दलित परिवार पर जानलेवा हमला! 💔
यूपी के प्रतापगढ़ में धीरज सिंह, ललित सिंह सहित कई दबंगों ने एक दलित परिवार पर जघन्य हमला कर उनकी हत्या का प्रयास किया। इस हमले में महिलाओं एवं बच्चियों समेत कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं, जिनका इलाज चल रहा है।
योगी सरकार, प्रशासन, महिला आयोग, न्यायपालिका और अनुसूचित जाति आयोग सहित सारा तंत्र दलितों के दमन पर इस तरह खामोश हो जाता है मानो वे कोई कीड़े-मकोड़े हों। भाजपा की सरकार में दलितों की कोई सुनवाई नहीं है। चूंकि शासन-प्रशासन में ऊंची जातियों का दबदबा है, अतः दलितों के साथ होने वाली मारपीट पर शासन की चुप्पी एक नियति बन गई है।
इस घटना में शामिल धीरज सिंह, ललित सिंह, शिव सिंह सहित अन्य सभी गुंडों पर कड़ी से कड़ी वैधानिक कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे लोग सामाजिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं, अतः जिला प्रशासन को इन पर NSA के तहत कठोर से कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही पीड़ित परिवार के सदस्यों का समुचित इलाज एवं उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
अखिलेश यादव की लड़ाई - बहन कु0 मायावती जी से
भाजपा की लड़ाई - बहन कु0 मायावती जी से
कांग्रेस की लड़ाई - बहन कु0 मायावती जी से
चंद्रशेखर की लड़ाई - बहन कु0 मायावती जी से
चमचों/ गुलामों की लड़ाई - बहन कु0 मायावती जी से
एक ही नारी सब पर भारी,
बहन जी ही नेता हमारी।
"पुलिस हमारे चाचा के हत्यारों को कब गिरफ्तार करेगी?"
बलिया में पुलिसकार्मियों ने एक दलित को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। बच्ची DIG से सवाल पूछ कर रही है।
DIG के पास कोई जवाब नहीं है। वह पसीना पोछ रहे हैं। योगी सरकार बताए कि हत्यारे पुलिसकर्मी गिरफ्तार कब होंगे?
दलित बच्ची को न्याय दो!
यूपी के बरेली में मोहम्मद मोनिश नामक दरिंदा एक दलित नाबालिग छात्रा से कई महीनों से छेड़खानी कर रहा है। विरोध करने पर वह उसे किडनैप करने की धमकी देता है।
क्या अब चंद्रशेखर आजाद आंदोलन करने नहीं जाएंगे? या फिर सेक्युलर ज़मात की तरह वह भी मौन ही बने रहेंगे?
बसपा सुप्रीमो मायावती जी के बयान पर नगीना सांसद @BhimArmyChief चन्द्रशेखर आजाद की बेहद शानदार व सधी हुई प्रतिक्रिया, सभी साथी सुनें व शेयर करें 👇🏻
"बहनजी अगर मुझे कुछ कहतीं तो बुरा नहीं लगता वो बढ़ी हैं। लेकिन उन्होंने भीम आर्मी के संघर्ष व पीड़ितों को अपमानित कर दिया। जो करने की हैसियत किसी और की नहीं है सरकार के सामने, हम सीना तानकर लड़ते हैं"
प्रिय बसपाई भक्तों,
आज मेरे द्वारा किए गए एक पोस्ट पर आपकी भावनाएं सिर्फ इस बात पर आहत हो गईं कि मैंने 'मायावती जी' कहने के बजाय
मायावती कह दिया।
जितना तुम लोगों ने मेरे शब्दों पर गौर किया है अगर उतना अपनी नेता पर करते तो शायद कुछ सुधार हो जाता।
शायद मेरठ वाले मुद्दे पर मायावती जी, चंद्रशेखर जी को सत्ता पक्ष की तरह न घेरतीं।
अगर तुम सबने उनसे ये सवाल किया होता जो कुछ दिनों पहले दैनिक भास्कर की स्टिंग ऑपरेशन में पता चला था (5 लाख वाला) तो शायद कुछ सुधार होता।
थोड़ा और ध्यान दिया होता तो मायावती जी से ये सवाल पूछते कि आपके प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल टिकट के लिए पैसों की बात क्यों कर रहे हैं?
अब थोड़ा और आगे बढ़ोगे तो एक सवाल ये भी बनेगा कि मायावती जी सत्ता पक्ष के लिए हमेशा सॉफ्ट कॉर्नर क्यों रखतीं हैं?
लेकिन प्रिय बसपाई भक्तों तुम्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है, तुम अपने नेता से सवाल करना सीख लो शायद Team B से A की तरफ बढ़ जाए।
बिना दिमाग की खोपड़ी मुलायम सिंह जी ने
1.कुर्मी शाहू के नाम पर कईंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज करने पर कहा था कि हम नही जानते शाहू वाहू को।
2.माली सैनी जाति के फुले दम्पति के नाम से बनी योजनाओं को रोक दिया।
3.बहुजन महापुरुष में 80% ओबीसी जाति से है जिनका प्रसार बसपा ने किया।
तुम लोग गैर यादव ओबीसी को क्यो सहन नह कर सकते। जिन्हें बसपा ने घर घर तक पहचा दिया।
दलित युवाओं के खिलाफ बड़ी साजिश!
प्रिय साथियों, दलित समुदाय के लोग स्वभाव से बहुत भोले होते हैं। दुःख की बात यह है कि इसी सीधेपन का फ़ायदा उठाकर कुछ स्वार्थी तत्व उनकी भावनाओं को भड़काते हैं और उन्हें हिंसक आंदोलनों की आग में झोंक देते हैं।
ऐसे में, विरोधी ताकतों के बहकावे में आकर तुरंत भावुक हो जाने वाले समाज के नौजवानों को आज बहुत ठंडे दिमाग से जमीनी हकीकत को समझने की ज़रूरत है। चुनाव को मद्देनजर देखते हुए इस समय विरोधी पार्टियों का पूरा तंत्र सक्रिय हो चुका है। वे जानते हैं कि बहुजन समाज को सीधे हराना नामुमकिन है; इसीलिए वे हमारे ही समाज के कुछ महत्वाकांक्षी युवाओं और उग्र संगठनों को मोहरा बना रहे हैं। ये लोग बड़ी-बड़ी बातें करके बसपा के नाम पर सहानुभूति बटोरते हैं और आंदोलन के बहाने भीड़ इकट्ठा करते हैं। फिर अपने पाले हुए हुड़दंगियों के ज़रिए माहौल को हिंसक बना देते हैं ताकि हमारे युवा सड़कों पर चक्का जाम व टकराव के आत्मघाती रास्ते पर धकेले जा सकें।
हमारे युवाओं के खिलाफ यह साज़िश कितनी गहरी है, इसे हम इन दो प्रमुख बिंदुओं के जरिए समझ सकते हैं।
1) युवाओं को मुकदमों के दलदल में धकेलना:
विरोधी चाहते हैं कि युवा आक्रोश में आकर कानून अपने हाथ में ले और पुलिस उन पर संगीन धाराएं ठोक दे। एक बार पुलिस रिकॉर्ड खराब हुआ, तो युवा का करियर, सरकारी नौकरी का सपना और परिवार की उम्मीदें हमेशा के लिए दम तोड़ देती हैं। बिना पुलिस NOC के न तो कैरेक्टर सर्टिफिकेट बनता है और न ही पासपोर्ट या सरकारी नियुक्तियां हो पाती हैं। फिर इस एक NOC के लिए हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक के चक्कर काटने पड़ते हैं।
परंतु इस हुड़दंग में फंसकर यदि कोई युवा जेल चला गया, तो पूरा घर बर्बाद हो जाता है। उन्हें पुलिस, प्रशासन, नेताओं और वकीलों के पीछे पीछे घूमते रहते हैं। सालों साल तक तारीख पर तारीख चलती रहती है। अगर आपको यकीन न हो तो एक बार सहारनपुर हिंसा, प्रयागराज हिंसा एवं अन्य जगहों पर पीड़ित युवाओं से पूछ लीजिए। मनुवादी सरकार एवं प्रशासन तो बस मौका ढूंढती है कि किस तरह वे दलितों को कुचल सकें। विरोधियों की असली चाल ही यही है कि बहुजन युवा पढ़-लिखकर अधिकारी बनने के बजाय कोर्ट-कचहरी और तारीखों के चक्कर काटता रहे, ताकि वे जीवनभर उन्हें अपनी पार्टियों का झंडा ढोने वाला अदना कार्यकर्ता बनाकर रख सकें।
2) 'मास्टर चाबी' से ध्यान भटकाना:
बाबासाहेब आम्बेडकर, मान्यवर कांशीराम साहब और आदरणीय बहन कुमारी मायावती जी ने हमें हमेशा यही सिखाया कि सड़कों पर लाठियां खाना हमारी नियति नहीं है। हमारी असली मंजिल शासन करना यानी 'हुक्मरान जमात' बनना है। ये बरसाती मेंढक और उग्र संगठन हमारे युवाओं को इसी मुख्य राजनीतिक लड़ाई से भटकाना चाहते हैं, ताकि हम सिर्फ सड़कों के विवादों में उलझे रहें और सत्ता की उस 'मास्टर चाबी' तक कभी न पहुँच पाएं जिससे तरक्की के बंद दरवाज़े खुलते हैं।
आज जो लोग बसपा की नीतियों पर उंगली उठाते हैं, उन्हें इतिहास देखना चाहिए। बहन जी के चार बार के शासनकाल में यूपी में 'क़ानून द्वारा क़ानून का राज' था। उस दौर में किसी बड़े से बड़े जातिवादी अधिकारी या बाहुबली गुंडे की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह दलितों के आत्मसम्मान को ठेस भी पहुँचा सके। बहन जी कानून के मामले में इतनी सख्त थीं कि उन्होंने गुंडागर्दी करने पर अपनी ही पार्टी के तत्कालीन सांसद उमाकांत यादव को मुख्यमंत्री आवास पर बुलाकर वहीं से गिरफ्तार करवा दिया था।
रोहित वेमुला को न्याय दिलाने के लिए जब बहन जी ने संसद भवन में हुंकार भरी थी, तो पूरी संसद हिल गई थी। यही नहीं, जब सहारनपुर हिंसा में दलित पीड़ितों की आवाज़ को दबाने की कोशिश की गई, तो बहन जी ने बाबासाहेब के पदचिन्हों पर चलते हुए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने साफ कहा था कि जिस सदन में मेरे समाज की बात न सुनी जाए, वहाँ रहने का कोई फायदा नहीं। इसे कहते हैं सिद्धांतों और आत्मसम्मान की असली लड़ाई!
इसलिए, साथियों! जोश और जुनून अपनी जगह बिल्कुल सही हैं, लेकिन याद रखिए कि जोश में होश खोने की गलती आत्मघाती साबित होती है। विरोधियों के इस विषैले षड्यंत्र को पहचानिए। मासूमों के भविष्य की कतरन पर अपनी राजनीतिक इमारत बनाने वाले इन स्वयंभू नेताओं के बहकावे में आकर अपनी जिंदगी और अपने परिवार का भविष्य दांव पर मत लगाइए। समाज की समस्याओं का असली समाधान खोखली डायलॉगबाज़ी या सड़कों पर बवाल करना नहीं है, बल्कि एकजुट होकर एक सामाजिक एवं राजनीतिक ताकत बनना है।
- सूरज कुमार बौद्ध (फाउंडर- मिशन आम्बेडकर)
दिनांक 11.07.2026 : जैसाकि सर्वविदित है कि बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी), दूसरी पार्टियों की तरह अपना राजनीतिक व चुनावी स्वार्थ साधने के लिये धरना-प्रदर्शन, सड़क जाम, हल्लाबोल, सरकारी व प्राइवेट सम्पत्तियों के तोड़फोड़ व दूसरी हिसंक घटनाओं तथा हवाहवाई वादों-दावों एवं मिथ्या प्रचार-प्रसार आदि के माध्यम से जनता को गुमराह करने आदि में विश्वास नहीं करती है।
अर्थात् बी.एस.पी. ऐसी तमाम राजनीतिक व चुनावी चालबाज़ियों से पूरी तरह से पाक-साफ देश की एकमात्र ऐसी अम्बेडकरवादी पार्टी है जो ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ के सिद्धान्त व नीति पर चलकर यहाँ सर्वसमाज में भी ख़ासकर ग़रीबों, मज़दूरों, शोषितों-पीड़ितों व उपेक्षितों के हित व कल्याण हेतु समर्पित है, और जिसका जीता-जागता प्रमाण यहाँ उत्तर प्रदेश में बी.एस.पी. के नेतृत्व में चार बार रही सरकार में व्यापक जनहित, जनकल्याण व विकास का तथा अपराध-नियंत्रण व क़ानून-व्यवस्था के मामलों में ’क़ानून द्वारा क़ानून का बेहतरीन राज’ रहा है।
इससे यहाँ यूपी जैसे विशाल राज्य में एक आदर्श संवैधानिक सरकार देने के साथ-साथ यह भी सूरज की रौशनी की तरह पूरी तरह से स्पष्ट है कि बी.एस.पी., विरोधी पार्टियों व उनके इशारे पर चलने वाले दलित संगठनों व पार्टियोें आदि की तरह छल व छलावा की राजनीति तथा उनके लिये मगरमच्छ के आँसू नहीं बहाती और ना ही संकीर्ण स्वार्थ हेतु गिरगिट की ही तरह रंग बदलती है, बल्कि करोड़ों दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों, मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ-साथ अपरकास्ट समाज के ग़रीबों के वास्तविक हित व कल्याण के लिये ’बहुजन समाज’ में समय-समय पर जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों में भी ख़ासकर महात्मा ज्योतिबा फुले, श्री नारायणा गुरु, राजर्षि छत्रपति शाहूजी महाराज, परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर व बहुजन नायक मान्यवर श्री कांशीराम जी के बताये रास्तों पर चलकर मुख्यतः सत्ता की मास्टर चाबी के माध्यम से ’सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक उत्थान’ का महान लक्ष्य हासिल करना चाहती है।
और अब यहाँ ख़ासकर उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी आमचुनाव में बी.एस.पी के प्रभाव को तेज़ी से आगे बढ़ता हुआ देखकर विरोधी पार्टियाँ में द्वेष व बेचैनी स्वाभाविक है और इसीलिये वे अपने साम, दाम, दण्ड, भेद आदि हथकण्डों के तहत् कुछ दलित संगठनों व पार्टियों आदि को आगे करके दलित व बहुजन समाज के अन्य विभिन्न अंगों को तरह-तरह से भटकाने व गुमराह करने में लगे हुये हैं,
जबकि शोषितों-पीड़ितों व उपेक्षितों को अच्छी तरह से मालूम है कि ’मा. बहन कुमारी मायावती जी’ के नेतृत्व वाली सरकार ही उनकी सभी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक समस्याओं का उसी प्रकार से बेहतरीन निदान है जैसाकि उनकी सभी सरकारों में होता रहा है जब सत्ता की शक्ति, संसाधन व ऊर्जा तथा सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल भी हर स्तर पर सबके साथ न्याय एवं सबको न्याय दिलाने के लिये समर्पित व तत्पर रहा।
साथ ही, चुनाव नज़दीक आता देख विरोधी पार्टियाँ अपने हथकण्डों आदि के साथ-साथ दलित संगठनों व गुलाम मानसिकता रखने वाले लोगों के कंधे पर बंदूक रखकर बी.एस.पी. व बाबा साहेब के मूवमेन्ट-विरोधी राजनीतिक स्वार्थ का अपना खेल आगे बढ़ाना चाहती हैं, जिससे सर्वसमाज के लोगों को व विशेषकर दलित एवं ’बहुजन समाज’ के सभी लोगों को बहुत ही ज़्यादा सचेत व सतर्क रहने की ज़रूरत है ताकि विरोधियों केे नापाक इरादे सफल ना हों सकें।
इसको लेकर बी.एस.पी. की असली चिन्ता यही है कि सर्वसमाज के ग़रीब, मज़दूर व बेरोज़गार नौजवान आदि के साथ-साथ समाज के शोषित-पीड़ित व अन्य उपेक्षित लोग, अपनी समस्याओं को लेकर सड़क पर उतरने के क्रम में सरकारी द्वेष, उत्पीड़न व आतंक आदि का शिकार ना बनने पायें,
क्योंकि नौजवान अगर सरकारी ज्यादती के कारण यदि मुकदमा व जेल आदि में उलझ जायेंगे तो इससे उनका भविष्य ख़तरे में पड़ जाने की आशंका है तथा अगर परिवार का मुखिया इन चक्कर में पड़ जायेगा तो उनका घरबार तबाह हो जायेगा और उनके पूरे परिवार के इस प्रकार से अंधकार में डूब जाने का खतरा है, जो बी.एस.पी. कतई भी नहीं चाहती है, क्योंकि बी.एस.पी. का अम्बेडकरवादी मिशन प्रभावित हो सकता है जो कि विरोधियों की असल चाल है।
इसके साथ ही, सर्वविदित है कि दलित-विरोधी सहारनपुर काण्ड में जातिवादी, सामंती व सरकारी आतंक के विरुद्ध बी.एस.पी. व उसके नेतृत्व ने सड़क से लेकर संसद तक में जबरदस्त लड़ाई लड़ी, किन्तु संसद में भी इसका सही से निदान नहीं मिलने के विरोध में तब बी.एस.पी. नेतृत्व ने, दलितों व अन्य पिछड़ों आदि के हक की अनदेखी करने पर परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर द्वारा देश के पहले कानून मंत्री पद से इस्तीफा देने का अनुसरण करते हुये, राज्यसभा से ही इस्तीफा दे दिया था कि जब संसद में भी हमारी बात नहीं सुनी जाती है तो ऐसी संसद में रहने का फायदा ही क्या?
इस प्रकार यह उन जबरदस्त उदाहरणों में एक है जो बी.एस.पी. नेतृत्व ने अपने संघर्ष के क्रम में दिया है अर्थात् स्पष्ट है कि बी.एस.पी. को अपनी तरह ही मगरमच्छ के आँसू बहाने की सलाह देेने वाले संकीर्ण स्वार्थी लोग विरोधी पार्टियों के जातिवादी व विशैले षडयंत्र का शिकार ना बनें तो यह बेहतर होगा।
वैसे भी सभी जानते हैं कि मान्यवर श्री कांशीराम जी ने बहुजन समाज पार्टी (बी.एस.पी.) का गठन देश में जाति के आधार पर सदियों से सताये, तोड़े व पछाड़े गये उन लोगों को ’बहुजन समाज’ को आपसी भाईचारा के आधार पर एकता में जोड़कर राजनीतिक शक्ति अर्थात् ’’हुकमरान जमात’’ बनाने के लिये इसलिये किया था ताकि इन वर्गों के मसीहा परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के सत्ता की मास्टर चाबी के माध्यम से आत्म-सम्मान व स्वाभिमान मूवमेन्ट को मंज़िल तक पहुँचाया जा सके, और यह क्रम लगातार जारी है, जिसकी राह में रोड़ा बनकर खड़ा होना बी.एस.पी के मिशन 2027 को प्रभावित करने का घोर बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर-विरोधी अनुचित कृत्य होगा। जय भीम, जय भारत।
युवाओं के नाम बहन जी का संदेश!
मेरठ की घटना का संज्ञान लेते हुए माननीया बहन जी ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जहाँ उन्होंने दलित समुदाय के युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि हमें बाबासाहेब डॉ. आम्बेडकर के दिखाए रास्ते पर चलना चाहिए। अपने ऊपर होने वाले किसी भी जुल्म-ज्यादती के विरुद्ध लड़ाई, कानून को हाथ में लेकर नहीं, बल्कि कानून के दायरे में रहकर लड़नी चाहिए।
न्याय के नाम पर हिंसा, हंगामा या सड़क जाम जैसा बवाल करने से पीड़ितों को न्याय मिलने वाला नहीं है; बल्कि इससे समाज के लोगों की मुसीबतें और परेशानियां और अधिक बढ़ जाती हैं। बहन जी ने स्पष्ट कहा कि न्याय के लिए समाज को बाबासाहेब के लिखित संविधान के अनुसार चलना चाहिए और जिला न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय सहित अन्य कानूनी तरीकों का सहारा लेना चाहिए।
अब इस पर चंद्रशेखर आज़ाद का कहना है कि कोर्ट-कचहरी से न्याय पाने में तो 10-10 साल लग जाएंगे, तब तक क्या हमारी बहन-बेटियों की इज्जत लुटती रहे और हम चुप बैठे रहें? दुनिया को छोड़िए, चंद्रशेखर आजाद पर खुद 36 मुकदमे दर्ज हैं। क्या उन्होंने अपने मामले में तत्काल इंसाफ दिलवा दिया? नहीं, क्योंकि कानून की प्रक्रिया के तहत सबको चलना ही पड़ता है।
चंद्रशेखर के इस बयान के बाद बहुत से लोग बहन जी को टारगेट कर रहे हैं। दरअसल, डायलॉगबाजी करने और नए लड़कों को खुश करने के लिए चंद्रशेखर का कहना सही लग सकता है, लेकिन आप ज़रा अपने विवेक का इस्तेमाल करके बताइए कि जिस भी घटना पर चंद्रशेखर जाते हैं, क्या वे उन परिवारों को तत्काल न्याय दिला पाते हैं? क्या वे कोई जज हैं जो ऑन-द-स्पॉट फैसला सुना देंगे? सहारनपुर, आजमगढ़, प्रयागराज, हरदोई, हाथरस... चंद्रशेखर आज़ाद ने इनमें से किस जगह पर तत्काल न्याय दिला दिया?
बहन जी ने चार-चार बार सरकार चलाई है, उन्हें अच्छी तरह पता है कि शासन और प्रशासन कैसे काम करता है। इसे छोड़िए, कोई भी व्यक्ति जो कानून की थोड़ी भी समझ रखता है, उसे पता होगा कि FIR होने के बाद पुलिस का इन्वेस्टिगेशन ऑफिसर (IO) विवेचना करता है, चार्जशीट दाखिल होती है, फिर सालों तक कोर्ट में तारीख पर तारीख चलती है और तब जाकर कोई फैसला आता है। अब वहाँ चाहे चंद्रशेखर जाएं या राहुल गांधी, कोर्ट की न्यायिक प्रक्रिया में सालों-साल तो लगते ही हैं।
हाँ, यह अलग बात है कि यदि आप सत्ता में हैं, तो फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन करके एक तय समय-सीमा के भीतर न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है। पर इसके लिए तो सत्ता चाहिए! इसीलिए बहन जी ने समाज के युवाओं को संदेश दिया कि अगर अपने ऊपर हो रहे जुल्म-ज्यादती को हमेशा के लिए रोकना है, तो उन्हें केंद्र व राज्यों की राजनीतिक सत्ता की 'मास्टर चाबी' खुद अपने हाथों में लेनी होगी।
अब कुछ साथियों की यह भी नाराजगी है कि बहन जी ने मेरठ के SSP अविनाश पांडेय के खिलाफ सीधा कुछ क्यों नहीं बोला। देखो भाई, बहन जी चार बार देश के सबसे बड़े सूबे की मुख्यमंत्री रही हैं, उनका राजनीतिक कद बहुत बड़ा है। मुझे नहीं लगता कि उन्हें अविनाश पांडेय जैसे किसी अदने और गालीबाज़ अफसर का नाम लेकर अपने स्तर को नीचे गिराना चाहिए। वैसे भी आप बहन जी का ट्रैक रिकॉर्ड उठाकर देख लीजिए, वह भाषणबाज़ी नहीं करतीं, सीधा एक्शन लेती हैं। उनकी सरकार के दौरान IG, DIG और DGP रैंक के बड़े-बड़े अफसरों में इतनी हिम्मत नहीं होती थी कि वे कानून और संविधान को धता बता सकें, फिर अविनाश पांडेय की क्या बिसात! उसके लिए तो हम लोग ही काफी हैं।
बाकी, ऐसे जातिवादी अफसरों को बल सत्ता के संरक्षण से मिलता है। अतः अगर समाज सच में अविनाश पांडेय के कृत्य से आहत है, तो भाजपा सरकार को इसका जवाब अपने वोट से दीजिए। लोकतंत्र में असली और सबसे गहरी चोट 'वोट की चोट' ही होती है। कुल मिलाकर बात यह है कि बहन जी ने समाज के युवाओं को जो संदेश दिया है, उस पर गंभीरता से अमल करें। वह बहुजन समाज की असली संरक्षक और मार्गदर्शक हैं।
संविधान विरोधी ताकतें हमेशा बहुजन समाज को सड़कों पर उलझाकर उनके भविष्य को मुकदमों के दलदल में धकेलना चाहती हैं। भावुकता में आकर सड़कों पर हुड़दंग करने से केवल हमारे युवाओं का करियर बर्बाद होगा, न्याय नहीं मिलेगा। इसलिए, इस सामंती व्यवस्था को नेस्तनाबूद करने के लिए जोश के साथ होश रखिए और बहन जी के नेतृत्व में 'वोट की ताकत' से अपनी खुद की हुक्मरानी स्थापित कीजिए।
आज मैंने मेरठ में दलितों पर बर्बरता और गाली-गलौज करने वाले जातिवादी IPS अविनाश पांडेय को बर्खास्त करने एवं उस पर विधिक कार्रवाई हेतु गृहमंत्री अमित शाह जी को पत्र लिखा है। समाज उसकी बदतमीजी को बर्दाश्त नहीं करेगा।
रक्षक को भक्षक बनने की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती!
UP का एक बड़ा नेता बार बार एक धार्मिक गुरु का चरण वंदना करने क्यों जाता है ?
ऐसा करने से क्या CM बन जाएगा ?
वो धार्मिक गुरु तो आए दिन आरक्षण, जाति जनगणना और बहुजन समाज के संवैधानिक अधिकारों पर टिका टिप्पणी करते रहता है.
श्रद्धा भाव है तो मंदिर जाओ, दान पुण्य कर दो. उस धार्मिक गुरु के पास बार बार जाकर क्यों उसके सामाजिक और राजनीतिक शक्ति को बढाने का काम कर रहे हो.
नेताओं को अपने निजी महत्वकांक्षा की ज्यादा चिंता रहती है, भले इसके लिए सवर्णों की Cultural Hegemony की सरपरस्ती को कबूल करना पड़े.
योगी राज में रक्षक बने भक्षक!
समाज के सामाजिक संगठनों से निवेदन है कि वे अपने सभी कार्यक्रमों में SSP अविनाश पांडेय की गुंडागर्दी का वीडियो दिखाएं, ताकि दलित समाज में जागृति आए कि भाजपा सरकार में न्याय मांगने वाले दलितों की हैसियत क्या है।
SSP अविनाश पांडेय ने अकेले ही भाजपा सरकार की पूरी कानून-व्यवस्था को एक्सपोज़ कर दिया है। संविधान का तकाज़ा है कि न्याय मांग रहे पीड़ितों के साथ प्रशासन नरमी से पेश आए। अगर कोई विपरीत स्थिति बने भी, तो प्रशासन कानूनी रवैया अपनाए। लेकिन इस जातिवादी सरकार में एक दलित लड़की की हत्या पर इंसाफ मांगने वालों को थप्पड़ मिल रहे हैं।
प्रदेश में रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं। मेरठ की पीड़िता के परिवार के साथ पहले दरिंदों ने क्रूरता करके उसकी हत्या कर दी, और अब न्याय मांग रहे दलितों पर SSP अविनाश पांडेय अपनी क्रूरता दिखा रहे हैं। जब कानून-व्यवस्था दम तोड़ देती है, तो गरीब, मजलूम और दलितों पर गुंडागर्दी हावी होने ही लगती है।
अगर योगी सरकार इस तानाशाह और जातिवादी मानसिकता के अफसर अविनाश पांडेय पर तुरंत सख्त कानूनी कार्रवाई और बर्खास्तगी सुनिश्चित नहीं करती, तो शोषित-वंचित समाज अपने इस अपमान को भूलेगा नहीं। आने वाले समय में दलित समुदाय के लोग इस घटना को गांव-गांव के दलितों को दिखाएंगे और उन्हें जागृत करेंगे। समाज इस जुल्म का जवाब संवैधानिक अधिकारों और वोट की ताकत से देगा।
@meerutpolice ये सिंघम वाली तेवर उस समय कहाँ चली जाती हैं जब धार्मिक जुलूस में सड़क जाम और गन्दा करते है, उपद्रव मचाते हैं?
उस समय तो यही पुलिस उन लोगो के पैरों मे तेल लगाते व पैर दबाते हैं और उनके ऊपर फूल बरसाते है।
महोदय @myogiadityanath जी !!
इनको कौन सा कानून बताया गया है कि तुम खुलेआम किसी को थप्पड़ मार सकते हो ?
यह इतने ही ज्ञानवान होते तो दरिंदा बलात्कारी जिंदा क्यों है बाहर क्यों घूम रहा उस दरिंदे को कितने थप्पड़ मारे है SSP ने जिसने एक बाप की बेटी का बलात्कार किया है ?
ऐसे अधिकारियों को बर्खास्त करो जो आरोपियों को ही संरक्षण देते हो !!
@ramjigautambsp@SurajKrBauddh
#MindsetShift
जब बिहार में पुलिस बनाम #तिवारी हो तो पुलिस गलत होगी किंतु मेरठ में पुलिस बनाम #जाटव हो तो पुलिस सही होगी !
स्टोरी में जरासा ही तो फर्क है :–
तिवारी पुलिस पर गोलियां चला दौड़ा रहा था और जाटव निहत्था खड़ा न्याय मांग रहा था !
सड़क पर गंदी करना गलत बात कोई साला नहीं कर सकता किसी के बाप की सड़क नहीं है, अच्छा, अभी आएंगे कांवरिया सड़को पर देखेंगे कितने बलवान हो आम जनता की भी ठुकाई करेंगे और पुलिस की भी रेल बनायेंगे तब इन्हीं सिंघम के फोटो उनके तलवों पर तेल लगा मालिश करते हुए अखबारों में छपेंगे, सभी आदर्शवादी नीतियां सिर्फ दलितों पर लागू होवे क्या ?
अगर न्याय मांगने वाले इसके समाज से होते तो अविनाश पांडेय उसको थप्पड़ नही मारता लेकिन यहां पीड़ित दलित समाज से है न इसलिए इस पांडेय की इतनी हिम्मत बढ़ गया।
जातिवादी BJP सरकार!
अगर आज यहां यूपी में बसपा की सरकार होती तो SSP अविनाश पांडेय की हिम्मत नहीं थी कि वह एक लड़की की हत्या पर न्याय मांग रहे दलित युवाओं पर थप्पड़ चला देता।
पांडेय को पता है कि वह ब्राह्मण है। अतः दलितों के प्रति उसकी गुंडागर्दी पर सरकार कोई कार्रवाई नहीं करेगी।
जातिवादी BJP सरकार!
अगर आज यहां यूपी में बसपा की सरकार होती तो SSP अविनाश पांडेय की हिम्मत नहीं थी कि वह एक लड़की की हत्या पर न्याय मांग रहे दलित युवाओं पर थप्पड़ चला देता।
पांडेय को पता है कि वह ब्राह्मण है। अतः दलितों के प्रति उसकी गुंडागर्दी पर सरकार कोई कार्रवाई नहीं करेगी।