काक्रोच रीढ़-रक्तविहीन है या उसका रक्त रंगहीन है। काया के बराबर पंख हैं, किंतु काक्रोच उड़ता नहीं, रेंगता है। काक्रोच न दोपाया है और ना ही चौपाया है। काक्रोच से सब डरते हैं, बचते हैं, शक्ति से नहीं, उसकी गंदगी से। काक्रोच रसोई की जूठन से उपजते हैं। क्या आप काक्रोच बनना चाहते हैं?
ये नग्नवंशी स्वयं ही नंगे नहीं हुए, अपनी संस्था, नेतृत्व एवं क्षुद्र वैचारिकता के नंगेपन का भी प्रकाशन-प्रदर्शन कर दिया। वैसे नंगे तो पहले से ही थे, किंतु संभवतः अपने नंगेपन की प्रामाणिकता के प्रति आश्वस्त नहीं थे, सो स्वयं ही अपनी नंगई का सार्वजनिक प्रमाणन भी कर दिया।
इतिहास साक्षी है, नया खून जितनी तेजी से सिर चढ़ाता है, उतनी ही गति से पांव तले रौंदता भी है। पुरुषार्थी युवामन का विश्वास भीतर तक टूटा है। सत्ता के जो निर्लज्ज पादुकापूजक यूजीसी के समता नियमों को लेकर असत्य का गान कर रहे थे, सुप्रीम कोर्ट ने उनके दुराचरण को निर्वस्त्र कर दिया है।
लोकतंत्र का यह भी एक प्रारूप है, लोगतंत्र। कुछ लोग एक नाम निश्चित कर लें। वह अर्धपदासीन भी हो जाए, फिर विधिवत चुनाव प्रक्रिया का आरंभ हो, पूर्वनिश्चित, पूर्वनिर्धारित नाम का अंकन, नामांकन हो और अंततः उसे सभी निर्धारित जन, तन से चुन लें। अब उसे निर्विरोध कहा जाएगा, अजातशत्रु भी…!
आवश्यक नहीं कि स्मार्ट सिटी से चुना गया विधायक भी स्मार्ट व संवेदनशील हो। वह दूषित पेयजल से मरने वालों के प्रति काष्ठवत हो सकता है। प्रश्नकर्ता को गाली भी दे सकता है। सनातन संस्कार के लिए संकल्पित संगठन के सौ वर्ष पूरे हो चले हैं और कुछ लोग अभी भी गालीगत संस्कार के अभ्यस्त हैं।
इथियोपिया में एक तिहाई से अधिक मोमिन हैं। वहां सात वर्ष से डा. अबि अहमद अली प्रधानमंत्री हैं। इथियोपियन राष्ट्रगीत में देश को ‘मां’ कहा गया है। वहां के सभी नागरिक सगर्व अपने देश, राष्ट्र को मां-मातृभूमि कह कर उसकी वंदना करते हैं। वहां तो किसी भी पंथ को संकट की अनुभूति नहीं हुई।
तुम एक चिकित्सक हो, डाक्टर हो। कितने परिश्रम से यह उपलब्धि मिली है। अब तुम्हारा जीवन समाज के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य के चिंतन में ही व्यतीत होना है। फिर स्वयं ही एक बीमारी को क्यों ओढ़ना? यह चेहरा क्यों, काहे छिपाना, किससे छिपाना? शान से सिर उठा कर जियो, रहो और चलो।
पटना वाले नबीन किशोर बाबू के बबुआ ‘कार्यकारी’ ( पालना) अध्यक्ष ही बनाये गए हैं। यह जो राष्ट्रीय अध्यक्ष के बीच में ‘कार्यकारी’ संलग्न है, जो ‘अंतरिम’ है, वह क्यों है? क्या जरूरत थी? जब ‘बनाना’ ही है, ‘बिठाना’ ही है, ‘मनोनीत’ ही करना है, तो सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष बना देते।
असंख्य लोगों के आराध्य ठाकुर बांके बिहारी आज प्रातः भूखे ही रह गए। उनके बाल भोग की व्यवस्था ही नहीं हो सकी। कारण बताते हैं कि भोग की व्यवस्था के लिए उत्तरदायी ठेकेदार का नवंबर माह का भुगतान ही नहीं हुआ है। यदि भगवान को भूखा रखने से वास्तव में पाप लगता है, तो यह पाप किसे लगेगा?
डबल इंजन सरकार की प्रचुर सुविधाओं से युक्त गोवा के नाइट क्लब में अग्निकांड, २५ की मृत्यु। सबका साथ (नाइट क्लब संचालकों का भी), सबका विकास (नाइट क्लब संचालकों का भी)। हम सभी (‘अवैध’ नाइट क्लब संचालकों की भी) की निर्भयता एवं स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं।
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आवश्यकता है, गांधी-माइनो-वाड्रा परिवार के लिए एक पूर्णकालिक राजनीतिक व्यवसायी की। जो पर्यटन केंद्रित होने के बजाय, परिवार पर पूरी तरह आश्रित, निरुपाय, निष्क्रिय-अक्रिय किंतु निष्ठावान कार्यकर्ताओं के पसीने की सुगंधि को महसूस कर सके।
गैरकांग्रेसवाद का डीएनए तो अपना काम करेगा ही। चाहे यूपी में मुलायम परिवार की पार्टी हो या बिहार में लालू परिवार की। दोनों ही मूलतः कांग्रेस विरोधी राजनीति की उपज। दोनों का ही मौलिक संकल्प एक।देश के सबसे प्राचीन राजनीतिक दल को एक ने यूपी में ठिकाने लगा दिया और दूसरे ने बिहार में
चाराजीवी प्राणिक समुदाय कितना प्रसन्न है, आनंदित है, उत्सव मना रहा है। उसकी चारागाह में अतिक्रमण की अब कोई बची-खुची आशंका भी नहीं रही। मानव भेस में चाराखोर प्रवृत्ति लोकयुद्ध में खेत रही।
ऐन बाल दिवस के दिन बिहार में दो बालकों के साथ घनघोर अन्याय हुआ। मम्मी के कुंआरे बच्चे के साथ, पापा के दुलारे बेटे के साथ। वो तो धीरे से लंडन निकल लिया, पटना वाला कहां जाये?
ये हैं तारा और सितारा
• तारा की दादी वोट चोरी करते पकड़ी गईं
• तारा की दादी ने पकड़े जाने पर देश में Emergency लगा दी
• सितारा की दीदी का नाम है MISA
• सितारा के बाबू जी ने तारा की दीदी का नाम MISA रखा
• सितारा के बाबू जी को तारा की दादी ने MISA के तहत जेल में डाला था
देश का स्वास्थ्य मंत्रालय किसी दवा की एक्सपायरी डेट तो तय कर सकता है, जांच भी सकता है, किंतु किसी पार्टी के अध्यक्ष पद की एक्सपायरी डेट के प्रसंग में तो निरुपाय ही है, निःशक्त ही है।