है। भगवद्पादाचार्य इस श्लोक में उसी शास्त्रप्रसिद्ध धारणा को सामने रखकर कहते हैं कि अब उसका निराकरण किया जायेगा। इस प्रकार यह श्लोक केवल कोई मत-उद्धरण नहीं, बल्कि एक गम्भीर दार्शनिक विवेचन का द्वार है।
“उत्पन्नेऽपि आत्मविज्ञाने” अर्थात् आत्मतत्त्व का यथार्थ ज्ञान प्रकट हो जाने पर। यहाँ ‘आत्मविज्ञान’ से आशय केवल शाब्दिक या बौद्धिक जानकारी नहीं, बल्कि उस अपरोक्ष अनुभूति से है, जिसमें साधक प्रत्यक्षतः जान लेता है कि वह न देह है, न मन, न बुद्धि, न अहंकार; वह शुद्ध, नित्य, असंग, साक्षिरूप ब्रह्मस्वरूप आत्मा है। ऐसा ज्ञान उदित होने पर अविद्या का मूल नष्ट हो जाता है। और जब मूल अविद्या ही न रही, तब उससे उत्पन्न देहाभिमान, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और कर्मबन्धन की सत्ता भी तत्त्वतः कैसे रह सकती है? यही इस विचार का मूल तर्क है।
किन्तु शास्त्र में कहीं-कहीं यह कहा गया है कि ज्ञान होने पर भी प्रारब्ध कर्म नहीं छूटता - “प्रारब्धं नैव मुञ्चति।” इस कथन का उद्देश्य क्या है? क्या वास्तव में ज्ञानी पुरुष भी पूर्वकृत कर्मों के अधीन बँधा रहता है? क्या ज्ञान के पश्चात भी कोई बन्धन-शेष मानना पड़ेगा? यदि ऐसा मान लिया जाए, तो आत्मज्ञान की पूर्णता पर आक्षेप उपस्थित होता है; क्योंकि जहाँ बन्धन का किंचित् भी अंश शेष है, वहाँ मोक्ष को कैसा नित्यमुक्त स्वरूप कहा जाएगा? इसीलिए आदि शंकराचार्य कहते हैं - “तन्निराक्रियतेऽधुना” अब उसका निरसन किया जाता है।
शाङ्करवेदान्त की दृष्टि से यह बात भलीभाँति समझनी चाहिए कि कर्म का सम्बन्ध सदा कर्ता से होता है, और कर्तृत्व का सम्बन्ध अहंकार तथा देहाभिमान से। आत्मा स्वयं न कर्ता है, न भोक्ता; वह तो केवल साक्षी चैतन्य है। उपनिषदों ने उसे “असङ्ग”, “अकर्ता”, “अभोक्ता”, “निष्क्रिय”, “शुद्ध”, “अपापविद्ध” कहा है। अतः जिस आत्मा का ज्ञान हुआ, वह न कभी कर्म करता है और न कर्मफल भोगता है। कर्म और कर्मफल का समस्त व्यवहार अविद्यावश कल्पित जीव, अर्थात् देहाभिमानी अहंकार, के साथ जुड़ा हुआ है। जब ज्ञान से वही मिथ्या जीवभाव निवृत्त हो गया, तब प्रारब्ध किसका रहेगा?
यहाँ एक सूक्ष्म भेद समझना आवश्यक है। शास्त्र कभी-कभी प्रारब्ध की चर्चा ज्ञानी के परमार्थस्वरूप के लिए नहीं, अपितु अज्ञानी-दृष्टि से करते हैं। जब सामान्य जन देखते हैं कि आत्मज्ञानी का शरीर ज्ञान के पश्चात भी कुछ समय तक बना रहता है, वह चलता-फिरता है, बोलता है, रोगी भी पड़ सकता है, भोजन भी करता है, तब उनके प्रश्न का समाधान करने के लिए शास्त्र कह देता है कि यह देह प्रारब्धवश चल रही है। परन्तु यह उत्तर व्यवहारदृष्टि का है, परमार्थदृष्टि का नहीं। परमार्थतः जहाँ केवल ब्रह्म ही सत्य है, वहाँ देह, जीव, कर्म, प्रारब्ध सभी अविद्याकल्पित हैं। ज्ञान होने पर इनकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रह जाती।
अद्वैत वेदान्त में यह भलीभाँति प्रतिपादित है कि अविद्या ही संसार की मूल कारणरूप उपपत्ति है। देह उसी अविद्या का अध्यारोप है; जीवभाव उसी का परिणाम; और कर्म-बन्धन भी उसी का प्रसार। जब ज्ञान से अविद्या ही भस्म हो गई, तब उसके कार्यों की परम सत्यता कैसे स्थिर रह सकती है? जिस रज्जु में सर्प का भ्रान्ति-ज्ञान मिट गया, वहाँ क्या सर्प के फुफकारने, डसने या चलने की बात शेष रह सकती है? जिस शुक्तिका में रजत-बुद्धि दूर हो गई, वहाँ क्या रजत के लेन-देन का कोई औचित्य बचता है? इसी प्रकार आत्मज्ञान में देहाभिमान का मूल कारण ही नष्ट हो जाता है। तब प्रारब्ध की सत्ता भी केवल अज्ञानियों की दृष्टि में रह सकती है, ज्ञानी की दृष्टि में नहीं।
यही कारण है कि आचार्य इस मत का निराकरण करने जा रहे हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि प्रारब्ध की स्वीकृति अन्तिम सिद्धान्त नहीं है; वह केवल साधक या सामान्य जन की समझ के लिए एक उपपत्तिमात्र है। वस्तुतः ज्ञानी के लिए न जन्म है, न मृत्यु, न बन्धन, न मोक्ष, न साधक, न सिद्ध; क्योंकि आत्मा तो सदा एकरस, अखण्ड, अद्वितीय और निष्क्रिय है। उसमें न कर्म का संसर्ग है, न फल का, न बन्धन का। अतः ज्ञान के पश्चात प्रारब्ध का आग्रह करना, अन्ततः, देहात्मबुद्धि की कोई सूक्ष्म छाया शेष रखना है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta
नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ - लोकमंगल, नारी-सम्मान एवं सनातन संस्कार-वैभव का अद्वितीय महोत्सव “शगुन विवाह उत्सव 2026” !!
भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित “द जोरा कन्वेंशन सेन्टर”, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम उस दिव्य, मंगलमय एवं करुणा-संवलित ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना, जब श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ अनन्तश्रीविभूषित जूनापीठाधीश्वर आचार्यमहामण्डलेश्वर पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज "पूज्य आचार्यश्री जी" के पावन सान्निध्य में अवधेशानन्दजी मिशन (AvdheshanandG Mission), लाडली फाउंडेशन (Ladli Foundation) तथा राशि एंटरटेनमेंट (Rashi Entertainment) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “शगुन विवाह उत्सव 2026” के अंतर्गत 51 कन्याओं का सामूहिक विवाह-संस्कार अद्वितीय गरिमा, मंगलानुभूति और सांस्कृतिक उदात्तता के साथ सम्पन्न हुआ।
यह आयोजन केवल एक सामाजिक उपक्रम न होकर, भारतीय जीवन-दर्शन में प्रतिष्ठित विवाह-संस्कार की शुचिता, पावनता एवं दायित्व-बोध का मूर्त उत्सव बनकर अभिव्यक्त हुआ। नवदम्पतियों के जीवन में मंगलप्रदीप प्रज्वलित करने वाला यह समारोह वस्तुतः समाज-संवेदना, सांस्कृतिक संरक्षण, नारी-गरिमा और लोकमंगल का एक विराट यज्ञ सिद्ध हुआ।
इस पुण्यप्रद एवं गौरवगर्भित अवसर पर भारत गणराज्य के 14वें महामहिम राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविन्द जी तथा दिल्ली प्रदेश की माननीया मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता जी की विशिष्ट उपस्थिति ने समारोह की प्रतिष्ठा को और भी उत्कर्ष प्रदान किया। उनकी गरिमामयी सहभागिता ने इस महनीय सामाजिक-सांस्कृतिक अभियान को राष्ट्रीय महत्त्व का आलोक प्रदान किया।
समारोह में केन्द्रीय खेल एवं युवा कल्याण राज्यमंत्री श्रीमती रक्षा खड़से जी, दिल्ली सरकार के गृह, शिक्षा एवं विद्युत मंत्री आदरणीय श्री आशीष सूद जी, देश के शीर्षस्थ प्रशासनिक अधिकारीगण तथा अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे, जिनकी सहभागिता ने इस आयोजन को बहुआयामी गौरव से मंडित किया।
इस विराट आयोजन को ऐतिहासिक ऊँचाइयों तक पहुँचाने में अवधेशानन्दजी मिशन के न्यासी एवं लाडली फाउंडेशन के प्रमुख श्री देवेन्द्र गुप्ता जी, उनकी सहधर्मिणी तथा लाडली फाउंडेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्रीमती पंखुड़ी गुप्ता जी के अथक परिश्रम, समर्पित भाव, दूरदर्शी नेतृत्व एवं उनकी दक्ष टीम-संयोजना की विशेष भूमिका रही। उनके प्रयासों ने इस आयोजन को केवल सुव्यवस्थित ही नहीं, अपितु भाव, भव्यता और करुणा से अनुप्राणित एक जीवन्त लोकमंगल-अभियान का स्वरूप प्रदान किया।
इस मंगल-वेला में श्रीमती सविता कोविन्द जी, सुश्री स्वाति कोविन्द जी, पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी नैसर्गिका गिरि जी, पूज्य महामण्डलेश्वर श्री स्वामी ललितानन्द गिरि जी महाराज, राशि एंटरटेनमेंट के प्रमुख श्री राजीव जैन जी, जोरा कन्वेंशन सेंटर के प्रमुख श्री आशीष गुप्ता जी, समाजसेवी श्री अमर सरीन जी, पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी श्री अवधेश माथुर जी, सुलभ इंटरनेशनल समूह के श्री दिलीप पाठक जी, प्रसिद्ध उद्योगपति श्री अजय गुप्ता जी, श्रीमती आभा कुमार जी, अवधेशानन्दजी मिशन (यूएसए, लॉस एंजलिस) के न्यासी श्री अभिजीत जी, श्रीमती मालिनी दोषी जी, श्री प्रवीण नरूला जी तथा श्री रोहित माथुर जी सहित अनेक विशिष्ट एवं प्रतिष्ठित जनों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
नव-विवाहित वर-वधुओं को मंगलाशीष प्रदान करते हुए “पूज्य आचार्यश्री जी” ने अपने आशीर्वचनों में प्रतिपादित किया कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का संयोग नहीं, अपितु दो कुलों, दो संस्कार-परम्पराओं, दो जीवन-दृष्टियों और दो हृदय-संसारों का पावन एवं उत्तरदायित्वपूर्ण समन्वय है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह दाम्पत्य मूल्यों के निर्वहन निमित्त अनुबंध ही नहीं, बल्कि धर्म, प्रेम, समर्पण, मर्यादा, सहअस्तित्व और जीवनपर्यन्त उत्तरदायित्व का दिव्य संस्कार है। सामूहिक विवाह जैसे आयोजन समाज में समरसता, सहयोग, परस्पर करुणा, सेवा-संवेदना तथा सामाजिक न्याय की चेतना को सुदृढ़ करते हैं।
“पूज्य आचार्यश्री” के वचनों में भारतीय संस्कृति की वह कालजयी आत्मा मुखरित हुई, जो नारी को केवल परिवार की धुरी नहीं, अपितु संस्कार, शक्ति, सौम्यता और सृष्टि-संतुलन की अधिष्ठात्री चेतना के रूप में देखती है। इस दृष्टि से यह आयोजन केवल 51 कन्याओं के विवाह का संस्कार न रहकर, नारी-सम्मान की पुनर्पुष्टि, सामाजिक उत्तरदायित्व की प्रतिष्ठा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के पुनरभिषेक का एक दिव्य पर्व बन गया।
#AvdheshanandG_Mission
@ramnathkovind@gupta_rekha@khadseraksha@ashishsood_bjp@FoundationLadli@RashiEnt
#शगुन_विवाह_उत्सव_2026
#सामूहिक_विवाह #Delhi
"अपरोक्षानुभूति"
यद्वदग्नौ मनित्वं हि मनौ वा वह्निता पुमान् ।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ।।८३।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति)
अद्वैत वेदान्त का समस्त तत्त्वचिन्तन एक मूल तथ्य पर आश्रित है - आत्मा कभी बन्धनग्रस्त नहीं होती, किन्तु अज्ञानवश बन्धनयुक्त प्रतीत होती है। यही प्रतीति संसार है, यही भ्रान्ति जीवत्व है, और यही अध्यास समस्त शोक-मोह, राग-द्वेष, जन्म-मरण और कर्तृत्व-भोक्तृत्व का आधार है। भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य अपरोक्षानुभूति के इस श्लोक में अत्यन्त सरल किन्तु मर्मवेधी दृष्टान्त के माध्यम से इसी अध्यासतत्त्व का निरूपण करते हैं। श्लोक कहता है - "यद्वदग्नौ मनित्वं हि मनौ वा वह्निता पुमान् ।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ।।" अर्थात् जैसे अज्ञानवश मनुष्य अग्नि में मणित्व की, अथवा मणि में अग्नित्व की कल्पना कर लेता है, वैसे ही अज्ञानयोग से आत्मा में देहत्व का दर्शन करता है। यहाँ श्लोक का सारा दार्शनिक बल “अज्ञानयोगतः” इस पद में निहित है। आत्मा वास्तव में देह नहीं है; देह वास्तव में आत्मा नहीं है; किन्तु अज्ञान के संयोग से दोनों के बीच ऐसा तादात्म्य मान लिया जाता है कि मनुष्य कह उठता है कि "स्थूल हूँ”, “मैं दुर्बल हूँ”, “मैं वृद्ध हूँ”, “मैं रोगी हूँ”, “मैं मर जाऊँगा।” यही वह मूल भ्रान्ति है जिसे शाङ्करवेदान्त “अध्यास” कहता है।
श्लोक में दो वस्तुओं का उल्लेख है - अग्नि और मणि। अग्नि का स्वभाव दाहकता, प्रकाश और ताप है; मणि का स्वभाव चमक, कान्ति, प्रतिबिम्ब और सौन्दर्य है। कभी दूर से, कभी आभा के कारण, कभी दृष्टिभ्रम से, कभी अज्ञानवश मनुष्य चमकती हुई अग्नि को मणि समझ बैठता है, और कभी देदीप्यमान मणि को अग्नि के समान मान लेता है। वस्तुतः दोनों भिन्न हैं, किन्तु भ्रान्ति में एक का धर्म दूसरे पर आरोपित हो जाता है।
यही अद्वैत का मूल प्रतिपाद्य है - 'अन्यस्य धर्मः अन्यस्मिन् आरोप्यते"। जो देह का धर्म है जन्म, वृद्धावस्था, जड़ता, दुःख, रोग, परिवर्तन, देश-काल-परिच्छेद उसे आत्मा पर आरोपित कर दिया जाता है। और जो आत्मा का धर्म है चैतन्य, साक्षित्व, असङ्गता, नित्यत्व, अविकारिता, स्वप्रकाशता उसे देह, मन और इन्द्रियों पर आरोपित कर दिया जाता है। इसी कारण जड़ देह भी “मैं” के रूप में अनुभूत होती है, और चेतन आत्मा स्वयं सीमित व्यक्ति के रूप में प्रतीत होती है।
इसी तत्त्व को भगवद्पादाचार्य ने ब्रह्मसूत्रभाष्य की भूमिका में अध्यास की परिभाषा देते हुए कहा है कि “स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः” पूर्वानुभूत वस्तु का किसी अन्य अधिष्ठान में अवभास ही अध्यास है। रज्जु में सर्प, शुक्तिका में रजत, स्थाणु में पुरुष, मरुस्थल में जल ये सब इसी अध्यास के उदाहरण हैं। यहाँ अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक उसी श्रेणी में एक नया और सूक्ष्म उदाहरण है - अग्नि और मणि के मध्य भ्रान्ति।
इस श्लोक की पृष्ठभूमि में एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अद्वैत सिद्धान्त है जो आत्मा और देह का सम्बन्ध वास्तविक नहीं, केवल अविद्याजन्य प्रतीतिमात्र है। यदि दोनों एक ही होते, तो कभी मोक्ष सम्भव न होता; यदि सर्वथा असम्बद्ध होते, तो अनुभव में उनका तादात्म्य प्रतीत न होता; अतः अद्वैत कहता है कि यह सम्बन्ध अध्यासजनित है।
उपनिषदों का निष्कर्ष स्पष्ट है कि “असङ्गो ह्ययं पुरुषः” यह पुरुष (आत्मा) असंग है। (बृहदारण्यक उपनिषद्) “न जायते म्रियते वा कदाचित्” आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। (कठोपनिषद्) “अशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” जो अशरीरी है, उसे प्रिय-अप्रिय स्पर्श नहीं करते।(छान्दोग्य उपनिषद्) आत्मा का स्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वप्रकाश, निरवयव, निर्विकार और साक्षिरूप है। देह इसके विपरीत अनित्य, जड़, परिवर्तनशील, दृश्य, उपाधिमात्र और पंचभौतिक है। इस प्रकार दोनों के स्वभाव में वैरूप्य है। जहाँ आत्मा द्रष्टा है, देह दृश्य है; जहाँ आत्मा साक्षी है, देह साक्ष्य है; जहाँ आत्मा स्वतःसिद्ध है, देह परतन्त्र है; जहाँ आत्मा निरवयव है, देह अवयवयुक्त है। किन्तु मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव में इस भेद को नहीं जानता। वह शरीर के धर्मों को “मैं” में मिला देता है। यही श्लोक का मर्म है - जो “तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यति” मनुष्य आत्मा में देहत्व का दर्शन करता है। वह आत्मा को नहीं देखता, आत्मा पर आरोपित देहत्व को देखता है।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#PrabhuShriKiLekhni
#AvdheshanandG_Quotes
#avdheshanandg_mission
#स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
"अपरोक्षानुभूति"
अलातं भ्रमणेनैव वर्तुलं भाति सूर्यवत्।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः।।७९।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित "अपरोक्षानुभूति")
भगवत्पादाचार्य भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक अद्वैत वेदान्त के अत्यन्त सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक तत्त्व को सरल दृष्टान्त द्वारा प्रकाशित करता है। यहाँ “अलात” अर्थात् अग्नि से प्रज्वलित लकड़ी या मशाल का उदाहरण दिया गया है। जब उस जलती हुई लकड़ी को तीव्र गति से घुमाया जाता है, तो वह एक अखण्ड अग्नि-वृत्त के रूप में प्रतीत होती है; यद्यपि वास्तव में वहाँ कोई वृत्त नहीं है। वह केवल तीव्र गति से उत्पन्न भ्रान्ति है। उसी प्रकार, शुद्ध, निराकार, निर्विकार, साक्षीस्वरूप आत्मा में देहत्व का आरोप केवल अज्ञानजन्य भ्रान्ति है।
“अलात-चक्र” का यह दृष्टान्त भगवान् गौड़पादाचार्य कृत माण्डूक्यकारिका में भी प्रसिद्ध है- “अलातशान्ति-प्रकरण” में जगत् की मायिकता को इसी उदाहरण से प्रतिपादित किया गया है। आदि शंकराचार्य उसी परम्परा के समर्थ संवाहक हैं। जब अग्निदण्ड को घुमाया जाता है, तो न कोई वास्तविक वृत्त उत्पन्न होता है, न अग्नि का आकार परिवर्तित होता है, न कोई नई सत्ता प्रकट होती है। केवल नेत्रों की सीमा और गति की निरन्तरता के कारण भ्रान्ति उत्पन्न होती है। इसी प्रकार आत्मा कभी देह नहीं बनती, न उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व का कोई वास्तविक परिवर्तन होता है, न वह सीमित जीव में परिणत होती है। किन्तु अज्ञानयोगतः अविद्या के संसर्ग से आत्मा में देहत्व का आभास होता है।
उपनिषद् बारम्बार उद्घोष करती हैं कि “असंगो ह्ययं पुरुषः” यह पुरुष (आत्मा) सर्वथा असंग है।
“न जायते म्रियते वा कदाचित्” वह न जन्म लेता है, न मरता है।”अयमात्मा ब्रह्म” यही आत्मा ब्रह्म है। यदि आत्मा देहस्वरूप होती, तो वह जन्म, जरा, व्याधि और मृत्यु से बँध जाती। किन्तु उपनिषद् उसे सर्वथा निर्लेप और शाश्वत सिद्ध करती हैं। अतः देह का आत्मा में आरोप केवल अलात-चक्रवत् भ्रान्ति है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः”असत् का अस्तित्व नहीं, और सत् का अभाव नहीं। देह अनित्य है, परिवर्तनशील है। असत्-स्वरूप है। आत्मा नित्य, अविकार, सर्वव्यापक है; अतः सत् है। फिर भी अज्ञानवश मनुष्य कहता है कि मैं मोटा हूँ”, “मैं वृद्ध हूँ”, “मैं दु:खी हूँ।” यह “मैं” का देह में आरोप ही अज्ञानयोग है। गीता में स्पष्ट कहा गया है कि “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इस शरीर-क्षेत्र में जो जानने वाला है, वही मैं हूँ। आत्मा क्षेत्रज्ञ है; देह क्षेत्र है। दोनों का अभेद-बुद्धि भ्रान्ति है।
ब्रह्मसूत्र में कहा गया है कि “नात्मा शरीरस्य” आत्मा शरीर का धर्मी नहीं। शंकरभाष्य में स्पष्ट किया गया है कि आत्मा शरीर से सर्वथा भिन्न है; किन्तु अविद्या से देहाभिमान उत्पन्न होता है। यह देहाभिमान ही संसार-बन्धन का मूल है। जैसे अलात के भ्रम से वृत्त का आभास होता है, वैसे ही चैतन्य के निरन्तर प्रकाश में बुद्धि-वृत्तियों की गति से “अहं देहः’ का मिथ्या ज्ञान उत्पन्न होता है।
भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य अपने ब्रह्मसूत्र-भाष्य के प्रारम्भ में ही कहते हैं कि “स्मृतिरूपः परत्र पूर्वदृष्टावभासः” अध्यास वह है, जिसमें एक वस्तु में दूसरी वस्तु का आभास होता है। आत्मा और देह का यह परस्पर अध्यास ही संसार है। आत्मा की चैतन्यता देह में आरोपित होती है, तब देह ‘जीवित’ प्रतीत होती है। देह के धर्म (जन्म, मृत्यु, रोग, शोक) आत्मा में आरोपित होते हैं, तब जीव दु:खी प्रतीत होता है। किन्तु वास्तव में आत्मा सदा अलात से भिन्न अग्नि की भाँति स्वप्रकाश है।
अलात-चक्र दृष्टान्त यह भी सूचित करता है कि भ्रान्ति का उदय और लय, दोनों कालबद्ध हैं। सत्य पर उसका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं पड़ता। जैसे अलात-चक्र का आभास समाप्त होते ही केवल अग्नि-दण्ड शेष रहता है, वैसे ही ब्रह्मज्ञानोदय पर देहाभिमान लीन हो जाता है, जीवत्व का मिथ्यात्व प्रकट होता है, केवल शुद्ध, अखण्ड, अद्वय ब्रह्म शेष रहता है।
माण्डूक्यकारिका कहती है कि “अजातं जायते किंचित्” वास्तव में कुछ भी उत्पन्न नहीं होता। अतः देहत्व की प्रतीति भी नित्यानित्य-विवेक के अभाव से उत्पन्न एक काल्पनिक वृत्त है।
जब साधक श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस सत्य को आत्मसात् करता है, तब वह जानता है कि मैं देह नहीं, देह का साक्षी हूँ। ”मैं मन नहीं, मन का द्रष्टा हूँ।” “मैं चैतन्यस्वरूप ब्रह्म हूँ।” तब “अलात-वृत्त” की समस्त भ्रान्ति शान्त हो जाती है। शुद्ध आत्मा सूर्यवत् स्वयं प्रकाशमान है; उसे किसी बाह्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta
“अपरोक्षानुभूति"
चक्षुर्भ्यां भ्रमशीलाभ्यां सर्वं भाति भ्रमात्मकम्।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः ।।७८।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति)
यह श्लोक अद्वैत वेदान्त के मूल सिद्धान्त अविद्या और अध्यास का अत्यन्त सूक्ष्म निरूपण करता है। जब नेत्र ही भ्रमग्रस्त हों, तब समस्त दृश्य जगत् विकृत और असत्य प्रतीत होता है। दोष वस्तु में नहीं, दृष्टि में होता है; परन्तु अज्ञानी उस विकृति को ही सत्य मान लेता है।
इसी प्रकार, जब बुद्धि अविद्या से आच्छन्न होती है, तब आत्मा जो नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त चैतन्य है, देह के रूप में प्रतीत होती है। देह का धर्म आत्मा पर आरोपित कर दिया जाता है, और आत्मा का प्रकाश देह में सीमित मान लिया जाता है। यही देहात्मबुद्धि है, यही संसार-बन्धन का मूल है। शाङ्कर-वेदान्त में अध्यास का तात्पर्य है कि अधिष्ठान पर परधर्म का आरोप।
जैसे भ्रमित नेत्रों से देखी हुई वस्तु वास्तविक स्वरूप से भिन्न प्रतीत होती है, वैसे ही अज्ञान से आच्छन्न चित्त आत्मा को देह मान लेता है।
श्रुति उद्घोष करती है - “असङ्गो ह्ययं पुरुषः” आत्मा असंग है, किसी उपाधि से बँधी नहीं। ”नेति नेति” वह समस्त नाम-रूप से परे है। ”अयमात्मा ब्रह्म” यह आत्मा ही ब्रह्म है। यदि आत्मा वास्तव में देह होती, तो वह परिवर्तनशील और दोषयुक्त होती; परन्तु श्रुति उसे अविकार और निरुपाधिक घोषित करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि
“अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।” आत्मा अविकार है। देह चलती है, मन चञ्चल है, बुद्धि निर्णय करती है पर आत्मा इन सबकी साक्षी है। जैसे भ्रमित नेत्रों से जगत् विकृत प्रतीत होता है, वैसे ही अज्ञानयुक्त बुद्धि से आत्मा देहवत् प्रतीत होती है।
ब्रह्मसूत्रों का समन्वित अभिप्राय यही है कि ब्रह्म जो आत्मा का ही स्वरूप है; एकमेव सत्य है। देह, मन और जगत् नामरूपात्मक उपाधियाँ हैं। उपाधि के धर्म आत्मा को स्पर्श नहीं करते; वे केवल प्रतीत होते हैं।
ज्ञान होने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भ्रम दृष्टि में था, वस्तु में नहीं। जब साधक विवेकपूर्वक विचार करता है कि देह दृश्य है, मैं द्रष्टा हूँ। मन परिवर्तनशील है, मैं साक्षी हूँ। अनुभव आते-जाते हैं, पर मैं नित्य हूँ। तब देहत्व का आरोप क्षीण होने लगता है। भ्रम नेत्रों में था; अज्ञान बुद्धि में था, आत्मा सदा शुद्ध और अविकार थी।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि देहत्व आत्मा का वास्तविक स्वरूप नहीं, अपितु अज्ञानजन्य भ्रान्ति है। आत्मा सच्चिदानन्दरूप, अखण्ड और नित्य है।दृष्टि शुद्ध होते ही भ्रम मिट जाता है। ज्ञान उदित होते ही देहाभिमान निवृत्त हो जाता है।
अन्ततः, इस श्लोक का सार यही है कि मुक्ति का पथ वस्तु-परिवर्तन में नहीं, दृष्टि-परिवर्तन में है। जगत् को बदलना आवश्यक नहीं; दृष्टि को शुद्ध करना आवश्यक है। आत्मा को सिद्ध करना आवश्यक नहीं; आत्मा पर पड़े मिथ्या आवरण को हटाना आवश्यक है। ज्ञान का उदय होते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भ्रम नेत्रों में था, आत्मा में नहीं; अज्ञान बुद्धि में था, सत्य में नहीं। तब देहाभिमान स्वतः निवृत्त हो जाता है और शुद्ध आत्मतत्त्व का प्रकाश, जो सदा से विद्यमान था, स्वयं प्रकाशित हो उठता है।
इसीलिए यह श्लोक केवल दार्शनिक प्रतिपादन नहीं, बल्कि साधना का दिशासूचक दीप है। यह साधक को भीतर की ओर लौटने, द्रष्टा और दृश्य के विवेक को दृढ़ करने, अध्यास के मिथ्यात्व को समझने और आत्मा के असंग, अखण्ड, अविकार, ब्रह्मस्वरूप सत्य को प्रत्यक्ष करने की प्रेरणा देता है। दृष्टि शुद्ध हो जाए तो भ्रम मिट जाता है; ज्ञान उदित हो जाए तो देहत्व का आरोप समाप्त हो जाता है; और तब जो शेष रहता है, वही आत्मा है - नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अद्वय, सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म।
#अपरोक्षानुभूति #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#PrabhuShriKiLekhni
#AvdheshanandG_Quotes
"केनोपनिषद्"
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे
लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ।।९।।
"केनोपनिषद् - चतुर्थः खण्डः"
केनोपनिषद् के चतुर्थ खण्ड के इस मंत्र में उपनिषद् ब्रह्म-विद्या का फल अत्यन्त स्पष्ट करती है कि “जो इस सत्य को ऐसे ही जानता है, वह पाप्मा को नष्ट करके अनन्त, श्रेष्ठ स्वर्ग-लोक में प्रतिष्ठित होता है।” भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार यहाँ “पाप्मा” का आशय केवल बाह्य पाप-कर्मों से नहीं, बल्कि उस मूल अविद्या-जन्य मल से भी है, जो आत्मस्वरूप को ढँक देता है। जब ब्रह्म का यथार्थ बोध या उपनिषद्-निर्दिष्ट उपासना चित्त में दृढ़ होती है, तब यह मल क्षीण होता है और साधक भीतर से शुद्ध, निर्भय एवं प्रकाशमान हो उठता है।
“अनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये” का संकेत आदि शंकराचार्य के भाव में सामान्य भोग-स्वर्ग की ओर नहीं, बल्कि उस श्रेष्ठ लोक की ओर है जहाँ ब्रह्म-विद्या का संस्कार पूर्ण परिपक्वता पाता है अर्थात् ब्रह्मलोक- समीप की उच्च अवस्था, जहाँ साधक का बोध और अधिक स्थिर, व्यापक और सूक्ष्म होता है। इसीलिए मंत्र में “प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति” की पुनरुक्ति आई है। यह केवल प्राप्ति नहीं, बल्कि अचल प्रतिष्ठा का बोध कराती है: साधक का चित्त वहाँ बार-बार गिरता नहीं; वह सत्य में दृढ़ होकर स्थित हो जाता है।
इस प्रकार यह मंत्र भगवत्पादाचार्य आदि शंकराचार्य की दृष्टि में यही प्रतिपादित करता है कि ब्रह्म-विद्या का फल शुद्धि है, और शुद्धि का पराकाष्ठा-फल है सत्य में स्थिर प्रतिष्ठा जो साधक को सीमितताओं से ऊपर उठाकर परम कल्याण की दिशा में ले जाती है।
This verse, the Kenopanishad states that one who truly knows this teaching “casts off pāpmā and becomes firmly established in the infinite, highest heavenly realm.”
Adi Shankaracharya clarifies that pāpmā is not merely outward “sin” in the social or ritual sense. It is the deeper inner taint born of avidyā that fundamental ignorance which superimposes body and mind upon the Self and thereby veils one’s own luminous reality. This is the root-impurity : the cause of fear, craving, sorrow, and bondage.
When Upaniṣadic knowledge and the steady contemplation (nididhyāsana) through which it matures becomes unwavering, this inner stain is burnt away. What is destroyed is not the Self (which is ever pure), but the obscuration that made the Self appear limited and bound. Thus the seeker is purified, inwardly elevated, and established in clarity.
The phrase “in the infinite, śreṣṭha (highest) world” points beyond the idea of a pleasure-filled heaven. It indicates a superior “realm” of attainment: an exalted state of being in which the mind has risen beyond narrowness, is suffused with purity and expansiveness, and is fit to receive and to rest in the fullness of realization. It is not a destination of sense-enjoyment, but the widening of consciousness toward the infinite.
And the emphatic repetition “established, established” is deliberate. It announces unshakable abidance: not a fleeting insight, not a temporary elevation, but firm stability in the highest good. The light does not merely flash and vanish; it becomes one’s natural dwelling steady, effortless, and irrevocable.
#केनोपनिषद् #अद्वैत_वेदान्त
#AdvaitVedanta #स्वाध्याय
#PrabhuShriKiLekhni
#AvdheshanandG_Quotes
#avdheshanandg_mission
#स्वामी_अवधेशानन्द_गिरि
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तीव्र, स्पर्धात्मक और बहुधा दिशाहीन होते परिदृश्य में यदि किसी व्यक्तित्व ने “राष्ट्रवाद” को एक स्पष्ट, प्रखर और विमर्शयोग्य स्वर प्रदान किया, तो वह नाम है- आदरणीय सुरेश चव्हाणके। उन्होंने समाचारों को केवल सूचना का माध्यम न मानकर, उन्हें विचार और वैचारिक चेतना का मंच बनाया।
समाचार-जगत में उनकी उपस्थिति एक वक्ता-योद्धा के रूप में रही जहाँ शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का उद्घोष बनते हैं। उन्होंने उन विषयों को मुखर किया, जिन्हें वे राष्ट्रहित से संबद्ध मानते थे। इस प्रकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में राष्ट्रवाद को एक विशिष्ट पहचान, नया आयाम और सशक्त भाषा मिली।
उनकी शैली में स्पष्टता है, आग्रह है और अपने मत के प्रति अडिग निष्ठा है। समर्थक उन्हें राष्ट्रचेतना का प्रखर स्वर मानते हैं, तो आलोचक भी उनकी प्रभावशीलता को स्वीकार करते हैं। यही किसी भी प्रभावशाली मीडिया व्यक्तित्व की पहचान होती है-वह चर्चा के केंद्र में रहता है, विमर्श को जन्म देता है और समाज को सोचने पर विवश करता है।
जन्मदिन केवल आयु-वृद्धि का उत्सव नहीं, बल्कि संकल्पों की पुनर्पुष्टि का अवसर होता है। इस शुभ अवसर पर कामना है कि उनका जीवन ऊर्जा, स्वास्थ्य और वैचारिक स्पष्टता से परिपूर्ण रहे; वे संवाद की गरिमा, सत्य की प्रतिबद्धता और राष्ट्रहित की भावना के साथ अपने पथ पर अग्रसर रहें।
ईश्वर उन्हें दीर्घायु, दृढ़ता और सद्बुद्धि प्रदान करें ताकि मीडिया जगत में विचारशील, संतुलित और सार्थक संवाद का प्रवाह निरंतर बना रहे।
सुदिनं सुदिनं जन्मदिनं तव, भवतु मंगलम् जन्मदिनम् ||
चिरं जीव कुरु पुण्यवर्धनम् , चिरं जीव कुरु कीर्तिवर्धनम् ||
सुदिनं पुनः पुनः आवर्तताम्।।
@SureshChavhanke@SudarshanNewsTV