कितना और घुमाना बाकी है? चुनाव आयोग, अब तो सच बोल दीजिए
आज चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा है कि SIR से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। यह हलफनामा उन याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है, जो चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठा रही हैं।
लेकिन सवाल तो यह है कि फॉर्म 6 में बदलाव चुनाव आयोग चाहकर भी नहीं कर सकता, फिर चाहे फैसला सर्वसम्मति से हुआ हो या नहीं। फॉर्म 6 "मतदाता पंजीकरण नियम, 1960" का हिस्सा है, और इसमें बदलाव के लिए केंद्र सरकार, यानी कानून मंत्रालय को अधिसूचना जारी करनी होती है। चुनाव आयोग इसकी सिफारिश कर सकता है, लेकिन खुद बदलाव नहीं कर सकता। तो फिर इसका जवाब कौन देगा?
चुनाव आयोग हमें पागल समझता है क्या?
या तो हम सबको कुछ समझ नहीं आता, या फिर चुनाव आयोग हमें पागल समझता है। एक आम नागरिक के तौर पर मेरे कुछ सवाल हैं।
पहले जान लीजिए कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा है। अपने हलफनामे में आयोग ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े तीनों आदेश, जो 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी हुए थे, आयोग ने सर्वसम्मति से लिए थे। आयोग का तर्क है कि याचिका पूरी तरह एक अखबार की रिपोर्ट पर टिकी है, याचिकाकर्ता ने तथ्यों की खुद से पुष्टि नहीं की, इसलिए याचिका सुनवाई लायक ही नहीं है। आयोग ने यह भी कहा कि उसने कभी कोई अंदरूनी नोट या फाइल मीडिया को न जारी की, न जारी करने की इजाज़त दी।
फॉर्म 6 पर आयोग का कहना है कि उसने अपने SIR आदेशों के ज़रिए फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया। आयोग ने खुद माना कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय फॉर्म में बदलाव सिर्फ केंद्र सरकार कर सकती है। उसके मुताबिक SIR के दौरान जो घोषणा ली जा रही है, वह एक अलग दस्तावेज़ है, फॉर्म 6 में संशोधन नहीं।
अब मेरे सवाल।
पहला सवाल: आयोग कह रहा है कि उसे एक अखबार की खबर के आधार पर कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। तो फिर आयोग ने 26 सितंबर को यह क्यों तय किया कि आगे से IT मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़ी हर नई पहल पर आयोग की मंज़ूरी से पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा होगी? आयोग के अपने प्रेस नोट (संख्या ECI/PN/120/2026, बिंदु iv) में "अब से" (Henceforth) लिखा है। इसका मतलब तो यही हुआ कि उससे पहले ऐसा नहीं हो रहा था। यानी खबर सही थी।
दूसरा सवाल: 26 सितंबर को आयोग ने अपनी बैठक के बाद जो प्रेस नोट जारी किया, उसके बिंदु (iii) में साफ लिखा है: “SIR के लिए फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई घोषणा को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। गैर-SIR अवधि में नियमों (मतदाता पंजीकरण नियम, 1960) के मुताबिक लागू फॉर्म ही इस्तेमाल होंगे।”
यानी उस दिन आयोग खुद कह रहा था कि यह घोषणा "फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई" है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि उसने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था। अब आयोग कह रहा है कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव हुआ ही नहीं, घोषणा तो एक अलग दस्तावेज़ थी।
और उसी बिंदु की दूसरी लाइन पर गौर कीजिए। अगर SIR के दौरान भी नियमों वाला फॉर्म ही चल रहा था, तो यह लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी कि "गैर-SIR अवधि में नियमों के मुताबिक फॉर्म इस्तेमाल होंगे"? इसका सीधा मतलब है कि SIR के दौरान जो फॉर्म चल रहा था, वह नियमों में तय फॉर्म से अलग था।
पहले कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया, जब कोर्ट ने मना कर दिया तो कह रहे हैं कि बदलाव किया ही नहीं। अगर बदलाव हुआ ही नहीं था, तो 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का नाम लेने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
कुल मिलाकर, सच सामने आ जाने के बाद भी चुनाव आयोग देश और उसके लोकतंत्र के साथ मज़ाक कर रहा है।
संभवतः पूरे विश्व में भारत पहला ऐसा डेमोक्रेटिक देश होगा जहाँ सरकार मीडिया के लिए ऐसा कानून ला रही है जहाँ जर्नलिस्ट को अपनी ख़बर का सोर्स क़ानूनन बताना पड़ सकता है।
यह देश की मीडिया को “घोषित “ तरीक़े से मृत् करने का अंतिम हथियार होगा।वरना 99% तो अभी बिना कहे मृत है।
सोचिए अगर क़ानून पास हो गया तो क्या दो चुनाव आयुक्त ने भी ज्ञानेश कुमार के सामने विरोध जताया यह स्टोरी कभी आ पाती ?
हैरानी एयर सुखद आश्चर्य है कि कई मीडिया हाउस इसका विरोध कर रही है। वह ग्रुप भी जो सरकार का “ प्रोपेगंडा टूल” बनकर काम कर रहे हैं!
The Hindu has reported about 60000 form 7s filled by EROs without citing reason.
Same trend @AnjanaMeenakshi noticed in Andhra too. But when we asked, EROs said the portal does not allow them to fill reason.
What’s the use of such a portal @ECISVEEP?
https://t.co/19P0Y0pqKH
अंकिता भंडारी मर्डर केस -
आखिरकार जैसा सोच रहे थे, वैसा ही हुआ। देहरादून की CBI कोर्ट में आज नार्को टेस्ट पर सुनवाई टल गई। उर्मिला राठौर जेल में है। वहीं, सुरेश राठौर ने तबियत खराब होने की मेडिकल रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी। अब कोर्ट फिर नई डेट देगा।
आज उर्मिला को कोर्ट में पेश होकर नार्को टेस्ट की सहमति देनी थी, उससे पहले ही उन्हें उत्तराखंड पुलिस ने अलग केस में अरेस्ट कर जेल भेज दिया।
सुरेश राठौर ने उर्मिला से फोनिन बातचीत में जिस दुष्यंत गौतम का अंकिता भंडारी मर्डर केस में नाम लिया था, उसकी सच्चाई जानने के लिए CBI दोनों का नार्को टेस्ट कराना चाहती है।
At least 61,059 Form-7 applications seeking the deletion of names from Karnataka’s electoral rolls were filed by election officials themselves, with not a single application mentioning a reason for the deletion, a mandatory requirement under the Registration of Electors Rules, 1960.
✍️@pon_vasanth and @rishitaakhanna
https://t.co/0tewANrH2Y
If Prasar Bharati can spend ₹15 crore a year on a DD News show featuring a star anchor, while the ISRO Chairman’s basic pay is about ₹27 lakh a year, shouldn’t we rethink our priorities? If India wants to conquer space and attract our finest scientific minds, our rewards must match our ambitions.
अच्छा है कि सोशल मीडिया में माध्यम से ही सही चुनाव आयोग अपने असली रंग में एक्सपोज़ हो रहा है।
यह देश के चुनाव आयोग का रिस्पांस है लोगों की शिकायत पर।
गलती की लेकिन उसके बाद अहंकार,दंभ और “जो करना है कर लो” वाला तर्क देखे! इससे अच्छा राजनीतिक दल ही खोल ले आयोग!
राहुल गांधी संवैधानिक पद पर नहीं हैं!
@RahulGandhi कहां जाते हैं किससे मिलते हैं इसमें दिलचस्पी अच्छी बात है लेकिन एक जरूरी तथ्य ये है कि नेता प्रतिपक्ष संवैधानिक नहीं, वैधानिक पद है! इसे 'संसद में विपक्ष के नेताओं के वेतन और भत्ते अधिनियम, 1977' के तहत वैधानिक मान्यता दी गई है जिसमें कैबिनेट मंत्री के समकक्ष वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाओं का प्रावधान है ... कुछ दिनों पहले बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की बात कही थी लेकिन सदन में उनके खिलाफ ऐसा कोई प्रस्ताव लाकर ऐसा नहीं किया जा सकता है, केवल संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ ही सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है. इसलिये संवैधानिक और वैधानिक पद का यह फर्क मामूली नहीं @manishdekoder
मध्य प्रदेश से एक छोटी सी घटना सामने आई है. खरगोन जिले में नर्मदा नदी से 400 से ज्यादा Voter ID कार्ड मिले हैं.
इन कार्डों पर इंदौर के तिलक नगर, आस्था पैलेस सहित अन्य स्थानों के पते दर्ज हैं.
कौन है जो Voter ID नदी में बहा रहा है? ये सवाल आप ज्ञानू से नहीं कर सकते.
This is the response from the chief electoral officer of Uttar Pradesh. They are not even pretending to sound neural. That's the election commission of India. Rigged is an understatement.
🚨 URGENT JOB OFFER FOR MR. KANWAL SIBAL! 😂
Dear Mr. @KanwalSibal,
I run a coaching institute for UPSC Civil Services aspirants, and after carefully examining your recent intellectual masterpieces on X, I am delighted to offer you the position of Senior Mentor – Democracy, Constitution & Diplomatic Etiquette....
Since retirement seems to have left you with plenty of time for X, why not put your extraordinary wisdom to productive use? 😊
Your teaching responsibilities will include:
Course 1: Freedom of Speech...
Indians may speak freely, provided they don't speak abroad.
Course 2: Judicial Independence...
Never question anything until the Supreme Court delivers its verdict.
Course 3: International Relations... An interview in London is an international conspiracy.
Course 4: Constitutional Morality...
Democracy means everyone is free to agree with Mr. Sibal.
Course 5: Diplomatic Etiquette...
When you cannot counter an argument, question someone's upbringing.
Course 6: Critical Thinking...
Stop thinking critically. Have faith and wait for the verdict.
SPECIAL ASSIGNMENT: Teach students how to defend democracy without allowing anyone to question those in power.
Salary: Negotiable.
Qualifications: Former Foreign Secretary, unlimited confidence and an exceptional ability to discover international conspiracies in ordinary podcasts.
One small condition, Mr. Sibal: You'll have to explain your arguments to UPSC aspirants. Unlike your X followers, they might actually ask follow-up questions. 😂
Looking forward to your application.
Director,
🙏😂
⁉️ देश का चुनाव आयोग पुलिस के डबल लेयर सुरक्षा घेरे में है।
लोकतंत्र का मतलब सिर्फ सरकार नहीं होता बल्कि स्वतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाएं भी होती हैं जिसके मजबूत स्तंभ पर जनविश्वास खड़ा होता है।
❓हाल के महीनों में चुनाव आयोग की साख पर लगा बट्टा पुलिसिया बैरिकेडिंग से नहीं मिटेगा, बल्कि
📍चुनाव आयोग के जवाबों से हटेगा जो सवाल पब्लिक डोमेन में है।
📍इतने दिनों के बाद भी अगर चुनाव आयोग एक ज्वाइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित नहीं कर पा रहा, तो यह गंभीर सवाल खड़ी करता है!
🚨EC cites “trade secrets and commercial confidence” to deny info about software used for SIR. It also says divulging information on who reviews flagged anomalies might “endanger” their lives. Reiterates that EROs remain the statutory authority to prepare rolls. @htTweets
बाराबंकी के पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज बरौली, जाटा को परीक्षा केंद्र बनाया गया है। यह सेंटर अयोध्या हाईवे से करीब 8 किमी अंदर गांव में है। यहां आने-जाने के लिए कोई सवारी साधन नहीं है। साधन नहीं मिलने से एक छात्रा परीक्षा केंद्र पर देर से पहुंची।
छात्रा ने डायल-112 पर कॉल कर मदद मांगी। पीआरवी पुलिस उसे सुबह 9:55 बजे केंद्र लेकर पहुंची, लेकिन देरी का हवाला देकर प्रवेश नहीं दिया गया। छात्रा गेट पर पुलिसकर्मियों से एंट्री देने की गुहार लगाती रही, लेकिन उसे अंदर नहीं जाने दिया गया। वह काफी देर तक गेट के बाहर खड़ी रोती रही। इसके बाद पीआरवी पुलिस छात्रा को लेकर लौट गई।
क्या यह किताब आ पाएगी? एक और किताब जिसपर होगी बहस।
जो इतिहास भूलता है वह उसे दोहराने का अभिशाप भोगता है।
UPA के समय इसी तरह बीजेपी पूर्व जज/अधिकारी आदि लोगों की कहानी को “अंतिम सत्य” बताकर सत्ता में आई थी। स्टूडियो मीडिया में तब उसे अखंड सत्य माना था।
अब आज जब कभी नरवने तो कभी कौल तो कभी आरके सिंह आ रहे हैं वैसी कहानी के साथ !