आज मध्य प्रदेश के इंदौर में सवर्ण समाज सड़कों पर! UGC के काले नियमों के खिलाफ पूरे प्रदेश में प्रदर्शन।
राजस्थान के बाद अब MP के हर कोने से सवर्ण समाज का आंदोलन तेज हो रहा है, BJP के लिए मुश्किले लगातार बढ़ रही हैं!
ब्राह्मण ने किसी का शोषण नहीं किया, हमारी खामोशी को कायरता मत समझना। द्वंद्व कहाँ तक पाला जाए, युद्ध कहाँ तक टाला जाए, तू है परशुराम का वंशज, फेंक जहाँ तक भाला जाए।
नरोत्तम मिश्रा का धाकड़ बयान 🔥
@BhaiPreetSingh जी की अध्यक्षता में SC ST Act और UGC Rollback के खिलाफ महत्वपूर्ण बैठक हुई!
यकीन मानिए यह चिंगारी जलती रहनी चाहिए, सदियों में एक बार उठती है ऐसी क्रांति की ज्वाला।
जिसका डर था, वही हुआ। वाराणसी के शास्त्री घाट पर भूख हड़ताल पर बैठे लोगों को पुलिस ने रात में हटा दिया।
खुद सुनिए, रात में उनके साथ क्या हुआ। अविश्वसनीय
वाराणसी में UGC, SC-ST Act और आरक्षण को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे लोगो की तबीयत बिगड़ चुकी है।
न सरकार सुन रही, न कोई चर्चा। अगर कोई और समुदाय होता तो अब तक हंगामा मच चुका होता।
रामदास आठवले जी, पहले कांग्रेस-NCP, फिर NDA, सालों से एक ही सीट और सीमित जनाधार के बावजूद सत्ता में मंत्री पद मिलता रहा। इसे प्रतिनिधित्व कहें या मौकापरस्ती?
और अब आरक्षण की समीक्षा पर सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। आरक्षण पर बहस से डर क्यों? समीक्षा की मांग दबाना लोकतंत्र नहीं, अपनी राजनीति बचाना है।
ज़मीनी हकीकत और हमारा अधिकार
यह एक बेहद कड़वी सच्चाई है कि इक्कीसवीं सदी के इस आधुनिक दौर में भी जातिवाद हमारे समाज की रगों में एक धीमे ज़हर की तरह दौड़ रहा है। ज़मीनी हकीकत यह है कि आज भी गाँवों की सीमाओं के बाहर हमारी अलग बस्तियां हैं, और शहरों में पूरे पैसे होने के बावजूद हमें कई कॉलोनियों में मकान या फ्लैट देने से अघोषित रूप से मना कर दिया जाता है। मंदिरों की पंगतियों से लेकर सोशल मीडिया तक, हर जगह जाति हमारी योग्यता और हमारे इंसान होने पर हावी कर दी जाती है। हम हर मुद्दे पर स्वस्थ संवाद और चर्चा के लिए हमेशा तैयार हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर मीम्स की आड़ में भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी का अपमान और आरक्षित समाज के बच्चों के साथ हो रहा जातिगत भेदभाव किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। यह महज़ कोई पुरानी कुरीति नहीं, बल्कि एक सोची-समझी व्यवस्था है जो समाज के एक बड़े हिस्से को जानबूझकर मुख्यधारा और सम्मानजनक जीवन से आज भी दूर रखे हुए है।
इसी अदृश्य लेकिन मज़बूत दीवार को तोड़ने के लिए आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि हमारा संवैधानिक अधिकार और प्रतिनिधित्व का एकमात्र हथियार है। लोकतंत्र में आपको जो चाहिए वह ज़रूर मांगें; यहां तक कि हमने भी EWS (आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग) की आर्थिक सीमा बढ़ाने की मांग का समर्थन किया है। लेकिन किसी और को जो अधिकार मिल रहा है, उसे छीनने की मानसिकता ठीक नहीं है। जब तक समाज में यह जातिगत भेदभाव ज़िंदा है, तब तक न केवल सरकारी बल्कि प्राइवेट सेक्टर (निजी क्षेत्र) में भी आरक्षण लागू होना ही चाहिए। जो लोग वातानुकूलित (AC) कमरों में बैठकर आरक्षण खत्म करने की वकालत करते हैं, उन्हें ज़मीनी हकीकत समझकर ही चर्चा करनी चाहिए। हमारी स्पष्ट चुनौती है पहले आप ज़मीन पर उतरकर, गाँवों और शहरों से इस सड़ी-गली जाति व्यवस्था को जड़ से खत्म करने का काम करें। जिस दिन इस देश से जाति और उसके आधार पर होने वाला भेदभाव पूरी तरह मिट जाएगा, हम खुद आगे बढ़कर अपना आरक्षण छोड़ देंगे।
Call it policy, call it politics but these decisions must be questioned. Look at what the government has done in recent years. 👇
> 27% reservation in Sainik Schools.
> SC/ST reservation expanded in medical education.
> SC/ST Act amended — 2018.
> Odisha increased reservation in medical/technical education to 50%.
> SC/ST Act offences increased from 22 to 47.
> SC/ST relief amounts increased up to ₹8.25 lakh.
> SC/ST/OBC students provided hostel and welfare facilities.
> UGC Equity Regulations introduced — 2026.
> NCBC given constitutional status.
> States empowered to maintain their own OBC lists.
अगर सरकार सोच रही है कि एक व्यक्ति को फुसलाकर सवर्ण समाज की पूरी माँगों से बच जाएगी और UP चुनाव तक टालमटोल करती रहेगी, तो यह भ्रम जल्द टूटेगा।
RHA Reforms की माँगें स्पष्ट हैं। जब तक सभी माँगें पूरी नहीं होतीं, आंदोलन किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेगा।
21 अगस्त को जंतर मंतर पर हुए आंदोलन के उपरान्त पूर्व निर्धारित समय के अनुसार श्री हर्ष दुबे, श्री रण बहादुर सिंह चौहान व श्री मृत्युंजय पाठक, टीम के सदस्यों से सौहार्द पूर्ण वार्ता हुई। इस क्रम में हम शीघ्र ही फिर मिलेंगे।
Himachal Pradesh removes the caste column from school admission forms.
If caste doesn’t define a student, why should it define opportunity through reservation? 🤷
Kudos to @roypranesh and TIMES NOW for consistently bringing our issues to prime time and giving them the debate they deserve.
Merit deserves the spotlight! 👏
यह देश का पहला ऐसा आंदोलन है, जिसमें न पक्ष साथ है, न विपक्ष साथ है, सरकार का विरोध करने वाले भी इसके साथ नहीं हैं, और वे भी साथ नहीं हैं जो कल तक खुद को कॉकरोच कहकर अपनी पहचान बताते थे।
कोई बात नहीं, हम अपना हक लड़कर लेना जानते हैं।
आरक्षण में समीक्षा क्यों जरूरी है?
बिहार की 6 SC-आरक्षित लोकसभा सीटों पर नज़र डालिए 4 सीटों पर राजनीतिक परिवार और विरासत वाले चेहरे बैठे हैं।
हाजीपुर-जमुई में पासवान परिवार, समस्तीपुर में मंत्री की बेटी शांभवी चौधरी, गया में खुद जीतन राम मांझी।
सवाल अब सिर्फ़ आरक्षण का नहीं, व्यवस्था की नीयत का है। आरक्षण का फायदा सबसे गरीब, सबसे वंचित को मिल रहा है या सिर्फ़ सत्ता के परिवारों को?
अजय आलोक जी, आपने कहा सवर्णों को आरक्षण की समीक्षा पर बात करने का अधिकार किसने दिया? सवर्ण होते कौन हैं?
अब मेरा सवाल क्या आप सवर्ण समाज के ठेकेदार हैं? आपको किसने हक़ दिया?
आपके दोनों बच्चे विदेश में पढ़ते हैं और जैसा आपने खुद बताया था, वे अमेरिकी नागरिक हैं।
चिराग पासवान जी, आरक्षण स्थायी जागीर नहीं, इसकी समीक्षा अनिवार्य है।
आपके तर्क को ही देख लीजिए। जिन पुरानी घटनाओं को आप आरक्षण के समर्थन का ढाल बना रहे हैं, वे आज महज अपवाद रह गई हैं। उससे लाखों गुना ज्यादा अन्याय, उत्पीड़न और अवसरों का छिनना आज सवर्ण समाज के युवाओं के साथ हो रहा है।
आप खुद देख लीजिए जहाँ चाहे जा सकते हैं, जहाँ चाहे घूम सकते हैं, बड़े-बड़े महलों में रह सकते हैं, सत्ता के शीर्ष तक पहुँच सकते हैं। आपके पिताजी कई बार मंत्री रह चुके हैं। आपके साथ कौन-सा भेदभाव हुआ?
योग्यता को कुचलकर सिर्फ़ जाति की आड़ में लाखों मेधावी बच्चों का भविष्य बर्बाद करना बंद कीजिए।
क्या आरक्षण को केवल किसी के कह देने भर से समाप्त किया जा सकता है? आरक्षण कोई खैरात नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकार है। इसे समाप्त करने की बात तो दूर, इसकी समीक्षा या इसमें बदलाव की सोच भी उन लोगों की सोच को दर्शाती है, जो यह नहीं समझते कि आरक्षण आज भी क्यों आवश्यक है।
आज भी सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। दलित दूल्हे को घोड़ी चढ़ने से रोका जाता है, दलित युवक की बारात रोक दी जाती है और कई जगहों पर दलित नेताओं के मंदिर जाने के बाद परिसर को गंगाजल से शुद्ध करने जैसी घटनाएं सामने आती हैं। ये घटनाएं बताती हैं कि छुआछूत और भेदभाव की मानसिकता आज भी समाज में मौजूद है।
ऐसे में आरक्षण की आवश्यकता को कैसे नकारा जा सकता है?
मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जब तक मैं यहां हूं और जब तक रामविलास पासवान जी का बेटा चिराग पासवान सरकार का हिस्सा है, तब तक आरक्षण की व्यवस्था को कमजोर या समाप्त करने की किसी भी कोशिश को स्वीकार नहीं किया जाएगा।